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1232km कोरोना काल में एक असंभव सफरः लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों के दर्द और जज़्बे की कहानी

कोरोना लॉकडाउन ने करोड़ों भारतीयों को अकल्पनीय त्रासदी का सामना करने के लिए विवश कर दिया था. नगरों-महानगरों में कल-कारखानों पर ताले लटक गए; काम-धंधे रुक गए और दर-दुकानें बंद हो गईं. इससे एक झटके में बेरोजगार, बेसहारा हो गए मजदूरों के दर्द और जज़्बे की अनूठी दास्तान

फिल्मकार और लेखक विनोद कापड़ी अपनी पुस्तक के असली नायकों के साथ फिल्मकार और लेखक विनोद कापड़ी अपनी पुस्तक के असली नायकों के साथ

इतिहास में वही फैसले दर्ज नहीं होते, जिनसे दुनिया बदलती है, बल्कि तवारीख दुनिया की तबाही को भी उतनी ही बेमुरव्वत ढंग से दर्ज करती है. खास बात यह भी कि इतिहास के आईने में कोई वाद नहीं होता, जिसकी व्याख्या हम अपने हिसाब से कर लें. आज भले ही कोविड-19 का कहर थमने चुका है, और जिंदगी पटरी पर धीरे-धीरे लौटती दिख रही है. पर उस दौर ने जो तबाही मचाई उसकी बानगी उनसे पूछिए, जिन पर बीती. 2020 में कोरोना दौर में बिना किसी सोच-विचार और तैयारी के घोषित लॉकडाउन ने करोड़ों भारतीयों को अकल्पनीय त्रासदी का सामना करने के लिए विवश कर दिया. नगरों-महानगरों में कल-कारखानों पर ताले लटक गए; काम-धंधे रुक गए और दर-दुकानें बंद हो गईं. इससे मजदूर एक झटके में बेरोजगार, बेसहारा हो गए. मजबूरन उन्हें अपने गांवों का रुख करना पड़ा. उनका यह पलायन भारतीय जनजीवन का ऐसा भीषण दृश्य था, जैसा देश-विभाजन के समय भी शायद नहीं देखा गया था. लॉकडाउन के कारण आवागमन के रेल और बस जैसे साधन बंद थे, इसलिए अधिकतर मजदूरों को अपने गांव जाने के लिए डेढ़-दो हजार किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ी. कुछेक ही ऐसे थे जो इस सफर के लिए साइकिल जुटा पाए थे. ऐसे ही लोगों में वे सात मजदूर भी थे, जिन्होंने दिल्ली से सटे ग़ाजियाबाद से बिहार के सहरसा स्थित 1232 किलोमीटर दूर अपने गांव का सफर साइकिल से तय किया.

फ़िल्म 'कांट टेक दिस शिट एनीमोर' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्म 'पीहू' के लिए अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में दो पुरस्कार हासिल करने वाले जानेमाने फिल्मकार और मीडिया हस्ती विनोद कापड़ी ने इसी विषय पर ओटीटी पर डिज़्नी हॉट स्टार के लिए 1232kms नाम से एक डाक्यूमेंटरी फिल्म बनाई. वजह यह थी कि कापड़ी का मानना था कि मजदूरों की पीड़ा को कोई कैमरा कैद नहीं कर सकता. यह पुस्तक सात दिन, सात रात और सात प्रवासी मजदूरों की गांव वापसी का आंखों-देखा हाल है. यह किताब राजकमल प्रकाशन के उपक्रम सार्थक से प्रकाशित हुई है. कापड़ी की यह पहली पुस्तक है, जो हिंदी के अलावा अंग्रेजी, तमिल, मराठी, तेलुगु और कन्नड़ में भी उपलब्ध होगी. हाल ही में इस पुस्तक का लोकार्पण इसके श्रमिक नायकों रितेश कुमार और रामबाबू के हाथों इंडिया हैबिटैट सेंटर में संपन्न हुआ. इस दौरान लेखक कापड़ी और दोनों नायकों से वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने बातचीत की.  विनोद कापड़ी कहना था कि बीते साल कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान मजदूरों के अभूतपूर्व पलायन और मुसीबतों को दर्ज करना मैंने अपना नैतिक और सामाजिक कर्तव्य समझा. हालांकि पहले मुझे बड़ा संकोच हो रहा था कि लोग इसको आपदा में अपना स्वार्थ साधना समझ सकते हैं, लेकिन आखिरकार मुझे मजदूरों के साथ जाना और उनकी आपबीती को दर्ज करना सबसे जरूरी लगा.

