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एक शिक्षक को समर्पित प्रकाश मनु की कहानीः जसोदा बाबू की अमर गाथा

पहाड़ पर एक छोटा सा गांव है, जानकीपुर. खूब हरा-भरा, प्रसन्न. जब-तब बरसने को आतुर काले-ऊदी बादलों और खुले आसमान वाला. सीधे-सादे लोगों के सीधे-सादे भूगोल वाला.

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प्रकृति और शिक्षा (प्रतीकात्मक चित्र) प्रकृति और शिक्षा (प्रतीकात्मक चित्र)

पहाड़ पर एक छोटा सा गांव है, जानकीपुर. खूब हरा-भरा, प्रसन्न. जब-तब बरसने को आतुर काले-ऊदी बादलों और खुले आसमान वाला. सीधे-सादे लोगों के सीधे-सादे भूगोल वाला. ऊंची-नीची पथरीली घाटियों, हरे जंगल, बरसों पुराने एक जलकुंड और अथाह प्रकृति संपदा वाला! यहीं रहते हैं यशोदानंदन जी. देश के नामी विद्वान और जाने-माने लेखक. पर गांव के लोग उन्हें जसोदा बाबू कहकर बुलाते हैं. 
बहुत सी किताबें लिखीं हैं जसोदा बाबू ने, जिनमें अपनी धरती और लोगों के बारे में नई-नई बातें हैं. भारतीय साहित्य और लोककलाओं को लेकर भी उनकी सोच औरों से अलग है. पहाड़ी लोकगीतों पर ऐसी किताब लिखी है उन्होंने, जिसके पन्नों में धरती का संगीत सुनाई देता है और आसमान की बांसुरी. 
लोग पढ़कर चकित होते हैं. जसोदा बाबू की प्रतिभा और विद्वत्ता की प्रशंसा करते हैं. देश-विदेश के लोग जसोदा बाबू को अपने यहां व्याख्यान देने के लिए आदर से आमंत्रित करते हैं. 
जसोदा बाबू शुरू में देश-विदेश में बहुत घूमे. उनके भाषणों की धूम मची. पर इधर कई वर्षों से उन्होंने कहीं भी आना-जाना बंद कर दिया है. कोई अपने यहां आमंत्रित करता है तो अकसर चिट्ठी में लिखते हैं-
"क्षमा करें, मुझे तो अपने गांव जानकीपुर में रहना ही अच्छा लगता है. यही मेरी साधना-भूमि है. यहां के लोगों में बड़ी सरलता है. ये सीधे-सादे लोग इतना प्यार लुटाते हैं कि मैं अकसर उसके बोझ से दब जाता हूं. अब जितना भी जीवन बाकी है, इन्हीं के बीच गुजरेगा."
जानकीपुर के लोग हैरान होते हैं. जसोदा बाबू के पास अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस और भी जाने किन-किन देशों से निमंत्रण आते हैं कि आप आएं, प्राचीन भारतीय संस्कृति और कलाओं के संबंध में हमारा मार्गदर्शन करें. हम आपके विचार सुनना चाहते हैं. पर जसोदा बाबू विनम्रता से इनकार कर देते हैं. चिट्ठी में लिख भेजते हैं-
"मेरे विचार मेरी किताबों में है, आप उन्हें पढ़ लें. पर जानकीपुर से तो मैं एक क्षण के लिए भी अलग नहीं हो सकता."
जानकीपुर में जसोदा बाबू का सारा दिन या तो वहां के सीधे-सादे लोगों के साथ बातें करने, घूमने-फिरने में बीतता है या फिर 'आदर्श पाठशाला' में बैठ बच्चों को पढ़ाने और लिखने-पढ़ने में. वे कहते हैं, "यही मेरा स्वर्ग है. यहां बैठकर जितने अच्छे विचार मन में आते हैं और मैं जितना काम कर लेता हूं, उतना कहीं और हो ही नहीं सकता."
अकसर दूर-दूर से लेखक-पत्रकार जसोदा बाबू से मिलने के लिए जानकीपुर चले आते हैं. जसोदा बाबू बड़े प्यार से उनसे बातें करते हैं और जानकीपुर की कथा सुनाते हैं. साथ ही यह भी कि जानकीपुर का यह नाम कैसे पड़ा?
