scorecardresearch
 

कैलकटास्केप: म्यूज़िंग्स ऑफ ए ग्लोबट्रॉटर; एक घुमक्कड़ की विचार-यात्रा

जीवन को ज्यों का त्यों, सहज किंतु आह्लादकारी तरीके से, शब्दों में पकड़ने की इच्छा घुल जाए तो उसका परिणाम संदीप भूतोड़िया की 'कैलकटास्केपः म्यूजिंग्स ऑफ ए ग्लोबट्रॉटर' के रूप में सामने आता है

कैलकटास्केप: म्यूज़िंग्स ऑफ ए ग्लोबट्रॉटर कैलकटास्केप: म्यूज़िंग्स ऑफ ए ग्लोबट्रॉटर

आसान शब्दों में कहा जाए तो जो लिखे वही लेखक है. ज्यादातर शब्दकोश यही बताएंगे. लेकिन जब लेखन में किसी शहर की बारीकियों, उसके लोगों और उसके संस्कारों-लोकाचारों को समझने की इच्छा ... जीवन को ज्यों का त्यों, सहज किंतु आह्लादकारी तरीके से, शब्दों में पकड़ने की इच्छा घुल जाए तो उसका परिणाम कैलकटास्केपः म्यूजिंग्स ऑफ ए ग्लोबट्रॉटर के रूप में सामने आता है. साहित्य जगत को संदीप भूतोड़िया की ताजा सौगात बीते सालों में उनके लेखन और ब्लॉगों का संग्रह है, जिसे उन्हीं के शब्दों में कहें तो, “मैं हमेशा इन्हें एक पुस्तक के रूप में लाना चाहता था, लेकिन व्यस्तताओं के चलते लॉकडाउन के पहले इसके लिए समय नहीं निकाल सका था.” सांस्कृतिक और आम जिंदगी, दोनों तरह के मूल्यों का गहराई से ध्यान रखने वाले संदीप की किताब ‘कैलकटास्केप: म्यूज़िंग्स ऑफ ए ग्लोबट्रॉटर’ पूरी ईमानदारी से एक शहर को समझने और उसकी गत्यात्मकता को सामने लाने की उनकी इच्छा का आदर्श प्रतिबिंब है.

किताब की प्रस्तावना कुणाल बसु ने लिखी है और परिचय जया बच्चन ने दिया है. किताब में 100 से अधिक अध्याय हैं और वे सभी भूतोड़िया के खुद के अलग-अलग अनुभवों और प्रेक्षणों से जुड़े हैं. सादगीपूर्ण होते हुए भी कस कर पकड़ने वाले और मनोरंजक होते हुए भी विचारोत्तेजक अध्यायों वाली यह किताब एक बार शुरू करने पर खत्म होने के पहले न छोड़ी जाने वाली है.  

विचार श्रृंखला
रोजमर्रा की घटनाओं से लेकर विलासितापूर्ण यात्राओं तक... मशहूर हस्तियों और फिल्मी सितारों से लेकर विदेशी गणमान्य व्यक्तियों और राजनेताओं के साथ मुलाकातों तक... वन्यजीवों से लेकर चुरू के श्मशान घाटों तक... इस किताब में भूतोड़िया ने असंख्य विषयों पर लिखा है. एक तरफ वह अवैध निर्माणों और कोलकाता में अग्नि-दुर्घटनाओं के मुद्दों पर प्रकाश डालते हैं तो दूसरी तरफ हुगली क्रूज की सुंदरता का वर्णन करते हुए इस ‘सिटी ऑफ़ जॉय’ के जीवन का सटीक चित्रण करते हैं. वास्तव में अलग-अलग विषयों को किताब में दिलचस्प तरीके से एकसाथ रखा गया है और इस किताब में ऐसा आपको में हर थोड़ी दूर पर मिलेगा. ‘डिवाइडेड इन डेथ’ अध्याय में विभिन्न हिंदू जातियों और छोटी जातियों के लिए अलग शवदाह-स्थलों की व्यवस्था के बारे में दिया गया विवरण वास्तव में आंखें खोलने वाला है. इसी क्रम में उन्होंने एक शाही परिवार में एक युवा के राज्याभिषेक समारोह और एक भव्य समारोह में गुरु गोबिंद सिंह जी की सदियों पुरानी तलवार का उपहार पाने के घटनाक्रमों का भी उल्लेख किया है.