कापड़ी ने बताया कि इस पलायन के दौरान सात मजदूरों के एक समूह के साथ मैं और मेरे एक दोस्त भी पूरे सफ़र में साथ-साथ चले, मुझे हमेशा यह डर सता रहा था कि अगर इनमें किसी एक को भी कुछ हो गया तो मैं अपने आप को कभी माफ़ नही कर पाऊंगा. '1232 किमी: कोरोना काल में एक असंभव सफर' एक मुश्किल वक्त का आख्यान तो है ही, आने वाली पीढ़ियों को सबक देने वाला एक जरूरी दस्तावेज भी है. राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा, '1232 किमी: कोरोना काल में एक असंभव सफर' हमारे समय की एक बड़ी त्रासदी का मार्मिक वृत्तान्त है. सात श्रमिकों की आपबीती के बहाने कोरोना काल के दौरान हुए श्रमिकों के पलायन की जो कहानी इसमें दर्ज है, वह आधुनिक भारत के इतिहास का सबसे अनपेक्षित और दुखद तथ्य है. यह उन श्रमिकों की मुश्किलों की, साथ ही उनके जज्बे की कहानी है. यह जितनी उनकी कहानी है उतनी ही हमारे देश-समाज और दौर की है. महेश्वरी ने कहा, "यह किताब बतलाती है कि आपदा के समय एक लोकतांत्रिक समाज के रूप में हम किस हद तक विफल रहे. यह उन असमानताओं और विसंगतियों को उजागर करती है जिनसे अनजान बने रहकर, हम दुनिया में अव्वल होने का दम भरते आये थे. इसीलिए हमने इसे प्रकाशित करना जरूरी समझा."

किताब के नायकों रितेश और रामबाबू ने भी अपनी बात कही. रामबाबू ने कहा, "कोरोना काल में लॉकडाउन हम गरीबों लिए घातक साबित हुआ, गरीब भी भारत के नागरिक हैं. इसलिए सरकार को कोई फैसला लेते वक्त गरीबों को भी ध्यान में रखना चाहिए." आप अपने भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं, के सवाल पर रितेश ने कहा, 'हम मजदूर हैं, रोज कमाते हैं तब खाते हैं, हमारे पास कुछ बचता नहीं है, फिर भी अपनी पूरी क्षमता से कोशिश करेंगें कि मेरे बच्चे ऐसा कुछ अच्छा करने लायक बनें कि मैं उनके नाम से जाना जाऊं." रितेश और रामबाबू ने लॉकडाउन के दौरान भुगते कष्ट का बयान भी किया और बताया कि काम व खाने पीने की दिक्कत होने के बाद ही हमने सोचा कि परदेस में भूखों मरने से अच्छा है अपने गांव जाकर मरें. यही सोचकर हम सात साथी 1232 किलोमीटर के सफर पर साइकिल से ही निकल पड़े. लेकिन हमारा यह सफ़र कतई आसान नहीं था. पुलिस की पिटाई और अपमान ही नहीं, भय, थकान और भूख ने भी हमारा कदम-कदम पर इम्तिहान लिया.

साहित्य आजतक पर पढ़िए इन्हीं सात साधारण लोगों के असाधारण जज़्बे की कहानी '1232 किमी: कोरोना काल में एक असंभव सफर' का यह अंशः  

