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साहित्य आजतक में बोले व्यंग्यकार, अच्छा व्यंग्य वही जो कटार सा चुभ जाए

आलोक पुराणिक ने कहा कि मैंने अर्थशास्त्र पढ़ लिया, इसलिए व्यंग्यकार के अलावा कुछ और नहीं बन सका. उन्होंने कहा कि जिस माहौल में हम रहते हैं, उसमें व्यंग्य हमारे आसपास है. बस उसे कैप्चर करना है.

साहित्य आजतक के मंच पर व्यंग्यकार आलोक पुराणिक, ज्ञान चतुर्वेदी, अर्चना और प्रेम जन्मय. साहित्य आजतक के मंच पर व्यंग्यकार आलोक पुराणिक, ज्ञान चतुर्वेदी, अर्चना और प्रेम जन्मय.

साहित्य आजतक के मंच पर हल्ला बोल में पांचवा सत्र टेढ़ी बात का रहा. इस सत्र में देश के जाने-माने व्यंग्यकार आलोक पुराणिक, डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी, अर्चना चतुर्वेदी और प्रेम जनमेजय शामिल हुए. इस सत्र का संचालन संजय सिन्हा ने किया.

कार्यक्रम की शुरुआत में सभी व्यंग्यकार खुद ही अपना तारुफ दिया. डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के बारे में संजय सिन्हा ने कहा कि ये दिल के डॉक्टर हैं. कलम से ऑपरेशन करते हैं और नश्तर से लिखते हैं.

देश में इस समय व्यंग्य की क्या स्थिति है?  इस सवाल पर अर्चना ने कहा कि व्यंग्य में महिलाएं कम हैं, मैं डटी हुई हूं. मर्द शिकार पर हैं मेरा पहला संग्रह आया था. व्यंग्य को हमेशा टेढ़ी बात क्यों कहते हैं? इस सवाल पर अर्चना ने कहा कि कटाक्ष करना ही व्यंग्य है.

डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा कि व्यंग्य जिगर के पार होने की कला नहीं, बल्कि अटक जाने की है. अच्छी रचना वो है जो पढ़ने के बाद भी आपके साथ बनी रहे. व्यंग्य आधा फंसा हुआ तीर है जो पाठक के सीने में फंस जाए. व्यंग्य टेढ़ा लेखन नहीं है. बल्कि सच टेढ़ा होता है. डॉ. ज्ञान ने शेर सुनाया, चट्टानों से जब गुजरा तो छाप रह गई पैरों की, सोचो कितना बोझ उठाकर मैं इन राहों से गुजरा हूं.

प्रेम जन्मय ने कहा कि मैं साहित्य का डॉक्टर हूं. जीवन में हर व्यक्ति व्यंग्य का प्रयोग करता है. यहां तक कि न्यायालय भी व्यंग्य का प्रयोग करता है. उन्होंने हाल ही में न्यायालय के तंज ‘शानदार’ का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि व्यंग्य एक हथियार है. उसका प्रयोग आप कैसे करते हैं, ये आप पर निर्भर करता है कि आप इसे वर्चुअल युद्ध के लिए करते हैं या समाज की लड़ाई के लिए. उन्होंने कहा कि पहले लेखक नेताओं पर व्यंग्य करते थे, पर आज नेता भी व्यंग्य का प्रयोग करते हैं. हमारे पास व्यंग्य का गोदाम है. जयशंकर प्रसाद कहते हैं कि व्यंग्य कटार की तरह चुभता है. व्यंग्य एक हथियार है. इसका प्रयोग करें, दुरुपयोग न करें.

प्रख्यात व्यंग्यकार आलोक पुराणिक ने कहा कि मैंने अर्थशास्त्र पढ़ लिया, इसलिए व्यंग्यकार के अलावा कुछ और नहीं बन सका. उन्होंने कहा कि जिस माहौल में हम रहते हैं, उसमें व्यंग्य हमारे आसपास है. बस उसे कैप्चर करना है. उन्होंने कहा कि विराट कोहली उबर टैक्सी का विज्ञापन कर रहे हैं. सवाल उठता है कि क्या वे उबर में चलेंगे. इस देश की आर्थिक स्थिति देखने के बाद व्यंग्य पढ़ना और समझना बेहद आसान हो जाता है. उन्होंने कहा कि व्यंग्य मेरे लिए विसंगतियों का रचनात्मक चित्रण है.

पुराणिक ने कहा कि सुबह से शाम तक जब मैं टीवी देखता हूं तो बगदादी 20 बार मार दिया जाता है. उन्होंने तंज किया कि बगदादी आज के टीवी चैनलों का मनरेगा है.

उन्होंने कहा कि हरिशंकर परसाई ने हम लोगों के काम को स्थापित किया है. व्यंग्यकार मूलत: बेहद संवेदनशील होता है. उसको टेढ़ापन और विसंगतियां बेहद साफ दिखाई देती हैं. व्यंग्यकार अगर बदमाश नहीं है तो वो व्यंग्य नहीं लिख सकता. व्यंग्यकार होने की पहली शर्त है कि आपको संवेदनशील होना पड़ेगा. दूसरी शर्त है कि आपको बेहतरीन ऑब्जर्वर होना होगा और तीसरी शर्त है कि आपको खूब पढ़ाई करनी होगी.

प्रेम जन्मय ने कहा कि परसाई का समय और हमारा समय अलग है. परसाई ने मुझसे कहा था मेरी पीढ़ी ने बाप को नंगा नहीं देखा है, तुम्हारी पीढ़ी देख सकती है. इसलिए हम अपने आपको संकुचित न करें.

संजय सिन्हा ने सभी व्यंग्यकारों से सवाल किया कि शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और परसाई का व्यंग्य लेखन क्या टेढ़ी बात है?