"क्या इसकी भी कोई कथा है?" सुनने वाले हैरान होकर कहते.
"हां-हां, है क्यों नहीं!...कहते-कहते जसोदा बाबू की निगाहें दूर अंतरिक्ष में कुछ टोने लगतीं. 
फिर धीरे-धीरे सुर में आते हुए बताते कि असल में कोई सौ-सवा सौ साल पहले इस गांव का नाम था- बड़खेड़ा. तब इस गांव में एक विद्वान आए जानकीशरण जी. उन्हें यह गांव इतना सुंदर और मनोरम लगा कि वे यहीं बस गए. उन्होंने गांव के लोगों को पढ़ाने के लिए एक पाठशाला भी खोली, 'आदर्श पाठशाला'. उसमें दूर-दूर के गांवों के बच्चे आकर पढ़ा करते थे. इनमें कई पढ़-लिखकर बहुत ऊंचे उठे, दूर-दूर तक गए और बहुत नाम कमाया. आज भी वह पाठशाला यहां है. जानकी बाबू की याद में ही इस गांव का नाम रखा गया, जानकीपुर. पूरे गांव ने स्वागत किया इस नए नाम का. और अब तो लोग भूल ही गए कि कभी इस गांव का नाम बड़खेड़ा था....
"तो भाई, यही है गांव बड़खेड़ा के जानकीपुर बनने की कहानी." जसोदा बाबू मुसकराकर बात को विराम देते.
पर जैसे भीतर कोई आकुलता सी हो. सो अगले ही पल फिर वे यहीं से बात का सिरा उठा लेते, और थोड़े खोए-खोए ढंग से उसे कुछ और आगे बढ़ाते-
"जानकीशरण जी के बाद इस पाठशाला के प्रधान आचार्य थे अयोध्यानाथ जी. वही मेरे गुरुदेव थे. उनके जाने के बाद उनके अधूरे काम को पूरा करने का जिम्मा मेरा है. इसलिए जितना समय मिलता है, उतना मैं स्कूल के बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में लगाता हूं. खुद भी सीखता हूं और नई-नई किताबें लिखता हूं....बस, यही मेरी कहानी है, यही मेरी जिंदगी का मकसद भी. बहुत जी लिया भाई, बहुत कुछ पाया. और सच पूछो तो इतना कुछ पा लिया कि जितना कभी सोचा भी नहीं था. मैंने तो कभी यह तक नहीं सोचा था कि अपनी जिंदगी में चार अक्षर भी पढ़ पाऊंगा...या कि पढ़ने-लिखने वालों की जमात में बैठ पाऊंगा. सच पूछिए तो इसका श्रेय जानकीशरण जी को ही है. बरसों पहले इस गांव में आकर उन्होंने एक ऐसी कहानी लिख दी, जो उनके जाने पर भी खत्म नहीं हुई. बल्कि अब भी चल रही है. चलती जा रही है...!" 
जसोदा बाबू मुसकराकर यह कथा सुनाते हैं और लोगों के दिलों में खुद-ब-खुद मास्टर जानकीशरण जी की एक मानस-मूर्ति बनने लगती है. कैसा भव्य, कैसा समर्पित रहा होगा उनका व्यक्तित्व, जिससे शिक्षा की एक अलग परिपाटी चला दी.
सचमुच दीये से दीया जलाने वाली बात....
अलबत्ता यह तो रही जानकीपुर गांव की कथा कि बड़खेड़ा गांव का नाम कैसे खुद-ब-खुद जानकीपुर पड़ गया. दूर-दूर से, देश-विदेश से अब इसी नाम से चिट्ठियां आती हैं. आने कहां-कहां से लोग जानकीपुर को ढूंढ़ते हुए, यहां चले आते हैं.
मगर खुद जसोदा बाबू की कथा? क्या जसोदा बाबू के जीवन की भी कोई छिपी हुई कथा है? नहीं तो भला इस गांव से उन्हें इतना मोह कैसे हो गया? सवाल सुनकर जसोदा बाबू अकसर हंसकर टाल जाते हैं. लेकिन कभी-कभार मूड में हों, तो वे यह कहानी सुनाने लगते हैं.
एक दर्दभरी कहानी, जिसे सुनाते हुए जसोदा बाबू के चेहरे पर अकसर उदासी की छाया तैरने लगती है.
