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जयंती विशेष: दिनकर की 'उर्वशी', जिसमें प्रेम कामाध्‍यात्‍म के तटों को छूता है

दिनकर जितने राष्‍ट्रीयता, ओज और वीर रस के कवि थे, उतने ही श्रृंगार के भी अद्भुत कवि थे. उर्वशी इसका प्रमाण है. दिनकर की जयंती पर उनके श्रृंगार काव्य की एक पड़ताल

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर [फाइल फोटो] राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर [फाइल फोटो]

दिनकर का नाम आते ही राष्‍ट्रीय और ओज के एक बड़े कवि की छवि हमारे सम्‍मुख तिर उठती है, पर वह जहां ओज व वीर रस के कवि थे वहीं वे श्रृंगार के भी अद्भुत कवि थे. उर्वशी इसका प्रमाण है. काव्‍य और गद्य चाहे जितना परिमाण में उन्‍होंने लिखा पर उनकी शख्‍सियत के केंद्र में सदा उर्वशी रही. उसी पर उन्‍हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्‍कार मिला. उर्वशी के आईने में दिनकर के कवि व्‍यक्‍तित्‍व को पड़ताल कर रहे हैं डॉ ओम निश्‍चल
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दिनकर एक राष्‍ट्रकवि के रूप में तो समादृत हैं ही, अपने श्रृंगार काव्‍य उर्वशी के कारण भी हिंदी साहित्‍य में जाने-पहचाने गए. हिंदी की काव्‍य  परंपरा में प्रेम का विशिष्ट स्थान है. प्रभूत मात्रा में लिखा गया श्रृंगार काव्‍य इसका प्रमाण है. श्रृंगार को रसगणना में शीर्ष स्थान पर रखा गया है. कहा जाता है, कविता का उत्कर्ष वहां प्रमाणित होता है जहां वह प्रेम और श्रृंगार के उदात्त वैभव को अपने भीतर समेटती है. प्रेम के बखान में कवि अपनी चित्तवृत्तियों के सारे पंख पसार कर अपनी चेतना का पराग उड़ेलता चलता है. उसकी अन्तर्मुखता ऐसे क्षणों में सर्वाधिक चंचल हो उठती है. माना जाता है कि कविता के जन्म का कारण ही काम-मोहित क्रौंच युगल के वध के फलस्‍वरूप उत्‍पन्‍न शोक है. कदाचित इसीलिए हमारे समय की सबसे बड़ी कविता वही है, जिसके मूल में करुणा है. ध्यान से देखें तो प्रेम के मूल में भी करुणा का ही वास है. कविता का खुद का स्वभाव ट्रैजिक है. महान प्रेम काव्‍यों की अन्तर्वस्तु में करुणा और शोक का स्थायी वास रहा है.  'तुम आ जाते एक बार' कविता में महादेवी वर्मा यही तो कहती हैं- कितनी करुणा कितने संदेश/ पथ में बिछ जाते बन पराग/ गाता प्राणों का तार तार/ अनुराग भरा उन्माद-राग. और निराला की कविता 'जूही की कली' में भी यही करुणा ठिठकी हुई है.

