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अप्रतिहत कवि-मन का निर्मल नैवेद्य अशोक वाजपेयी का 'कम से कम'

कोरोना संक्रमण के इस दौर ने अशोक वाजपेयी की गतिविधि और यात्राओं पर विराम भले लगाया हो, उनकी कविताओं का करघा कभी मंद नहीं पड़ा

कवि अशोक वाजपेयी और उनका काव्य संकलन कवि अशोक वाजपेयी और उनका काव्य संकलन

अपने इक्यासीवें वर्ष में चल रहे अशोक वाजपेयी साहित्य के एक अनवरत यात्री है. मुक्तिबोध के इस कथन कि 'कभी खत्म होती नहीं कविता' की तरह साहित्य संस्कृति और कला से उनका भी कौल-करार कुछ इसी किस्म का है. लिहाजा कोरोना संक्रमण के इस दौर ने उनकी गतिविधि और यात्राओं पर विराम भले लगाया हो, उनकी कविताओं का करघा कभी मंद नहीं पड़ा, उनकी वैचारिकी अपने समय की असंगतियों को चिह्नित करने से नहीं चूकती. साल की शुरुआत में आए उनके संग्रह 'कम से कम' पर कवि-आलोचक डॉ ओम निश्चल कहते हैं कि यह संग्रह उनके अप्रतिहत कवि-मन का निर्मल नैवेद्य है.
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लिखो कि अपनी गवाही दर्ज करा सको
और कह सको बिना आंख झपकाए
कि वारदात के समय तुम चुपचाप देख भर नहीं रहे थे. -लिखो

ये पंक्तियां अशोक वाजपेयी के नए कविता संग्रह 'कम से कम' की हैं जो यह जताती हैं कि कविता कला व संगीत-चिंतन के सतत रथी अशोक वाजपेयी इस बुढ़ापे को भी शब्दों की युवतर चेतना से भर रहे हैं कि जैसे अंधेरे समय में उजाला भर रहे हों. पिछले ही संग्रह 'कहीं कोई दरवाजा' में उनका कहना नहीं भूलता कि पृथ्वी इतनी उदारचेता और वत्सल है कि वह अभी भी हमारे गुनाहों को विस्मृति के क्षमादानों में फेंकती जा रही है. ऐसे निर्मम समय में जब बाज़ार के उजाले में विपन्न व्यक्ति की कोई सुनवाई न हो, पूरे परिदृश्य को विज्ञापन के रंगरेज अंधेरे समय के दाग धब्बों को ढँकने पर सन्नद्ध हों, साम्यवाद या समाजवाद सिर्फ घोषणापत्रों की सैद्धांतिकी तक महदूद रह गया हो, एक कवि -वह भी अशोक वाजपेयी जैसा जिद्दी कवि न तो अपने समय को बदलने की कोई घोषणा करता है, न ऐसी अहम्मन्यता पालता है. पर वह अपने नैतिक विवेक के आर्तनाद को शब्दों  की कार्रवाई में बदलने का आकांक्षी जरूर लगता है.

किसी भी बड़े कवि का यह लक्षण है कि वह न केवल कवियों के उत्तराधिकार को बरतता है बल्कि अगली पीढ़ी के लिए उत्तराधिकार छोड़ भी जाता है. कविता ही जैसे कवि की लिखित वसीयत हो. 'अपने हाथों से उठाओ पृथ्वी' कविता वे पहले लिख चुके हैं. उनके नए संग्रह 'कम से कम' की भी 'लिखो' कविता पढ़ कर जर्मन कवि बर्तोल्त' ब्रेख्त की नई पीढ़ी के नाम लिखी कविता याद आती है, जिसमें उन्होंने अपनी पीढ़ी की दिलेरी को तरजीह देने का अनुनय किया था. अशोक वाजपेयी ठीक उसी लहजे में कहते हैं -'लिखो जो अकारण निरपराध मारे जा रहे हैं/ और जिन्हें न कब्र मिलती है न चिता/ और जिन्हें भूलना जुर्म में शामिल होना होगा.' यह एक ऐसा जिद्दी कवि है जो अपनी कविता की कोमल काया की चिंता किए बिना उसमें सूक्ष्म के ज्ञापन को डायल्यूट करते हुए सीधी दो टूक भाषा में यह कह कर जीवन की धज्जियां उड़ाने पर हठी दिखता है-
क्षमा करो
स्वच्छ लोकतंत्र के निर्मल नागरिको
तुम्हारे स्व‍च्छ्ता अभियान में तुम्हारे साथ नहीं हूँ.-क्षमा करो

