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प्रेम कहानीः वो दूर कैसे चली गई

वाकई हम जब प्यार में होते हैं तो हमारे सपनों को लग जाते हैं पंख. फूलों पर उतर आती है खूशबू. चांद की रोशनी अचानक से बढ़ जाती है. चिड़िया चहचहाने, नदियां गाने, झरने संगीत छेड़ेने, और पहाड़ बुलाने लगते हैं. ...और भी क्या कुछ घटता है प्यार में? पढ़िए, दिल को धड़का देने वाली यह कहानी.

प्रतीकात्मक चित्र प्रतीकात्मक चित्र

हम नये नये उस मोहल्ले में पंहुच थे. पिता का ट्रांसफर हुआ था. हमे जो घर किराये पर मिला था उसके ठीक सामने एक विशालकाय कोठी थी. ये शहर का एक नामी गिरामी परिवार था. दौलत थी. नौकर चाकर थे. गाड़ियां थीं.

कोठी में पांच भाईयों के संयुक्त परिवार के होने से काफी चहल-पहल रहती थी. ईश परिवार की धर्म कर्म में बड़ी आस्था थी. हर रविवार को कथा होती. दूर-दूर से लोग आते. शहर के जाने माने व्यापारी थे, तो उनके यहां आना लोग अपना सौभाग्य समझते.

इसी वक्त कुछ बच्चे जवान हो रहे थे.  कोठी में भी और आसपास बने मकानो में भी. हालांकि दोनों की हैसियत में ज़मीन आसमान का फर्क था. पड़ोसियों को कोठी के भीतर घुसने की इजाज़त नहीं थी. लेकिन बच्चों की आंखें चार होने लगीं थीं.

वो दौर रेडियो स्टेशन का था. हमारे शहर में उन दिनों मीडियम वेव पर रेडियो नजीबाबाद आता था. रेडियो नेपाल भी आता था. रात को कभी-कभी पाकिस्तान के स्टेशन भी पकड़ में आ जाते थे. लेकिन असल खेल दिन में होता था. पहले आकाशवाणी से पता नहीं क्यों ज़्यादातर फिल्म 'लैला मजनूं' के गाने बजते रहते.

उस रेशमी पाजेब की झंकार के सदके, जिसने ये पहनायी है उस दिल दार के सदके

और

तेरे दर पर आया हूं  कुछ करके जाउंगा, झोली भरके जाऊंगा या मरके जाऊंगा

या फिर

हुस्न हाज़िर है मुहब्बत की सज़ा पाने को, कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को

ये गाने बजते रहते. दोनों तरफ रेडियो बजता था. अहाते में भी और दूसरे तरफ बने मकानों में भी.

लवस्टोरी फिल्म के गाने भी उस वक्त काफी मकबूल हुए थे. सबसे खास था-

याद  आ रही है तेरी याद आ रही है

याद आने से तेरे जाने से जान जा रही है

एक और गाना था

कैसा तेरा प्यार कैसा गुस्सा है तेरा, तौबा सनम तौबा सनम...

या फिर

ये लड़की ज़रा सी दीवानी लगती है मुझे तो ये गुड़िया जापानी लगती है

और

देखो मैंने देखा है ये एक सपना, फूलों के शहर में हो घर अपना

इन गानों ने 15-16 साल के बच्चों को आपस में बांध दिया था. भले ही उनमें बातें ना होती हों लेकिन वो संगीत के तारों से बंध चुके थे. उनमें मुकाबला होता रहता.

उस कोठी में एक लड़की खास थी. तीन भाई बहनों में दूसरे नंबर की थी. सांवला रंग. लंबा कद. लंबे बाल. मनोहारी चाल. जिधर से गुज़रती थी सबकी नज़रें उस तरफ घूम जातीं. वो खाली वक्त में बरामदे में आकर बैठ जाती. गाने सुनती रहती.