क्रांतधर्मी चेतना और श्रृंगार के चरम भावों को छूने वाले काव्‍य के रचयिताओं में दिनकर का कवि व्‍यक्‍तित्‍व सबसे ज्यादा आलोकित और चर्चित रहा है. उन्होंने जहां ओज, आवेग और राष्ट्रीय अस्मिता के कवि के रूप में अपनी पहचान बनायी, वहीं प्रेम और श्रृंगार के सर्वाधिक लोकप्रिय काव्‍य 'उर्वशी' की रचना करने श्रेय भी हासिल किया. हिंदी की काव्‍यधारा में प्रांरभ से ही प्रेम की अप्रतिम प्रतिष्ठा रही है. लौकिक और अलौकिक प्रेम की अभिव्‍यक्‍तियों से हिंदी का समूचा रचना जगत आच्छादित है. वे बड़े कवि इसलिए ही नहीं माने जाते कि उन्होंने गुलामी के दौर में पराधीनता की श्रृंखला तोड़ने के लिए ओज और पौरुष की कविताएं लिखीं और समूचे भारतीय जन मानस को आंदोलित किया बल्कि इसलिए भी कि वे समग्र मानव-स्वभाव के कवि के रूप में पहचाने गए. एक ऐसा कवि जिसमें एक साथ राष्ट्रीयतावादी, उपनिवेशवाद विरोधी स्वर मुखरित हो, जिसके भीतर भारत के सामासिक सांस्कृतिक चिंतन को लेकर एक समावेशी दृष्टि सक्रिय हो, जिसके बौद्धिक मानस में इतिहास, काव्‍यशास्त्र, देश, काल और समाज के प्रति एक उत्तरदायी चेतना विराजती हो, जो सत्ता के आश्रय में रहते हुए भी सत्ता की निरंकुशता से टकराता रहा हो, जो आलोचकों की परवाह न कर कविता की अपनी डगर पर चलता रहा हो और करोड़ों जनता के कंठ से जिसकी पंक्‍तियां गूंजती रही हों, जिसका समूचा जीवन शुद्ध कविता की खोज में विकल रहा हो, जिसने अपने उत्तर जीवन में प्रेम की प्रतिष्ठा के लिए काम और अध्यात्म के शिखर पर जा कर प्रेम की विरल अनुभूतियों के काव्‍य रूपक उर्वशी की सर्जना की हो, ऐसे समग्र कवि दिनकर के प्रेम काव्‍य और उर्वशी पर चर्चा करना जीवन में प्रेम की अनिवार्यता और श्रृंगार की सत्ता को पुनर्स्थापित करना है.

एक कवि पूछता है, 'यह शरीरों से परे क़्या है हमें जो बांधता है?' प्रेम को दैहिक सीमाओं की परिभाषा से जोड़ कर देखना प्रेम के अक्ष और देशांतर को सीमाबद्ध करना है. दिनकर इस काव्‍य के बहाने प्रेम के बारे में अपनी धारणा प्रस्तुत करते हैं
    देह प्रेम की जन्मभूमि है, पर उसके विचरण को
    सारी लीला-भूमि नहीं सीमित है रुधिर त्वचा तक.
    यह सीमा प्रसरित है मन के गहन गुह्य लोकों में
    जहां रूप की लिपि अरूप की छवि आंका करती है
    और पुरुष प्रत्यक्ष विभासित नारी-मुखमंडल में
    किसी दिव्‍य अव्‍यक्‍त कमल को नमस्कार करता है.

यही प्रेम की वह पारिभाषिकी है जिसकी सीमा कामाध्यात्म के तटों को छूती है. उनके अनुसार, देह केवल रुधिर और त्वचा की लीलाभूमि ही है, भले ही यह प्रेम की जन्मस्थली हो. इसका विस्तार मन के गहन गुह्य लोकों तक है. यह स्थूलता और मांसलता में नहीं, मन के सूक्ष्म आकाश की ओर उड़ानें भरता है. अरूप और अव्‍यक़्त की अतीन्द्रिय अनुभूतियों का संगम है यह. प्रेम दिनकर के शब्दों में नारी के मुखमंडल पर शोभित एक दिव्‍य अव्‍यक्‍त कमल है, जिसे पुरुष नमन करता है. जिसके संधान में वह रत रहता है. दिनकर ने अपनी काव्‍य रचना के लिए सदैव इतिहास, पुराण, महाभारत और मिथकों से प्रसंग और चरित्र उठाए हैं. इसका अर्थ इतिहास की पुरानी मान्यताओं से उलझना नहीं बल्कि उनके संसर्ग से आधुनिक जीवन के उदात्त प्रसंगों को सामने लाना उनका अभीष्ट रहा है.