मारवाड़ियों का जिक्र
किताब के कुछ अध्याय मारवाड़ियों के बारे में चर्चा को समर्पित हैं. खुद मारवाड़ी होने के नाते भूतोड़िया ने उनकी परंपराओं और रीति-रिवाजों के बारे में काफी हद तक अपनी अंतर्दृष्टि साझा करते हुए संकेत किया है कि इनमें से कुछ को समय के साथ बदलने की कितनी जरूरत है. एक अध्याय दूसरे देशों में बसे मारवाड़ियों को भी समर्पित है, जो अपने-अपने देशों में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं. व्यापार की दुनिया में कम सक्रिय रही मारवाड़ी महिलाओं के बारे में बात करते हुए, उन्होंने अपनी मां डॉ. प्रभा खेतान के उदाहरण दिए हैं, जो पारम्परिक साँचा तोड़ कर सफल उद्यमी बनने वाली पहली मारवाड़ी महिलाओं में से एक थीं.

दुनिया भर के बारे में...
अपनी विदेश यात्राओं के बारे में बात करते हुए, वह आपको उस देश, उसके इतिहास के साथ ही उल्लेखनीय रूप से सामान्यतः भारत के साथ और विशेष रूप से बंगाल के साथ उसके संबंधों का सुंदर विवरण देते हैं. जैसे, उनकी रियो डि जेनेरो यात्रा को समर्पित अध्याय, जहां कुछ समय पहले तक बंगाली के महान कवि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की मूर्ति थी. उन्होंने उन कुछ लैटिन अमेरिकी दूतावासों के बारे में भी लिखा है, जहां बंगाली साहित्य के स्पेनिश में स्पेनिश साहित्य के बंगाली में अनुवाद का काम चल रहा है.
भूतोड़िया की इन विदेश यात्राओं की दिलचस्प बात यह है कि वह हमेशा वहां के स्थानीय भारतीयों के साथ बातचीत करते हैं, और मानते हैं कि उनके दिल भारत के लिए धड़कते हैं. यह स्वयंभू घुमक्कड़ उन लक्जरी होटलों के बारे में लिखना भी नहीं भूलता जहां वह रुका होता है. वहां का परिवेश, सेवाएं और भोजन आदि सभी कुछ.. आप इन विवरणों को पढ़ते हुए अपनी पसंद की जगह चुन सकते हैं.... यूरोप, अमेरिका (विशेषकर 9/11 के दौरान जब वह आतंकवादी हमलों के बाद वर्ल्ड ट्रेड सेंटर टावरों के पतन का गवाह बने), दक्षिण पूर्व एशिया, भूटान, चीन… समेत इस अंतहीन सूची के सभी स्थान वास्तव में पूरे-पूरे अध्याय लायक हैं और भूतोरिया इस मामले में निराश नहीं करते.

तकनीक से मिलन
इसी किताब में जगह-जगह पर आपको आंधी की तरह दुनिया में फैलती नई तकनीकी क्रांति, सेल फोन, की चर्चा करने वाले अध्याय भी मिलेंगे. इन अध्यायों को पढ़ते हुए आपको साफ पता चल जाएगा कि दुनिया भले सेल फोन के पीछे भाग रही हो, लेखक इसके प्रशंसकों में नहीं है. उन्होंने चर्चा की है कि कैसे उन्होंने अपने सेल फोन को कुछ महीनों के लिए बंद रखा और कितनी शांति महसूस की. वह लिखते हैं, “इससे मेरी एकाग्रता में सुधार हुआ.”
इसी क्रम में उन्होंने ऐसी घटनाओं का भी जिक्र किया है, जब लोगों ने अंत्येष्टि या बैठक में शामिल होने जैसी गंभीर स्थितियों में भी अपने फोन बंद नहीं किए. एक घटना के जिक्र में उन्होंने लिखा है कि एक अर्थी में कंधा दे रहा व्यक्ति फोन पर बात कर रहा था, जिससे वहां मौजूद सभी लोग काफी आहत हुए थे. और कि, इस घटना के बाद कैसे उनकी एक चाची ने घोषणा की थी कि उनके अंतिम संस्कार में किसी सेल-फोन वाले को शामिल न होने दिया जाए. एक अध्याय में वह इस पर भी हैरानी जताते हैं कि भारत के लोग वॉयसमेल या संदेश का इस्तेमाल करने से क्यों बचते हैं, जबकि यह किसी अन्य काम में फंसे व्यक्ति से सम्पर्क करने का सबसे आसान रास्ता है. ‘गूगल पीढ़ी’ के बारे में चर्चा वाले अध्याय में नई पीढ़ी के इंटरनेट के साथ जुड़ाव पर उनकी चिंता सामने आई है. अन्य अध्यायों की ही तरह, ये चिंताएं भी जीवन के हर हिस्से में प्रौद्योगिकी के बड़े पैमाने पर व्यापक उपयोग और उसके नुकसानों को उजागर करती हैं. यह निश्चित रूप से विचारणीय प्रश्न है!