अशोक वाजपेयी ने कविताओं में जिन्दगी भर देवता, गोधूलि, अवसान, एकांत, अनंत, लोप और जीवन के विपर्ययों को साधा है और जीवन की उत्तरशती तक आकर भी इन प्रत्ययों से मुँह नहीं मोड़ा बल्कि, रूढ़ि की हद तक उन शब्दों, पदों, प्रत्ययों का साथ निबाहा है जिन्होंने 'शहर अब भी संभावना है' से लेकर अब तक यानी 'कम से कम' तक हमारे समय की बेधक व्यंजनाओं, अलक्षित आशयों व प्रतीतियों को पढ़ने समझने में मदद की है. पर अपने स्वप्नहारे, पथहारे या उम्मीदहारे, मनहारे, अंत:करणहारे वक्तव्यों के बावजूद उम्मीद और प्रार्थना करनी नहीं छोड़ी. वे विपक्ष में खड़े होकर भी केवल नारे और जूलूसों में अपने शब्दों का अपव्यय नहीं होने देते बल्कि दुनिया को यत्किंचित प्रकाशमान करने की नैतिक इच्छा के वशीभूत होकर दुर्विनियोजनकारी शक्तियों से अभिव्यक्ति के स्तर पर सतत लोहा भी लेते रहे हैं. कहने की बात नहीं कि अपने कलावादी रूझानों के बावजूद वे अपने समय के विलाप को सुनने में कभी अलसाये या विमुख नहीं रहे. यह हमारे समय का विलाप ही है जो उनकी कला को करुणा के महाभाव में पर्यवसित कर रहा है.

जब इस वक्त स्मृति को नए सिरे से ध्वस्त कर संज्ञाओं के नए नामकरण किये जा रहे हैं, असहमति को लोकतंत्र में एक व्याधि की तरह देखने का चलन हो, यह कवि ही है जो सत्यंब्रूयात् यानी सच बोलना चाहिए के पथ पर चलने का दुस्साहस कर सकता है. दुष्यंत कुमार ने लिखा था: हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए. यह आग कवि के उन शब्दों में दहकती है जो अपने समय के ठंडेपन और निर्ममता के विरुद्ध आंच और आग बचाए रखने की जतन में लगे होते हैं. उसका अवसाद अब कोई निज का अवसाद नहीं है. वह निज मन मुकुर से छिटक कर बाहर आ चुका है. तभी तो वह कितने सजल शब्दों में कहता है-
कुछ चिड़ियां, थोड़ा सा आकाश, जरा-सी धूप
एक अधखुली खिड़की, एक सूना गलियारा
छोर पर के घर में सो रहा एक ग़रीब बच्चा
भाषा में बढ़ती चुप्पियां
सब कुछ पर छाया अवसाद. -सब कुछ

कभी कैलाश वाजपेयी ने लिखा था: भविष्य घट रहा है. आज अशोक वाजपेयी ठीक उसी लहजे में कह रहे हैं- पृथ्वी पर उम्मीद कम हो रही है. पर इस नाउमीदी के आलम में भी वे उम्मीद का कोई न कोई कोना सहेज कर रखना चाहते हैं. पर उम्मीद कहां है? शायद शब्दों की धीमी पड़ती उजास में, भाषा में घिरते अंधेरों में, विन्यास की शिथिल पड़ती इबारतों में! -कहां खोजें उम्मीद? इसीलिए वे कहते हैं - ''उम्मीद का ऐसा घर अभी वक्त है थोड़ी सी मुहलत कि हिम्मत और मेहनत कर हम बना लें. कहीं और नहीं तो कविता में ही सही.'' -यानी 'हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए.' और यह ऑंच, यह आग, यह उम्मीद कविता में ही सही; कम से कम कविता से तो यह उम्मीद की ही जा सकती है.