पुरुरवा और उर्वशी की कथा बहुत पुरानी है. उर्वशी के बारे में अनेक धारणाएं और आख्यान प्रचलित हैं. कहा जाता है कि वह नारायण ऋषि के ऊरु से निकली. महाभारत में भी उसका जिक्र आया है कि कैसे एक बार इंद्र के यहां अस्त्र विद्या सीखने आए अर्जुन पर उर्वशी मोहित हो गयी थी किन्तु अर्जुन ने उसे मातृवत देखा. फलस्वरूप उर्वशी ने अर्जुन को साल भर नपुंसक रहने का शाप दे दिया. लेकिन जो भी हो, साहित्य में पुरुरवा और उर्वशी का प्रेम विश्वविश्रुत है. कालिदास ने भी इस आख्यान को अपने काव्‍य का विषय बनाया है तथा एक सुखांत काव्‍य की रचना की है, किन्तु दिनकर ने इसे दुखांत रहने दिया है. जैसी कि कथा है, भरत के शाप के कारण पुरुरवा उर्वशी के संसर्ग से उत्‍पन्न संतान का मुख जैसे ही देखता है, उर्वशी उसे छोड़ कर पुनः इंद्रपुरी चली जाती है. दिनकर रचित उर्वशी का यह अंत दारुण किन्तु चिंतन के लिए विशेष अवकाश देता है.

हालांकि उर्वशी की कथा दिनकर ने पुरा आख्यानों से ही उठायी है. परन्तु दिनकर की उर्वशी में वैदिक आख्यान के तत्व खोजना बेमानी है. दिनकर ने उर्वशी के पुरातन स्वरूप की अभ्यर्थना नहीं की है, बल्कि उसे युगानुरूप सनातन नारी का प्रतीक मान कर प्रेम और श्रृंगार का प्रवर्तन किया है. इसी तरह पुरुरवा भी सनातन पुरुष के गुणधर्म का प्रतीक बन गया है. उनके लेखे नारी किसी की बेटी, भार्या या बहन नहीं है, वह एक अशरीरी कल्पना की प्रतिमा है. वह समूची नारी जाति का प्रतिनिधित्व करती है. उर्वशी पर कालिदास के अलावा रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी ने भी कलम चलाई है, किन्तु दिनकर की उर्वशी इन कवियों की कल्‍पनाओं से विलग और विशिष्ट है. कालिदास की उर्वशी रतिरहस्य प्रवीण थी तो दिनकर की उर्वशी भी रति की गोपन क्रियाओं में पर्याप्त रस लेने वाली है. किन्तु दिनकर की उर्वशी में प्रेम के प्रति निष्ठा है, पुरुरवा के प्रति समर्पण है.

प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

पौराणिक आख्यानों में भी इंद्र, गंधर्व और अर्जुन के प्रति आसक़्त होते हुए भी उसका समर्पण पुरुरवा के लिए कहीं अधिक रहा है. दिनकर की उर्वशी हाड़-मांस से बनी अपूर्व सुंदरी है जिसमें जीवन और जगत के प्रति आस्था है. प्रेम के लिए वह निछावर होना जानती है. वह सतत अनुरागिनी और विश्वप्रिया दोनों है. उसमें स्वर्गिक आभा और सांसारिक अनुराग दोनों का आयतन प्रभावी है. रवीन्द्रनाथ ठाकुर की उर्वशी अप्सरा है, इसलिए वह कल्पना में ही रमणीय है. वह सौंदर्य की अधिष्ठात्री है, अक्षुण्ण यौवना है, जिसके सौंदर्य पर काल की छाया नहीं मंडराती. कविवर रवीन्द्र ने अलौकिक आंखों से उर्वशी के दर्शन किए थे, इसलिए उसकी एक काल्पनिक छवि तो बनायी जा सकती है, उसे चाक्षुष बिम्बों में पकड़ पाना संभव नहीं है. जबकि दिनकर की उर्वशी में सौंदर्य के सारे चाक्षुष आकर्षण भरे हैं.

दिनकर ने इस प्रेम काव्‍य की रचना उस वक़्त की थी, जब वे अपने जीवन की अर्धशती पूरी कर चुके थे. यानी सामान्यतः प्रेम और श्रृंगार युवा कवियों का विषय हुआ करता है और प्रौढ़ता की ओर उन्मुख कवि जीवन के अन्य पक्षों की ओर मुड़ता है. जबकि दिनकर ने तरुणाई में राष्ट्र के स्वाभिमान की कविताएं लिखीं, जीवन के मध्य काल में प्रेम पर कलम चलाई और ओज और पौरुष के कवि के साथ प्रेम के अग्रदूत कवि होने का लोहा भी मनवाया.