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ट्रक ने जब मज़दूरों को गोरखपुर की सीमा पर उतारा तो शाम के 7 बजने वाले थे. आज का दिन बहुत अच्छा जा रहा था. आज अभी तक क़रीब 276 किलोमीटर की दूरी पार कर ली गई थी. अब रितेश और उसके साथी अपने राज्य बिहार की सीमा से बस सौ किलोमीटर दूर थे. बिहार सीमा और गोरखपुर के बीच यूपी का ज़िला कुशीनगर पड़ता है. कुशीनगर, भगवान बुद्ध की निर्वाण स्थली, क़रीब 60 किलोमीटर दूर थी. सभी ने तय किया कि अपने राज्य की सीमा के क़रीब पहुंचने के लिए अभी हमें कम-से-कम कुशीनगर तक तो साइकिल चलाना ही चाहिए. यानी चार घंटे और. थकान भी ज़्यादा नहीं थी. सब एक बार में ही तैयार हो गए. अब अपना गांव-घर क़रीब आता नज़र आ रहा था. रितेश सबसे ज़्यादा ख़ुश था. जब सब कुछ देर चाय के लिए रुके तो रितेश एक नई थ्योरी निकाल लाया.
"आज का जो ये दिन इतना अच्छा जा रहा है...जानते हो इसकी क्या वजह है?"
सबने जिज्ञासा भरी नज़रों से रितेश को देखा.
"इसकी वजह है...जो हमसे कल गलती हुई थी न...वो...उस गलती की वजह से हमारा आज का दिन अच्छा जा रहा है." रितेश की फ़िलासफी सुनकर सोनू और संदीप हंसने लगे.
"हंस मत सोनू...मैं सच बोल रहा हूं."
"कैसे?" यह रामबाबू का सवाल था.
रितेश ने समझाना शुरू किया-
"देखो, कल गलत रास्ते पर जाने की वजह से हमको चार घंटा देर हो गया...चार घंटा देर हुआ तो हम लखनऊ पहुंचे, वहां इतना आराम मिला...फिर सुबह पहला ट्रक मिला और अभी दूसरा...सब ग्रहों का खेल होता है...आपको फायदा पहुंचाने के लिए कभी-कभी ग्रह आपका नुकसान भी कराता है."
"हां! जैसे हम लोगों को आज ये दो ट्रक का मजा दिलाने के लिए मोदी जी डेढ़ महीने पहले लॉकडाउन लगा दिए? है ना?" रामबाबू की हाज़िरजवाबी पर सब हंसने लगे.
रितेश कहां हार मानने वाला था-
"ठीक है, नहीं मानना है तो मत मानो. पर सच यही है."
"ठीक है...तो तुम एक गलती और करो...सबका टायर सूआ लेकर पंक्चर कर दो...देखते हैं तुम्हारा इस गलती से क्या फायदा होता है?" एक बार फिर सब हंसने लगे.
पूरी यात्रा में पहली बार उनके बीच चुहलबाज़ी चल रही थी. साफ़ था कि अब सब कम तनाव में थे.
गोरखपुर से आगे बढ़ते ही पुलिस और प्रशासन की कई गाड़ियाँ खड़ी दिखीं. बैरिकेड लगे हुए थे. दोनों तरफ़ पुलिस के जवान तैनात थे. क्या यह कोई नई मुसीबत है? सबका मन आशंकाओं से भर गया. यहां भी लम्बी क़तार थी. मज़दूरों की स्क्रीनिंग चल रही थी. इस बार रितेश, रामबाबू और बाक़ी मज़दूर निश्चिन्त थे. मुकेश की तबीयत भी ठीक थी. गोरखपुर प्रशासन ने स्क्रीनिंग के बाद सभी को नाश्ते के पैकेट दिए और सातों मज़दूरों को पुलिस के हवाले कर दिया. हमें लगा कि चूँकि गोरखपुर सीमा से लगा ज़िला है, अब मज़दूरों को क्वारंटीन किया जाएगा. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह कल्पना से परे था. सामने नज़ारा हैरान करने वाला था. पुलिस के सिपाही ट्रक रुकवा रहे थे और मज़दूरों को उसमें बिठवा रहे थे. रितेश, रामबाबू और बाक़ी पांच लोगों को भी ऐसे ही ट्रक में बैठा दिया गया, जो कुशीनगर से 22 किलोमीटर पहले स्थित हाता क़स्बे तक जा रहा था. मज़दूरों को क़रीब 35 किलोमीटर का सफ़र ट्रक से करने का मौक़ा फिर मिल गया था. यह बेहद राहत और खुशी की बात थी. रितेश ने तो सुझाव भी दे डाला कि अगर सब हिम्मत करें तो आज रात ही बिहार के गोपालगंज पहुंचा जा सकता है.
"देखो, ये मैप बता रहा है कि गोरखपुर से गोपालगंज 122 किलोमीटर है...अभी 35 किलोमीटर ट्रक से हो जाएगा...बाकी का बचा 90 किलोमीटर हम लोग चार घंटे में खींच देंगे...रात 12 बजे तक गोपालगंज...क्या बोलते हो?"
"लेकिन आज ही गोपालगंज पहुंचना इतना जरूरी क्यों है? आज हम तीन सौ किलोमीटर नाप तो दिए हैं." यह वही मुकेश था, जो दो रात पहले बेहोश हो गया था.
"अरे अपना मिट्टी अपना ही होता है...घरवालों को रात के बारह बजे बताएंगे कि हम लोग बिहार पहुंच गए हैं तो सब लोग कितना खुश होगा." रितेश का उत्साह चरम पर था.
"वो सब तो ठीक है पर हमको जम नहीं रहा." मुकेश ने रितेश के उत्साह पर पानी डाल दिया.
"अगर तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है तो फिर कोई बात नहीं...."
"नहीं, वो बात नहीं है. अगर सब लोग चलने को तैयार हैं तो हमें क्या दिक्कत होगा?" मुकेश ने अब गेंद बाक़ी लोगों के पाले में डाल दी थी. जिस पर सबसे पहले रामबाबू ने प्रतिक्रिया दी-
"रात भर साइकिल चलाने में कोई समस्या नहीं है पर रात को अगर किसी का साइकिल बिगड़ गया तो क्या करेंगे? ये भी सोचना चाहिए."
रामबाबू ने ऐसी गुगली फेंकी थी, जिसके बाद सब चुप हो गए और सबको समझ आ गया कि गोपालगंज पहुंचने का कार्यक्रम रद्द हो गया है. रितेश थोड़ा निराश था लेकिन बहुमत के फ़ैसले के आगे क्या किया जा सकता था?

