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स्त्री विमर्श पर दो महत्वपूर्ण किताबें जो एक-दूसरे की पूरक पुस्तकें भी हैं

निवेदिता मेनन की अंग्रेजी किताब सीइंग लाइक ए फेमिनिस्ट का हिंदी अनुवाद- नारीवादी निगाह से और सुजाता की किताब- आलोचना का स्त्रीपक्षः पद्धति, परम्परा और पाठ, अब पाठकों के लिए उपलब्ध हैं.

नारीवाद पर आईं दो किताबें नारीवाद पर आईं दो किताबें
स्टोरी हाइलाइट्स
  • नारीवाद पर आईं दो किताबें
  • एक-दूसरे की पूरक हैं दोनों किताबें
  • राजकमल प्रकाशन की पेपरबैक्स सिरीज की ओर से प्रकाशित

राजकमल प्रकाशन की पेपरबैक्स सिरीज की ओर से प्रकाशित निवेदिता और सुजाता की ये दोनों किताबें नारीवाद के बौद्धिक विमर्श और नारीवादी दृष्टि से हमारे समय के नोट्स के रूप में अलग-अलग लिखी गई किताबें हैं.

दोनों किताबें अलग-अलग लिखी गई हैं लेकिन दोनों को पढ़ने के क्रम में यह समझ जरूर आता है कि अगर दोनों को पढ़ा जाए तो वो एक-दूसरे की पूरक दिखाई देती हैं. निवेदिता जहां अपने आसपास के बिंबों के माध्यम से नारीवादी दृष्टि को रेखांकित करती चलती हैं वहीं सुजाता इस विषय पर विमर्श को एक अकादमिक सांचे में ढालकर प्रस्तुत करती हैं.

हालांकि अनुवाद की दृष्टि से और लेखन की दृष्टि से दोनों ही किताबों में तकनीकी शब्दों का पर्याप्त प्रयोग किया गया दिखता है. ये इनकी भाषा को सहज और सरल बनाने में रुकावट सी पैदा करता दिखता है लेकिन ऐसा करने की अपरिहार्यता भी नकारी नहीं जा सकती. शायद ऐसा इसलिए भी जरूरी रहा होगा कि इनका कथानक किसी कथालोक की कल्पनाओं को चहक-महक के साथ कागज पर उतारना भर नहीं था, बल्कि एक समर्थ बहस को जीना था.

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सुजाता का लेखन ज़्यादा आकर्षक है क्योंकि वो नारीवाद की चर्चा को एक व्यापक आयाम देती हैं. इतिहास और अवधारणाओं की परिधि से गुजरती स्त्री साहित्य, साहित्य में भी लोक-परंपरा और स्त्री लेखन की चौखट तक गुजरती है. निवेदिता का लेखन इससे इतर संभाषण शैली का लेखन ज़्यादा प्रतीत होता है. निवेदिता को पढ़ना ऐसा है जैसे नारीवाद पर कोई लेक्चर सिरीज हो या किसी विशेषज्ञ से उसके विचार सुनने का सिलसिला.

लेकिन यही दो अलग-अलग विशेषताएं इन दोनों किताबों को एक दूसरे का संपूरक जैसा भी बनाती हैं. सुजाता जहां हिंदी में हिंदी के समाज के लिए स्पष्ट रेखांकन के साथ इस विमर्श का ताना-बाना तैयार करती हैं वहीं एक फिल्टर कॉफी के कप की तरह बिना चीनी वाली बहस के ज़रिए निवेदिता इसमें विस्तार और नई कुर्सियां लाकर रख देती हैं.

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सुजाता का पाठ गठन आकर्षक है. इतिहास और संदर्भों के ऐसे महीन उदाहरण वो उठाकर सामने रख देती हैं कि उनकी विद्वता और विषयवस्तु पाठक को सम्मोहित कर लेती है. हालांकि कहीं-कहीं पर उदाहरण सुग्राह्य न रहकर एक बहस खड़ी कर देते हैं और ये आलोचना इस पाठ्यक्रम को पुस्तक के बाहर तक ले जाने में मदद करते हैं.

सबसे सुंदर बात यह है कि सुजाता बहुत सधे ढंग से स्त्री-विमर्श और आलोचना को कुलीन और अगड़े सामाजिक-बौद्धिक संकुलों की चौहद्दी लंघवाकर उसे बसाहटों के दक्षिणी टोले तक ले जाती हैं. इससे जेंडर के साथ-साथ वर्ग और जाति की लक्ष्मणरेखाएं भी टूटती नजर आती हैं और इसके लिए सुजाता साधुवाद की पात्र हैं.

निवेदिता की किताब दरअसल हर महिला की हैंडबुक जैसी है. घर की बैठक से कानून की समझ तक वो महिलाओं को संबोधित करती नजर आती हैं और एक अच्छा संवाद उन तमाम स्त्रियों से गढ़ती हैं जो सहमत भी हैं और अनभिज्ञ भी.

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