आइए, जानकीपुर की हवाओं में बसी हुई वह कहानी सुनें...
***
बहुत पहले-यही कोई साठ बरस पहले इसी जानकीपुर में रहता था जस्सू. वह अकसर मैली कमीज और फटा पाजामा पहने, भेड़-बकरियां चराता दिखाई पड़ जाता. चेहरा बिल्कुल भोला-भाला सा. गोल-मटोल. गोरा, ललछौंहा. लेकिन उस पर एक दर्द छलकता रहता. आंखें जैसे बाहर देखकर भी कुछ न देख रही हों. और व्याकुलता से किसी ऐसी चीज को खोज रही हों, जिसका उसे खुद भी पता न हो.
बहुत कम उम्र रही होगी तब उसकी, यही कोई सात-आठ बरस की. लेकिन इस उम्र में ही वह अनाथ हो गया था. पहले मां गुजरीं और उसके थोड़े अरसे बाद ही पिता भी चल बसे. घर में मिट्टी की दीवारें और कंगाली के सिवा कुछ न था. क्या खाए, कहां रहे? जस्सू की समझ में कुछ नहीं आता था. बस, मां-बाप का प्यार याद करके वह रोता, दिन भर रोता ही रहता. रोते-रोते आवाज गले में फंस जाती. पर आंखों से धार-धार आंसू बहते रहते.
जस्सू का चाचा अवधू भी था उस गांव में. उसका छोटा सा खेत था, साथ ही भेड़-बकरियां भी पालता था. जस्सू को भूख से बेहाल, दर-दर भटकते देखा तो उसने थोड़ी दया दिखाते हुए कहा, "तुम सुबह-शाम दो रोटी मेरे यहां खा लिया करो. लेकिन बदले में तुम्हें ये भेड़-बकरियां चरानी पड़ेंगी." 
साथ ही उसने जस्सू की गरदन पकड़कर बड़े सख्त लहजे में चेतावनी भी दे दी, "काम से जी न चुराना. नहीं तो कान पकड़कर उसी वक्त घर से बाहर निकाल दूंगा."
यों भी चाचा अवधू की आवाज इतनी कर्कश और भारी थी, और लहजा ऐसा सख्त कि सुनते ही जस्सू कांपने लगता था. पर उसने सोचा, कुछ न करने से भेड़-बकरियां चराना ही अच्छा है. फिर भेड़-बकरियों से दोस्ती हो जाएगी तो अपना दुख मुझे याद ही न रहेगा.
अगले दिन से जस्सू भेड़-बकरियां चराने जाने लगा. अकसर भेड़-बकरियां अपने रास्ते चलती जातीं और पीछे-पीछे जस्सू. बस, कोई भेड़-बकरी किसी गड्ढे में गिरने को होती या किसी गलत रास्ते पर पड़ जाती, तो वह उसे संभाल लेता. हर वक्त ध्यान से वह भेड़-बकरियों को देखता रहता और बीच-बीच में पुचकारकर अपना प्यार जताता. धीरे-धीरे सभी भेड़-बकरियां उससे ऐसी हिल-मिल गईं, जैसे उसकी दोस्त हों. 
जस्सू ने सबके अलग-अलग नाम रख दिए थे. कोई धौली, कोई कजरी, कोई भूरी, कोई जमुनी. कोई चंपा, कोई मोतिया. वह उन्हें पुकारता तो पहाड़ी हवाओं में प्यार की एक मीठी फुहार सी बिखर जाती. और जस्सू की भेड़-बकरियां अपने-अपने नामों की पुकार सुनते ही दौड़कर चली आतीं. जैसे जस्सू की गोद में बैठ जाना चाहती हों. और जस्सू प्यार से उनका सिर सहलाने लगता.
इससे वाकई जस्सू का दुख थोड़ा कम हो गया. उसे लगता, अपना अकेलापन बांटने के लिए उसे बहुत से दोस्त मिल गए हैं. लेकिन तो भी, जब-जब मां-बाप की याद आती, उनका प्यार याद आता, उसकी आंखें आंसुओं से भीग जातीं....खासकर मां. वह तो उस पर जान निसार करती थी. थी एकदम दुबली-पतली. बांस जैसी लंबी. टी.बी. की मरीज. पर जस्सू को हर वक्त छाती से चिपकाए रखती. बाद में रोग बढ़ा. ठीक से इलाज भी नहीं हुआ. इसलिए दिनोंदिन कमजोर होती जाती थी. जैसे तोरई की बेल सूख गई हो, और सूखते-सूखते एक दिन...!
