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लमही को याद रहे फणीश्वर नाथ रेणु, शताब्दी समय में निकाला विशेषांक

हिंदी उपन्यास एवं कहानी की एक सदी की अंतर्यात्रा को समझने के लिए लमही एक बड़ा साहित्यिक माध्यम है. फणीश्वर नाथ रेणु की शताब्दी के उपलक्ष्य में अनेक युवतर आलोचकों ने उनके विभिन्न रचनात्मक पहलुओं पर लिखा है.

फणीश्वर नाथ रेणु की याद में लमही के एक अंक का कवर फणीश्वर नाथ रेणु की याद में लमही के एक अंक का कवर

'लमही' प्रेमचंद के गांव के नाम पर उनके ही दौहित्र विजय राय के द्वारा गए एक दशक से ज्यादा समय से निकल रही पत्रिका है, जो मुख्यत: प्रेमचंद की परंपरा के कथा संसार को अग्रसर करने के लिए हिंदी कहानी पर केंद्रित रही है. कवि भगवत रावत, कथाकार रवींद्र कालिया, शिवमूर्ति, श्रीपत राय व उपन्यासकार व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी पर विशेषांक सहित अनेक मूर्धन्य कथाकारों पर विशिष्ट सामग्री के प्रकाशन के साथ-साथ लमही ने हिंदी के उपन्यास मूल्यांकन को लेकर 'औपन्यासिक' नाम से दो विशिष्ट विशेषांक निकाले हैं तथा पिछली सदी के कहानी लेखन पर 'कथा-समय' नाम से क्रमश: तीन वृहद् विशेषांक निकाल कर एक कीर्तिमान स्थापित किया है. हिंदी उपन्यास एवं कहानी की एक सदी की अंतर्यात्रा को समझने के लिए इससे बड़ा उपक्रम कोई और नहीं हो सकता, जहां इतने व्यापक फलक पर उपन्यास व कहानी की चर्चा-समीक्षा की गयी हो. पते की बात यह कि प्रधान संपादक विजय राय ने इसके साथ हिंदी आलोचकों की एक युवतर पीढ़ी भी तैयार की है तथा लमही में उसे बहुमान देकर छापा है. इस तरह कथासंसार के विवेचन के साथ कथा आलोचना की लीक पुख्ता करने का काम भी 'लमही' ने किया है.

हाल ही फणीश्वर नाथ रेणु की शताब्दी के उपलक्ष्य में लमही ने एक परिपुष्ट विशेषांक उन पर केंद्रित किया है, जिसमें आज के अनेक युवतर आलोचकों ने रेणु के विभिन्न रचनात्मक पहलुओं पर लिखा है. विजय राय ने अपने संपादकीय में लिखा है, ''रेणु सचमुच प्रेमचंद की परंपरा के वास्तविक उत्तराधिकारी हैं. इनकी किस्सागोई में प्रेम के जमीनी शेड्स और लोक संगीत की अभिभूत कर देने वाली जुगलबंदी है जो पाठकों के मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ देती है.'' लेकिन अपने संपादकीय का समाहार जिन दो छोटे पैराग्राफ में विजय राय ने किया है वे हमारी आज की साहित्यिक दुरभिसंधियों और कालुष्य का रोजनामचा है. वे कहते हैं, ''उपभोक्तावादी संस्कृति के आज के दौर में जब साहित्य हाशिए पर जाने को अभिशप्त हो, तो अधिकांश साहित्यकारों की निर्लज्ज तिकड़मबाजी उनके लिए ही आत्मघाती साबित हो रही है. आज ज्यादातर लेखक जिन मुद्दों को अपनी रचना में दिखाता है, जीवन में उसी से विच्छिन्न रहता है. न वह गलत चीजों से घृणा करता है न सही चीजों के पक्ष में खड़ा होता है. वह तभी तक सैद्धांतिक है जब तक उसके हितों पर आंच नहीं आती. वे आगे कहते हैं, ''नैतिक स्खंलन के इस दौर में न कोई किसी का रहबर है न कोई किसी का अनुयायी. साहित्यिकों की नई पीढ़ी को प्रेमचंद निराला, नागार्जुन, रेणु, परसाई, मुक्तिबोध आदि का न नैतिक विवेक सुहाता है न मूल्य चेतना.'' ऐसे तीखे मत व्यक्त करने वाले विजय राय ने शुरू से ही लमही को साहित्यकारों की तुच्छ महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ने से बचाये रखा है तथा साहित्य के पाठ केंद्रित आलोचना को केंद्र में रखा है. नए आलोचकों को अग्रसर करने की लमही की पहल इसी दिशा में एक प्रयास है कि बड़े साहित्यकारों के मूल्यांकन के बहाने उनकी आवाज युवा रचनाशीलता तक तीव्रता से पहुंचे और आधुनिक गजेट्स और सोशल मीडिया की भूल-भुलैया में डूबी नई पीढ़ी को नए रचनात्मक मूल्यों से जोड़े.

