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कहानी : तुम्हारे इंतज़ार में... | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

रसूलपुर रियासत के मालिक 71 साल के इनायत अली खां साहब, उस टाट के पर्दे वाली झुग्गी के सामने खड़े थे। "कौन है" अंदर से एक औरत की बुज़ु्र्ग आवाज़ आई। खां साहब ने डरते-डरते पर्दा हटाया तो झुर्रियों के जाल वाला एक चेहरा सामने था - हां, वो आफ़रीन ही थी। उनकी 40 साल पुरानी मुहब्बत, जो मुकम्मल न हो सकी। आफ़रीन अब 'बड़ी बी' कहलाती थीं। और वक़्त उनके चेहरे पर झुर्रियों की शक्ल में जाने क्या-क्या लिख गया था। पर उस की धुंधली आंखों में अब भी खां साहब का इंतज़ार बाक़ी था।

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कहानी - तुम्हारे इंतज़ार में ...
कहानी - तुम्हारे इंतज़ार में ...

शाम ढलने लगी थी, बारिश को थमे कुछ ही वक्त हुआ था। हाइवे की उस चौड़ी सड़क पर एक नीली रंग की मंहगी गाड़ी तेज़ रफ्तार चली जा रही थी। कार की पिछली सीट पर शेरवानी पहने बैठे थे इनायत अली खां साहब। सर पर पल्ले वाली टोपी, हाथ में बारीक नक्काशी वाली छड़ी, उम्र तकरीबन इकहत्तर साल। खां साहब कार से पीछे गुज़रते रास्ते को ग़ौर से देख रहे थे। एसी की उस ठंड में भी उनकी कनपटी से पसीने की एक बूंद ढलकती हुई गर्दन को छूने लगी। 

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ड्राइवर ज़रा गाड़ी और तेज़ चलाओ... जल्दी पहुंचना है उन्होंने कहा तो ड्राइवर ने रफ्तार और बढ़ा दी। 
इनायत अली खां साहब रसूलपुर इस्टेट के मालिक थे। खानदानी रईस। रसूलपुर स्टेट में उनकी कई खानदानी हवेलियां थी... जिनमें से एक में वो खुद रहते थे... अपने दो बेटों और पोते-पोतियों के साथ। कुछ साल पहले उनकी बीवी पैंसठ साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गयीं थी। तब से इनायत अली खां साहब ने गोल्फ खेलना भी छोड़ दिया था और खुद को अपनी हवेली के बागीचे में महदूद कर लिया था। 
या तो दिन के वक्त हवेली के बागीचे में बैठकर पुरानी किताबें पढ़ते या फिर पोते-पोतियों के साथ खेलते। खानदानी काम सब बच्चों में तक्सीम कर दिया था। अब ऐसा कुछ नहीं था जिसकी उन्हें फिक्र हो। न कोई तमन्ना बाकी थी, न कोई आरज़ू। 
पर एक दिन उस ठहरे हुए पानी में एक कंकड़ उछल गया। हुआ यूं कि इनायत अली खां साहब के पुराने दोस्त शौकत मिर्ज़ा जो उस ज़माने से उनके दोस्त थे जब लखनऊ यूनिवर्सिटी कैनिंग कॉलेज कहलाती थी, उनका फोन आया। मिर्ज़ा साहब और खां साहब की बातचीत तकरीबन पंद्रह साल बाद हो रही थी। शुरुआती यहां वहां की बातचीत के बाद उन्होंने एक ऐसा राज़ फाश किया कि खां साहब के सकूनभरे माथे पर बल पड़ गए। 
खा साहब ने कहा, यार खां साहब, दो हफ्ते पहले एक बड़ी अजीब बात हुई। हम गए थे नौचंदी वाले मेले के मुशायरे में... वहां से लौटते वक्त जलालपुर में रुकना हुआ... वहां एक औरत मिली... जो लगभग नाबीना है (यानि देख नहीं पाती) पर... पर मुझे लगता है कि ये... ये वही आफरीन है... वही आफरीन... याद तो होगी आफरीन या भूल गए?

आफ़रीन का ज़िक्र आते ही ऐसा लगा जैसे खां साहब को कोई गुज़रे हुए ज़माने में खीचता चला गया। क्या.... आफरीन... वहां? जवानी के दिनों की अपनी अधूरे इश्क का ज़िक्र सुनकर, बस यही तीन जुमले उनकी कांपती आवाज़ से निक सके... 
"हां, यार पूरे ऐतबार से तो नहीं कह सकता लेकिन अंदाजा है कि वो आफरीन ही है। जलालपुर में बहुत बुरे हालात में ज़िंदगी गुज़ार रही है
इस जानकारी ने खां साहब की ज़िंदगी में उबाल ला दिया था। वक्त कुछ सुनी सुनी सी दास्तां सुनाने लगा था, गुज़रे हुए ज़माने की झलकियां आंखों के सामने से गुज़रने लगीं थी।
आज से 40 साल पहले आफ़रीन खां साहब का जुनून थी, तब वो एक जवान और मजबूत कदकाठी का लड़का थे। रसूलपुर के एक जमींदारी घराने का वो लड़का जिसकी मुस्कुराहट पर लड़कियां फिदा थीं, वो जब गांव में अपनी बग्घी पर गुज़रता था तो इलाके की लड़कियां अपना दिल ताम लेती थीं। पतली मोहरी वाली पतलून, कंधों पर कसा हुआ कोट, दिलफरेब मुस्कुराहट और मिली हुई पतल भवें। इलाके का सबसे खूबसूरत नौजवान हुआ करते थे खां साहब... लेकिन उतने हसीन चेहरों के बीच उनका दिल आया था एक ऐसे चेहरे पर जो खूबसूरत तो था, लेकिन उन्हीं की हवेली पर मुलाज़िमा थीं। 
आफ़रीन.... बड़ी बड़ी आंखे, शगुफ्ता मुस्कुरहाट, सर पर दुपट्टा और होंठ के किनारे एक खूबसूरत सा तिल। 
खां साहब की शादी के लिए रिश्ते देखे जा रहे थे, लेकिन वो तो अपना दिल एक ऐसी लड़की को दे बैठे थे जो उन्हीं की हवेली पर काम करती थी। रसोई में खाने की तैयारी करना, आने वाले खास महमानों के हाथ धुलाना, जब फसल कट कर हवेली के बरामदे में आती थी तो वो बाकी औरतों के साथ बैठकर गेहूं छानती... ये वही वक्त था जब खां साहब दो मंज़िल पर पंतग उड़ा रहे होते थे और तनी हुई पतंग की डोर संभालते हुए बार-बार झांक कर नीचे बरामदे की तरफ देखते। 
कभी नज़रें मिल जातीं तो दोनों तरफ से मुस्कुराहट की अदला बदली होती और लगता कि दुनिया कितनी खूबसूरत है। वो शर्म के मारे सर झुका लेती और खां साहब दीवार से टिक कर खड़े हो जाते। 