जस्सू को एक-एक चीज याद है. एक-एक चीज. यह भी कि जिस दिन मां गई, उस दिन भी बाबू ने शराब पी रखी थी. बगैर शराब के उन्हें चैन ही नहीं पड़ता था.
मां के बाद बाबू ने घर संभालने की बहुत कोशिश की. पर यह उनके बस में न था. बाबू सख्त थे. पढ़ाई पर बहुत जोर देते थे. पर जाने क्यों जस्सू के भीतर कुछ उतरता ही न था. वह पत्थर चेहरा लिए बाबू की ओर देखता रहता और थप्पड़ खाता रहता. 
बाबू से खाई मार का उसे जरा भी अफसोस नहीं. पर जाने क्यों, बाबू जो कुछ पढ़ाते, वह ऊपर-ऊपर से निकल जाता. कुछ भी उसके पल्ले न पड़ता था. वह अपने आप पर झुंझलाता. सोचता, हे भगवान, मैं इतना अभागा क्यों हूं? क्या वाकई मैं जिंदगी भर अनपढ़ रहूंगा? कुछ न पढ़ पाऊंगा, कुछ नहीं...! 
जस्सू अपनी ओर से बार-बार कोशिश करता. पर जाने क्यों, उसे कुछ याद ही नहीं होता था. न तो क, ख, ग वाली वर्णमाला. न गिनती. न पहाड़े. बाबू का गुस्सैल चेहरा देखकर, जो कुछ आता था, वह भी भूल जाता.
फिर एक दिन बाबू को बुखार आया. चक्कर आए और फिर डॉक्टर ने न जाने क्या दवा दी कि उलटियों पर उलटियां. ऐसी बदबूदार कि सारा घर गंधा रहा था. जस्सू ने पानी पिलाना चाहा, पर उन्हें पानी भी नहीं पच रहा था. और फिर जस्सू के देखते ही देखते उनके प्राण-पखेरू उड़ गए....
पर जाने से पहले पता नहीं कैसी करुण नजरों से वे ताकते रहे थे जस्सू की ओर. और पता नहीं क्या कहना चाहते थे कि...जस्सू आज तक उन निगाहों को भूल नहीं पाया....
तब से काफी समय बीत गया. और अब तो जस्सू का घर-परिवार ये भेड़-बकरियां ही हैं, जो दूर से उसका इशारा समझ जाती हैं और उसके पुकारते ही इस तरह दौड़ी आती हैं, जैसे उनमें कोई रेस लगी हो. या फिर वे किसी अदृश्य डोरी से बंधी चली आ रही हों. देखकर जस्सू निहाल हो जाता.
एक दिन जस्सू भेड़-बकरियां चराता हुआ अपनी राह जा रहा था, तो उसे बस्ता और तख्ती लिए, साफ-सुथरे कपड़े पहनकर स्कूल जाते हुए कुछ बच्चे दिखाई पड़े. छोटे-छोटे बच्चे. वे आपस में हंस-हंसकर बातें कर रहे थे. बीच-बीच में अचानक खिलखिला पड़ते. 
जस्सू को सुनाई दिया, एक लड़की कह रही थी, "जल्दी चलो, मास्टर जी क्लास में आ गए होंगे...!"
"अरे बुद्धू, वे डांटते थोड़े ही हैं." एक बिल्कुल छोटी बच्ची की आवाज.
तभी किसी और बच्चे ने कहा, "सच, हमारे मास्टर जी बहुत अच्छे हैं. जरा भी नहीं डांटते. पाठ भूल भी जाओ तो इतने प्यार से समझाते हैं...!"
"हां सच्ची, मुझे रामलीला वाला पाठ पढ़ाया था. कितने प्यार से...!"
ये आवाजें जस्सू के कानों में पड़ीं तो जाने क्यों वह भीतर से बेचैन हो गया. बहुत बेचैन. लगा, पाँव आगे बढ़ने से इनकार कर रहे हैं. ऐसी हालत तो उसकी पहले कभी नहीं हुई थी.
