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पुण्‍यतिथि विशेषः मांझी न बजाओ वंशी, केदारनाथ अग्रवाल की कविता का स्थापत्य

मेहनतकश और किसानों को अपनी कविता के केंद्र में रखने वाले केदारनाथ अग्रवाल की पुण्यतिथि पर उनकी कविता के विशेषत्‍व पर साहित्य आजतक की खास प्रस्तुति

कवि केदारनाथ अग्रवाल [ फाइल फोटो ] कवि केदारनाथ अग्रवाल [ फाइल फोटो ]

मेहनतकश और किसानों को अपनी कविता के केंद्र में रखने वाले केदारनाथ अग्रवाल पेशे से वकील थे पर सच्‍चे अर्थों में कवि. ऐसा कवि जिसने औपनिवेशिक दौर में गुलामी के खिलाफ अपनी कविताओं के जरिए जोरदार आवाज उठाई. परकीया प्रेम के बदले कविता में दाम्‍पत्‍य प्रेम को प्रतिष्‍ठा दी. उनकी पुण्‍य तिथि पर उन्‍हें और उनकी कविता के विशेषत्‍व को साहित्य आजतक में उद्घाटित कर रहे हैं हिंदी के सुधी समालोचक डॉ ओम निश्‍चल.
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केदारनाथ अग्रवाल के कविता संसार पर निगाह जाती है तो बरबस उनके गीतों की याद हो आती है. वे ऐसे कवियों में हैं जिनकी कविताओं में छायावादी रूमान की कोई जगह नहीं है जबकि वे छायावाद के गढ़ इलाहाबाद से ज्यादा दूर न थे. बांदा में रहते हुए उन्होंने अपनी कविता और गीतों को भी बांदा की धरती की तरह ही जुझारू और क्रांतिधर्मी बनाया. केन किनारे रहने वाले इस कवि का स्वाभिमान किसी गांगेय पृष्ठभूमि में पलने बढ़ने वाले कवि से कम न था. मार्क्सवादी प्रगतिवादी विचारधारा को उन्होंने केवल सैद्धांतिकी पढ़ कर नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष के बीचोंबीच रह कर जाना था और उसे अपने जीवन में उतारा था. वे न परिमलियों के प्रभाव में आए, न छायावादियों के और न ही अज्ञेय जैसे प्रयोगवादियों के. उन्होंने वक्त की जरूरत के अनुसार अपने अनुभवों की प्रतिमा रची और जीवन भर इसका उन्हें मलाल न रहा. सहृदय आलोचक रामविलास शर्मा के रहते उन्हें और किसी आलोचक की परवाह न थी. एक तरफ कचहरी में जनता की पैरवी, दूसरी तरफ साहित्य में लोक की हिमायत- उनके जीवन और कवि-कर्म में कितनी अद्भुत समानता थी. उनका जीवन कविता में व्यक्त जीवन से अलग न था. अपने दाम्पत्य प्रेम तक को भी उन्होंने स्पृहणीय और सार्वजनिक बनाते हुए मानवीय प्रेम और सुगंध में बदल दिया.

केदारनाथ अग्रवाल की कविता पर विचार करने से पूर्व उनके उपलब्ध काव्यचिंतन पर एक दृष्टि डालनी आवश्यक है. अपने चिंतनपरक निबंध 'कविता संवेदनशील वस्तुवत्ता है' में केदारनाथ अग्रवाल ने लिखा है: ''अलंकारों की सजावट कविता को पूरी तरह कृत्रिम और हृदयहीन बना देती है. कवि की आत्मपरकता विलुप्त हो जाती है. कविता ममताविहीन होकर केवल जड़ाऊ कंगन बन जाती है. न स्पर्श करती है, न इंद्रियबोध जगाती है. जीवन की जीवंतता से रहित वह जीवन का अंश नहीं बनती.'' इस विचार में ही केदारनाथ अग्रवाल की कविता का सौंदर्यशास्त्र छिपा है. याद करें तो अशोक वाजपेयी के साथ एक बातचीत में नामवर जी ने त्रिलोचन और नागार्जुन को ठेठ जन-जीवन का कवि कह कर अशोक के इस तर्क को कि ''जिस मुक्तिबोध को आप अपना आदर्श बनाए बैठे हैं, उनका नई पीढ़ी में कोई अनुयायी नहीं है'', और यह कि ''इन कवियों में विजनलेसनेस है'', कह कर निरस्त कर दिया था कि मुक्तिबोध की अपेक्षा, नागार्जुन और त्रिलोचन से नई पीढ़ी के जुड़ने का अर्थ यह नहीं है कि इनमें वह सामर्थ्य नहीं है, बल्कि सच तो यह है कि ये दोनों कवि ठेठ जन-जीवन के कवि हैं जिसकी ओर नई पीढ़ी का स्वाभाविक खिंचाव है. यही बात केदारनाथ अग्रवाल की कविता के साथ लागू होती है.