मैं और मेरा दोस्त दोनों अगल बगल रहते थे. वो जानती थी कि हम दोनों की निगाहें हर वक्त उस पर रहती हैं. ये हम भी जानते थे कि उसकी नज़रें हम पर रहती हैं. हम दोनों वैसे तो हमप्याला, हम निवाला थे, पर उससे इश्क की बातें हम एकदूसरे से छिपाते.  हम दोनों को यह गुमान था कि वो हमीं को पसंद करती है.

वक्त गुज़रता रहा... फिर आयी फिल्म इक दूज के लिये. गाने तो उसके भी सुपर डुपर हिट थे ही. लेकिन इस फिल्म ने हम मौन प्रेमियों को संवाद का नया तरीका दे दिया. अब अक्सर हमारे घरों की लाईट जलने बुझने लगी. यहां घर दो नहीं होते थे. एक साथ तीन घरों की लाईटें जलती थीं.

कोई नहीं जानता था कि ऐसा क्यूं हो रहा है. किसके लिये हो रहा है लेकिन इक उम्मीद थी. यह उस पहले प्यार की कशिश थी जो अभी अभी इकतरफा जन्म ले रही थी.

मैं इक रोज़ साईकिल से अपनी ट्यूशन क्लास जा रहा था. ये वो वक्त होता था जब वो अपने स्कूल से वापस आती थी. स्कूली रिक्शा में काफी बच्चे ठूसे रहते थे. तो उस रोज़ मैं जा रहा था और उसका रिक्शा आ रहा था. अचानक हम दोनों की नज़रे मिलीं तो मैंने उसे अपनी ओर देखता हुआ पाया. उसने झट से दांतों से अपने निचले होंठ दबाते हुए नज़रें चुरा लीं. मानो उसकी कोई चोरी पकड़ी गयी हो.

उसने चाहे जो महसूसा हो, पर मेरा दिल तो बाग बाग हो गया. मानो कोई जन्नत मिल गयी हो. मुझे लगने लगा कि हो ना हो मुझे वो भी वैसे ही चाहती है जैसे मैं उसे चाहता हूं. इस रविवार को हमारे रेडियो ट्रांज़िस्टर का वॉल्यूम और तेज़ हो गया. गाने और बजने लगे. हालांकि रेडियो के ये गाने अब माईग्रेट हो चुके थे. अब दर्द फिल्म के गाने हमें भाने लगे थे.

प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा, ये हसीं दर्द ही दो दिलों का है सहारा...

या फिर

अहले दिल यूं भी निभा लेते हैं, दर्द सीने में छुपा लेते हैं....

और 

ना जाने क्या हुआ जो तूने छू लिया, खिला गुलाब की तरह मेरा बदन
निखर निखर गयी संवर संवर गयी बना के ज़िंदगी तुझे ए जानेमन

एक और गाना आता था-

ऐसी हसीन चांदनी पहले कभी ना थी
शामिल है इसमें आपके चेहरे का नूर भी...

इन गानो के बीच मैं सपनों के घोड़े पर सवार हो अपनी रूप की रानी के इश्क में आगे बढ़ता कि इसी बीच मुझे पहला झटका लगा. ये पता चला कि उस लड़की ने संगीत सीखने मेरे दोस्त के घर जाना शुरू कर दिया है. मेरे दोस्त के पिताजी संगीत सिखाया करते थे. अब मेरा दोस्त सातवें आसमान पर था. अब उसके दिल में मुझसे ज्यादा मुहब्बत के फूल खिलने लगे थे.

दोस्त अब कमीना हो चला था. अब उसने लड़की के बारे में बात करना बंद कर दिया था. अब वो मुझसे कम मिलता था. अब उसका ज़्यादातर वक्त अपने घर पर बीतता था. वो लड़की संगीत सीखने के बाद दोस्त के घर पर रुक जाती थी. काफी काफी देर तक वहीं रहती थी. घर के सभी सदस्यों से वो काफी घुल-मिल गयी थी.