प्रेम की लहरें दिनकर को तरुणाई से ही मथती रही हैं, किन्तु तब राष्ट्र के समक्ष बड़े प्रश्नों के होते हुए, वे इन लहरों का निमंत्रण स्वीकार न कर सके. बच्चन इन लहरों में यह कहते हुए बह गए थे- 'तीर पर कैसे रूकूं मैं आज लहरों का निमंत्रण.'  इसलिए रसवंती में दिनकर की प्रेम भावना का अंकुर फूटा अवश्य, पर उनकी राष्ट्रवादी कविताओं के प्रवाह में ठीक से विकसित न हो पाया. तब भी उन्होंने इतना तो आश्वस्त किया ही था कि -
तरंगित सुषमाओं पर खेल करूंगा देवि तुम्हारा ध्यान
दुखों की जलधारा में भींग तुम्हारा ही गाऊंगा गान.
दिनकर नारी के सौंदर्य के वे अनन्य उपासक रहे हैं. प्रेम के तीन प्रकार माने गए हैं- प्लेटॉनिक लव, रोमैंटिक लव और लव थ्रू पैरेंटल च्वायस. इनमें उर्वशी का प्रारंभिक प्रेम तो रोमैंटिक किस्म का है, किन्तु वह आखिर में प्लेटॉनिक लव में बदल गया है. जिसे आज के वयसश्रेष्ठ कवि अशोक वाजपेयी कहते हैं, स्थापत्य सुंदर है, शरीर सुडौल है, आत्मा सुंदर है -लेकिन सुंदरता सबसे अधिक वेध्य है- इसे दिनकर बहुत पहले स्थापित कर चुके हैं. उर्वशी में सुंदरता ही उनके लिए सर्वाधिक वेध्य है. इस कार्य-व्‍यापार में यदि अध्यात्म की थोड़ी सी भी अनुभूति मिल सके तो क़्या कहना.

दिनकर जिन ऐतिहासिक कारणों से राष्ट्रवादी, उपनिवेशवादविरोधी, शोषण विरोधी रचनाओं के साथ कविता में अग्रसर हुए थे, उसी तरह उन्होंने ऋग्वेद, निरुक़्त, शतपथ ब्राह्मण तथा पुराणों में कल्‍पित, पल्लवित, और कालिदास सरीखे कवि द्वारा विरचित पुरुरवा और उर्वशी की कई रूपों में चली आती कथा के सहारे प्रेम को जीवन के बीचो-बीच प्रतिष्ठित कर देखना चाहा है. उर्वशी लिखने से पहले दिनकर ने वर्षों इस प्रसंग पर मंथन किया. वे इसमें डूबे रहे तथा प्रेम को लेकर मनुष्य की सनातन प्रवॄत्ति और स्वभाव का अध्ययन करते हुए उर्वशी और पुरुरवा के प्रेम को मानवीय प्रेम के रूप में प्रतिष्ठित किया. उर्वशी लिखने के पीछे दिनकर में कोई कामकुंठा नहीं दिखती बल्कि इस गोपन, वर्ज्‍य विषय के हर सोपान से गुजरने की व्‍यग्रता दिखती है.  
प्रेम के बारे में दिनकर की अवधारणा यह रही है कि पुरुष और स्त्री, देह के सौंदर्य तल को छूते हुए इंद्रियातीत सुखों का सार आयत्त करते हैं, एक तरह के समाधि-सुख का अनुभव करते हैं. प्रकारांतर से यह आचार्य रजनीश की सैद्धांतिकी 'संभोग से समाधि' की ओर का ही प्रसार लगता है. नारी के भीतर एक और नारी तथा पुरुष के भीतर एक और पुरुष की उपस्थिति को रेखांकित करते हुए दिनकर ने शरीर को महज एक पुल माना, जिससे गुजर कर प्रेम की अलौकिक अनुभूति के लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है. उस लोक में पहुंचा जा सकता है. जो दिनकर के शब्दों में किरणोज्ज्वल और वायवीय है. इंद्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्‍पर्श, यही प्रेम की आध्यात्मिक महिमा है, जिसका गौरवगान दिनकर को काम्य है.