जहां तक मार्क्सवादी अवधारणा और प्रगतिशील चेतना का ताल्लुक है, मुक्तिबोध और केदारनाथ अग्रवाल विचारधारा के तल पर समान हैं, किन्तु अनुभूति और अभिव्यक्ति के मामले में दोनों में वैविध्य है. केदारनाथ अग्रवाल ने कविता में जीवन्तता और जीवन के अंश को प्रमुखता दी है. ऐसा इसलिए कि बड़ा से बड़ा कवि जनता के सम्मुख अपनी कला और सैद़्धांतिकी नहीं बघारता, बल्कि जीवन में ही कविता की खोज करता है. क्योंकि जन-जीवन ही समस्त कलाओं का आधार है. 'पंख और पतवार' की भूमिका में भी उन्होंने 'कविता क्या है' शीर्षक से अपने विचार व्यक्त किए हैं. कविता में आत्मनिष्ठ वस्तुनिष्ठता का समर्थन करने वाले केदार जी कविता के गुणधर्म पर बात करते हुए पाब्लो नेरूदा, नाजिम हिकमत और मायकोव्स्की का उदाहरण देते हैं जो राजनीतिक कविता लिखने के लिए सुविदित रहे हैं. उनका कहना है कि ऐसे कवि जो राजनीति के दिग्गज कवियों में गिने जाते हैं, उनके यहां भी जब कविता दर्ज होती है तो उनकी आत्मनिष्ठता वस्तुनिष्ठता के धरातल पर एक झरने की तरह झरती है. वे इस बात के प्रति सतर्क थे कि कवि की अनुभूति की जटिलता कहीं अभिव्यक्ति की जटिलता में न बदल जाए. इसीलिए उनकी कविताएं राजनीतिक रूप से सजग होते हुए भी नारेबाजी में तब्दील नही होतीं, वे अपनी आत्मनिष्ठता से ऐसी कविताओं को भी ऐंद्रिय संवेदना में बदल देते हैं.

केदारनाथ अग्रवाल शमशेर और नरेन्द्र शर्मा के सहपाठी रहे हैं और अच्छे मित्रों में भी. किन्तु इन दोनों कवियों से उनकी कविताएं न केवल भिन्न हैं बल्कि अपनी सामाजिक उपयोगिता में भी अव्वल हैं. जनजीवन से, खेती किसानी से जुड़े रहने का ही यह लाभ उन्हें मिला कि न तो उनके यहां जीवन को लेकर हवाई कल्पनाएं हैं न नकली क्रांतिकारिता का उद्घोष. ऊपर से वे अपनी कविता को अज्ञेय के आत्मनेपद की छाया से बचाना भी चाहते थे. इसीलिए अज्ञेय उनके लिए एक उलझन बने रहे हैं. इसका प्रमाण 'कला का स्वभाव और उद्देश्य' विषयक उनका वह लेख है, जिसमें उन्होंने अज्ञेय के कला के उद्देश्य की बखिया उधेड़ी है.

लगभग तीस बरस के पहले के दौर को याद करता हूं तो पाता हूं कि जब से गाने गुनगुनाने का शौक पैदा हुआ, कुछ गीतों से मन का ऐसा अटूट नाता बना कि आज भी वे गीत या उनके मुखड़े गाहे-ब-गाहे याद हो आते हैं. इन गीतों में निराला का 'बांधो न नाव इस ठांव बन्धु' तथा 'आज मन पावन हुआ है' जैसे गीत थे तो बच्चन का 'महुआ के नीचे मोती झरे, महुआ के', शम्भुनाथ सिंह का 'मन का आकाश उड़ा जा रहा, पुरवैया धीरे बहो', गिरिजा कुमार माथुर 'पिया आया बसंत फूल रस के भरे' , केदारनाथ सिंह का 'झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की' तथा धर्मवीर भारती के 'अगर डोला कभी इस राह से गुजरे कुबेला' जैसे सुमधुर गीतों की छटा भी कुछ कम न थी. ठाकुर प्रसाद सिंह के 'वंशी और मादल' के बहुतेरे गीत एक दौर में खासा चर्चित रहे. लोक जीवनचर्या के उल्लास और उदासियों से भरे ये गीत आज भी अपने चाक्षुष बिम्बों के कारण चित्त को आकर्षित करते हैं. 'पांच जोड़ बाँसुरी' गीत का स्मरण होते ही लगता है, सचमुच कोई पर्वत के पार से बाँसुरी बजा रहा है- और बासंती रात के आखिरी पल अत्यंत बेसुध, विह्वल और निर्मल हो उठे हैं. बाद के दिनों में गीतों की इस विकल खोज यात्रा में राजेन्द्र किशोर का 'रात न माने सपने मैंने बहुत उन्हें समझाया', देवेन्द्र कुमार का 'एक पेड़ चांदनी लगाया है आंगने, फूले तो आ जाना एक फूल माँगने', शिवमंगल सिंह सुमन का 'मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार पथ ही मुड़ गया था' जैसे गीत मिले. एक दौर नीरज, रामावतार त्यागी और रामानंद दोषी के गीतों का भी रहा है और उमाकांत मालवीय के ताजे टटके बिम्बों वाले नवगीतों का भी, किन्तु उमाकांत मालवीय और वीरेंद्र मिश्र को छोड़ कर नवगीत विधा का कोई ऐसा संपूर्ण कवि याद नहीं आता जिसमें जीवन की सभी हलचलों की आमद हो. माझी न बजाओ वंशी- मेरा मन डोलता, आज नदी बिल्कुल उदास थी- ऐसे अनेक प्रिय गीत रच कर केदारनाथ अग्रवाल हमारे बीच से चले गए पर उनका यह गीत जब भी होठों की नमी पाकर अठखेलियां करता गुनगुनाहट की बंदिशों में तब्दील होता है, एक मद्धिम नीली सुरीली आंच समूचे वातावरण को अपने सांगीतिक लालित्य में अन्तर्भुक़्त कर लेती है. कविता में ऐसे गोचर और मूर्त बिम्बों का सृजन करने वाले कवि कम होंगे जो देखते ही देखते अपने शब्दों, पदावलियों और अंदाजे-बयाँ से जीवन की हलचलों का ताना बाना बुन दें.
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केदारनाथ अग्रवाल ऐसे ही कवियों में है जो उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद के कमासिन गांव में जन्मे और जीवन भर बांदा से बाहर नहीं गए. इलाहाबाद और कानपुर से शिक्षा ग्रहण कर लौटे तो जीविका के लिए अथवा कविता में यश पाने के लिए साहित्य और कला के सत्ता केंद्रों की ओर रुख नहीं किया. दुनियावी प्रलोभन उन्हें खींच न सके. वे बांदा में वकालत करते रहे और अपने कस्बाई मिजाज के होने के बावजूद साहित्य की धुरी पर प्रतिष्ठित कवियों की रुढ़िवादी, कलावादी और सौंदर्यवादी प्रवृत्तियों से लोहा लेते रहे. ये वही केदार हैं जिन्होंने कभी 'तार सप्तक' में सम्मिलित होने का अज्ञेय का प्रस्ताव ठुकराया और भरसक उनकी जमात से अलग होते हुए भी कविता माधुरी के सृजन-संवर्धन में संलग्न रहे. निराला से नैकट्य के कारण पं. रामविलास शर्मा के भी प्रिय बने और जीवनपर्यन्त मैत्री का निर्वाह किया. यह कहना अतिशय नहीं कि रामविलास शर्मा जैसे दिग्गज से उनकी मैत्री न होती तो केदार के कवि का श्रेय और प्रेय प्रायः अलक्षित ही रह जाता. जिस दौर में किसी भी युवा कवि के लिए अज्ञेय के प्रस्ताव की अनदेखी कर पाना संभव न था, यहां तक कि रामविलास शर्मा, मुक्‍तिबोध और शमशेर तक सप्तक में शामिल थे, अपरिग्रह की मिसाल बन कर उससे अलग रहना अपने आप में सत्ता केंद्रों को चुनौती देना है. सप्तक में न शामिल होकर नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन ने अपनी प्रगतिशीलता के चरित्र पर आंच नहीं आने दी, स्वयं को किसी भी सत्ता के प्रति भवदीय नहीं बनने दिया. यही नहीं, बार-बार उन्होंने दुहराया भी कि मैं कतई प्रयोगवादी नहीं हूं.