कोलकाता से जुड़ाव
किताब का शीर्षक ठीक-ठीक संकेत करता है कि इसके केंद्र में कोलकाता और बीते सालों में इसके भू-परिवेश के विभिन्न पक्षों जैसे आधारभूत संरचनाओं, समाज और मानव व्यवहार में हुए बदलाव हैं. इसके कुछ अध्याय दिल्ली पर हैं और कुछ अध्याय जयपुर (राजस्थान) पर, जहां उनकी जड़ें हैं. कुछ अध्याय मुंबई पर भी हैं, जहां लेखक ने कुछ साल बिताए थे. लेकिन, इसे पढ़ते हुए आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका दिल तो कोलकाता में बसता है. दुर्गा पूजा के बारे में बात करते हुए, वह कहते हैं कि यह बात उनके दिल को वास्तव में गदगद कर देती है कि पूरी दुनिया में, खास तौर पर अमेरिका, कुआलालम्पुर (मलेशिया), ज्यूरिख (स्विटजरलैंड), आदि देशों में भी ‘प्रबासी पूजा’ का आयोजन होता है. साथ ही, वह इस बात से तब दुःखी भी होते हैं जब लोग वरिष्ठ नागरिकों से भी पूजा के नाम पर दान मांगते और दबाव बनाते हैं.

बढ़िया मिश्रण...
साहित्य उत्सव, साहित्यिक बैठकें, फिल्म पुरस्कार, संसदीय सत्र आदि-आदि...सभी कुछ एक साथ... फिर भी, इस किताब के अध्याय हर चीज के बारे में पर्दे के पीछे की जानकारियां देते हैं. भूतोड़िया जिस तरह से किसी समारोह की अंदरूनी जानकारी देने वाली छोटी-छोटी घटनाओं को बुनते हैं, वह पढ़ना बहुत रोचक है. बहुत से विवरणों को पढ़ते हुए आपको ठहाके छूट सकते हैं तो कई मौकों पर उनका लेखन आपको रुक कर सोचने के लिए बाध्य करेगा– खासकर जब वह पुरस्कार समारोहों में देर से आने के चलन या किसी प्रतिष्ठित संगठन में मानद पदाधिकारी बनने के लिए मदद मांगने वालों के बारे में बात करते हैं. एक जगह उन्होंने इस बात भी दुःख जताया है कि भारत में अभी भी बहुत से लोग आमंत्रणों पर अपनी भागीदारी की सूचना देने को कोई महत्त्व नहीं देते जिसकी वजह से मेजबानों को अक्सर मुश्किल का सामना करना पड़ता है. यह बात एक साथ ही मज़ेदार और गंभीर दोनों है. एक अन्य स्थान पर उन्होंने याद किया है कि पोलो के एक आयोजन में जब वह थोड़ी देर से पहुंचे तो उन्होंने वहां पहले से मौजूद डिज़ाइनर कपड़ों में सजी-धजी और एवियन की बोतल थामे एक महिला से पूछा कि किसने स्कोर किया है तो जवाब में महिला ने पूछा कि “क्या गोल हुए हैं?”

सब कुछ शाही...
पोलो ऐसा खेल है जो दुनिया भर में बहुत ज्यादा प्रचलित नहीं है, लेकिन जयपुर और कोलकाता में इसकी काफी चर्चा रहती है. भूतोरिया का कहना है कि यह खतरनाक खेल है क्योंकि उन्होंने खुद जोधपुर के राजकुमार को खेल के दौरान गिर कर सिर में गंभीर चोट खाते देखा था.
छोटी सी रियासत सिरमौर के युवा राजकुमार लक्ष्य राज प्रकाश के राज्याभिषेक का विवरण भी रोचक है. जयपुर राजघराने के एक बेटे के हिमाचल प्रदेश में सिरमौर का शासक बनने की कहानी वास्तव में रोचक है. संदीप भूतोड़िया आपको इन भूतपूर्व शाही परिवारों के कामकाज के तौरतरीकों की विस्तार से जानकारी देते हैं.


आम लोगों का जीवन भी...
इन हाई प्रोफाइल किस्सों-कहानियों के अलावा, किताब में ऐसे अध्याय हैं, जो रोजमर्रा की जिंदगी और आम आदमी, विशेष रूप से कलाकारों की जिंदगी की बारीकियों को उजागर करते हैं. एक मर्मस्पर्शी घटनाक्रम में भूतोड़िया याद करते हैं कि कैसे राजस्थान का बाल कलाकार वीरेंद्र सिंह राठौड़ सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का पुरस्कार जीतने पर राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार लेने सपरिवार दिल्ली आया था. इन लोगों को दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में ठहराया गया था, लेकिन जब परिवार होटल छोड़ कर जा रहा था तो होटल वालों ने उनके सामने खाने और यात्रा का बिल रख दिया था. इससे वह परिवार हक्काबक्का रह गया था तब संदीप ने उनकी मदद की. फिर भी, यह घटना देश में अभी भी मौजूद कुलीनवादी मानसिकता के बारे में कसैला स्वाद छोड़ती है.

