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साहित्योत्सव 2022 के 5वें दिन शशि थरूर ने दिया सवंत्सर व्याख्यान

साहित्य अकादेमी के साहित्योत्सव के 5वें दिन का मुख्य आकर्षण शशि थरूर का संवत्सर व्याख्यान, ट्रांसजेंडर कवि सम्मिलन और मीडिया और साहित्य विषय पर परिसंवाद रहा.

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साहित्य अकादेमी संवत्सर व्याख्यान में शशि थरूर साहित्य अकादेमी संवत्सर व्याख्यान में शशि थरूर

साहित्य अकादेमी के साहित्योत्सव के 5वें दिन का मुख्य आकर्षण शशि थरूर का संवत्सर व्याख्यान, ट्रांसजेंडर कवि सम्मिलन और मीडिया और साहित्य विषय पर परिसंवाद रहा. शशि थरूर के व्याख्यान का विषय 'द ग्रेट इंडियन नॉवल' था, जिसमें उन्होंने महाभारत के विभिन्न अनुवादों और उस पर लिखे गए शोध और आलोचनात्मक ग्रंथों के सहारे उसकी व्यापकता को प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारतीय संस्कृति का प्रतीक है, इसमें हमारी पूरी विरासत समाई हुई है. इस पुस्तक में ऐसे असंख्य रूपक हैं जो हमारी वर्तमान परिस्थिति की हर दशा को प्रतिबिंबित करते हैं. मैं महाभारत को आम लोगों का महाभारत मानता हूं. उन्होंने विभिन्न कला माध्यमों में महाभारत के रूपांतरण पर भी विस्तार से प्रकाश डाला. आगे उन्होंने कहा कि महाभारत मेरे लिए एक धर्मनिरपेक्ष ग्रंथ है और मैं इसके द्वारा भारत के ज्ञान और धर्म की परिभाषा का पुनर्निरीक्षण करना चाहता हूं.
'मीडिया और साहित्य' विषय पर आयोजित परिचर्चा के उद्घाटन सत्र के विशिष्ट अतिथि प्रख्यात लेखक और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र राव ने कहा कि साहित्य और मीडिया के बीच दूरी ज़रूर बढ़ी है, लेकिन दोनों का महत्त्व कम नहीं हुआ. एक समय में साहित्यकार पत्रकारिता की तरफ उन्मुख हुए लेकिन जैसे-जैसे पत्रकारिता बाज़ारवाद के प्रभाव में आती गई, उसके साहित्यिक सरोकार सीमित होते गए. आगे उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कारण अब आम आदमी भी पत्रकार की भूमिका में है और अपने आस-पास जरा भी कुछ ग़लत होते देख तुरंत सक्रिय हो जाता है. 
उद्घाटन वक्तव्य देते हुए आकाशवाणी के महानिदेशक एन. वेणुधर रेड्डी ने कहा कि साहित्य और मीडिया एक ही सिक्के दो पहलू हैं. युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति रुचि पैदा करने के लिए आकाशवाणी विशेष तौर पर प्रयास कर रही है. उन्होंने नई तकनीक के संतुलित प्रयोग को उचित ठहराया. 
अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रख्यात मराठी लेखक विश्वास पाटिल ने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता की पुरानी परंपरा अब खत्म हो चुकी है. साथ ही, संपादक जो अपने आप में एक संस्था की हैसियत रखते थे, अपना वजूद खो चुके हैं. आगे उन्होंने कहा कि कोरोना काल से एक बात स्पष्ट रूप से कही जा सकती है कि लोग अखबार के बिना रह सकते हैं, साहित्य के बिना नहीं. 
समापन वक्तव्य में साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि शहरी पत्रकारिता विशेषतौर पर साहित्य से विमुख हुई है, लेकिन क्षेत्रीय पत्रकारिता में अभी भी उम्मीद की किरण बची है. संवाद सत्र की अध्यक्षता आलोक मेहता ने की, जिसमें क्षमा शर्मा, मधुकर उपाध्याय, मधुसूदन आनंद, प्रताप सोमवंशी, सरजू काटकर, सईद अंसारी एवं एस.आर. विजयशंकर ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर साहित्य का प्रभाव विषयक संगोष्ठी के चतुर्थ सत्र की अध्यक्षता सुमन्यु शतपथी ने की तथा सचिन सी. केतकर, ओम द्विवेदी तथा सायंतन दासगुप्त ने आलेख प्रस्तुत किए. संगोष्ठी का पंचम सत्र 'स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता की भूमिका' विषय पर था, जिसकी अध्यक्षता बल्देव भाई शर्मा ने की तथा मालन वी. नारायणन, अनंत विजय तथा मधु आचार्य 'आशावादी' ने आलेख प्रस्तुत किए. 
छठा सत्र 'भारतीय कथा साहित्य में स्वतंत्रता की तड़प' विषय पर था जिसमें बी. तिरुपति राय, दर्शना धोळकिया तथा गौरहरि दास ने आलेख-पाठ प्रस्तुत किए. सप्तम सत्र 'लोक साहित्य और स्वतंत्रता आंदोलन' विषय पर था जिसकी अध्यक्षता सितांशु यशश्चंद्र ने की तथा प्रदीप ज्योति महंत तथा फ़ारूक़ फ़याज़ ने अपने आलेख-पाठ प्रस्तुत किए.
साहित्योत्सव में आज ट्रांसजेंडर कवि सम्मिलन का आयोजन भी किया गया जिसके विशिष्ट अतिथि प्रख्यात गुजराती कवि विनोद जोशी थे. जोशी ने कहा कि हम जन्म से दो चीजे लेकर आए हैं भाषा और लैंगिक समानता. उन्होंने कहा कि ट्रांसजेंडर कोई दूसरे नहीं है हमारे अपने हैं. 
साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने कहा कि समाज ट्रांसजेंडर को अलग दृष्टि से देखता है लेकिन साहित्य में अनेक स्वर सुनाई देते हैं. उन्होंने उम्मीद जताई की यह वर्ग भी कविता और साहित्य की अन्य विधाओं के माध्यम से समाज की अवधारणा को बदल सकेगा. 
सम्मिलन के कविता-पाठ सत्र में पार्थसारथी मजुमदार (बाङ्ला), मीरा परिडा (ओड़िआ), दिशा शेख़ (मराठी), रेशमा प्रसाद (हिंदी), कल्कि सुब्रमणियम (तमिळ) ने अपनी कविताएँ प्रस्तुत की. प्रथम सत्र की अध्यक्षता मानवी बंद्योपाध्याय ने की तथा मृत्तिका (अभिजित चटर्जी) (बाङ्ला), धनंजय चौहान (हिंदी), ऋत्विक चक्रवर्ती (हिंदी), विजयाराजमल्लिका (मलयाळम्), साधना मिश्र (ओड़िआ) तथा मनीषा महंत (उर्दू) ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं.
 

 

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