इधर हम बेहाल हो चुके थे. मुंह फुला कर बैठे थे, पर मनाए कौन? बरसों की दोस्ती में अब दरार पड़ चुकी थी. मैं यह तय कर चुका था कि वो दोनों एक दूसरे से मुहब्बत करते हैं. लड़के के परिवार को इस बात की जानकारी हो चुकी थी. लेकिन लड़की का परिवार से बात से बेपरवाह था.

हम दोस्तों की बातचीत टूट चुकी थी. वो उसी लड़की की मुहब्बत में गिरफ्तार था, जिसके इश्क ने मुझे भी दीवाना बना रखा था. दोस्ती की बातें अब बेमानी थी. मैं अब उसका रकीब था. अपनी मुहब्बत के रास्ते में वो मुझे कतई नहीं आने देना चाहता था.  

सिनेमा हॉल में अब जितेंद्र और श्रीदेवी की तोहफा और मकसद सुपर हिट हो रही थी. अमिताभ बच्चन शराबी बनकर धूम मचा रहे थे. हम गा रहे थे-

मंज़िलें अपनी जगह हैं रास्ते अपनी जगह

प्यार करना जुर्म है तो, जुर्म हमसे हो गया
काबिल-ए-माफी हुआ, करते नहीं ऐसे गुनाह
तंगदिल है ये जहां और संगदिल मेरा सनम
क्या करे जोश-ए-जुनूं और हौसला फिर क्या करे
मंज़िलें अपनी जगह...  

ऐसे ही एक दिन मैं फिल्म देखने गया 'आमने सामने'. ये फिल्म मेरे लिये खास थी. वजह इस सिनेमा में मेरा साथी कोई और नहीं उस लड़की का भाई था. अपने दोस्त से रकीबी के दौर में काफी कोशिश के बाद मैं उस लड़की के भाई के साथ दोस्ती करने में कामयाब हुआ था. उसके साथ हमारी यह पहली फिल्म थी. इस फिल्म में अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ थे. इस फिल्म का एक गाना काफी चला था.

अंदर बाहर बाहर अंदर, हम हैं जहां वहां जलवे...

मैं खुश था कि इसी बहाने उस लड़की के घर जाने, नजदीक होने का कोई तो रास्ता तो निकला. उस से मिलने और बात कर पाने की चाहत में 7-8 साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका था. मैं बीते कल के बारे में सोचने लगा. इस लड़की के लिए हमारी दीवानगी के क्या आलम थे. कैसे शुरुआत हुई थी. कैसे हम उसे देखने के लिए दोस्त के साथ जाते. कैसे वह दोस्त के घर संगीत सीखने जाने लगी. कैसे हमारी दोस्ती उसकी मुहब्बत की परवान चढ़ गई, और कैसे इतने सालों में हमारे बीच सिर्फ एक बार बातचीत हुई थी. वो भी होली की रात. वह भी बातचीत क्या थी शायद एक वाक्य रहा होगा. एक छोटा सा वाक्य. मुझे सोचकर हंसी आ गई.

वह होली का दिन था. हमारे मुहल्ले में परंपरा थी कि हम बच्चे मिलकर सभी घरों से चंदा लेते थे. लकड़ी लेकर आते.. मेरे घर के आंगन के ठीक सामने होलिका सजती, तो मजमा मेरे ही आंगन में लगता. पहले होलिका दहन का कार्यक्रम होता और बाद में रात भर लाउडस्पीकर बजाया जाता. सारी रात हम लड़के मस्ती करते. ऐसी ही होली की एक रात हम लोग मस्ती कर रहे थे. रात करीब दो बजे का वक्त रहा होगा, कि हमारी मस्ती को एक झटका लगा. देखा कि सामने के घर से हाथ में ट्रे पकड़े एक लड़की चली आ रही है. उसे देखकर मेरे तो होश उड़ गये. उसने अपनी ट्रे मेरे सामने की जिसमें चाय से भरे कई कप रखे थे.

'ये आप लोगों के लिये है.' इतना कह कर उसने ट्रे मेरे हाथ में दी और चली गयी.

मैं हैरत से से देखता रहा गया.

