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पुस्तक अंशः अमेठी संग्राम, दास्तान स्मृति की जीत और कांग्रेसी अहंकार के हार की

'अमेठी संग्रामः ऐतिहासिक जीत, अनकही दास्तान' पुस्तक इनदिनों काफी चर्चा में है. इस पुस्तक में अमेठी के इतिहास के साथ ही स्मृति इरानी की वर्ष 2014 से वर्ष 2019 की संघर्ष यात्रा की चर्चा बेहद बारीक ढंग से की गई है.

अनंत विजय की पुस्तक अमेठी संग्राम का कवर अनंत विजय की पुस्तक अमेठी संग्राम का कवर

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, आलोचक और फिल्म पर सर्वोत्तम लेखन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के स्वर्ण कमल से सम्मानित अनंत विजय की पुस्तक 'अमेठी संग्रामः ऐतिहासिक जीत, अनकही दास्तान' इनदिनों काफी चर्चा में है. इस पुस्तक में अमेठी के इतिहास के साथ ही स्मृति इरानी की वर्ष 2014 से वर्ष 2019 की संघर्ष यात्रा की चर्चा बेहद बारीक ढंग से की गई है. लेखक का दावा है कि उन्होंने स्मृति इरानी की विजय के कारकों को समझने के बहाने भारतीय राजनीतिक दलों और नेताओं की कार्यशैली, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दूरदृष्टि, भाजपा की रणनीति, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता, गाँधी परिवार की ताकत का मिथक और क्षेत्रीय दलों के स्वार्थ का लेखा-जोखा तो लिया ही है, स्मृति इरानी की रणनीतिक, व्यवहारिक और राजनीतिक कार्यशैली को भी सूक्ष्मता से खोला है. साहित्य आजतक के पाठकों के लिए 'अमेठी संग्राम' पुस्तक का एक अंश.

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विद्रोह, क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है. घाव फूटने के पहले बहुत काल तक पकता रहता है. विचार भी, चुनौती लेकर खड़े होने के पहले वर्षों तक अर्धजाग्रत अवस्था में फैलते रहते हैं.’ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने आज से तिरसठ साल पहले अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में यह बात लिखी है. दिनकर की इस पंक्ति को अमेठी के 2019 के लोकसभा चुनाव के ऐतिहासिक नतीजों से जोड़कर देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि 2019 में भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार स्मृति इरानी की जीत किसी क्रांति से कम नहीं थी. इसमें एक परिवार के एकाधिकार के खिलाफ अमेठी की जनता की बगावत भी शामिल है. पांच साल में एक विचार का चुनौती बनकर खड़े हो जाना भी इसका हिस्सा है, तो यह भी कि सालों से स्थापित विकास व परिवार का साम्राज्य जैसी मान्यताएं कितनी छद्म थीं. पिछड़ेपन का घाव भी फूटने के पहले कई दशकों से पक रहा था.

ऐतिहासिकता के आईने में अगर अमेठी के चुनाव का आंकलन होगा तो दिनकर के इन बिंबों से बेहतर बिंब कोई हो नहीं सकता. अगर हम अब से पांच साल पहले, यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो दोपहर बाद ये साफ हो गया था कि अमेठी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव जीत रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार स्मृति इरानी ने राहुल गांधी को कड़ी टक्कर दी थी, लेकिन राहुल गांधी एक लाख सात हजार मतों से जीत गए थे. पर पांच साल बाद स्थिति पूरी तरह उलट थी. मतगणना बेहद धीमी गति से चल रही थी और एक राउंड को छोड़कर हर राउंड में स्मृति इरानी को बढ़त मिली थी. यह अलग बात है कि स्मृति इरानी की जीत में उनके व्यक्तित्व, लोगों से तत्काल जुड़ने की उनकी क्षमता, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता, संघ के कार्यकर्ताओं की तपस्या का एक ऐसा समुच्चय है, जिसका प्रतिफलन नियति ही निर्धारित करती है.