जस्सू सोच रहा था, 'काश, आज मेरे भी मां-बाप होते, तो मैं भी इन बच्चों की तरह स्कूल पढ़ने जाता.'
उसी समय जस्सू को लगा, जैसे उसके पैर जादू से किसी खास दिशा में खिंचते चले जा रहे हैं. उसने भेड़-बकरियों को घेरकर उसी रास्ते पर घुमा लिया जिधर बच्चे जा रहे थे. जस्सू अपनी भेड़-बकरियों के साथ उसी दिशा की ओर चल पड़ा. चलते-चलते वह उसी स्कूल के पिछवाड़े जा पहुंचा. बच्चे स्कूल में जाकर पढ़ने लगे. वे सब मिलकर वर्णमाला याद कर रहे थे, 'क से कबूतर, ख से खरगोश, ग से गधा, घ से घड़ी...!'
जस्सू को याद आया, बाबू भी इसी तरह उसे कभी-कभी वर्णमाला सिखाया करते थे. तब उसे पढ़ाई बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी. पर आज जाने क्या बात थी कि बच्चों की आवाजें सुनकर उस पर जैसे कोई जादू-मंतर सा हो गया. उसका मन हुआ कि वह दौड़कर स्कूल के अंदर चला जाए और उन बच्चों के साथ बैठकर खुद उनके साथ स्वर में स्वर मिलाकर दोहराने लगे, 'क से कबूतर, ख से खरगोश...!'
आज उसे सारी बातें फीकी लग रही थीं और 'क से कबूतर ख से खरगोश, ग से गधा, घ से घड़ी...!' ये स्वर उसे ऐसे मीठे लग रहे थे, जैसे मां कोई प्यारी-प्यारी लोरी या गाना गाया करती थी. बीच-बीच में मास्टर जी की आवाज भी सुनाई पड़ती थी. कोई बच्चा गलत बोलता या उनके सवाल का जवाब न दे पाता तो वे प्यार से उसे टोकते और सही उत्तर बता देते. कभी-कभी पढ़ाई बीच में रोक, वे हंसकर बच्चों से बातें करते थे और कोई छोटी-सी मजेदार कहानी भी सुनाते थे. 
ऐसे ही एक छोटी-सी कहानी उन्होंने सुनाई थी चूहे-बिल्ली की कि कैसे सारे चूहे मिलकर बिल्ली के गले में घंटी बांधने चलते हैं. फिर एक के बाद एक तमाशे होते हैं. बड़े ही मजेदार. बहुत से नौजवान चूहे सभा में उछल-उछलकर अपनी बात कह रहे हैं और मूंछों पर ताव दे रहे हैं. कोई-कोई तो जोश में आकर हवा में कलामुंडियां खा रहे हैं. कुछ मुट्ठियां भींचकर गुस्से में अजीब-अजीब आवाजें निकाल रहे हैं. मगर जब बिल्ली आई तो...! 
कहानी इतनी मजेदार थी और मास्टर जी इतने प्यारे ढंग से उसे सुना रहे थे कि स्कूल के पिछवाड़े बैठा जस्सू उसे सुनकर जोर से खिलखिला उठा था और भेड़-बकरियां उसे चौंककर देखने लगी थीं.
फिर एक दिन बच्चों की आपसी बातों से ही उसे पता चला. मास्टर जी का पूरा नाम है, मास्टर अयोध्यानाथ.
"मास्टर अयोध्यानाथ...!" जस्सू ने बार-बार दोहराया. जैसे यह मास्टर जी का नाम न हो. कोई मंत्र हो, जिसे याद करने से उसे शक्ति मिल रही हो.
आज उसे लगा कि वह अनाथ नहीं है. उसके सिर पर भी एक छत है. छतरी है. और उसका नाम है, मास्टर अयोध्यानाथ...!
***
अब तो जस्सू का यह रोज का नियम ही बन गया था. वह भेड़-बकरियों को उसी दिशा में मोड़ देता, जिधर स्कूल था और स्कूल के पिछवाड़े बैठा बच्चों और मास्टर जी की आवाजें सुनता रहता. कभी वर्णमाला याद करने की आवाजें, कभी गिनती और पहाड़े याद करने की आवाजें. कभी-कभी बच्चों की आपस में लड़ने-झगड़ने की आवाजें. और कभी सबकी एक साथ हंसी और मजाक...! 
