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पुस्तक अंशः जया गंगा, प्रेम को तलाशते लेखक का औपन्यासिक यात्रा-वृत्तांत

वह पतझड़ की रात थी. सर्दी की पहली किरणें पारदर्शी उजाले की तिरछी बरछियों की तरह खिड़की से प्रवेश कर रही थीं. जंग-लगा केरोसिन का लैम्प जल रहा था, जिसकी कांपती हुई किरमिज़ी लौ पपड़ियाए हुए दरवाज़े के रेखांकन जैसी ही निरीह थी

जया के बहाने गंगा तक विजय सिंह की प्रेम यात्राः जया गंगा का आवरण-चित्र जया के बहाने गंगा तक विजय सिंह की प्रेम यात्राः जया गंगा का आवरण-चित्र

प्रख्यात लेखक, फिल्मकार और पटकथा लेखक विजय सिंह का बहुप्रशंसित उपन्यास 'जया गंगा' सबसे पहले साल 1985 में अंग्रेजी और फ्रेंच में प्रकाशित हुआ और छपते ही इन भाषाओं के पाठकों का दिल चुरा लिया. यह एक औपन्यासिक यात्रा-वृत्तांत है, जो लेखक की आन्तरिक और बाहरी दुनिया के विलय का अभूतपूर्व चित्र प्रस्तुत करती है. इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि इस पर बनी फिल्म ने फ्रांस और इंग्लैंड में धूम मचा दी. करीब 40 देशों में इसका प्रदर्शन हुआ और योरोप के कई सिनेमाघरों में यह 49 सप्ताह से अधिक समय तक चली. अब करीब 35 वर्ष बाद यह राजकमल प्रकाशन से हिंदी में आया है, जिसका अनुवाद हमारे दौर के चर्चित कवि, संपादक और अनुवादक रहे मंगलेश डबराल ने किया है. हालांकि कोरोना के चलते इस उपन्यास के प्रकाशन से पहले ही डबराल का देहांत हो गया, पर उनकी भाषा और अनुवाद का कौशल इस उपन्यास में सर्वत्र दिखता है.