अशोक वाजपेयी की अब तक लगभग पंद्रह से ज्यादा काव्य-कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. अपने अप्रतिहत कवित्व के बल पर वे गत और वर्तमान शताब्दी की तमाम हलचलों के पास से गुजरे ऐसे कवि हैं, जिन्होंने देश-दुनिया के समय और साहित्य को करीब से देखा और महसूस किया है. अनुराग और प्रेम के कवि रहे होंगे वे कभी. अब वह मुलम्मा उन पर से हट गया है. यों अनुरागमयता उनके लेखन की अस्थिमज्जा से दूर नहीं हुई है तथापि जिसे कविता की सामाजिक उपयोगिता कहते हैं, उस समाज की बात अब वे कविता में बेहद संजीदा होकर करते हैं. 2020 में आया यह स्लिमकाय संग्रह 'कम से कम' इस बात की गवाही देता है कि वे कविता के ऐसे अप्रतिहत रथी हैं जो अभिव्यक्ति के इस दुस्साध्य समय में श्लथ नहीं हुए हैं तथा कवियों को जिसे विपक्ष के खेमे का माना जाता है, उस विपक्ष की भूमिका निबाहने वाले कवियों में एक हैं.

अजरज नहीं कि इस साल उनके संग्रह के लगभग साथ-साथ पहल द्वारा छापी गयी उनके प्रश्नोत्तर की पुस्तिका भी आई है. दोनों के आवरण ब्लैक एस्थेटिक्स की दृष्टि से बहुत ध्यानाकर्षी बन पड़े हैं पर जैसा कि कवियों को लगभग हर समय यह कहने की आदत पड़ चुकी है, कि यह अंधकार का समय है -उनकी कविताएं और उनका इंटरव्यू दोनों लगभग इस समय की विपत्तियों, समस्याओं और इस अंधेरे समय को बेबाक तरीके से रखते हैं -कविता में सांकेतिक ढंग से तो संवाद में मुखर ढंग से. 

आज जब अहसमति पर अडिग होने का सवाल है. ऐसे वक्त सत्ता के आलोक में दीप्त होने वालों की कमी नहीं. एक सामूहिक चेतना का जिस तरह आखेट हाल के समय में हुआ है वैसा पहले नहीं और ऐसा करने में इलेक्ट्रानिक मीडिया, सोशल मीडिया समेत बहुत सारी अंदरूनी व बाह्य शक्तियां हैं, जो भीड़ को एक खास तरह से प्रदीक्षित करती हैं कि वे उनके प्रदत्त मूलमंत्र से च्युत नहीं होते. खास तौर से अशोक वाजपेयी पिछले लगभग एक दशक ही नहीं बल्कि गुजरात त्रासदी के समय से ही अपनी कविताओं में उत्तरोत्तर राजनीतिक रुख के साथ जिस तरह से सामने आए हैं, उसने हिंदी कविता में उनकी भूमिका को काफी महत्वपूर्ण बना दिया है. जहां कविता आज भी अपने क्राफ्ट की बंदी होकर एक खास तरह की रीतिबद्धता में निमग्न है, अशोक वाजपेयी ने अपनी मुखरता को कविता में जरा सबल ढंग से उद्घाटित किया है. नियमित लिखे जाने वाले स्तंभ में तो वे अपनी बात कहते ही हैं, कविता में कविता की क्षति न हो पर कविता अपने उत्तरदायित्व  से विमुख भी न हो, इसलिए ऐसे इंदराज उनकी कविता में खास तौर पर 'दुख चिट्ठीरसा है' के समय से ही अधिक स्पष्टता से दीख रहे हैं. 'कहीं कोई दरवाज़ा' और 'नक्षत्रहीन समय में' के दौर की कविताओं में वे अपनी असहमतियों और व्यग्रताओं के साथ अमानवीय प्रयत्नों का प्रतिरोध दर्ज करते हैं.

'कम से कम' वाजपेयी की 2015 से 2018 तक की कुछ कविताओं का संग्रह है. उनके संग्रहों में प्राय: भूमिकाएं नहीं हुआ करतीं पर उनके इस संग्रह की शुरुआत भूमिका से होती है. सागर जैसी जगह की कवि गोष्ठी का संदर्भ उठाते हुए वे कहते हैं, ''मेरे लिए जीना कविता के लिए जीना है. मेरे लिए वही जीवन अर्थ रखता है जो कविता में है या जिसे कविता रचती है. ...यह एक हारी होड़ है. हारी है पर होड़ है.'' ऐसा नहीं कि उनकी कविता में विलाप के स्वर नहीं हैं, वे हैं पर कुछ इस तरह कि उनका रोना सुनाई न दे. एक बार एक बातचीत में उन्होंने मुझसे कहा था: ''हँसने के लिए  महफिलें बहुत थीं, रोने के लिए कंधे कम मिले.'' यह एक ऐसे प्रशासनिक अधिकारी का बयान है जो लगभग हमेशा भीड़ के उजाले में होता है. उन्हें इस बात की चिंता है कि समाज कविता विरत हो रहा है जैसा कि साठ साल पहले न था. वे चिंता करते हैं कि कविता अस्तित्व और नियति, ब्रह्मांड और काल का प्रश्नांकन करना छोड़ चुकी है. बड़े स्वप्नों का सूर्यास्त हो चुका है. अपने को स्वप्न हारे और पथहारे मानते हुए भी वे उम्मीदहारे, मनहारे या अंत:करणहारे नहीं मानते. माना कि इस समय अंधेरा है पर ''कविता का काम ही 'अंधेरे में' होना, अंधेरों की शिनाख्त करना है.'' 

अपनी नागरिकता की तमाम जवाबदेहियों में कविता को भी शुमार करने वाले अशोक वाजपेयी 'कम से कम' में भी अधिक से अधिक प्रतीति देने की कोशिश करते हैं. हम सब जानते हैं कि कुछ शब्द उनकी कविता के लिए अनिवार्य श्रृंगार या कूट पदों की तरह हैं. देवता, प्रतीक्षा, प्रार्थना, उम्मीद, बचाना, गोधूलि इत्यादि. यहां भी उनकी आमद हुई है. 'प्रार्थना करता हूँ' कविता में उनका यह इसरार है कि 

थोड़ी-सी जगह छोड़ दो 
जिसमें थके हारे लोग बैठ कर कुछ देर सुस्ता सकें;
थोड़ा सा पानी और गुड़ रख दो
जो यहां से गुजरने वालों के काम आए. 
थोड़े से शब्द चुपचाप रख दो
जिन्हें कोई चाहे तो किसी दुर्दिन में काम आने के लिए
अपने साथ ले जाय. 

वे हताशा, अवसान और गोधूलि की बातें बहुत करते हैं कविताओं में. कुछ प्रत्ययों को तो जितनी बार प्रयुक्त हों, अलग-अलग अर्थों में डिकोड किया जा सकता है. उनकी चिंता है कि 'पृथ्वी पर उम्मीद कम हो रही है.' या 'दूर दूर तक उम्मीद का कोई घर नज़र नहीं आता'. कभी कैलाश वाजपेयी कहा करते थे, 'भविष्य घट रहा है';  पर इस सबके बावजूद वे उम्मीद नहीं छोड़ते. उनकी कविता के ही हवाले से-

