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एक देश बारह दुनिया: हाशिये पर छूटे भारत की तस्वीर

यह बताने की जरूरत नहीं है कि बेला कौन है. इसे उन्नीस की उम्र में यहां बेचा गया था. पिछले सोलह साल से यह यहीं रहती है. अब यही उसकी बस्ती है, यही उसका घर है. बेला यहीं जीना चाहती है और यहीं मरना भी. मुंबई महानगर में कमाठीपुरा की यह मंडी एशिया की सबसे बड़ी देह मंडी कही जाती है. कमाठीपुरा की यह कोठरी इतनी तंग है कि यहां सिर्फ एक बेड रखने लायक जगह है.

एक देश बारह दुनिया किताब का कवर एक देश बारह दुनिया किताब का कवर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सामने आई लेखक शिरीष खरे की नई किताब
  • वेश्यावृत्ति की दुनिया के बारे में बताती है किताब

पत्रकार शिरीष खरे की पुस्तक 'एक देश बारह दुनिया' में यात्राओं के माध्यम से विभिन्न प्रदेशों के वंचित जनों की जिंदगियों में झांककर उनके दुर्गम जीवनानुभव की परतों को उघाड़ा गया है. राजपाल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ये पुस्तक दरअसल एक रिपोतार्ज है. 208 पेज की ये किताब हिंदी में है जिसमें हाशिये पर छूटे भारत की तस्वीर दिखाने की कोशिश की गई है. पेश हैं पुस्तक का एक अंश.

इस दुनिया की स्त्री जब कहती है, ''वेश्यावृत्ति ने मुझे आजादी का अहसास दिलाया'', तो उत्तर-1947 के राज्य की उपलब्धियां दीवारों में सजी खिड़कियां दिखाई देती हैं. 21वीं सदी के मेट्रो-बुलेट ट्रेन भारत में ये जिंदगियां (भूख, मौत, खुदकुशी, बंधुआ मजदूरी, अत्याचार, अन्याय, अनाचार, अराजकता, आदिवासी, बंजारे, दलित, सैय्यद मदारी, विकास के मारे विस्थापित, बदनाम बस्तियां आदि) दूसरे ही हिन्दुस्तान को पेश करती हैं और झटके के साथ एक सदी पीछे हमें धकेल देती हैं. यह दुनिया बिल्कुल ठहरी हुई! इस सदी के लोगों को इस 'रुके-रुंधे हिंदुस्तान' से भी बावस्ता होना चाहिए:

‘‘याद आ रही है, तेरी याद आ रही है...’’

रेडियो पर यह गाना बज रहा है, वैसे तो पूरी रात से गाने बज रहे हैं, लेकिन यह गाना उसे पसंद नहीं आया, पता नहीं क्यों यह गाना सुनकर वह चिढ़ गई, फिर उसने बगैर आंखें खोले लेटे-लेटे रेडियो बंद कर दिया.

‘‘सुबह-सुबह इसे (रेडियो को) क्यों इतनी याद आ रही है,’’ कहते हुए उसने अपना चेहरा साड़ी से ढक लिया. वह मुझे रात में ही बोली थी कि आज के दिन पता नहीं कितने दिनों के बाद वह बहुत लंबी और गहरी नींद सो जाना चाहती है.

आज यानी वर्ष दो हजार नौ के एक रविवार छह दिसंबर का दिन. यूं तो पूरी रात जागना इसे कभी अच्छा नहीं लगा था, फिर भी उससे तो हरदम और हर बार ही चुस्त-तंदुरुस्त रहने की उम्मीद की जाती है.

इस उम्मीद के बगैर दुनिया चल सकती है, ऐसा वह सोच भी नहीं सकती. इस शहर या यूं समझें कि इतनी बड़ी दुनिया में अब उसका कोई दूसरा ठिकाना नहीं है, जहां वह जा सकती है, या रह सकती है. कोई सोलह साल पहले उसे यहां लाया गया था और तब से वह यहीं की होकर रह गई है.