सुनकर एकाध दफा तो जस्सू भी हंस पड़ता. सच तो यह है कि उसके कान इन आवाजों को सुनने के लिए तरसते थे.
सबसे अधिक उसे प्रभावित किया था मास्टर जी के व्यवहार ने. उसे यह भी पता चल गया था कि मास्टर जी बहुत विद्वान हैं. दूर-दूर तक उनका नाम है. जस्सू को हैरानी होती कि इतने विद्वान हैं मास्टर जी, लेकिन जरा भी घमंड नही. इतने सरल हैं कि बच्चों को हमेशा हंसाते रहते हैं और खेल-खेल में ही पाठ याद करा देते हैं.
'काश! मैं भी इसी तरह स्कूल जाकर मास्टर अयोध्यानाथ जी से पढ़ पाता.' जस्सू सोचता और सोचते ही उसकी आंखें आंसुओं से भर जातीं. वह अपने दुर्भाग्य को याद करके रोने-सुबकने लगता. मन ही मन बुदबुदाता, 'मैं अभागा हूं, मेरी ऐसी किस्मत कहां?'
तो भी जस्सू ने एक निर्णय कर लिया था. वह मास्टर अयोध्यानाथ जी से ही पढ़ेगा. स्कूल के अंदर नहीं जा सकता तो क्या? स्कूल के बाहर बैठकर ही अपनी पढ़ाई करेगा. मास्टर जी जो-जो पाठ पढ़ाएंगे, वह बाहर बैठा-बैठा याद करता रहेगा.
उसने मन ही मन मास्टर अयोध्यानाथ जी को गुरु मानकर प्रणाम किया और अपनी पढ़ाई शुरू कर दी. और हैरानी की बात यह कि उस दिन के बाद सचमुच उसे बाहर बैठे-बैठे अपने पाठ बहुत अच्छी तरह याद हो जाते. उसने पूरी वर्णमाला याद कर ली. सौ तक गिनती और बीस तक पहाड़े भी. लिखने में उसे मुश्किल आती थी, लेकिन जो भी बात एक बार सुनता, उसे झट याद हो जाती. 
फिर एक मुश्किल यह थी कि लिखने के लिए न खड़िया थी, न चाक. जमीन पर लकड़ी से लकीरें खींच-खींचकर वह किसी तरह काम चलाया करता. फिर भी उसे लगता कि वह भी अब मास्टर जी का शिष्य हो गया है और इसी स्कूल का विद्यार्थी है. उसका काम है, सुबह से शाम तक पढ़ना. 
भेड़-बकरियां मजे से आसपास चरती रहतीं और जस्सू अपनी पढ़ाई में लगा रहता. उसे कहीं से एक फटी हुई पोथी मिल गई थी. उसी की मदद से वह जमीन पर लकड़ी से लकीरें खींच-खींचकर क ख ग लिखता, गिनती और पहाड़े लिखता.
एक दिन जस्सू इसी तरह अपनी पढ़ाई में लगा था कि उसे मास्टर अयोध्यानाथ जी की आवाज सुनाई पड़ी. वे बच्चों से उन्नीस का पहाड़ा पूछ रहे थे. उन्होंने एक बच्चे से पूछा, "उन्नीस निम्मा कितने होते हैं?'
बच्चा चुप! फिर दूसरे, तीसरे, चौथे बच्चे से पूछा. पूरी क्लास में कोई बच्चा नहीं बता सका. मास्टर जी ने दुखी होकर कहा, "कितनी खराब बात है. कल मैंने तुमसे कहा था न, उन्नीस का पहाड़ा याद करके आना. लेकिन तुममें से किसी ने याद नहीं किया. कोई नहीं बता सका कि उन्नीस निम्मा कितने होते हैं...?"
मास्टर जी इसी तरह दुख और क्रोध से मिले-जुले स्वर में बोल रहे थे. तभी अचानक उन्हें सुनाई पड़ा, "एक सौ इकहत्तर...! उन्नीस निम्मा एक सौ इकहत्तर."
मास्टर जी बुरी तरह चौंके- 'कौन बोला, कौन?' उन्होंने इधर-उधर निगाहें घुमाई. मगर सब बच्चे चुप. मास्टर जी को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ. अभी-अभी कोई बोला था या यह उनका भ्रम था? आवाज कहां से आई थी?
इतने में एक बच्चे ने कहा, "मास्टर जी, जस्सू!...यह जस्सू की आवाज थी."
मास्टर अयोध्यानाथ चौंके, "जस्सू?...कौन जस्सू? क्या कह रहे हो तुम?" 
"मास्टर जी वही जो स्कूल के पिछवाड़े बैठा-बैठा जमीन पर लकड़ी से लिखता रहता है, वही जस्सू."
सुनते ही मास्टर जी का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया. वे उसी समय स्कूल से निकले और घूमकर स्कूल के पिछवाड़े जा पहुंचे. पीछे-पीछे क्लास के कुछ बच्चे भी!
वहां मास्टर जी ने जो कुछ देखा, उस पर एक क्षण के लिए तो उन्हें यकीन ही नहीं आया. एकदम मैली फटी कमीज, फटा पाजामा पहने एक बच्चा जमीन पर पालथी लगाकर बैठा था. लकड़ी से खोद-खोदकर जमीन पर वर्णमाला गिनती और पहाड़े लिख रहा था.
मास्टर जी को पास आते देख, वह लड़का चौंक उठा और उठकर खड़ा हो गया. शर्म के मारे उसका चेहरा लाल था. गर्दन झुकी हुई थी.
मास्टर जी ने प्यार से उससे कहा, "तुम्हीं जस्सू हो न? तुम्हारा ही नाम जस्सू है!"
बच्चे ने हां में गर्दन हिलाई. उससे एक शब्द भी नहीं बोला जा रहा था.
"तुम भी स्कूल में पढ़ोगे जस्सू? पढ़ना चाहते हो?" मास्टर जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा. तभी जस्सू एकाएक फूट-फूटकर रो पड़ा. उसका पूरा चेहरा आंसुओं से भीग गया.
मास्टर जी ने उसी समय जस्सू को छाती से लगा लिया. कहा, "तुम पढ़ोगे, जरूर पढ़ोगे. मैं पढ़ाऊंगा तुम्हें. तुम्हारे जैसा बच्चा नहीं पढ़ेगा तो कौन पढ़ेगा?"
कुछ देर बाद जस्सू थोड़ा सहज हुआ, तो उसे चाचा की याद आ गई और अपने हालात भी. बोला, "मास्टर जी, मेरे माता-पिता नहीं हैं. चाचा हैं, वे नहीं चाहते मैं पढ़ूं-लिखूं. वे चाहते हैं, मैं उनकी भेड़-बकरियां चराता रहूं. मेरे पास फीस के पैसे भी नहीं हैं."
"चिंता न करो, मैं मिलूंगा तुम्हारे चाचा से." मास्टर जी ने कहा.
***
उसी दिन मास्टर अयोध्यानाथ जस्सू के चाचा अवधू से जाकर मिले. और उनके आगे जस्सू की जमकर तारीफ की. कहा, "यह लड़का लायक है. बहुत जहीन. पढ़-लिख गया तो तुम्हारे पूरे कुल का नाम रोशन करेगा."
सुनकर चाचा अवधू ने बात को दाएं-बाएं करना चाहा.
"वह तो ठीक है मास्टर जी. पर मैं गरीब आदमी हूं. भला इसकी फीस का इंतजाम कहां से करूंगा?" अवधू ने गरदन हिलाते हुए अपनी लाचारी बताई.
"इसकी चिंता न करो, भाई. इसकी फीस के पैसे मैं अपनी तनखा में से दिया करूंगा. ऐसा लायक बच्चा अनपढ़ रह जाए, यह तो पूरे जानकीपुर गांव का अपमान है."
बस, अगले दिन से जस्सू का उस स्कूल में दाखिल हो गया और जस्सू को इतनी खुशी मिली, इतनी कि मानो उसके जीवन का बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया. अकसर फटे कपड़े पहने वह स्कूल जाता. पैरों में जूते भी नहीं होते थे. हालात बुरे थे, लेकिन चेहरे पर बुद्धिमत्ता की चमक थी. जो भी सवाल मास्टर जी पूछते, झट जवाब दे देता. 
उस साल वह अपनी क्लास में फर्स्ट आया. फिर पांचवीं में आसपास के सारे स्कूलों में उसका पहला नंबर था. उसे सरकारी वजीफा मिलने लगा. आठवीं में पूरे जिले में वह प्रथम आया. 