केदारनाथ अग्रवाल को पढ़ते हुए अक़्सर यह बोध मन में जाग्रत होता है कि चाहे जैसे भी हो, केदार ने अपना कवि-कद स्वयं निर्मित किया है. किसी का दिया हुआ नहीं है. हजार ग़म सही दिल में मगर खुशी ये है/ हमारे होठों पे मांगी हुई हंसी तो नहीं. केदार का कवि बुंदेलखंडी ज़मीन और मिजाज का कवि है. बुंदेलखंड की धरती की छाती पानी के लिए दरक जाती है, बादल निहारते जनता के कंठ सूख जाते हैं, स्त्रियां गहरे कुंओं और जल के स्रोतों की तलाश में मीलों लंबा सफर कर सिर पर पानी ढोकर लाती हैं फिर भी उफ नहीं करतीं. केन नदी, जिसका सबसे ज्यादा वर्णन केदार ने अपनी कविताओं में किया है, उससे उनका इतना सख्य भाव है कि उसकी तनिक भी उदासी उन्हें विचलित कर देती है. वे केन किनारे उसका सौंदर्य, उसकी चफलता, उसकी लहरें निहारते घंटों बैठे रह सकते थे.

केदार और नागार्जुन ने एक दूसरे पर कविता लिख कर अपने नैकट्य का परिचय दिया है. केदार पर लिखते हुए नागार्जुन ने अपने को बड़भागी और आभारी माना है कि उन्हें केदार जैसा मित्र मिला. आज संपर्कवाद का युग है, मैत्री का मान रखने वाला समाज नहीं रहा. ऐसे दौर में नागार्जुन-केदार और रामविलास-केदार मैत्री अचरज में डाल देती है. मात्र चार दिनों के बांदा प्रवास में नागार्जुन ने वह सब देख लिया जो केदार और उनके इर्द गिर्द व्‍याप्त था- समूचा परिवेश, फौलादी पत्थर, बुंदेलखंड की रसप्रसविनी भूमि, गंधर्व नगर जैसा दिपदिपाता बांदा, मुस्कानों से बरसती गरीबी, केन का प्रवाह, भिखमंगों का चिर अधिवेशन, धूल भरी राहें, प्रशस्त आंगन, पपीतों की बगिया, चितकबरी चांदनी, नीम की छतनार डालें और केदार के गेहुएं मुख मंडल पर फैली-फैली आंखों में दमकता युग. बांदा से लौट कर नागार्जुन लिखते हैं-
तुम्हें भला क़्या पहचानेंगे बाँदा वाले
तुम्हें भला क़्या पहचानेंगे साहब काले
तुम्हें भला क़्या पहचानेंगे आम मुवक़्किल
तुम्हें भला क़्या पहचानेंगे शासन की नाकों पर के तिल
तुम्हें भला क़्या पहचानेंगे जिला अदालत के वे हाकिम
तुम्हें भला क़्या पहचानेंगे मात्र फेट के बने हुए हैं जो कि मुलाजिम
प्यारे भाई, मैंने तुमको पहचाना है
समझा-बूझा है, जाना है.....
केन-कूल की काली मिट्टी , वह भी तुम हो
कालिंजर का चौड़ा सीना, वह भी तुम हो
ग्रामवधू की दबी हुई कजरारी चितवन, वह भी तुम हो
कुपित कॄषक की टेढ़ी भौंहें, वह भी तुम हो
खड़ी सुनहली फसलों की छवि छटा निराली, वह भी तुम हो
लाठी लेकर कालरात्रि में करता जो उनकी रखवाली
वह भी तुम हो.
(-ओ जन मन के सजग चितेरे/नागार्जुन)

केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन और त्रिलोचन लगभग एक ही भावधारा के कवि हैं. कविता कला में कौन कितना गहरा है,यह बात अलग है, किन्तु मिजाज तीनों कवियों का लगभग यकसां है. केदार कहते हैं- मर जाऊंगा तब भी तुमसे दूर नहीं हो पाऊंगा/ मेरे देश तुम्हारी छाती की मिट्टी हो जाऊंगा. नागार्जुन भी अपने आखिरी दौर में अपने खेत को याद करते हैं. 'अपने खेत में' शीर्षक उनका संग्रह उनके आखिरी दिनों में ही आया था, जो अपनी ज़मीन से जुड़ने के इसी भाव-बोध से भरा है. अपने अंतिम दिनों में त्रिलोचन के भी दो संग्रह आए. 'जीने की कला' और उससे पहले 'मेरा घर'. 'जीने की कला' में वे प्रकृति और खेती किसानी से जुड़ कर लिखी कविताओं में जैसे लोगों को जीने की कला सिखा रहे हों. किन्तु 'मेरा घर' में उनका यह कहना कि मुझे अपने मरने का थोड़ा भी दुख नहीं/ मेरे मर जाने पर शब्दों से मेरा संबंध छूट जाएगा- जैसे कवि की आात्मिक कचोट का परिचायक है. कवियों का शब्दों से अटूट नाता होता है. ध्यान से देखें तो शब्द त्रिलोचन की कविता का बीज शब्द है- श्लेष से भरा. इस शीर्षक से उनका एक संग्रह भी है. उनके शब्द- लोक के, समाज के, जनपद के बोले-बरते हुए शब्द हैं- उस धरती से उपजे हैं जो ताप से ताई हुई है, जो चैती और अमोला की धरती है.

इस तरह तीनों ही कवि अपनी धरती, अपने समाज, परिवेश और प्रकॄति से गहरा नाता रखने वाले कवि हैं, शब्दों के मर्म, कथ्य और उस जन-संस्कॄति के सद्भावी कवियों में हैं. उन्होंने अपनी कविता-यात्रा में लोक के मिजाज को, गंवई गांव की धूल मिट्टी से जन्मी भाषा को आंतरिकता से सहेजा है. नागार्जुन बांग्ला, मैथिली, संस्कॄत, पालि और हिंदी के ज्ञाता व छंदों के मर्मज्ञ थे, तो त्रिलोचन अवधी, हिंदी और उर्दू के निष्णात रसिक, रचनाकार, वाग्गेयकार व छंदों के सम्यक साधक. केदारनाथ अग्रवाल में बुंदेलखंड की धरती का सत्व, तत्व बोलता है , उनका निर्झर जैसा मन केन के जल की उत्ताल तरंगों -सा प्रवाहित होता है. वे धुर देहात, गांव और कस्बे की संवेदना के कवि तो हैं ही, औपनिवेशिक भारत में जनता की बदहाली से परिचित कवि भी जिन्होंने अपने कवित्व को कला की कारीगरी में न बदल कर उसे जनता की बोली बानी के सांचे में ही ढाला, जिससे वह वक़्त जरूरत कविता के साथ साथ निर्बल मनुष्य के जीने का संबल बन सके, नारों और रोजमर्रा के काम आने वाले मुहावरे में भी ढल सके और जीवन के आड़े वक़्त काम आए. कहना न होगा कि जन जीवन में सबसे ज्यादा उद्धॄत और मौके पर काम आने वाले तुलसी और कबीर के बाद कदाचित निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदार जैसे कवि ही हैं जिनकी रचनाओं में जीवन की बहुवस्तुस्‍पर्शी गतिविधियों के चित्रण और सुभाषित मिलते हैं , निराशाओं और हताशाओं से लड़ने-जूझने की प्रेरणा भी. हिंदी भाषी समाज ऐसे कवियों की तरफ उम्मीद से देखता है.
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केदारनाथ अग्रवाल हिंदी की प्रगतिशील काव्‍य-धारा के उन चुनिंदा कवियों में हैं, जिन्होंने औपनिवेशिक और स्वातंत्र्योत्तर भारत में शोषण और वर्चस्व के पाटों में पिसती आम जनता के हक में आवाज उठायी है. प्रगतिशील हल्के के कवियों में उनसे कोई तुलनीय हो सकता है तो वह नागार्जुन हैं. निराला के बाद कविता को एक तरफ शिल्प-सजग और प्रयोगवादी कविता की राह पर ले जाने वाले अज्ञेय जैसे आधुनिकतावादी और शमशेर जैसे ऐंद्रिय बोध के सौंदर्यग्राही कवि थे तो दूसरी तरफ जनता के बीचोबीच रह कर उनके शोषण, पीड़ा, गरीबी और गुलामी की जंजीरों में जकड़े देश के स्वाभिमान को स्वर देने वाले प्रकृति के अनुगायक केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन तथा त्रिलोचन जैसे कवि थे जिनकी रचनाएं आत्मनिमग्न और निज के राग-रंजन में दत्तचित्त होकर नहीं रह जाती बल्कि जनता से सीधा संवाद करती हैं. उनकी कविताओं में वैसा ही आवेग है जैसा आम जनता के भीतर पाया जाता है. खरी खरी और दोटूक लहजे में कहने वाले केदार की अनगढ़ कविता काव्‍य-रसिकों को तो लुभाती ही है, वक़्त जरूरत उसे नारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. केदारनाथ अग्रवाल पेशे से वकील होने के कारण जैसे जनता के हितों के पैरोकार नजर आते हैं. अकारण नहीं कि अपनी इसी साफगोई और सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण रामविलास शर्मा जैसे दिग्गज आलोचक ने निराला के बाद यदि किसी को अपनी आलोचना में ऊंचा आसन दिया है तो वह केदारनाथ अग्रवाल ही हैं. यों उन्होंने शमशेर के गद्य की भी भूरि -भूरि सराहना की है. पर उनके पद्य के प्रति कदाचित संशयी थे. उनके लेखे, शमशेर के लेखन में जो पद्य में नहीं है, वही सबसे महत्वपूर्ण है. चाहे वह गद्य उनके निबंधों में हो, चाहे उनकी कविताओं में. ( शमशेर बहादुर सिंह की कुछ गद्य रचनाऍं, भूमिका)