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‘‘तुमने पैंतीस की उम्र में भी अपना भोलापन बचाकर रखा है,’’ मैंने बगैर उसे देखें उससे कहा. लेकिन, उसने कोई जवाब नहीं दिया. यह शायद कई दिनों बाद लंबी-गहरी नींद सो गई है. रात में उसने बताया तो था कि उसमें अब पहले जैसी बात नहीं रही. बचपन तो बहुत सालों पहले ही बीत चुका था, जवानी भी साथ छोड़ती जा रही है. वह शादी करना चाहती है. असल में शादी करने की चाहत ही तो उसे यहां तक ले आई थी. किससे?...और अचानक मुझे याद आता है कि मैंने तो उसका नाम ही नहीं पूछा. मैं पूछता हूं, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘बेला,’’ मतलब वह फिर सो नहीं पाई है. वैसे मुझे नहीं पता कि बेला उसका असली नाम है, या उसने मुझे गलत नाम बताया है. वैसे मैं भी तो यहां किसी भी ‘बेला’ को उसके असली नाम से कहां जानना चाहता हूं. लेकिन, यह सच है कि इस समय बेला जागी है. बेला कहती है, ‘‘मैं यह जगह कभी नहीं छोड़ूंगी. मैं मरुंगी भी तो यहीं!’’

यह बताने की जरूरत नहीं है कि बेला कौन है. इसे उन्नीस की उम्र में यहां बेचा गया था. पिछले सोलह साल से यह यहीं रहती है. अब यही उसकी बस्ती है, यही उसका घर है. बेला यहीं जीना चाहती है और यहीं मरना भी. मुंबई महानगर में कमाठीपुरा की यह मंडी एशिया की सबसे बड़ी देह मंडी कही जाती है. कमाठीपुरा की यह कोठरी इतनी तंग है कि यहां सिर्फ एक बेड रखने लायक जगह है.
 
बेला ने कमाठीपुरा से बाहर जीने की कल्पना छोड़ दी है. वजह, बाहर यह हर आदमी से डरती है. वहीं, यहां वह हर बाहरी आदमी के साथ होकर भी खुद को सुरक्षित महसूस करती है.

बेला मूलत: नेपाल की लड़की है. इसे कम उम्र में धोखा देकर लाया गया है. धोखा दिया था इसके प्रेमी ने. जिसे इसने सबसे ज्यादा चाहा था, सबसे ज्यादा भरोसा किया था, उसी ने बेला बेच दी. बेला गरीबी की नहीं, अंधे प्रेम की शिकार हुई है. लेकिन, मेरे लिए ताज्जुब की बात यह है कि इतने साल बाद भी बेला न अपने प्रेमी से अलग हो सकी है और न ही कमाठीपुरा की गलियों से. उसका प्रेमी आज भी उससे मिलने कमाठीपुरा की इन्हीं गलियों में आता है और यह उससे शादी करना चाहती है.

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बेला अपने प्रेमी और कमाठीपुरा की गलियों के बगैर क्यों नहीं रह सकती है? यह समझना मेरे बस की बात नहीं. मुझे तो यही लगता है कि मैं इन्हें जितना समझने की कोशिश करता हूं उतना ही नासमझ साबित होता हूं. बेला ने रात में देर तक बातें की थीं और इस बारे में मुझे बताया था. उसने कहा था, ‘‘और मैं कर भी क्या सकती हूं! मेरे पास कोई चारा नहीं...यहां यह तो है कि मैं किसी पर बोझ नहीं हूं.’’ यही बात उसे सुकून देती है. यही बात उसे आत्मविश्वास देती है.

पता नहीं यह मजबूरी है या कुछ और कि विकट से विकटतम परिस्थितियों में भी उसने अपने प्रेमी के साथ खुशी ढूंढ़ ली है और न चाहते हुए भी इस जगह पर अपनी मर्जी से न आने के बावजूद वह अब यहीं जिंदगी बिताना चाहती है.

सच है कि कमाठीपुरा सेक्स की सबसे सस्ती जगहों में से है. लेकिन, मेरे लिए शुरू से ही यह जगह जिज्ञासाओं का केंद्र रही है. आदमी की जिज्ञासाएं आदमी से जो करवा दें, कम हैं. जिज्ञासाएं विपरीत के प्रति. इन्हीं जिज्ञासाओं ने मुझे मेरी दुनिया से निकालकर यहां आने पर मजबूर कर दिया.

इनकी वजह से ही मैं कमाठीपुरा से महज एक किलोमीटर दूर नागपाड़ा स्थित अपने ठिकाने से इन गलियों और फिर इन गलियों से गुजरते हुए इस बेहद तंग कोठरी तक आया हूं. यहां मैंने जाना है कि बेला जैसी लड़कियों के ग्राहक ही उन्हें बाहर की दुनिया के कुछ किस्से सुनाते हैं. और अजीब बात है कि मैं बाहर का आदमी इनके बारे में जानने के लिए इनकी दुनिया की इन पिंजरानुमा कोठरियों में एक के बाद एक दाखिल होता जा रहा हूं.