हाता में रात नौ बजे ही जिस तरह का सन्नाटा पसरा था, उससे लग रहा था कि रात के बारह बज रहे हैं. बन्द दुकानों को देखकर कहा जा सकता था कि ये ठीक-ठीक आबाद क़स्बा है. इसके बावजूद कहीं भी खाना मिलने के आसार नहीं थे सबकी राय बनी कि कुशीनगर ज़िला मुख्यालय है, लिहाज़ा रात वहीं बितानी चाहिए और सम्भव है कि वहां खाना भी मिल जाए. सिर्फ़ रामबाबू चाहता था कि रात हाता में ही काटी जाए. उसका तर्क था कि आज एक दिन में कम-से-कम तीन दिन की साइकिल यात्रा बच गई है. अब आराम करना चाहिए. खाने को थोड़ा-बहुत सबके पास है. आज ऐसे ही गुज़ारा कर लेते हैं. सुबह पांच बजे निकल पड़ेंगे. रितेश कुछ और सोच रहा था. उसका कहना था कि अभी सिर्फ़ नौ बजे हैं. हद से हद साढ़े दस बजे तक कुशीनगर पहुंच जाएंगे. उसके बाद बिहार बॉर्डर सिर्फ़ 40 किलोमीटर दूर रह जाएगा. सुबह पांच बजे निकलेंगे. आठ बजे तक बिहार पहुंच जाएंगे अपनी मिट्टी में. अपनी मिट्टी के लालच ने बाक़ी मज़दूरों को भी कुशीनगर तक चलने का उत्साह दे दिया.
मैं और मानव यह सोचकर कार से आगे बढ़ गए कि कहीं खाने का इन्तज़ाम देखते हैं. मज़दूरों का दल भी चल पड़ा.