पुस्तक अंशः जया गंगा, मेरे स्टूडियो में

दरवाज़े पर एक छोटा-सा रेखांकन बना है. चारकोल का. अधूरा. नाज़ुक. ज़िन्दा. वह कभी मिट नहीं सकता. एक युवती रात-भर उसे बनाती रही. अगली सुबह वह अपना उलाहना छोड़ गई- घर की दहलीज़ से जाती हुई एक युवती की छवि. अक्सर ऐसा होता है कि वे स्त्रियां, जिनसे आपने सबसे कम प्यार किया होता है, आपके जीवन के बारे में कोई आख़िरी फ़ैसला देकर चली जाती हैं. जाते हुए वह बुदबुदाई थी: स्त्रियां हमेशा तुम्हारी ज़िन्दगी के दरवाज़ों से बाहर जाती रहेंगी. एक सच्चे वाक्य में उसने सब कुछ समेट दिया था जैसा कि बच्चे ही कर सकते हैं.
वह पतझड़ की रात थी. सर्दी की पहली किरणें पारदर्शी उजाले की तिरछी बरछियों की तरह खिड़की से प्रवेश कर रही थीं. जंग-लगा केरोसिन का लैम्प जल रहा था, जिसकी कांपती हुई किरमिज़ी लौ पपड़ियाए हुए दरवाज़े के रेखांकन जैसी ही निरीह थी. मैं बेचैन था. एक पवित्र-सी अनिद्रा की चपेट में. मुझसे जीवन में कोई बड़ी भूल हो गई थी. मुझे ऑथेलो की तरह देवताओं को श्रद्धांजलि अर्पित करनी थी...
मैं स्टूडियो से बाहर आया और उस अकेली रात में खो गया. नीचे र्‌यू आले में एक हल्का-सा मोड़ था. मेरी तक़दीर के घुमाव जैसा. एक कार चीख़ती हुई रुकी, फिर मुड़ी और भनभनाते हुए चली गई- यह बताते हुए कि मैं नशे में हूं. नहीं, मेरे अलौकिक साक्षी, हम कभी नशे में नहीं होते, यह तो वक़्त है जो नशे में होता है. शराब सिर्फ़ यह बताती है कि हम कुछ नहीं, सिर्फ़ वक़्त के विशाल पहिये के दांत हैं.
एवेन्यू रेने कोती एकमात्र सड़क है जो पूर्णता की ओर जाती है. पार्क मोंसूरी में उसका आख़िरी सिरा एक जीवन के ख़ामोश अन्त और दूसरे जीवन की शुरुआत का संकेत करता है. एक विचित्र मानसिक राह. यही वह सड़क है जहां हर मौसम अपने आख़िरी दस्तख़त छोड़ जाता है.
मैं एवेन्यू पर चलता रहा. मेरी आंखों के आगे पतझड़ गहरे भूरे रंग में पसीज रहा था. जैसे वह विदा की रात के रहस्य को देखने के लिए जगा हुआ हो. पार्क मोंसूरी के फाटक बन्द थे. रात 8 बजे के बाद नो एंट्री-लाल और सफ़ेद रंग में उन्होंने लिखा था. पेरिस की नगरपालिका अपनी आपराधिक सुरक्षा की भावना मुझ पर थोप रही थी. मैं फाटक से कूदकर बाग़ीचे के घने अंधेरे में पहुंचा, जिसे उस पुराने क़ब्रिस्तान की आत्माओं ने पारदर्शी बना दिया था. मोरक्को वेधशाला के शुरू में फूलों की एक पट्टी थी जहां धरती के सभी फूलों के सभी रंगों की प्रजातियां थीं. मेरे पास फूलों से प्रेम करने की कोई वजह नहीं थी, मुझे उनसे कभी प्रेम नहीं रहा, मैंने उन्हें कभी किसी को भेंट नहीं किया, लेकिन मुझे देवताओं को श्रद्धांजलि अर्पित करनी थी. मेरे देवता, जो किसी चर्च या मन्दिर या मस्जिद से परिचित नहीं थे.
मैंने चार गुलदाउदी, पांच गुलाब, पांच गेंदे और ग्यारह चमेली के फूल तोड़े. कुल मिलाकर पच्चीस फूल. उतने ही, जितने वर्ष वह थी. फूलों का गुच्छा बनाने के लिए मैंने रात की रानी की एक पतली टहनी तोड़ी, जो उस अवर्णनीय रात की तक़दीर को समेटने में सक्षम लगती थी. उन सबको मैंने एक पवित्र सफ़ेद धागे से बांध लिया. ऐसे ही धागे के साथ मेरी मां ने अनन्त पहेलियों से भरी हुई इस धरती पर मेरे जन्म की ख़ुशियां मनाई थीं.
मैं रात-भर चलता रहा. पेरिस की फुहारों की धुंध में खोया हुआ. कई घंटे बाद मैं सेन नदी पर पहुंचा. उसका पानी अपारदर्शी था. वह निश्चिन्त बह रही थी, जैसे प्रेम का तूफ़ान गुज़रने के बाद कोई स्त्री उसांसें भर रही हो.