करीब से गुजरते हुए
संदीप भूतोड़िया ने अपनी किताब में भारत में धार्मिक स्थानों के महत्त्व पर भी प्रकाश डाला है. अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर की यात्रा से संबंधित अध्याय में वह साफ-साफ रेखांकित करते हैं कि मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्चों समेत सभी धर्मस्थल कैसे हमारी आस्था और आंतरिक शक्ति के सबसे मजबूत स्तंभ हैं. उनका मानना है कि ‘यह आस्था ही है जो हमारे देश को चला रही है और निरंतर चलायमान रखती है.’ इसी जगह भूतोड़िया को यह दुःख भी है कि ऐतिहासिक स्थलों और राष्ट्रीय उद्यानों में जाने वाले दर्शक और पर्यटक कैसी बेपरवाही से गंदगी फैलाते हैं. एक घटनाक्रम मर्सिडीज़ कार में बैठे आदमी द्वारा प्लास्टिक की खाली बोतल फेंकने से संबंधित है, जो आपको रुक कर सोचने के लिए बाध्य करती है. हम अपने घर को भले ग्रेनाइट और संगमरमर से सजा लें, पर बाहर की गंदगी के बारे में शिकायत क्यों करें जब हम खुद ही उसे फैलाने में योगदान करते हैं.

इस बात की भी चर्चा होनी चाहिए कि किताब के एक अध्याय में उन्होंने डॉमिनिक लापियर और लैरी कॉलिंस की मशहूर किताब ‘फ्रीडम ऐट मिडनाइट’ को उद्धृत किया है कि कैसे समय की कमी से जूझ रहे लॉर्ड माउंटबेटन ने एक पेंसिल लेकर भारत के नक्शे पर पंजाब राज्य को विभाजित करती हुई रेखा खींच दी थी, जो भारत-पाकिस्तान की सीमारेखा बन गई. तमाम दूसरे लोगों की ही तरह से उन्होंने भी इस अनुत्तरित प्रश्न पर विचार किया है कि क्या विभाजन न हुआ होता तो देश की स्थितियां बेहतर रही होतीं या आज से भी खराब होतीं.
ऐसी कई छोटी-छोटी घटनाएं हैं जो आंख पर जोर डाले बिना ही ध्यान आकर्षित करती हैं. पाठक प्रत्येक शब्द, प्रत्येक वाक्य और प्रत्येक घटना से जुड़ता जाता है. उदाहरण के लिए, अपनी पत्नी के घोड़े मिचिको को मिट्टी में दबाते हुए लेखक का शोक इतना वास्तविक है कि वह शब्दों के पार आकर पाठक को छू जाता है. यह लेखकीय क्षमता है जो अध्याय-दर-अध्याय पाठक से यह जुड़ाव बनाए रखती है.


दिल से निकली...
विदेशी साहित्य सम्मेलनों की आकर्षक यात्राओं से लेकर, छोटे-छोटे रेस्तराओं तक की यात्रा, लक्जरी होटलों, सिनेमा से लेकर वन्य जीवन तक, पुस्तक-पाठ से लेकर फैशन शो तक, किताब का हर पन्ना आपको बांधे रहता है और इसका सारा श्रेय लेखक को है कि वह बेहद सहजता से पाठकों को एक से दूसरे विषय तक ले जाता है. हर अध्याय आप में कुछ और पाने-पढ़ने की ललक छोड़ने के साथ ही आपको विचार करने के लिए बाध्य करता है. इसी के साथ आप यह भी महसूस करते हैं कि हर अध्याय से कुछ न कुछ सीखने को मिला है.
सुगठित और बहुत श्रमपूर्वक व्यवस्थित कहानियों का ये गुलदस्ता आपको अंत तक बांधे रखेगा. ये कहानियां लेखक के दैनंदिन जीवन से निकली हैं और उसके विचारोत्तेजक, बेलाग और स्पष्ट प्रेक्षणों के साथ इस आकर्षक पुस्तक के रूप में गूंथी गई हैं. वास्तव में ये एक घुमक्कड़ की विचार-श्रृंखला ही है! सीधे दिल से निकली!

#कैलकटास्केप की यह समीक्षा मूल रूप से अंग्रेजी में जिया दत्ता ने की है.

पुस्तकः कैलकटास्केप: म्यूज़िंग्स ऑफ ए ग्लोबट्रॉटर
लेखकः संदीप भूतोड़िया
विधाः संस्मरण, यात्रा- लेखक
भाषाः अंग्रेजी
प्रकाशकः मैकमिलन
पृष्ठ संख्याः 256
मूल्यः 499

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें