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पुस्तक अंशः क्या रहा है मुशायरों में अब; गायब होती तहज़ीब व परंपरा की बात

साहित्य और संस्कृति की अपनी तरह की इकलौती संस्था मुशायरा का सफर जारी है. शब्दों का यह उत्सव आज भी हो रहा है. साहित्य आजतक के पाठकों के लिए इक़बाल रिज़वी की पुस्तक 'क्या रहा है मुशायरों में अब' का अंश.

 इक़बाल रिज़वी की पुस्तक 'क्या रहा है मुशायरों में अब' इक़बाल रिज़वी की पुस्तक 'क्या रहा है मुशायरों में अब'

भारतीय उपमहाद्वीप में मुशायरों और महफ़िलों की अपनी एक परंपरा और इतिहास रहा है. अपने मन के भावों को दूसरे के सामने प्रकट करने के लिए मुशायरे एक ऐसी जगह हुआ करते थे, जहां सुनने और सुनानेवाले दोनों एक-दूसरे के पूरक हुआ करते थे. मुशायरे का आरम्भ यूं तो दरबारों और राजमहलों से माना जाता है लेकिन अरब जगत में मेलों के अवसर पर शायरों के जुटने का इतिहास भी मिलता है. अरबी और फ़ारसी के ज़रिये मुशायरे के आयोजन भारत पहुंचे, तो बरसों तक इसमें ख़ास लोग ही शामिल होते रहे. एक ज़माने में मुशायरे तहज़ीब के केन्द्र हुआ करते थे.

आख़िरी मुग़ल बहादुर शाह ज़फ़र के लाल किले के मुशायरे अब इतिहास का हिस्सा हैं. इन मुशायरों में ग़ालिब सुनाते थे और जौक़ सुनते थे, बहादुर शाह ज़फ़र ग़ज़ल पढ़ते थे और सुननेवालों में मोमिन ख़ाँ, ग़ालिब, शेफ़्ता और युवा शायर दाग़ होते थे. उन दिनों सुनानेवालों और सुननेवालों के बीच में इतनी दूरी नहीं होती थी जितनी आज नज़र आती है. फिर जब उर्दू ने विस्तार पाया तो मुशायरों में कई वर्ग के लोग शामिल होने लगे. बाद में सामाजिक वातावरण और राज-व्यवस्था के बदलाव के साथ मुशायरों के तौर-तरीक़ों में भी बदलाव आने लगा.

एक समय जो मुशायरे राजदरबारों, सामन्तों और अभिजात वर्ग के लोगों के लिए सामाजिक हैसियत के पर्याय हुआ करते थे, धीरे-धीरे उन्होंने सार्वजनिक मंचों का रूप ले लिया. सार्वजनिक मंचों पर पढ़ी जानेवाली ग़ज़लों और नज़्मों की लोकप्रियता का परिणाम यह हुआ कि मुशायरों की तर्ज़ पर हिन्दी कविता भी कवि-सम्मेलनों में पढ़ी जाने लगी. दिल्ली के लाल किले पर हर वर्ष गणतन्त्र दिवस के मौके पर आयोजित होनेवाले मुशायरे और कवि-सम्मेलन तो लाल किला मुशायरा और लाल क़िला कवि-सम्मेलन के नाम से बेहद प्रसिद्ध हुआ करते थे. मुशायरों और कवि-सम्मेलनों की बढ़ती इस लोकप्रियता के चलते जहां श्रोताओं के स्वाद में परिवर्तन हुआ है, वहीं सत्ता का हस्तक्षेप भी बढ़ा है. इसलिए इन दोनों सार्वजनिक मंचों पर बेहतरीन शायरी या कविता पढ़ने को नहीं मिलती है बल्कि इनका स्थान चुटकलों और द्विअर्थी कविताओं ने ले लिया है.

शोधी व सुधी पत्रकार इक़बाल रिज़वी की हालिया पुस्तक में मुशायरों के इसी अतीत और वर्तमान को गंभीरता से खंगाला गया है. साहित्य आजतक के पाठकों के लिए 'क्या रहा है मुशायरों में अब' पुस्तक का अंश.

कहां रुकेगा मेरा कारवां ख़ुदा जाने

साहित्य और संस्कृति की अपनी तरह की इकलौती संस्था मुशायरा का सफर जारी है. शब्दों का यह उत्सव आज भी हो रहा है. रंग, रूप, तेवर और लहजा बदलकर हो रहा है. सिर्फ हिंदी उर्दू भाषी राज्यों में ही नहीं बल्कि, बंगाल, उड़ीसा, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, कश्मीर और केरल में भी. सिर्फ भारत और पाकिस्तान ही नहीं दुनिया के उन स्थानों पर भी मुशायरे हो रहे हैं जहां कभी सोचे भी नहीं गए थे. बड़े मुशायरों में पहुंचने वाली नौजवानों की अच्छी संख्या उम्मीद जगाने वाली है.  

मीर चले गए, ग़ालिब ख़ामोश हुए, इकबाल चुप हो गए, चकबस्त, फिराक़, फ़ैज़, साहिर, जिगर, जोश और ख़ुमार भी विदा हो गए लेकिन मुशायरे जारी हैं. पुराने मुशायरों की वीडियो रिकार्डिंग ने जौन एलिया को फिर से ज़िंदा कर दिया है. उन्हें अब फिर से समझा जा रहा है. यह उनके पढ़े गए मुशायरों की बदौलत ही हुआ कि मरने के सालों बाद उनका कलाम देवनागरी में छप कर सोशल मीडिया पर चर्चा में रहता है. केवल उर्दू भाषियों ही नहीं गैर उर्दू भाषियों के बीच भी अहमद फराज़, नासिर काज़मी, मजरूह और शहरयार जैसे भी जी उठे हैं. मगर बिना जाति, धर्म, वर्ग और देश का लिहाज करे हुए सबको अपने आंचल में समो लेने वाली मुशायरे की गंगा जुमनी रिवायत में दूसरे समुदायों की घटती भागीदारी एक प्रश्न चिन्ह बन गयी है.   

यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह बीते समय की चीज़ों को बेहतर मानता रहा है. यह पीढ़ी दर पीढ़ी होता आ रहा है, पिछली पीढ़ी को शिकायत रहती कि बदलते समय ने सब बरबाद कर डाला उनके समय की बात ही कुछ और थी. मुशायरों को लेकर तो यह शिकायत मीर तकी मीर के समय से होती आ रही हैं हांलाकी तब मुशायरों का सुनहरा दौर शुरू ही हुआ था. पर मीर ने विचलित हो कर कह दिया था ‘क्या रहा है मुशायरों में अब - लोग कुछ जमा आन होते हैं’.  मीर को तब के राजनीतिक और सामाजिक हालात में मुशायरों की परंपरा में आ रहे बदलाव नागवार गुज़र रहे थे.  

बहरहाल उर्दू के आशिक़ ज़िंदा हैं तो मुशायरे भी ज़िंदा हैं. क्योंकि फारसी या अरबी के मुशायरो का वुजूद भारतीय उपमहाद्वीप में तो नहीं बचा है. मुशायरे सीधे उर्दू भाषा से जुड़े हैं और उर्दू मुसलमानो से जोड़ी गयी है. इसीलिए मुस्लिम बाहुल्य राज्यों में उर्दू अकादमियों की स्थापना की गयी. इन अकादमियों को जो बजट मिलता रहा उसे खर्च करने का सबसे सुरक्षित तरीका मुशायरों का आयोजन है. जब जब उर्दू खतरे में है की बात होती थी, ख़ासकर सातवें दश्क के अंत से, तब तब राज्य  सरकारें सूचना एंव जनसंपर्क विभागों के माध्यम से मुशायरों का आयोजन करवा कर यह जताती रहीं है कि वे उर्दू के विकास के लिये प्रयासरत हैं. हांलाकि ये आयोजन खालिस राजनीति से प्रेरित रहे हैं इसलिये ना तो स्तरीय मुशायरों का आयोजन हो पाता था ना ही उर्दू के विकास में एक इंच की बढ़ोत्तरी हो पायी. ऐसे आयोजन सरकारी पैसे की बंदर बांट का जरिया बन कर रह गए.  

मुशायरों का आधार बनी उर्दू के अस्तित्व पर अब भी चर्चा होती रहती है. बस यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है कि उर्दू कब तक ज़िंदा रहेगी. एक बोली के तौर पर नहीं बल्कि एक भाषा के रूप में. किसी भी भाषा की अपनी संस्कृति होती है. उसकी कुछ विशेषताएं होतीं हैं. अरबी, फारसी, तुर्की, बृज, अवधी, जिनके आधार पर उर्दू का विकास हुआ उर्दू से बहुत प्राचीन हैं लेकिन उर्दू में सबको समाहित कर सब तक पहुंचने की जो विशेषता रही उसी ने मुशायरे को स्थापित किया, लोकप्रियता दी, ऐसा लहजा दिया जिससे सबने इश्क किया. कुछ समय से महाराष्ट्र में मुंबई सहित कई स्थानो पर स्कूली स्तर पर उर्दू के शेरों पर आधारित बैतबाज़ी (अंताक्षरी) प्रतियोगिताएं नियमित रूप से आयोजित की जा रही हैं. इस तरह की छिट पुट कोशिशें बंगाल में भी शुरू हुई हैं. हांलाकि ये प्रयास बहुत अश्वस्त करने वाले तो नहीं है लेकिन कुछ ना होने से कुछ होना हमेशा ही बेहतर माना गया है.  

उधर वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी की सुनामी ने, जिसका सीधा असर भारत पर बरसों से पड़ रहा है, कई भाषाओं के विस्तार पर ही नहीं उनके वुजूद पर गहरा असर डाला है. माना जा रहा है कि जो भाषा बेहतर रोज़गार देने में सहायक सिद्ध नहीं हो सकती उसके साहित्य में ठहराव तो हर हाल में आएगा. उस भाषा में नए सोचने और लिखने वालों में क्रमश: कमी आती जाएगी. कई भाषाओं के साथ यह होता दिख भी रहा है जिसमें उर्दू भी शामिल है. इसके अलावा भारत और पाकिस्तान दोनो देशों में भाषायी राजनीति से भी उर्दू को विशेषकर जूझना पड़ा है. उर्दू के भविष्य को लेकर जो चिंताएं हैं वो सीधे सीधे मुशायरे के अस्तित्व से भी जुड़ी हैं.  

वैसे से तो सब कुछ ठीक ठाक सा नजर रहा है. पर ध्यान दें तो उर्दू तहज़ीब की बहुत सी निशानियां गुम हो गयी हैं , कई स्तंभ समय के थपेड़ों से ढह चुके हैं. मुशायरे की जो महफिलें अदब सिखाने की पाठशाला होती थीं वो बदल गयी हैं. वहां व्याकरण, काव्य में नए प्रयोग, मुहावरों के प्रयोग के तरीके और कविता शिल्प जैसे मुद्दे अब नहीं रहे हैं. श्रोताओं की पसंद, कविता को लेकर उनकी समझ,  दृष्टिकोण और व्यवहार में भारी बदलाव आया है. शिष्टाचार के तरीके भी अब यहां सीखने को नहीं मिलते. मुशायरों में हा हा ही ही का माहौल दिखायी देना आम हो गया है.  

व्यवस्था विरोधी शायरी करने वालों को मुशायरों में पढ़ने से पहले ही या तो रोका जाने लगा है या उन्हें आमंत्रित ही नहीं किया जाता. मुशायरों में शामिल होने या आयोजित करने के लिये पहले की तरह परंपराएं, बंधन या शर्तें नहीं रहीं इसमें शामिल होना  सबके लिये सुलभ है. इसकी लोकप्रियता ने इसे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा बन दिया है इसलिये ये साहित्यितक गंभीरता से भी दूर होते जा रहे हैं. सदियों लंबी मुशायरे की दास्तान में नए नए अध्याय जुड़ गए हैं. ये अच्छे हैं या बुरे इनका फैसला समय को करना है. तो इस मिसरे के साथ बात खत्म की जानी चाहिये - ‘कहां रूकेगा मेरा कारवां खुदा जाने’       

पुस्तक: क्या रहा है मुशायरों में अब
लेखक: इक़बाल रिज़वी
भाषा: हिंदी
विधाः  शोध
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
पृष्ठ संख्या: 142
मूल्य: 199 रुपए

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