प्रगतिशील कवियों में उनसे अग्रतर स्थिति में नागार्जुन और त्रिलोचन थे किन्तु राम विलास शर्मा ने केदारनाथ अग्रवाल पर केंद्रित पुस्तक 'प्रगतिशील काव्‍यधारा और केदारनाथ अग्रवाल' लिख कर जताया कि प्रगतिशील साहित्य और वामपक्ष, जनवादी क्रांति, पूर्णस्वाधीनता, यथार्थवाद और नई प्रगतिशीलता तथा कविता की सामाजिक प्रासंगिकता के आईने में केदार का अपना महत्त्व है. उन्होंने घन गरजे जन गरजे, आग लगे इस रामराज में, एक हथौड़े वाला घर में और हुआ, दीन दुखी यह कुनबा, धूप धरा पर उतरी, मैं घूमूँगा केन-किनारे, मेड़ पर इस खेत की बैठा अकेला, जिन्दगी की भीड़ में, रेत मैं हूँ जमुनजल तुम, तथा मैं लड़ाई लड़ रहा हूँ- इन शीर्षकों में केदार की प्रिय कविताओं का अपना चयन भी प्रस्तुत किया और कहना न होगा कि केदार की कविताओं का विषय-वस्तुवार इतना सटीक और समावेशी चयन कोई दूसरा नही हो सकता . इस चयन से केदारनाथ अग्रवाल के कवि की शख्सियत और कॄतित्व के वे सभी पहलू रोशन होते हैं जिनसे प्रगतिशील कविता की चारित्रिक पहचान की जा सकती है.
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केदारनाथ अग्रवाल उस धरती के कवि हैं जो त्रिलोचन की धरती से थोड़ा अलग है- लगभग पठारी क्षेत्र, जहाँ वर्षा के अभाव में धरती का सीना दरक उठता है, किसानों का श्रम नियति के भाग्यलेख के आगे निष्प्रभ हो उठता है. ऐसे परिवेश से होकर निकले केदार के यहां बादलों की तनिक भी गरज कवि की संवेदना को प्राणवायु से भर देती है. जलाभाव से ग्रस्त इस इलाके में कदाचित नदी के लिए कवि के मन में इसीलिए इतना प्रेम भरा है ( मैं घूमूँगा केन किनारे) कि उसे नदी की उदासी ( आज नदी बेहद उदास थी) और तेज धार का कर्मठ पानी विचलित करता है तो केन के तड़पने और काल के कगार पर खड़े पेड़ों की पीड़ा कचोटती है.

ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक़्तियों के विरुद्ध जनवादी चेतना का पहला बड़ा आह्वान केदार के संग्रह 'युग की गंगा' में मिलता है, जो मार्च 47 में प्रकाशित हुआ था. क़्या संयोग है कि 1953 में आया नागार्जुन का संग्रह 'युगधारा' स्वाधीनता की स्वातंत्र्योत्तर परिणति पर प्रहार करते हुए केदार की परंपरा को ही आगे बढ़ाता है. निराला के नए पत्‍ते पर भी इस युगीन विक्षोभ की छाया है. बेशक अज्ञेय की प्रयोगवादी धारा ने प्रगतिशीलता के पाले में खड़े कुछ लेखकों, कवियों को अपनी ओर आकर्षित किया किन्तु अंततः जनाकांक्षाओं के बलबूते प्रगतिशील कविता धारा को व्‍यापक जन समर्थन मिला . यहां तक कि शमशेर जैसे महीन संवेदना के कवि तक अज्ञेय की सुरुचि के कायल होते हुए भी यही कहते रहे कि कवि-दृष्टि उन्हें नागार्जुन और त्रिलोचन से ही मिली. केदारनाथ अग्रवाल शहरी आधुनिकता के कवि नहीं हैं. बेशक, उनके यहां कला की बारीक बीनाई न हो, भाषा की भंगिमा नई न हो, पर जनकवि होने के नाते वे काव्‍यभाषा के लिए कोशीय कवायद नहीं करते, अनावश्यक बेल बूटे नहीं टाँकते- लोक के पास जाते हैं, सानी-पानी और गाँव के गलियारों की धूल-धक़्कड़ के बीच से भाषा उठाते और बरतते है. इसीलिए वे इस विश्वास से कह फाते हैं--जरा-मरण से हार न सकते मेरे अक्षर/ मेरी कविताऍं गाएगी जनता सस्वर.