हाता से निकलते ही सड़क और सुनसान हो गई. रौशनी भी न के बराबर थी. वे लोग चार किलोमीटर ही चल पाए होंगे कि सोनू की साइकिल परेशान करने लगी. वही पुरानी दिक़्क़त-उसकी चेन कभी सख़्त हो जाती तो कभी उतर जाती. जैसे ही कोई दिक़्क़त होती, रितेश मदद करने आ जाता. उसे एहसास हो चला था कि सोनू की साइकिल की वजह से अटके तो रामबाबू से सारी गालियाँ उसे ही पड़ने वाली हैं. हरदोई में रास्ता भटकने पर तो रामबाबू ने उसे बचा लिया था लेकिन यहां तो उसने रामबाबू से ही पंगा ले लिया था.
ऐसे ही एक मौक़े पर जब सभी लोग सोनू की साइकिल के ठीक होने का इन्तज़ार कर रहे थे कि तीन युवक वहां पहुंचे. 21 से 24 साल के बीच उम्र रही होगी उनकी. दिखने में तीनों आसपास के ही लग रहे थे.
"क्या भैया, साइकिल में कोई समस्या आ गया है क्या?" दुबला-पतला दिखने वाला पहला लड़का बोला.
"हां...इसका चेन दिक्कत कर रहा है?"
"कहो तो हम देखें क्या?"
नेकी और पूछ-पूछ. रितेश को लगा कि फिर से मददगार आ गए हैं. वह तुरन्त साइकिल से हट गया. पहला लड़का ज़मीन पर बैठ गया और साइकिल की चेन को ऊपर-नीचे करने लगा. मज़दूरों को लगा कि ज़रूर यह कोई जानकार है, जो उसने थोड़ी-देर में यक़ीन करा भी दिया.
"भैया ऐसा है, ये जो तुम्हारी चेन है न...ये हो गई है खत्म. अब इसमें कुछ बचा नहीं है...घिस गई है पूरी...नई चेन लगेगी."
"तो फिर?" रितेश बेचैन हो गया था.
"करते हैं कुछ व्यवस्था. राकेश जगा होगा क्या?" पहले वाले लड़के ने दूसरे से पूछा.
दूसरा वाला इससे पहले कि कुछ जवाब देता, पहला वाला फिर बोला-
"एक काम कर...राकेश को फ़ोन लगा."
दूसरे लड़के ने फ़ोन लगा दिया. घंटी जा रही थी. पर फ़ोन उठा नहीं. मज़दूरों की उम्मीद बनने से पहले ही बिखर गई.
"तुम लोग चिन्ता मत करो बिलकुल भी...एक मील अन्दर अपना गांव है...राकेश की अपनी साइकिल की दुकान है...सो भी रहा होगा तो साले को उठाकर नई चेन लगवा देंगे."
पहले लड़के के आत्मविश्वास से मज़दूरों ने राहत की सांस ली. लेकिन रामबाबू थोड़ा आशंकित था-
"तुम्हारा दोस्त गांव में नहीं मिला तो?"
"अरे मिलेगा कैसे नहीं? वो गांव में ही है. अभी आठ बजे मेरे साथ तो खाना खाया था." थोड़ा थुलथुल-सा दिखने वाला तीसरा लड़का पहली बार बोला.
रामबाबू को हाइवे छोड़कर गांव जाने का आइडिया जम नहीं रहा था. एक तो देरी होगी, ऊपर से अनजान लोग. वह ख़ुद झुककर साइकिल की चेन पकड़कर देखने लगा.
"10-12 किलोमीटर तो अभी चल जाएगी." रामबाबू ने ख़ुद को भी तसल्ली देने की कोशिश की और उन अनजान लोगों से भी पूछा.
"नहीं चलेगी भैया...बाक़ी तुम्हारी मर्ज़ी...हमने तो परेशानी में देखा... इसलिए चले आए." पहला लड़का बोला.
रामबाबू असमंजस में था. उसने सबकी तरफ़ देखा. किसी के चेहरे पर कुछ नहीं लिखा था. पर फ़ैसला तो लेना ही था.
"चलो कोई नहीं...हम आगे बढ़ते हैं भाईसाहब...अभी बहुत देर हो गई है..इतनी रात में जाएंगे फिर आएंगे...बहुत देर हो जाएगी...क्यों रितेश?" उसने अपने फ़ैसले पर रितेश की मुहर लगाने के इरादे से पूछा.
रितेश पहले से ही अपने फ़ैसले को लेकर अपराधबोध में था, इसलिए इस बार वह जोखिम नहीं लेना चाहता था.
"जैसा तुम्हें ठीक लगे. आगे बढ़ते हैं."
"और रास्ते में चेन टूट गया तो?" यह आशीष था जो दिन में सब कुछ झेल चुका था.
"अरे भैया...तुम लोग पंचायत करो. हम लोग चल रहे हैं." पहला लड़का बोला और जाने लगा. उसके पीछे बाक़ी दो भी चल पड़े.
"अरे, रुको भाई...तुम लोगों का गांव एक किलोमीटर ही दूर है ना?" रामबाबू ने पीछे से आवाज़ दी.
"हां भैया." दूसरे लड़के के इस आश्वासन के बाद सारे मज़दूर उन तीन लड़कों के पीछे हाइवे से नीचे एक छोटी सड़क पर उतर गए. चूँकि वे तीनों लड़के पैदल चल रहे थे तो इन्हें भी पैदल ही चलना था. रामबाबू मन-ही-मन प्रार्थना कर रहा था कि उसका फ़ैसला सही साबित हो. रितेश यह सोचकर तसल्ली में था कि इस बार उस पर कोई बात नहीं आएगी. दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे.

पुस्तकः 1232KM: कोरोना काल में एक असम्भव सफ़र
लेखक: विनोद कापड़ी
भाषाः हिंदी
प्रकाशकः सार्थक, राजकमल प्रकाशन उपक्रम
विधाः कथेतर
मूल्यः 199/- रुपए
पृष्ठ संख्याः 184

 

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