मैंने धूप जलाई. काले पेस्ट से चिपचिपा सफ़ेद धुआं उठा और पानी की सतह पर फ़ैल गया. वातावरण अनुष्ठानमय हो उठा. हवा बांसुरी-सी बज रही थी. पेरिस की रात के उस घोर सन्नाटे में मैंने एक पत्थर पर एक नारियल फोड़ा ताकि उसकी आत्मा सांसारिक जाल से छूट सके. नारियल और माला, सिन्दूर और काजल, कांच की चूड़ियां और परांदी, वह सब जिसे वह प्यार करती थी और जो उसकी आस्था थी, उसे मैंने सेन नदी में इस अगाध विश्वास के साथ विसर्जित कर दिया कि सभी नदियां गंगा में विलीन हो जाती हैं...
जया को गए हुए बारह घंटे हो गए थे. उसके जाने से पहले मैंने उसकी मांग में सिन्दूर भरा था. एक चमकदार लाल लकीर. उसने भी उसी रंग की एक पतली-सी लकीर मेरे बालों में लगा दी जैसे हिन्दू धर्म से बग़ावत करते हुए अपने को दूसरे विवाह की अनुमति दे रही हो. कर्मकांड सम्पन्न हो गया. सिन्दूर मिलन का प्रतीक है और मिलन विच्छेद का बीज है. सिन्दूर एक दुखान्त है. दुखान्त पहले मिलन के सिवा कुछ नहीं है.
हम ठीक उस वक़्त अलग हुए जब एक-दूसरे को सबसे अधिक चाहने लगे थे. हम इस तरह मिले और बिछुड़ गए जैसे किसी सम्मोहक 'वस्तुनिष्ठ संयोग' के तहत इकट्ठा हुए हों. दो अस्तित्व, जिन्हें किसी बाहरी मजबूरी और भीतरी चाहत ने एक कर दिया हो और जो फिर एक बाहरी मजबूरी में एक-दूसरे से अलग हो गए. यही अकेला ऐसा क्षण होता है जब प्रेम इतिहास जैसा बन जाता है और इतिहास प्रेम. हम एक सनकी इतिहास की संतानें हैं और इतिहास किसी विदूषक का छिपा हुआ आंसू है.
जया ने अपने पिया के घर के लिए उड़ान भरी और मैं हवाई अड्डे की बस में पेरिस के लिए निकल गया.
सूरज की धुंधली नारंगी गेंद मेरी बग़ल में बैठी एक अल्जीरियाई लड़की के घुंघराले बालों से बाहर आ रही थी. उसकी किरणें जैसे पूरी सृष्टि को रोशन किए हुए थीं, लेकिन मेरे भीतर अनुपस्थिति और शून्य के अलावा कुछ नहीं था. मैंने उन गहराइयों में जया को देखा -हल्के भूरे रंग का पश्मीना शॉल ओढ़े, गंगा के सूर्यास्त के रंगों में सराबोर. मैंने उसकी सांसों की ख़ुशबू को धीरे-धीरे रात में उड़ते हुए देखा. मैंने उसके पैरों को गंगा की चंचल लहरों से खेलते हुए देखा. मैंने उसकी कमर को छुआ तो गंगा मुस्कुरा उठी.
अनुपस्थिति का अर्थ दुख नहीं है. प्रसन्नता और उदासी इस क़दर सांसारिक चीज़ें हैं कि वे मन की ब्रह्मांडीय अवस्थिति के सिंहासन पर नहीं बैठ सकतीं. कभी-कभी सम्पूर्ण अनुपस्थिति सम्पूर्ण उपस्थिति बन जाती है. अनुपस्थिति आन्तरिक संसार को इस तरह चमका देती है जैसे एक छोटा-सा जुगनू एक अभेद्य रात को प्रकाशित करता है. जया एक जुगनू थी जो प्रेम करने के अपराध में एक सज़ायाफ़्ता क़ैदी की आंखों के आगे चमकने के लिए प्रकट हुई थी. जया इनसान के माथे पर लिखा हुआ पतझड़ थी.
अनुपस्थिति स्वतंत्रता की एक अवस्था को बतलाती है, एक भयावह स्वतंत्रता. अनुपस्थिति आपको एक खुली जेल में क़ैद कर देती है. वह घिसी-पिटी रवायतों और रूढ़ियों की दुनिया को फिर से रचने का मौक़ा देती है, लेकिन उसी के साथ एक अन्धापन भी सौंपती है जो आपको वह सब देखने से रोक देता है जिसे आपने फिर से रचा है. वह आपको राजपाट सौंपती है, लेकिन आंखें नहीं देती जिनसे आप अपनी रानी को देख सके हों. अनुपस्थिति आपके संसार को नए सिरे से रचती है, लेकिन वह ऐसी रचना होती है जो अपने रचनाकार के वजूद को नहीं मानती. वह एक भ्रम है, एक अन-इतिहास. वह है और नहीं है. उसका कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि जो भी है वह कुछ नहीं है. क्योंकि क्षितिज की सतह पर अथाह दूरी तक गंगा बहती रहेगी और उस पर अस्तित्व की मेरी एकाकी नाव वही चिरन्तन प्रश्न उठाती रहेगी: 'मैं कौन हूं? वह कौन है? वह यहां क्यों है और यहां क्यों नहीं है? वह क्यों गई और क्यों नहीं गई? कहां है वह लक्ष्मण झूला -दो चाहतों के बीच का पुल?' काश, मैं गंगा की तरह समुद्र की अनन्त बांहों में समा सकता...