किसानों, मजदूरों के लिए गीत लिखने वाले, उनके संघर्षों के चित्र उकेरने वाले केदार को कविवर राजेश जोशी ने नगरीय संवेदना का कवि माना है. मुझे राजेश जोशी का यह कथन मान्य नहीं लगता. कौन कहेगा कि 'इन धनहा खेतों के ऊपर' जैसा खेती किसानी में रमा गीत लिखने वाला कवि नगरीय होगा. कहना न होगा कि उनके इसी तेवर को देख कर शमशेर ने 'एक बिल्कुल पर्सनल ऐसे' में अपने इम्प्रेशन्स दर्ज करते हुए लिखा है- किसान और मजदूर के हाथ और रग-पुट्ठे कहीं हमारे हाथों और रग-पुट्ठों को रगड़ते हुए से लगते हैं और अपना वेग और सहज शक़्ति बरबस ही हमें महसूस कराते हैं. उनके यथार्थ वातावरण की गृहिणी, उनके किसान, युवक और युवती और खेतो की सजीव हरियाली और भोली भाली रंगीनी अपना परिचय हमेशा के लिए हमसे दृढ़ कर लेती है. (कुछ और गद्य रचनाएं/ शमशेर बहादुर सिंह, पृष्ठ 20) कोई किसानी चेतना का कवि ही अषाढ़ की पहली झमाझम बारिश के लिए दौंगरा का इस्तेमाल कर सकता है, नगरीय कवि नहीं. शमशेर ने अपने उक़्त इम्प्रेशन्स के अलावा, फूल नहीं रंग बोलते हैं पर विस्तृत समीक्षा लिखी है. कदाचित रामविलास शर्मा के बाद उस दौर में शमशेर ने ही केदार की कविता की मौलिक रंगतों को बारीकी से पकड़ा है. कहने का अर्थ यह कि केदार उस कवि परंपरा के कवि हैं जिनकी वाणी में ओज है, तेज है, शिल्प की बारीक बीनाई न होते हुए भी उसमें एक ताजगी है और सच तो यह कि सादगी में रची बसी उनकी कविताऍं शिल्प-सज्जा की कमी के बावजूद असर करती हैं.

याद रहे, रामविलास शर्मा ने ही 'अच्छे गद्य की पहचान' शीर्षक भूमिका में लिखा है कि कविता केवल जनगान नहीं उसमें जनसंघर्षों की गूँज के अलावा और बहुत कुछ है. सामाजिक दायित्व और जन आंदोलनों से कट कर कविता केवल व्‍यक़्तिगत कुंठाओं के दायरे में घुमड़ती रहे, यह भी एक अस्वाभाविक क्रिया है. --हमें यह देखने की जरूरत है कि केदार अपनी कविताओं में कहां तक इन अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं. क्‍या विडम्बना है कि कभी केदार जी ने भरोसे और आशावादी तेवर के साथ लिखा था- वह जन मारे नहीं मरेगा. आज राज्य व्‍यवस्था का सबसे ज्यादा प्रहार इसी जनता पर है. करों के बोझ से दबी, दैवी आपदाओं, लालफीताशाही से ग्रस्त, पानी, बिजली और मूलभूत सुविधाओं के लिए त्राहि -त्राहि करती जनता आज भी किस तर्क से जीवित है, यह अचरज का विषय है. अभी कोरोना के दौरान जिस तरह मजदूर पलायन करने को विवश हुए हैं और पूरे देश में जिस तरह उनको लेकर सरकार का रुख रहा है वह अचरज में डालने वाला है. विदर्भ के किसान आखिर आत्‍महत्‍या पर क्‍यों विवश होते हैं.

केदार की कविता स्वाधीनता की पुकार है. वह भारत में ब्रिटिश पूँजी के समर्थक नेताओं की नीयत पर प्रहार करती है. समाजवाद नहीं, जनवाद का सपना देखती है. पसीना बहाकर शिलाएं तोड़ते श्रमिकों का यह कह कर स्तवन करती है कि जिन्दगी को वह गढ़ेंगे जो शिलाएं तोड़ते हैं/ जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएं मोड़ते हैं. निराला ने कभी इलाहाबाद के पथ पर पत्‍थर तोड़ती युवती का एक मार्मिक चित्र आँका था. निराला के लिए यह दृश्य सह पाना कठिन था. केदार पत्थर तोड़ने को कोई हेय काम नहीं मानते, बल्कि इसके विपरीत इसे मजदूर के भाग्य की सौगात मानते हुए सरकार को सुनाते हुए कहते हैं- सुन ले री सरकार/ कयामत ढाने वाला और हुआ/ एक हथौड़े वाला घर में और हुआ. केदार उस रामराज की मुखालफत करते हैं जिसमें गरीबों की चमड़ी से अमीरों की ढोलक मढ़ी जाती हो. ठीक ही तो कहते हैं वे, जहां गरीबों की रोटी रूठे, कौर छिने, थाली अन्न बिना सूनी रहे, ऐसे रामराज को आग लगे. याद आता है एक लोक कवि का यह कथन कि ''तोहरे सोने कै तिलरिया हमरे काहे लागै हो? ''