साल 2019 में जब आम चुनाव की घोषणा हुई और भारतीय जनता पार्टी ने अमेठी से स्मृति इरानी के चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी तो समूची पार्टी और स्वयं स्मृति इरानी ने इसे बेहद अलग ढंग से लिया. इन लोगों ने इस चुनाव को राष्ट्रहित से जोड़ कर देखा और माना कि राष्ट्रसेवा के लिए अमेठी का चुनाव जीतना जरूरी है. बाजार, होटल व स्टेशन तो दूर अमेठी में शिक्षा, सड़क, पेयजल और स्वास्थ्य की हालत बहुत खराब थी. स्मृति के यहां आगमन से पहले यह समूचा संसदीय क्षेत्र आधारभूत सुविधाओं से बहुत दूर था. चुनावी मुकाबले को कभी हल्का नहीं लेना चाहिए, इसीलिए पूरे पांच साल तक हर दिन अमेठी को सोचने, समझने, संपर्क साधने के बावजूद स्मृति इरानी ने कभी भी अमेठी को हल्के से नहीं लिया. हालांकि 2014 की तुलना में 2019 में हालात पूरी तरह से अलग थे. केंद्र और प्रदेश दोनों जगहों पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी, स्मृति इरानी केंद्रीय मंत्री थीं.

अमेठी को कोई ऐसा उम्मीदवार चाहिए था, जो कांग्रेस के अहंकार को तोड़ सके. अमेठी की जनता को स्मृति इरानी में ऐसे गुण दिखाई दे रहे थे. 2014 में चुनाव नतीजों के बाद भी स्मृति इरानी का अमेठी में आना जाना लगा रहा था. कांग्रेस के सांसदों के कालखंड का अगर विश्लेषण करें, तो यह उनको आईना दिखाने के लिए काफी था कि वे कितना समय क्षेत्र में रहे और क्षेत्र के विकास में कितनी रुचि ली. मई 2014 में मोदी अमेठी आए थे. उनके वहां आने से एक सकारात्मक संदेश गया. मोदी के आने के बाद अमेठी के लोगों को लगा कि उनका कांग्रेस से संबंध छलावा है. मोदी ने अपने भाषण से लोगों को बेहद प्रभावित किया था और बदलते भारत और युवा देश के सपनों को झंकृत कर गए थे.

अमेठी लोकसभा क्षेत्र 1967 में बना था तब से ज्यादातर चुनाव में कांग्रेस को ही सफलता मिलती रही, लेकिन इस इलाके का विकास नहीं हुआ. इस इलाके में गरीबी, अशिक्षा और भुखमरी थी जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया था. सच तो यही था कि अमेठी में कांग्रेस कभी लोकप्रिय रही ही नहीं. वह तो हमेशा धनबल के आधार पर चुनाव लड़ती रही थी. फिर 2014 में नरेन्द्र मोदी के बनारस से चुनाव जीतने के बाद वहां हुए विकास कार्यों की तुलना अमेठी से होने लगी. अमेठी के लोगों की अपेक्षाएं जाग्रत होने लगी थीं. वे यह सोचने को विवश थे कि मोदी ने बनारस में विकास की गंगा बहा दी, लेकिन राहुल गांधी ने अपने डेढ़ दशक के सांसद के कार्यकाल में अमेठी के लिए कुछ किया ही नहीं. लोगों को लगने लगा था कि अगर बनारस का विकास हो सकता है तो अमेठी का क्यों नहीं. वैसे भी अमेठी से बिना सांसद रहे स्मृति ने क्षेत्र में विकास की हरसंभव कोशिश की थी, इसलिए उनकी उम्मीदवारी ने क्षेत्रीय जनता की अपेक्षाएं जहां बढ़ा दी थीं, वहीं कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया था. यहां यह बताना उचित होगा कि स्मृति के प्रयासों से रेल मंत्रालय ने रायबरेली और अमेठी के बीच रेल लाइन दोहरीकरण के लिए तीन सौ अट्ठावन करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की थी. तब टाइम्स ऑफ इंडिया के रोहन दुआ को दिए एक साक्षात्कार में उस वक्त के रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने इसकी घोषणा की थी. अमेठी के लोगों की ये दशकों पुरानी मांग थी जिसको स्मृति ने अपने प्रयासों से पूरा करवाया था.

2019 के चुनाव में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी स्मृति इरानी के साथ पूरी ताकत से अमेठी में खड़े थे. इस समय चुनाव आयोग भी बेहद सक्रिय था. इसके चलते प्रशासन के स्वार्थी तत्व भी अपनी मनमानी नहीं कर पा रहे थे. कहा गया कि इस सख्ती की वजह से इस बार कांग्रेस की तरफ से पैसे नहीं बंट पाए. हालांकि कई अफसर अब भी कांग्रेस का राग अलापने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनको भी अपने करियर की चिंता थी. लिहाजा ज्यादातर खामोशी पर न्यायपूर्ण ढंग से काम करने में लगे रहे.

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पुस्तकः अमेठी संग्राम
लेखकः अनंत विजय
भाषाः हिंदी
विधाः राजनीति/ राजनीतिक इतिहास
प्रकाशकः एका
मूल्यः 350.00
पृष्ठ संख्याः  240

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