हवाई अड्डे से लौटते हुए, दिमाग़ में खलबली मची रही. थकान से चूर मैं एवेन्यू दु मेन पर एक छोटे से बाग़ीचे में चला आया और लॉन में लेट गया. एक पुरानी हरी बेंच पर क़रीब सात या आठ साल के दो बच्चे एक-दूसरे के हाथ थामे बैठे थे. बच्ची के हाथ में एक पोस्टर था जिस पर तरह-तरह की फ़िल्मी पोशाकों में अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की तस्वीरें थीं. पोस्टर के ऊपर लिखा था: पहचानो तो कौन? छोटी लड़की आर्मेल कुछ सोचते हुए बोली: 'बड़ी होकर मैं इस ऐक्टर से डेटिंग करूंगी. कितना सुन्दर है!' छोटे लड़के ज्यां ने कहा: 'बड़ा होकर मैं इस लड़की को डेट करूंगा. बहुत प्यारी है, क्यों?' और इसी तरह वे अपनी मुक्त इच्छाओं की बिसात पर हीरो-हीरोइनों से डेटिंग का खेल खेलते रहे. अचानक लड़की जीतने की ख़ुशी में चिल्लाई: 'और मैं इसको डेट करूंगी. बस, मैं जीत गई...' लड़का उदास हो गया क्योंकि अब पोस्टर में डेट करने के लिए कोई हीरोइन नहीं बची थी. वह अचानक पलटा और अपनी मां की स्कर्ट की चुन्नटों के पीछे छिपने के लिए दौड़ा. मां ने कहा: 'चलो, चलो बच्चो, देर हो रही है. चलो, अंधेरा होनेवाला है.' छोटे बच्चे ने आश्चर्य से सूर्यास्त की ओर देखते हुए पूछा: 'मम्मी, सूरज क्यों डूबता है...?'
मैं घर पहुंचा. धीरे-से चाबी घुमाई. पता नहीं मैं किसी मन्दिर में प्रवेश कर रहा था या किसी क़ब्रिस्तान में. सिगरेट का पैकेट लेने के लिए झुका, तो एक लिफ़ाफ़ा दिखाई दिया जो मेरे नाम था. लिखावट जया की थी: तुम्हारे साथ बिताए हुए चौदह दिनों के बाद अब जीवन में और कोई इच्छा नहीं बची है. अगर अगले जन्म में हम तीन दिन बनारस में गंगा के किनारे बिता सकें तो मैं समझूंगी कि मेरा कर्म सम्पूर्ण हो गया है. काश, तुम्हें जुनून की हद तक प्यार मिलता रहे. तुम्हारी पगली जया...
स्टूडियो से बाहर आकर मैं सीढ़ियों पर बैठ गया. तीख़ी हवा सायं-सायं कर रही थी. मैंने नीचे की तरफ़ देखा. क़रीब पचास क़दम पर गंगा की प्रचंड लहरें इतिहास के ऊबड़-खाबड़ तटों से टकरा रही थीं. मानसूनी हवा के थपेड़े स्नान करनेवालों को बेचैन किए हुए थे. स्त्रियां धूप में तपी देहों पर फड़फड़ाते कपड़ों को दबाने की कोशिश करती हुई हंस रही थीं. डंडों से जाल लटकाए हुए मछुआरे लगातार हलचल कर रहे थे. मेरी निगाहों के नीचे बनारस के रामघाट पर विवाह की लाल पोशाक पहने एक युवती पीली लपटों से घिरी हुई थी और उसके चारों ओर लगातार 'राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है' का शोर उठ रहा था. अन्तिम संस्कार की घड़ी में शोक भारी हो गया, जैसा कि चे गेवारा के अन्तिम संस्कार में हुआ था. एक छोटी-सी लड़की ने लहरों पर एक दिया बहाया, जैसे वह सात साल की नाज़ुक उम्र में ही मृत्यु से साक्षात्कार करने के लिए गंगा मैया का आभार व्यक्त कर रही हो. लेकिन दुनिया के तमाम कार्य-व्यापार के बीच गंगा बेख़बर अन्दाज़ में और सामान्य रफ़्तार के साथ बह रही थी जैसे वह हिन्दुस्तान के इतिहास और उसकी नियति पर फैली एक अन्तहीन काली मखमली चादर हो.