कहना न होगा कि लमही ने रेणु को लेकर जो प्रयास किए हैं ऐसे प्रयास विश्वाविद्यालयों के स्तर पर नहीं हुए हैं. लिहाजा, साल दर साल शोध ग्रंथों का अंबार लगाने वाले विश्वविद्यालयों के बावजूद साहित्य के पठन-पाठन का सूचकांक तेजी से गिरा है तथा विश्वविद्यालयीन परिसरों से साहित्य के नवाचारों की कोई आहट नहीं सुन पड़ती. रेणु पर आधारित 'लमही' के इस अंक में 'पंचलाइट' पर प्रो रविभूषण, 'मैला आंचल' पर प्रो सूरज पालीवाल, 'परती परिकथा' पर वरिष्ठ पत्रकार रमेश अनुपम, रेणु की कहानियों पर शंभु गुप्त, कथाभूमि पर अरुण होता, रस और आग की जुगलबंदी पर रोहिणी अग्रवाल, कथाशिल्प के नए नैरेटिव पर गोपेश्वर सिंह, रेणु के भाषाई जादू पर कथाकार शिवमूर्ति, 'तीसरी कसम' पर नीरज खरे, राजेंद्र राजन व विपिन शर्मा अनहद तथा 'एक आदिम रात्रि की महक' पर गौरी त्रिपाठी सहित अनेक युवा आलोचकों ने उनकी अनेक सुपरिचित कहानियों पर गहरे मंथन के साथ लिखा है.

रेणु पर एक जमाने से लिखा जा रहा है और बहुत कुछ लिखा जा चुका है जिसमें से धरोहर के रूप में यहां नलिन विलोचन शर्मा, निर्मल वर्मा, सुरेंद्र चौधरी व नित्यानंद तिवारी के आलेख दिए गए हैं. साथ ही अन्य युवा आलोचकों यथा मृत्युंजय सिंह, स्नेहा सिंह, सुलोचना दास, सुनील द्विवेदी, हृषिकेश कुमार सिंह, धनंजय साब, अरविंद कुमार, अल्पना सिंह, पंकज शर्मा, एकता मंडल, नीलाभ कुमार, भुवाल सिंह, अंबरीश त्रिपाठी, अंकिता चौहान, ममता कुमारी, कनक रागिनी एवं संध्या कुमारी के आलेख रेणु के कथा संसार एवं कई अन्य पहलुओं व कहानियों पर प्रकाशित किए गए हैं. 252 पन्नों के इस विशेषांक से शताब्दी वर्ष में रेणु की प्रासंगिकता पर जिस तरह विचार किया गया है वह हिंदी की विशद अध्ययनशीलता का पर्याय है.

जहां तक इस अंक के कुछ विशिष्ट आलोचकों के मत का सवाल है, पत्रकार रमेश अनुपम का मानना है कि अध्यापकीय आलोचना ने मैला आंचल व परती परिकथा को जिस तरह आंचलिकता के खाते में डाल कर मूल्यांकन किया वह रेणु के साथ अन्याय है. इस परिधि से बाहर आकर उन पर विचार होना चाहिए. आलोचक अवधेश प्रधान कहते हैं, ''सचमुच रेणु को एक नाम देना हो तो वे हिंदी साहित्य  के मिरदंगिया हैं. उन्होंने  साहित्य के माध्यम से जो संगीत प्रतिध्वनित की, वह संगीत बिदापत की तरह, बिदेसिया की तरह, रसप्रिया की तरह, अपनी ज़मीन से उठा हुआ संगीत है.''
''डॉ सूरज पालीवाल मैला आंचल के ग्रामीण यथार्थ को पूरे भारत का ग्रामीण यथार्थ मानते हैं वे कहते हैं, कि एक अंचल विशेष को आधार बना कर यह कथा लिखी गयी है, यह अवधारणा सिरे से गलत है. आलोचक रोहिणी अगवाल की दृष्टि में '' उनकी कहानियां ऊपर से जितनी सरल हैं उनकी संरचना भीतर से उतनी ही संश्लिष्ट. उनके यहां अभिधात्मक स्तर पर झूलते दृश्य हैं तो व्यंजना के स्तर पर दृश्य का निर्माण करने वाली सामाजिक मनोविश्लेषणवादी सचाइयां.'' कथाकार शिवमूर्ति उनकी कहानियों के क्राफ्ट और आर्ट के मुरीद दिखते हैं. प्रो गोपेश्वर सिंह का कहना है कि 'रेणु के कथा साहित्य में जो सांगीतिकता, लोक लय है, वह हिंदी कथा पंरपरा में बिल्कुल नई चीज है. इसी लोक लय के भीतर से रेणु के चरित्र और कथानक पैदा होते हैं. अरुण होता को उनके यहां भोगे हुए संसार की जीवंत अभिव्यक्तियां मिलती हैं तो नीरज खरे कहते हैं कि उनकी कहानियों में व्यक्तिगत अकेलापन ओढ़ा, आयातित या कम से कम आत्मघातक या अवास्तविक नहीं है.

कुल मिलाकर यह अंक आंचलिकतावादी मूल्यांकन की उन पुरानी सरणियों की मान्यताओं को ध्वस्त करता हुआ रेणु को ग्रामीण यथार्थ की नई रोशनी में पढ़ने का प्रस्ताव करता है तथा भाषा की विशिष्टताओं को अभिव्यक्ति  के रूढ़ प्रत्ययों से अलग पढ़ने की मांग करता है. कोरोना आपदा के समय भी लमही ने लेखकों की रचनाशीलता का एक भव्य उदाहरण सामने रखा है. इस दृष्टि से 'लमही' का यह विशेषांक लेखकों के मूल्यांकन की परंपरा में एक बेहतरीन प्रयास माना जाना चाहिए.
#डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि-आलोचक एवं भाषा चिंतक हैं.
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लमहीः फणीश्वर नाथ रेणु पर विशेष अंक
(अक्‍तूबर-दिसंबर, 2020)
प्रधान संपादक: विजय राय,
3/343, विवेक खंड, गोमती नगर, लखनऊ.
मूल्यः रुपए 100 मात्र.

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