उर्वशी में यों तो अनेक पात्र हैं- रंभा, मेनका, चित्रलेखा, मदनिका, औशिनरी, निपुणिका आदि जो अपनी संवादमयता से प्रेम को परिभाषित- आकलित करते हैं, किन्तु मुख्य पात्र उर्वशी और पुरुरवा ही हैं. पुरुरवा का स्वभाव द्वंद्वग्रस्त है, संशयी है क़्योंकि यह मनुष्य का सनातन स्वभाव है. दूसरी ओर उर्वशी द्वंद्वों से मुक़्त है. देवी है, अप्सरा है, इसलिए उसे सांसारिक द्वंद्व नहीं व्‍यापते, हां मानव रूप धारण करने और सांसारिक जलवायु का हिस्सा बनने के बाद इसकी थोड़ी बहुत अनुभूति अवश्य होती है. दिनकर उर्वशी और पुरुरवा को पौराणिक पात्र के रूप में नहीं देखते. वे उन्हें मानवीय गुणधर्म से विभूषित करते हुए उर्वशी को चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक् तथा श्रोत्र की कामनाओं का प्रतीक मानते हैं, तो पुरुरवा को रूप, रस, गंध, स्‍पर्श तथा शब्द से मिलन वाले सुखों से उद्वेलित मनुष्य का प्रतीक. अपनी भूमिका में वे पुरुषार्थत्रयी यानी धर्म, अर्थ और काम की अवधारणा पर भी रोशनी डालते हैं. वे पाते हैं कि पुरुरवा में देवत्व की तृषा है जबकि उर्वशी पृथ्वी का सुख भोगने के लिए ही देवलोक से आई है. यहीं दिनकर ने उर्वशी और पुरुरवा के प्रेम को काम से अध्यात्म की यात्रा के रूप में देखा है. संभवतः चिरन्तन वेदना से व्‍यथित मनुष्य का ठौर यही अध्यात्म है, अतीन्द्रियता है. कहना यह कि उर्वशी में केवल वासना की लहर और रुधिर का उत्ताप नहीं है. उसमें स्थूल से होकर सूक्ष्म की ओर यात्रा के पर्याप्त प्रमाण हैं.

यह कम मजेदार नहीं कि उर्वशी के मनोविज्ञान मुक़्तिबोध अलग ढंग से लेखते हैं. उर्वशी के जगत-व्यवहार को उधेड़ते हुए मुक़्तिबोध ने लिखा है कि उसमें एक दुर्निवार कामुक अहं ने अस्वाभाविक ढंग से आध्यात्मिक मुकुट पहनने की कोशिश की है तथा कवि ने काम-संवेदनात्मक कल्पना का ऐसा अहेतुक आडंबर खड़ा किया है, जिससे पाठकों के मन में अध्यात्म का भ्रम उत्पन्न हो सके. मुक़्तिबोध लिखते हैं, 'उर्वशी में कोई रोमैंटिक उन्मेष, श्रृंगार की ताजगी तथा स्फूर्ति नहीं है. इसके विपरीत उसमें बासी फूलों का सड़ापन है.' मुक़्तिबोध की दृष्टि एक कवि-आलोचक की दृष्टि है. उन्होंने कामायनी के साथ साथ उर्वशी पर भी विचार किया है. उनकी दृष्टि में उर्वशी का कामाध्यात्मवाद उत्प्रेरित तथा समुत्तेजित लगता है, स्वाभाविक नहीं. कामायनी के बारे में भगवतशरण उपाध्याय के इस मत का उन्होंने विरोध किया है कि वह दार्शनिकता की दृष्टि से उत्तम किन्तु कविता की दृष्टि से निम्नतर कृति है.