इस तरह जया, गंगा बन गई और गंगा, जया. गंगा ने अपनी बांहें मेरी तरफ़ बढ़ाईं और मैं उनमें समा गया, जैसे जया के आगोश में समाया था. फिर जया उस नदी की एक लम्बी तटवर्ती यात्रा बन गई, जो हिमालय के बर्फ़ीले ग्लेशियरों को बंगाल की खाड़ी की भाप बनती हुई मरीचकाओं में विसर्जित करती थी. मेरे लिए जया ने उस लम्बी और प्राचीन नदी के रूप में पुनर्जन्म लिया, जिसके तटों पर वेदों, पुराणों, महाभारत और रामायण की रचना हुई. पौ फटने के साथ ही जया एक नदी-सभ्यता बन गई, जो भारत के इतिहास के एक-एक यात्री के अमिट पदचिह्नों को अपने आगोश में लिये हुए थी. आर्यों से मौर्यों तक, कुषाणों से गुप्तों तक, मध्य एशियाइयों से फ़ारसियों तक, मुग़लों से अंग्रेज़ों तक, सभी ने गंगा को श्रद्धांजलि अर्पित की. बीसवीं सदी तक आते-आते जया ने धर्म और धर्म-द्रोह, आस्था और स्वार्थ, भक्ति और अपराध, घुमन्तू चारणों की विक्षुब्ध कविता और निरी फ़िल्मी व्यावसायिकता-सबको एक धागे में पिरो लिया. मैंने जिस तरह जुनून में जया को अपनाया था, वैसे ही गंगा के रूप में उसके पुनर्जन्म को भी अपना लिया-उसके तमाम दार्शनिक सत्यों और ऐतिहासिक बग़ावतों के साथ. इसलिए कि सबसे बढ़कर, जया गंगा का एक कालातीत प्रवाह थी, एक चिड़िया की पतली-सी गर्दन पर एक नाज़ुक नस, जिसमें समूची मानवता की साँस चल रही थी...
'प्यारी लहर, ज़रा ध्यान से, तुम्हारी स्कर्ट के नीचे से प्रकाश के अणु उमड़ रहे हैं!' मैंने उसकी स्कर्ट का सिरा उठाया और गंगा मुस्कुरा उठी. गंगा, एक वैदिक स्तोत्र, गंगा, अंजन-तिमिर-भानु, अज्ञान के अन्धकार में प्रकाश, गंगा, कबीर, मीरा और सूरदास की कविता, गंगा, बंगाल के बाउलों और माझियों का वि-राग, गंगा, पातकी और गंगा, पापहारिणी...
पतझड़ के उदास मौसम में एक रविवार की सुबह मैंने बैग में सामान ठूंसा और गंगा के लिए चल पड़ा...
***

पुस्तक: जया गंगा
लेखक: विजय सिंह
विधाः उपन्यास
अनुवादक: मंगलेश डबराल
प्रकाशकः राजकमल पेपरबैक्स
भाषाः हिंदी
पृष्ठ संख्याः 232
मूल्यः 295
 

 

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