मेरे बाकी साथी भी हैरत में थे. जिसका दीवाना पूरा मुहल्ला था. वो रात के दो बजे हमारे लिये चाय लेकर आयी थी. ना जाने क्यूं? क्या वजह थी? कोई नहीं जानता था. उस रात हमारा वो दोस्त वहां नहीं था जिसके घर वो संगीत सीखने जाती थी. उसने हम सबसे मिलना छोड़ दिया था.

खैर हमारे लिए इसके बाद मौसम बदल चुका था. मेरा रूमानी वक्त शायद शुरू हो चुका था. हवा में सर्दियों के आने की आहट आ चुकी थी. मुझे अच्छी तरह से याद है कि वह अक्टूबर की 24 तारीख थी, जब दिन में मैं उसके भाई के साथ फिल्म देख कर लौटा था. मेरे पैर जमीन पर नहीं थे, और मन को पंख लग चुके थे. देर रात हो चुकी थी, पर मैं अपनी ही धुन में अपने प्रेम को परवान चढ़ाने की तरकीबें बुन रहा था कि अचानक  कहीं से ज़ोर ज़ोर से रोने की और चीखने की आवाज़ें आने लगीं. पहले तो समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है. मैं उठ कर बाहर भागा. जब कुछ समझ नहीं या तो छत पर भागा. मेरे पीछे मां-पापा और बहनें भी थी. छत पर पंहुचे तो देखा कि आवाज़े सामने वाली कोठी से आ रही हैं. 

कुछ ही देर में आस पड़ोस के सभी लोग जग चुके थे. हर किसी के चेहरे पर चिंतायें थी. मन में एक सवाल कि हुआ क्या है.

किसी ने कहा कि शाम तक को सब ठीक था. मैं तो भाई साहब से मिला ही था. किसी ने कहा कि उसने बच्चों को वापस लौटते देखा है. किसी ने कहा कि वो लड़की तो सुबह ही कहीं गयी थी. हर किसी ने किसी ना किसी को देखा था. लोगों के हिसाब से सब सही था. तो फिर रोने की आवाज़े क्यूं आ रही हैं.

हिम्मत करके मैं अंदर गया. सोचा कि पता किया जाये कि माजरा क्या. ये परिवार करीब 7-8 साल से यहां रह रहा था. इन सालों में ये शायद यह दूसरा मौका था जब मैं उस घर के अंदर गया था. अहाते में घुसते ही पाया कि हर कोई गुमसुम खड़ा है. महिलाएं रो रही हैं. मेरी नज़र उस छोटे भाई पर पड़ी जिसके साथ मैं दिन में ही पिक्चर देख कर आया था. मैं आहिस्ता से उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रख दिया. उसने मेरी तरफ देखा तो उसकी आंखों में आंसू थे.

मैंने पूछा कि क्या हुआ?

'दीदी नहीं रहीं.' उसने कहा.

'कौन सी दीदी? बड़ी?' मैंने धड़कते दिल से पूछा.

'छोटी.' वो बोला.

मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन निकल गयी. हैरत से मैं उसे देखता रहा गया. शब्द सारे खत्म हो चुके थे.

मेरी पहली मुहब्बत की मौत हो चुकी थी. 8-9 साल में एक मुलाकात, एक वाक्य और आखों देखी घटना. इतने साल बाद भी सब कुछ मेरी आंखों के सामने वैसे ही रुका है जैसे तब.

आजतक नहीं पता कि अचानक वो कैसे चली गयी. क्या हुआ था उसको. किसी ने नहीं बताया. 
 
हर साल जब अक़्टूबर आता है तो वो मेरे साथ रहने लगती है. बार बार मेरे ख्यालों में आती रहती है. दस्तक देती रहती है. नहीं जानता कि ऐसा क्यूं होता है मेरे साथ.   हर साल 24 अक़्टूबर को मैं वो कहता हूं जो मैं उससे कभी कह नहीं पाया- 'आई लव यू नैना.' 
***

 

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