उसी दरवाजे से लौटेंगी
भाषा की कई अनजानी उक्तियां
रंगों के बहुत सारे अरूप,
स्वरों के अटपटे संयोजन-
उन्हें पहचानना कठिन होगा
असंभव होगा उन्हें थामना -उसी दरवाजे से

वे कहते हैं, चलो बैठकर उम्मीद का एक कन्था बनाते हैं. अत्याचार के विरुद्ध जयकार के नारों में दुबकी हुई चीख/ अकारण मारे गए लोगों के लिए विलाप, बच्चों की फूल जैसी कोमल गदेलियों और बूढ़ों की आंखों में थम गए आंसुओं से युवा कसमसाहट और आवेग से, स्त्रियों की हँसी और सिसकियों से/ चलो उम्मीद का एक कन्था बनाते हैं. (उम्मीद का एक कन्था) अकारण नहीं कि इन कविताओं में किसी न किसी रुप में उम्मीद के स्वर मंद नहीं पड़ते.

वे इस बात की वजह बार-बार अपनी कविता में तलाशते हैं कि क्या बात है हमारे पास कोई सवाल नहीं बचे हैं. हम आश्वस्त हो गए हैं कि सभी जरूरी मसलों का हल मिल गया है. वे इनमें अपनी असहमति का स्वर भी बुलंद करते हुए स्वच्छ‍ता अभियान में साथ न होने की घोषणा करते हैं. वे कविता में सारी चीजें निर्भयता से लिखने को कहते हैं और 'युगांत' में तो जैसे इस समय का दृश्यालेख बांच रहे हों -''भाषा में शब्द लगातार घट रहे हैं/ और गालियां तेजी से बढ़ रही हैं/ अखबार निकल रहे हैं स्तुति स्मारिकाओं की तरह निर्लज्ज/ और झूठ की दमक और छटा चहुँओर फैल रही है/ भाषा में सच के लिए शब्द नहीं बचे हैं. ''

उत्तर जीवन में अक्सर लेखक 'हारे को हरिनाम' जपने लगते हैं. किन्तु अशोक वाजपेयी ने इसके उलट सदैव की तरह कला साहित्य और संस्कृति के सवालों पर अपने को उत्तरोत्तर उत्तरदायी बनाया है. हर हफ्ते बिला नागा 'कभी कभार'  के अपने स्तंभ लेखन के जरिए उन्होंने समाज व राजनीति की संकीर्णताओं और साहित्य में व्याप्त धुंधलके को चीरने का काम किया है. जिस तरह से वे लगातार वर्तमान समय में सत्तारुढ़ शासन की मूढ़ताओं, संकीर्णताओं पर प्रहार कर रहे हैं, मेरे देखे ऐसे लेखक कम हैं जो यह जोखिम उठाने में उनके हमकदम हों-यहां तक कि वामपंथी कवि भी. यह उनकी लेखकीय जिद है कि उन्होंने अपने कवि-चिंतक के कार्यभार को कहीं च्युत नहीं होने दिया है. यों तो आर्थिक सुधारों व भूमंडलीकरण के बाद बदले सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उनकी कविताएं अपने पूर्व स्वभाव से परिवर्तित होने लगी थीं किन्तु लेकिन 'कहीं कोई दरवाज़ा' से उनका कवित्व साहसिक प्रत्याख्यानों के लिए जाना जाएगा. वे भले ही शुरुआती दौर में प्रेम, अवसान, प्रतीक्षाओं व गार्हस्थ्‍य के कवि रहे हों, उनकी बहुविध कविताओं को लगभग एक रंग में पर्यवसित कर देखने की चेष्टाएं की गयी हों, पर गुजरात त्रासदी के बाद उनकी कविता करवट बदलती है तथा बगैर राजनीतिक मुखौटा चढ़ाए वह राजनीतिक कविता का एक प्रस्तावन तैयार करती है और राजनीतिक कविता लिखने वाले ज्ञानेन्द्रपति, आलोक धन्वा, विष्णु नागर, असद जैदी, देवीप्रसाद मिश्र की पहल को अपना मौन समर्थन देती है. 

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