काम पर ध्यान दे... इधर उधर मत देख... आफरीन की सहेलियां मामले को समझ गयीं थी और वो जानती थीं कि अगर ये रिश्ता आगे बढ़ा भी तो इसका कोई मुस्तकबिल नहीं है। भला ज़मीन और आसमान कहीं कहीं मिलते हुए लगते ज़रूर लेकिन वो असल में कभी नहीं मिलते, वो सिर्फ नज़र का धोखा होता है। 
पर इश्क की तमाम कहानियों में आसमान झुकते भी हैं, ज़मीन उठ खड़ी होती है कभी किसी पहाड़ की शक्ल में औऱ मिल जाते हैं एक दूसरे से। औऱ यही ऐतबार था आफरीन और इनायत अली खां साहब को। वक्त गुज़रा तो इश्क परवान चढ़ने लगा... हवेली में सबकी नज़र बचाकर चलते-गुज़रते वो एक दूसरे को छेड़ देते... कभी कोई जुमला खां साहब कहते हुए गुज़र जाते तो घंटो आफरीन के कान गर्म रहते और चेहरे पर तबस्सुम छाया रहता। 
उन्हें याद था कि एक बार हवेली की छत पर जब खां साहब अकेले बैठे कुछ पढ़ रहे थे तो आफरीन उनके लिए चाय लेकर आई थी। 
लीजिए कहते हुए उसने चाय मेज़ पर रख दी। 
वाह.. चाय तो बहुत अच्छी लग रही है खां साहब ने कहा तो वो हंसते हुए बोली, बिना पिये ही इतना भरोसा?
खां साहब ने किताब का एक पन्ना पलटते हुए कहा, भरोसा चाय पर नहीं, बनाने वाले हाथों पर है। और ये कहते हुए उन्होंने किताब के पन्ने पलटे तो आफरीन की नज़र, पन्नों के बीच में रखे एक मोरपंख पर गयी। 
वो बोली, मोरपंख... वाह
तुम्हें पसंद हैं? खां साहब ने पूछा तो आफरीन ने हां में सर हिलाते हुए चहक कर बच्चों की तरह कहा, मेरी सहेली कहती है कि इसे किताब में रखो तो ये दो हो जाते हैं। 
उसकी मासूमियत पर मुस्कुराते हुए खां साहब बोले, ठीक है फिर... तुम रख लो... जब दो हो जाएं तो एक मुझे लौटा देना। उन्होंने मोरपंख आफरीन की तरफ बढ़ा दिया। 
आफरीन के चेहरे पर खुशी छलकने लगी थी। वो मोरपंख लेकर चली गयी। और न जाने कितने वक्त तक उसे अपनी तकिया के नीचे रखकर सोती रही। पर अब ये अफसाना आगे बढ़ गया था। उनकी अक्सर की मुलाकातें होने लगीं। वो दुनिया की नज़र बचाकर एक दूसरे का हाथ थामें कस्बे की नहर के पास घंटो बैठे रहते थे। 
लेकिन इश्क जब आगे बढ़ा तो इम्तिहान तक पहुंचा। वो वक्त आ गया था कि जब दुनिया से बगावत करनी थी। इश्क पर यकीन दिखाना था... पर ये इतना आसान नहीं था। खां साहब के वालिद सुल्तान अहमद खान को जब इन मुलाकातों की खबर मिली तो उनकी रगों में दौड़ते शाही खून में उबाला आ गया। 
ये क्या सुन रहा हूं मैं... हवास ठिकाने है या नहीं... तुम सोचना भी मत कि ये कभी मुमकिन होगा... पहली बार हवेली की दीवारों के बीच सुल्तान अहमद की आवाज़ इतनी तेज़ी से गूंजी थी। लेकिन अब्बा मैं.... 
बस यही तीन लफ्ज़ थे... जो उनकी ज़बान से निकले थे। और इसके बाद लंबी खामोशी थी। इश्क की तमाम कहानियों में बगावत जीत जाती है, पर हर कहानी में ऐसा नहीं होता। झूठ कहते हैं वो जो कहते हैं कि इश्क हर बार जीतता है, कभी-कभी इश्क हार भी जाता है। नहीं होती सबमें हिम्मत दुनिया से टकरा जाने की। बगावत की आग की चिंगारी सब में कहां होती है। 
हालांकि ऐसा भी नहीं कि इनायत अली खां ने कोशिश नहीं की। वालिद साहब को समझाने की हज़ार कोशिशें की... पर वो नहीं माने। आखिरी रास्ता बग़ावत का था, जो खां साहब नहीं कर सके। 
खां साहब के वालिद सुल्तान अहमद ने एक रोज़ अपने कुछ लोग आफ़रीन के घर पर भेजे। उन लोगों ने आफ़रीन के सामने दौलत की पेशकश करते हुए कहा कि वो इनायत अली खां की ज़िंदगी से निकल जाए। 
“ये सारे रुपये आप ही के लिए भेजे हैं हुज़ूर ने... बस ये कहा है कि इसके बाद आप इस कस्बे में, इस इलाके में दोबारा नज़र मत आइयेगा” आफ़रीन ने थाल में रखे नोंटो के बंडलों को ग़ौर से देखा औऱ आंसुओं से उसकी नज़र धुंधला गयी। 
इसके बाद आफ़रीन और उसका परिवार कहां गया... कोई नहीं जानता। न किसी ने उसके बाद उन्हें इलाके में देखा... न कहीं से उसकी कोई खबर आई। इश्क की वही कहानी, जो हज़ारों बार इस दुनिया में दोहराई जा चुकी है, एक बार फिर से वक्त ने दोहरा दी थी।
वक्त अफनी रफ्तार से आगे चलता रहा और चालीस साल के बाद आज फिर उसी आफ़रीन के बारे में सुनकर खां साहब उसकी एक झलक देखने के लिए जलालपुर की तरफ चल दिए थे।
हुज़ूर गाड़ी इसके आगे नहीं जा पाएगी... ड्राइवर ने एक सड़क के मोड़ पर गाड़ी रोकते हुए कहा यही वो गली है, जिसके बारे में मिर्ज़ा साहब ने बताया था
लड़खड़ाते कदमों से एक इन्हत्तर साल का बुजुर्ग उस गली से अपनी चालिस साल पुरानी मुहम्बत की बस एक झलक के लिए चला जा रहा था। मंहगी शेरवानी, नक्काशी वाली छड़ी, ज़रा झुकी हुई कमर और मंहगे जूते उस गली की धूल को छूते हुए आगे बढ़ रहे थे। 
वो एक गर्द गुबार से भरी हुई गली थी, जहां शहर के शायद सबसे गरीब तबके के लोग रहते थे। बजबजाती नालियां, कच्चे रास्ते, यहां वहां टाट के पर्दों से बनी झुग्गियां, मुर्गियों का शोर, औऱ कुछ लोग जो खां साहब को ग़ौर से देख रहे थे। 