अब तो चाचा अवधू भी उससे खुश था. जस्सू की वजह से सब तरफ उसका नाम हो रहा था. बधाइयां मिल रही थीं.
हाईस्कूल में पूरे बोर्ड में जस्सू का तीसरा नंबर था. आगे की पढ़ाई के लिए मास्टर अयोध्यानाथ जी ने उसे बनारस भेज दिया. वहां एक स्कूल में बारहवीं पास करने के बाद उसने यूनिवर्सिटी में ऊंची पढ़ाई की. वहीं उसके लेख और किताबें छपने लगी थी. दूर-दूर तक उसका नाम फैलता गया.
एक-एक कर उसने बहुत सी किताबें लिखीं. उन पर बड़े-बड़े पुरस्कार मिले. लेकिन हर बार मास्टर अयोध्यानाथ जी के पास आकर उनके चरणों में बैठकर वह कहता, "मास्टर जी, इसमें मेरा कुछ नहीं है. सब कुछ आपका ही दिया है. आपने उस दिन जस्सू के सिर पर हाथ फेरकर उसके हृदय में ज्ञान का जो दीपक जलाया था, यह उसी का प्रकाश है. सारी दुनिया जिसे यशोदानंदन के रूप में जानती है, वह असल में तो वही आपका जस्सू ही है."
एक दिन जस्सू यानी यशोदानंदन को पेरिस में कला पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया. उसके व्याख्यान की सब ओर धूम मची. पूरी दुनिया से आए विद्वानों ने कहा, "हमें पता नहीं था, भारत में कला को लेकर इतना ऊंचा चिंतन हुआ है."
यशोदानंदन खुशी-खुशी पेरिस से अपने गांव जानकीपुर लौटा. वह जल्दी से जल्दी मास्टर अयोध्यानाथ जी के पास जाकर यह बताना चाह रहा था कि दुनिया में भारतीय कलाओं का कितना सम्मान है....
लेकिन जैसे ही वह जानकीपुर लौटा, उसे पता चला, मास्टर अयोध्यानाथ उसे छोड़कर जा चुके हैं. वे अपने शिष्य जस्सू के लिए दो पंक्तियों का एक छोटा सा पत्र छोड़ गए, 'प्रिय जस्सू, जानकी बाबू के अधूरे काम को जितना आगे मैं बढ़ा सका, मैंने किया. अब यह जिम्मा तुम पर छोड़कर जा रहा हूं.'
बस, उसी दिन जस्सू को अपने जीवन की मंजिल मिल गई. उसी दिन उसने तय कर लिया कि अब सारा जीवन जानकीपुर में ही रहना है. और गुरु जी ने जो ज्ञान का दीपक जलाया था, वैसे दीपक जगह-जगह जलाने हैं....
इतनी कथा सुनाकर जसोदा बाबू चुप हो जाते हैं. और अपनी कल्पना में दूर, बहुत दूर, भविष्य के पार देखने लगते हैं.
इसके आगे न जसोदा बाबू कुछ बोल पाते हैं और न उनसे सवाल पूछने वालों के लिए ही कुछ और कहना बाकी रह जाता है.
***
उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद में 12 मई, 1950 को जन्मे वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु का मूल नाम चंद्रप्रकाश विग है. आपने आगरा कॉलेज से भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. की डिग्री हासिल की, पर साहित्यिक रुझान ने उनके जीवन का ताना-बाना बदल दिया. 1975 में आपने हिंदी साहित्य में एम.ए. किया और 1980 में यूजीसी की फेलोशिप के तहत कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से 'छायावाद एवं परवर्ती काव्य में सौंदर्यानुभूति' विषय पर शोध किया. मनु अब तक शताधिक रचनाओं का सृजन कर चुके हैं. कुछ वर्ष प्राध्यापक रहे और फिर लगभग ढाई दशक तक बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका 'नंदन' के संपादन से जुड़े रहे. फिलहाल प्रसिद्ध साहित्यकारों के संस्मरण, आत्मकथा तथा बाल साहित्य से जुड़ी कुछ बड़ी योजनाओं पर काम कर रहे हैं. संपर्कः प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, मो- 09810602327, ईमेल- prakashmanu333@gmail.com
 

 

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