प्रेम की अद्वितीयता और दिनकर के उर्वशी प्रेम पर मुक़्तिबोध सरीखे आलोचकों के मत को हमें गंभीरता से लेना चाहिए. पुरुरवा और उर्वशी के जरिए दिनकर ने यों ही काल्पनिक कुलाबे नहीं मिलाए हैं. उनके समक्ष कहीं न कहीं प्रसाद रचित कामायनी की कद्दावर छवि भी रही है. हो सकता है एक ऐसी कृति लिखना उनके लेखन लक्ष्यों में शामिल रहा हो जो कामायनी के यश को गौण बना सके. कदाचित यही कारण है कि कामायनी के अध्यात्म को छूने की चेष्टा में उर्वशी के कामाध्यात्म का रूपक रच कर दिनकर ने एक बड़ी लकीर हिंदी में खींचनी चाही है. प्रहार कामायनी को भी झेलने पड़े, और उर्वशी को भी. किन्तु आलोचनाओं के बाद भी 'कामायनी' और 'उर्वशी' को क़्लैसिक काव्‍य का दर्जा मिला. प्रसाद ने मनु को नायकत्व दिया तो दिनकर ने पुरुरवा को. लेकिन अंत दोनों काव्‍यों का लगभग एक-सा है. दोनों नायक इस संसार का परित्याग करते हैं, एक बलात्कार और निरंकुश शासन की असफलता के कारण और दूसरा प्रेयसी के चले जाने के कारण.

कहना यह कि कामायनी के सापेक्ष एक बड़ी रचना करना दिनकर के उद्देश्यों में अवश्य रहा है. स्वर्ग की अप्सरा से पृथ्वी पुत्र पुरुरवा का प्रेम यों भी मिथक ही है, यथार्थ के धरातल पर उसकी क़्या अर्थवत्ता होगी, फिर भी सौंदर्य का प्रतिमान मानी जाने वाली उर्वशी और पौरुष के प्रतिमान पुरुरवा का प्रेम दर्ज कर दिनकर ने प्रेम के लिए अपने भीतर जलती समिधाओं का ही शमन करना चाहा है. दिनकर को ओज और पौरुष के कवि के रूप में ही न जाना जाए बल्कि शाश्वत प्रेम का कवि भी कहा जाए, कहीं न कहीं ऐसी लालसा दिनकर के भीतर जरूर काम करती रही है, इसलिए जिन अप्सराओं के लिए प्रेम, व्रत नहीं क्रीड़ा मात्र हो, जो कितनी बाहों में कितनी बार समा जाने को ही अपना जीवन-लक्ष्य मानती हों, ऐसी अप्सरा के प्रेम को शाश्वत प्रेम की गरिमा से जोड़ना और फिर काम से अध्यात्म की ओर प्रयाण करने के मार्ग पर प्रामाणिकता की मुहर लगाने की कोशिश करना दिनकर की हठीली कल्पना का ही सुनियोजित खेल है, इसमें संशय नहीं. और फिर जहां रूप की आराधना का मार्ग आालिंगन और स्नेह का सौंदर्य को उपहार रसचुंबन भर ही हो, वहां प्रेम की पार्थिवता का अध्यात्म-आरोहण समुत्तेजित और कृत्रिम लगे तो अत्युक़्ति नहीं है.