बेला जैसी कई लड़कियों को जब मैंने बताया कि मैं सिर्फ बातचीत करने के लिए आया हूं तो उनमें से कुछ लड़कियों को बिल्कुल भी हैरानी नहीं हुई, क्योंकि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में मैं ऐसा पहला आदमी नहीं हूं. उल्टा मुझे तो इस बात पर हैरानी हुई कि मैं क्यों ऐसा पहला आदमी नहीं हूं जो सिर्फ और सिर्फ उनसे बातें करने के लिए आता हूं.

मुझे याद आता है कि इन्हीं लड़कियों में से एक ने मुझे बताया था कि कुछ आदमी अपनी बातें सुनाने के लिए आते हैं, जबकि कुछ आदमी उनकी बातें सुनने के लिए आते हैं. उनकी नजरों में मैं दूसरे तरह का आदमी हूं, जो उनकी बातें सुनने के लिए यहां आता हूं. यह सच है कि मैं इन दिनों उनके अहसास, अनुभव, मर्जी और शर्तों के बारे में जानना चाहता हूं. मैं उन परिस्थितियों के बारे में समझना चाहता हूं जिनमें वे रहती हैं, उन सपनों के बारे में पता करना चाहता हूं जो उनकी आजादी, अतीत और भविष्य से जुड़े हैं.

मगर, रात में जब से बेला ने मेरे जैसे लोगों को सनकी कहा है तब से मैं दिमागी तौर पर खुद को कुछ बीमार-सा महसूस कर रहा हूं. असल में उसने कुछ आदमियों की अजीब हरकतों के बारे में मुझे बताया तो मेरा ध्यान मेरी एक आदत पर गया. आदत यह कि उसकी कही कुछ बातों को सुनने के बाद मैं बार-बार उसका माथा चूम लेता हूं. फिर मुझे ध्यान आया कि मैं यहां की अन्य लड़कियों के साथ भी अक्सर ऐसे ही करता रहा हूं, जिसे शायद न वे सेक्स समझती होंगी और इसमें न ही मुझे सेक्स जैसा कुछ महसूस होता है. यह उनके प्रति मेरा प्यार और आभार है, जो बताता है कि मैं उनके साथ ‘कंफर्ट’ हूं.

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मगर, अभी जितना निडर और बेझिझक हूं, शुरू-शुरू में ऐसा बिल्कुल नहीं था, शुरू-शुरु में तमाम तरह के डर और धारणाओं से आगे बढ़ पाना मेरे लिए आसान न था. डर की सबसे बड़ी वजह तो यह थी कि कहीं इन लड़कियों से यौन-संबंध स्थापित न हो जाएं, क्योंकि यहां आने से पहले मैंने एड्स की स्थिति और अन्य बीमारियों के बारे में अच्छी तरह से जान और समझ लिया था.

कहा जा सकता है कि एड्स की स्थिति और अन्य बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों की भयावह कहानियों ने भी मुझ पर नियंत्रण बनाए रखा. फिर इनसे मिलने और इनकी सच्ची कहानियां सुनने के बाद मुझे इनके साथ एक अच्छी दोस्ती का अहसास तो हुआ, लेकिन सच बात यह भी है कि इनमें से कोई ऐसी न थी जो मेरी ‘फेंटेसी’ बने. असल बात तो यह है कि इन्हीं दिनों में एक रिश्ते में हूं और वहीं मेरी ‘फेंटेसी’ है.

बेला के साथ यह मेरी पहली रात थी, जबकि आज की तारीख तक कमाठीपुरा की पिंजरानुमा कोठरियों में अलग-अलग लड़कियों के साथ शनिवार की आठ रातें और रविवार की बारह दोपहर गुजार चुका हूं.

इस दौरान मुझे चौदह लड़कियों से खुलकर और विस्तार से बातचीत का मौका मिला है. अपने अनुभव के आधार पर एक बात बता सकता हूं कि इनमें से किसी भी लड़की ने मुझसे न तो ज्यादा पैसे मांगे और इनमें से न ही कोई भी बेइमान थी. हां, कुछ लड़कियों ने बातचीत के दौरान अश्लील गालियों का इस्तेमाल किया, जिनसे मुझे कोई आपत्ति नहीं, फिर भी जिन्हें मैंने लिखते समय कांट-छाट दिया. पता नहीं यह सही है या गलत, लेकिन यह सही है कि मैंने उनकी भावनाओं को अपनी भाषा में लिखा है.

पुस्तक: एक देश बारह दुनिया
लेखक: शिरीष खरे
प्रकाशक: राजपाल प्रकाशन
भाषा: हिंदी
विधा: रिर्पोताज
पृष्ठ संख्या: 208 पेज
मूल्य: 295 पेपरबैक
प्रकाश्न वर्ष: 2021

 

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