खा साहब गली को टटोलते हुए उस मकान की तरफ जा रहे थे जिसके बारे में उन्हें पता चला था।  

अब वो कैसी होगी, मुझे पहचान पाएगी क्या, पहचान पाएगी तो क्या करूंगा - ऐसे तमाम सवाल थे उनके मन में... पर अभी वो सिर्फ उसकी एक झलक देखना चाहते थे... उसके बाद क्या होगा... उन्हें इसका इल्म नहीं था। 
एक टाट के पर्दे वाली झुग्गी के सामने आ कर वो रुक गए। यही वो घर था। आफ़रीन इस इलाके में अब बड़ी बी के नाम से जानी जाती थी। मोहल्ले के एक शख्स ने उन्हें बताया कि बडी बी इसी में रहती हैं। और उन्हें अब ना के बराबर दिखाई देता है। 
कौन है एक बूढी आवाज़ पर्दे के उस पार से गूंजी तो खां साहब का दिल धक्क से हो गया।
कांपते हांथो से पर्दा हटाया तो एक चेहरा सामने था। चेहरा बदल गया था. वक्त झुर्रियों की लिखावट में जाने कितना कुछ लिख गया था. हालांकि बाल कहीं कहीं से अब भी काले थे, लेकिन निचले होंठ के किनारे वो तिल गवाही दे रहा था कि हो वो मैं ही हूं। खां साहब उस चेहरे को करोड़ों की भीड़ में पहचान सकते थे। उस एक पल में बीते चालीस साल खां साब के सामने से गुजरने लगे। उनकी आंखें नम होने लगी थीं, पर अफसोस कि बुजुर्ग आफ़रीन की धुंधला चुकी आंखें खां साब को पहचान नहीं पाई। खां साहब के आंसू कोरों से ढलते हुए गालों को छू रहे थे। वक्त ने एक खूबसूरत मुस्कुराते चेहरे को किस कदर गर्द आलूदा कर दिया था।सोच रहे थे कि न जाने चालीस सालों में इस चेहरे ने गम के कौन कौन से पहाड़ ढोए होंगे... हर जब जब ऐसा हुआ होगा... उसने मुझे याद किया होगा। वो उस छोटे से कच्चे फर्श वाले कमरे में बैठ गए जो सड़क से काफी नीचे था। 

 

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