इस पर डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा कि परसाई व्यंग्य को जीते थे. स्वतंत्रता के बाद लोगों का मोहभंग हुआ. स्वतंत्रता के पहले लोगों को लगता था कि नेहरू आ जाएंगे तो ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा. इससे लोगों का मोहभंग हो गया. परसाई का पूरा लेखन उसी मोहभंग पर है. स्वतंत्रता के बाद अगर भारतीय समाज को समझना है तो हमें परसाई को समझना होगा.

आज व्यंग्य के सामने अलग चुनौतियां हैं. आज के समाज का युवा अलग है. राजनीति आज गंदी हो चुकी है. जो बात पहले व्यंग्य में कही जाती थी, आज सीधी कही जा रही है. समाज बहुत बदल गया है. आज ऐसा समाज आ गया है, जिसमें हर कविता-कहानी का मूल स्वर व्यंग्य हो गया है.

अर्चना ने कहा कि परसाई जी इतना काम कर गए कि उनके काम के आगे किसी का काम पहचान में ही नहीं आ रहा है. इस पर प्रेम जन्मय ने कहा कि परसाई से भी बेहतर व्यंग्यकार कबीर थे. वे सीधे समाज पर व्यंग्य करते थे. ऐसा निडर व्यंग्यकार नहीं मिलेगा.

डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा कि व्यंग्य का एक ही काम है कि आपको आपसे परिचित कराए. कबीर ने आइना नहीं चेहरे पर जमी धूल साफ की. आज के लोगों और राजनीति को समझने के लिए परसाई से आगे चलने की जरूरत है. परसाई का झुनझुना बजाने से कुछ नहीं होगा. स्टैंडअप कॉमेडी, वन लाइनर्स की उपयोगिता बताती है कि लोगों में आज भी व्यंग्य की तड़प है. अब ये आप लोगों की जिम्मेदारी है कि आप क्या खिलाते हैं. व्यंग्य में विमर्श खूब है पर अच्छा लिखकर नहीं दिखाते.

अर्चना ने कहा कि स्टैंडअप कॉमेडी और व्यंग्य दोनों अलग चीजें हैं. आज लोग स्टैंडअप कॉमेडी में लोग कुछ देर के लिए सिर्फ हंसते हैं., लेकिन व्यंग्य देर तक कटोचता है.

डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी  से संजय सिन्हा ने सवाल किया कि ऑपरेशन करते हुए कुछ दिमाग में आ जाए तो क्या करते हैं. इस पर उन्होंने कहा कि विचार मुंडेर पर बैठा पंछी है. विचार आते ही मैं डायरी में लिख लेता हूं. ऑपरेशन के बाद सबसे पहले मैं उसे लिख लेता हूं. आलोक पुराणिक ने कहा कि रात 11 बजे भी मेरे दिमाग में कुछ आता है तो मैं फौरन लिख लेता हूं. व्यंग्यकार फुल टाइम जॉब है. चौबीस घंटे दिमाग में आइडिया आते हैं, लेकिन उसे डायरी में उतार पाना अनुशासन का काम है. कविता का एक अनुशासन होता है. एक अच्छा शब्द हटा नहीं सकते और एक गलत शब्द जोड़ नहीं सकते. प्रेम जन्मय ने कहा कि महाभारत का मूल कारण व्यंग्य ही था. दुर्योधन के गिरने पर द्रौपदी की हंसी उसे चुभती है और महाभारत हो गया.

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सत्र में डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी  ने दो सांप्रदायिक कथाएं सुनाईं, जो सभी को कचोटती है. आलोक पुराणिक ने कहा कि इश्तेहार से वे व्यंग्य निकालते हैं. उन्होंने कन्फ्यूजन पर एक रचना सुनाई. अमिताभ बच्चन के विज्ञापन पर उन्होंने कहा कि मैं टीवी में देख रहा था कि अमिताभ कल्याण ज्वैलर का ऐड कर रहे थे. अगले विज्ञापन में वे बताते हैं कि मुथुट फाइनेंस में गहने गिरवी रख देना चाहिए. और तीसरे विज्ञापन में कहते हैं कि गुजरात टूरिज्म के तहत कुछ दिन को गुजरात में गुजारिए. मैं सोचता हूं कि अगर गहने गिरवी रखकर गुजरात घूमना हो तो ये कहां की बुद्धिमानी है. इतना सोचते ही वे अगले विज्ञापन में दिखे कि बोरोप्लस की क्रीम से त्वचा सुंदर रहती है.

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अमिताभ 75 किस्मों का प्रोडक्ट बेचते हैं. मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मुझे अभिषेक बच्चन खाली दिखते हैं. तभी मेरे दिमाग में आया कि अमिताभ को इतना काम क्यों करना पड़ता है. यहां से मेरे मन में कन्फ्यूजन आया कि इस उम्र में एक व्यक्ति को इतना काम करना पड़ रहा है ये बुजुर्ग होने की समस्या है या फिर एक बुजुर्ग को इतने आइटम बिकवाने के लिए मिल रहे हैं, इसे हम इकोनॉमी के लिए अच्छा मानें, ये मेरे लिए कन्फ्यूजन है.

‘साहित्य आजतक’ का यह कार्यक्रम फ्री है, पर इसके लिए रजिस्ट्रेशन कराना आवश्यक है. इसके लिए आप ‘आजतक’ और हमारी दूसरी सहयोगी वेबसाइट पर दिए गए लिंक पर जाकर या फिर 7836993366 नंबर पर मिस्ड कॉल करना भर होगा, और आपका पंजीकरण हो जाएगा. तो आइए साहित्य के इस महाकुंभ में, हम आपके स्वागत के लिए तैयार हैं.

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