इसे अतीन्द्रियता का आख्यान मान लेने में कठिनाई अनेक आलोचकों को है कि इंद्रियगम्य प्रेम का छक कर भोग करने के पश्चात ऐसी कौन सी प्रक्रिया और प्रविधि है, जिससे आध्यात्मिक सुख हासिल होता है. यह तो दांपत्य और गार्हस्थ्य प्रेम में भी संभव है. किन्तु दिनकर ने रमणी और अप्सरा प्रेम को तो गौरवान्वित किया है पर पुरुरवा का अपनी पत्नी औशीनरी की उपेक्षा, गार्हस्थ्य और दाम्पत्य प्रेम का निंदन नहीं तो और क़्या है. यह ठीक उसी तरह से है जैसे रक्षिता को दाम्पत्य प्रेम के मुकाबले श्रेष्ठ और उदात्त ठहराया जाए. क़्या प्रेम की ऐसी कोई अधिष्ठात्री देवी धरती पर नहीं थी, जिसे दिनकर अपने काव्‍य का विषय बना सकते. उधर उर्वशी स्वर्ग में प्रेम के अभाव के मारे ही धरती पर प्रेम का आस्वाद चखने पुरुरवा के पास आई थी. जब धरती पर प्रेम का भंडार उपलब्ध था तो निश्चय ही प्रेम को मान देने वाले नायक-नायिकाओं की कमी तो न रही होगी. तथापि गतानुगतिक होते हुए दिनकर ने एक अप्सरा के प्रेम को, जो विशुद्ध दैहिक आनंदवाद पर ही टिका है, न जाने किस रणनीति के तहत अध्यात्म की ऊंचाई देने की कोशिश की है. ऐसे में जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि के आलोचक मुक़्तिबोध को यह सुदूर कल्‍पना क़्यों कर भली लगती. क़्योंकि कहना ही था तो दिनकर धर्मवीर भारती की तरह खुल्लमखुल्ला कहते- न हो यह वासना तो जिन्दगी की माप कैसे हो. इसलिए उर्वशी प्रेम का, काम का काव्‍य तो है- आध्यात्मिकता के गंतव्‍य का भी यह संसाधन और मार्ग है, ऐसा सिद्ध करना समीचीन नहीं लगता. डॉ. नगेन्द्र ने उर्वशी में काम को पुरुषार्थ का चरम लक्ष्य निर्धारित करने की दिनकर की विचारणा की यह कह कर आलोचना की है कि काम और अर्थ साधन हैं, साध्य और सिद्धि नहीं हो सकते. ये धर्म के साधन हैं किन्तु चरम पुरुषार्थ तो मोक्ष ही है.

दिनकर राष्ट्रवादी कवि होने के नाते एक लेखे जनकवि भी कहे जा सकते हैं, यदि नागार्जुन प्रेमियों के ऋतराज न हों तो. किन्तु राष्ट्रकवि होने की अभिजात दृष्टि से बंध जाने की ही यह विवशता रही है कि वे प्रेम का आख्यान भी लिखते हैं तो उसके लिए धीरोदात्त पुरुरवा और स्वप्नसुंदरी उर्वशी का चयन करते हैं. राजन्य प्रेम का यह आख्यान किस लेखे साधारण मनुष्य के हृदय को वशीभूत कर सकता है. वह भी ऐसा प्रेम जिसमें एक पतिव्रता पत्नी न केवल उपेक्षिता का जीवन जीती है बल्कि उर्वशी की अंतरंग सहेली चित्रलेखा से उसे यह कटूक़्ति भी सुनने को मिलती है- एक घाट पर किस राजा का रहता बंधा प्रणय है और अंत में औशिनरी पश्चाताप के आंसू बहाने को शेष रह जाती है. कदाचित आज के स्त्री विमर्श और स्त्री सशक़्तीकरण के इस दौर में औशीनरी के नारी अधिकारों की बात उठायी जाए. एक विद्वान का कहना है कि यदि जायसी की पद्मावती और नागमती रत्नसेन के साथ आनंद से रह कर प्रेम के विराट रूप की झांकी दे सकती थी तो उर्वशी और औशीनरी भी ऐसा कर सकती थीं, कम से कम औशीनरी को पश्चाताप तो न करना पड़ता.

तथापि उपर्युक़्त आलोचना के बावजूद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस काव्‍य रूपक की सराहना की है, खास तौर से इसके तीसरे अंक को वे कवि के समाधिस्थ चित्त की देन मानते हैं. यह अंक उनकी दृष्टि में काव्‍यात्‍मकता का सर्वाधिक कमनीय कुसुम है- रंगीन, मादक, शामक. वे कहते हैं उर्वशी पढ़ने से लगता है कि दिनकर का कवि अब भी जी रहा है और केवल जी ही नहीं रहा है, उसमें प्राणधारा का वेग बहुत प्रबल है, जीवन का उल्लास जैसे बाँध तोड़ कर बह रहा हो. विजेन्द्रनारायण सिंह जैसे आलोचक भी काम की यात्रा को ही ऊर्जा का प्रस्थान बिन्दु मानते हैं तथा कहते हैं कि जिस व्‍यक्‍ति में काम नहीं होता वह परमात्मा तक पहुंच ही नहीं सकता. अपनी इस थीसिस की सिद्धि के लिए वे रजनीश की शरण में जाते हैं और संभोग की महिमा का देर तक बखान करते हैं. जैसे यही करना आध्यात्मिकता का गवाक्ष खुलने की कुंजी हो. पता नहीं इस संभोग से स्त्री भी अध्यात्म का सुख लूट पाती है या केवल पुरुष ही. उनके अनुसार काम के अनुभव के तीन तल हैं, शरीर, मन और आत्मा. आत्मा का तल ही उनके अनुसार आध्यात्मिक तल है. पुरुरवा शरीर तल के काम को आत्मा के तल तक ले आता है, यही उर्वशी का कामाध्यात्म है.

उर्वशी के प्रेम और कामाध्यात्म पर घंटों बहस की जा सकती है. प्रेम जैसी आात्मिक अनुभूति को शयन कक्ष का प्रवचन या विमर्श बना देने के तौर-तरीकों पर भी सवाल उठाए गए हैं, किन्तु दिनकर की चेतना वीर रस के भावों से अधिक प्रेम और श्रृंगार से भरे प्रसंगों में ही विश्रांति खोजती रही है. वे जहां यह मानते थे कि वीर और श्रृंगार दोनों उन्हें बारी-बारी से लुभाते रहे हैं, वहीं यह भी स्वीकार किया है कि कीर्ति भले ही हुंकार से मिली हो, आत्मा मेरी रसवंती में ही बसती है. रसवंती, रेणुका और द्वंद्वगीत में निहित हृदय के गहरे उद्वेगों का विस्फोट ही आगे चल कर उर्वशी में हुआ. आखिर कोई बात ऐसी अवश्य है कि वे वीर रस का एकाधिकारी कवि होने के बावजूद भूषण नहीं, अपने को मैथिलीशरण और पंत के करीब मानते रहे. उर्वशी उनके लिए तन-मन और आत्मा के संगम का काव्य है. यह संगम काम और प्रेम की समावेशिता में घटित होता है. प्रेम न हो तो शरीर का मिलन निस्सार है. लौकिक प्रेम की उजास में देदीप्यता का अनुभव किया जा सकता है, दिनकर ऐसा मानते हैं. उनकी दृष्टि में पुरुरवा की दृष्टि ऊर्ध्वगामी है जो उर्वशी के शरीर का अतिक्रमण करना चाहता है. अब सवाल यह है कि जिस अतीन्द्रियता का बोध प्रेम के सोपानों से गुजर कर संभव है, क़्या वह बोध पुरुरवा को प्राप्त हुआ. क़्या वह काम और अध्यात्म के द्वंद्व से उबर सका. पर हम कोई निष्कर्ष निकालें ही क़्यों, क़्योंकि यह तो दिनकर ने स्वयं कहा है कि उर्वशी किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए नहीं, प्रेम की अतल गहराई का अनुसंधान करने के लिए लिखी गयी है. एक और बात जो दिनकर को बड़ा बनाती है, श्रृंगार रस के एक बड़े कवि के रूप में, प्रेम को प्रतिष्ठा देने वाले कवि के रूप में, वह यह कि वे महाभारत से जुड़ी काव्‍य-परंपरा के कवि तो हैं ही, उर्वशी के साथ वे भारतीय काव्‍य की परंपरा से और गहराई से जुड़ते हैं. प्रेम हृदय के आले में रखा हुआ दिया है जिसके जलते रहने से ही जीवन में उजाला बना रहता है. परंपरा से धीरोदात्त नायकों का गौरवगान कविता में होता आया है, उनके पौरुष और प्रेम की किरणें सहृदय जनों की संवेदना को भी सींचती हैं. दिनकर ने उर्वशी और पुरुरवा के धीरोदात्त प्रेम का रुपक रच कर काव्‍यरसिकों को प्रेम और काम की निर्झरिणी में बहने का सुअवसर दिया है. मानो अज्ञेय के शब्दों में कह रहे हों- जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है.
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#डॉ ओम निश्चल आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध सहित कई पुस्तकें प्रकाशित है. कई संपादित कृतियां व आलोचनात्मक कृतियां भी प्रकाशित हो चुकी हैं. ढेरों साहित्य सम्मान से नवाजे जा चुके हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059. मेल dromnishchal@gmail.com, मोबाइलः 9810042770

 

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