एक बात और. केदारनाथ अग्रवाल की कविता में वाचिक कविता के अनन्य गुण हैं. चाहे वे औपनिवेशिक सत्ता के विरोध में लिखी कविताएं हों, या आजादी के बाद के परिदृश्य पर, प्रकॄति पर या किसानों, मजदूरों को लेकर- उनकी कविताओं में गेयता है. वाचिक सरसता है. कविताओं-गीतों के शीर्षक भी सुगठित और लुभावने हैं. इस तरह हम उन्हें वाचिक परंपरा का कवि भी मान सकते हैं. इसीलिए उनकी कविता के पाठ्य रूप में आते ही जब हम उसे कविता की अन्य कसौटियों पर कसते हैं, तब लगता है, यह कविता तो है, पर शमशेर कहीं इससे आगे के कवि हैं, या अज्ञेय की बात कुछ और ही है और नागार्जुन, त्रिलोचन की कविताओं का पाठ्य संसार ज्यादा समृद्ध और बहुवस्तुस्पर्शी वक्रताओं और अंतर्ध्‍वनियों से लैस है. केदार की कविता में सरलता को भी गुणधर्म के रूप में देखा जाता रहा है. पर हर सरल सहज कवि अच्छा भी हो, यह जरूरी नहीं. अजय तिवारी भी सरलता की बात करते हुए मानते हैं, सरलता गुण है तो दोष भी. सरलता यदि इस अर्थ में है कि सहज हूँ अति कठिन - तो और बात है. किन्तु सरलता- सपाटबयानी में बदल जाए तो काव्‍य मूल्यों की कसौटी पर कविता कमतर मालूम होती है. केदार की कविता युगीन आवश्यकताओं की उपज है. उस समय ऐसी ही जुझारु, सरल, सहज और दोटूक कहने लिखने वाले कवियों की जरूरत थी, जिनकी कविता, भाषा जनता की जबान पर उतर सके. वक़्त जरूरत उसकी लाठी, उसका संबल, उसका नारा बन सके, जीवन में मुहावरे की तरह काम आए. केदार की कविता ये सब काम करती है. वह साम्राज्यवाद और पूंजीवाद की मुखालफत तो करती है, किसानों, मजदूरों में हिम्मत भी जगाती है, वह जीवन के उल्लास और उत्सवता की कविता है. वह पूँजीपतियों, शोषकों के धिक़्कार की कविता भी है. वह जनवाद के आह्वान की भी कविता है. वह प्रेम, रूमान और एकांतिक विलास की कविता भी है. वह अपनी खुराक भारतेन्दु हरिश्चंद, बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन, पद्माकर, मतिराम, बिहारी, रत्नाकर, हरिऔध -सभी से लेती है. किन्तु वह फार्मलिस्ट होने से बचती है और अपने को सर्वथा मौलिक और ऋजु रूप में सामने रखती है. विचारधारा के मोर्चे पर कहीं समझौते नहीं करती और एक आलोचक की तरह व्‍यवस्था की खामियों पर उँगली भी रखती है. वह प्रगल्भ और स्वाभिमानी जनता के मन की बात कहती है.
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अग्रवाल के जीवन और कविता दोनों में एक अनिंद्य प्रेम का भाव विराजता है. जो जीवन में है वह कविता की परिधि से बाहर नहीं है. जहां लोग दाम्पत्य प्रेम को जीते हुए अपने उत्तरवर्ती जीवन तक आकर ऊब का अनुभव करने लगते हैं, वहीं केदार जी आजीवन इस प्यार से बँधे बिंधे रहे. हिंदी की काव्य परंपरा में प्रेम का अनूठा और अद्वितीय स्थान है पर है वह परकीया प्रेम से बंधा हुआ. आधुनिक कवियों में केदारनाथ अग्रवाल का एक विरल उदाहरण है जहां वे दाम्पत्य प्रेम में ही लौकिक-अलौकिक सुखों की अपूर्व व्यंजना कविताओं में संभव करते हैं. 'हे मेरी तुम, मार प्या‍र की थापें' और 'जमुन जल तुम' जैसे संग्रह इस बात के प्रमाण हैं कि उन्होंने प्रेम को दाम्पत्य की सुखद अनुभूतियों और संवेदना से भरा है. छायावादियों में जो प्रेम लौकिक धरातल से ऊपर उठ कर दार्शनिक उपपत्त्तियों में पर्यवसित हो गया था, सूफी कवियों के यहां जो प्रेम ईश्वरीय सत्ता से लगन का पर्याय बन गया है, वह केदारनाथ अग्रवाल जैसे यथार्थवादी प्रगतिवादी कवि के यहां लोक में उपलब्ध प्रेम की सबसे कर्मठ जिजीविषा का पर्याय बन गया है. वे प्रेम में इतने लौकिक और कहीं कहीं इतने शरीरी हो उठे हैं कि उनकी कामाभिव्यक्ति से गुजरते हुए कुछ संकोच-सा होता है. पर वे उन कवियों में हैं जो शायद अपनी विचारधारा, अपने सरोकारों, और अपने जीवन के क्रियाकलापों की तरह अपने प्रेम को भी अप्रकट नहीं रहने देना चाहते.

वे अपनी कविताओं में दैहिक सौष्ठव के बखान में सकुचाते नहीं. नितंब और कुच तो उन्‍हें इतने प्रिय हैं कि प्रकृति के बीच सैर करते हुए भी दृष्टिबंध में ऐसे पद आ ही जाते हैं. नदी को वे जैसे एक नायिका की तरह ही देखते हैं जो स्त्री की तरह ही सजलप्रवाही है. 'न भूलेगी मुझे नितंबिनी, स्रोतस्विनी'' कहते हुए वे उसे नितम्बिनी वीणा कह कर भी सराहते हैं: नदी है कि नितम्बिनी वीणा/ तट पर धरी/ कभी बजती -कभी मौन. नदी तो नदी, दिन की बात करते हुए भी वे नदी के सौष्ठव में विलम जाते हैं: 'दिन अच्छा है/ नटी नदी के दृढ़ नितम्ब की तरह खुला है.' रघुवीर सहाय की कविता में एक बिम्ब आता है: पानी के मन में उसके तन के अनेक संस्मरण हैं. केदार जी ने यहां नदी के उस रूप को निरखा है कि कोई सांवली सुंदरी जैसे अभी -अभी आंख बचाकर नहा कर गयी है और विकल नील जल व्याकुल कॉंप रहा है. यहां दो बातें ध्यातव्य हैं. एक तो यह कि सौंदर्यबोध को लेकर उनके मन में स्त्री के सांवलेपन से किसी तरह की हिचक नहीं है. दूसरे, देह की मादकता और सौंदर्य की ऊष्मा से नदी का स्निग्ध जल भी प्रकंपित हो उठा है. बिलकुल मानवीय प्रेम की मानिंद. मैं पहाड़ हूँ और तुम मेरी गोद में बह रही कोई नदी हो- कहते हुए वे पौरुषेय प्रेम की ऊष्मा से कितना संवलित हो उठते हैं. रूप-रस की यह शहनाई उनके जीवन में ही नहीं, उनकी कविता में भी बजती सुनाई देती है. अपने यौवन को उन्हों ने उन्मादी कहा है.

प्रेम केदारनाथ अग्रवाल की दिनचर्या का ही एक अंग है. वह जीवन की मांसपेशियों में रुधिर की तरह प्रवाहित है. प्रेममय जीवन के सारे काम जीवन के काम हैं. कुरते में बटन नहीं लगी, ऊपर से वह फटा हुआ है, सारा घर अस्तव्यस्त हो उठा है, न सोपकेस में साबुन, न तेल की एक बूंद, न खोजने से मिल पाता रूमाल, मेजपोश पर धूल, किताब पर प्याला, कापी पर औंधा रखा गिलास -कवि अधीर होकर संबोधित करता है पत्नी को कि घर सँवारने कब आओगी. घर की सारी शिष्ट सँवरन पत्नी की देन है. पत्नी, जो प्रिय है जिसके होने से जीवन है. वे उसे ब्याह कर लाने तक की चर्चा काव्य में करते हैं. सारा कुछ खुल्लमखुल्ला. क्योंकि इस प्रेम में, प्रिय की बाहों में, लोचनों में, कुंतलों में वे इतना डूब जाते हैं कि जैसे पवर्तशिखर सदियों से सिंधु में डूबे हुए हैं और अब तक ऊबे नहीं हैं -मग्न हैं बेऊब. प्रेम में प्रिया सदैव साथ रहे कौन नहीं चाहता. एक दिन भी पितृगृह में रहना जब दुष्कर हो तो ज्यादा दिनों की कौन कहे. प्रेम के लिए लोग कितनी सघन साधना करते हैं. केदार जी को यह प्रेम अचानक ही सुलभ हुआ है. वे कहते हैं कि गया तो था युवती ब्याह कर लाने पर सदेह प्रेम को ही ब्याह कर लौटा. और फिर वे अपने प्रणयजीवन का जो चित्रण करते हैं, वह किसी भी गृहस्थ के प्रेम का चित्रण हो सकता है. सौंदर्य के आलंबनों उद्दीपनों में शायद ही कोई अंग हो जो उनके अवलोकनों से छूटा हो. इन्हीं दिनों की उनकी एक कविता है जो प्रेम की अभीप्सा और मनुहार का साकार परिचय है :
आंख से उठाओ और बांह से
सँवार दो.
अंतरंग मेरा रूप रंग से
उबार लो
बार-बार चूमो और बार-बार
प्यार दो.

अज्ञेय की कविताओं में प्रेम का स्वरूप अलग है. वहां प्रेम में देने का भाव प्रबल है. जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है. अज्ञेय कहते हैं. केदारनाथ अग्रवाल अपने को रेत सा नगण्य मानते हुए प्रिय को जमुन जल की तरह अंत:सलिला मानते हैं. रेत मैं हूँ- जमुन जल तुम. मुझे तुमने हृदय तल से ढँक लिया है/ और अपना कर लिया है/ अब मुझे क्या रात-क्या. दिन/ क्या प्रलय- क्या/ पुनर्जीवन. केदार जी जानते हैं पाने के लिए एक पात्रता चाहिए. प्रिय के चरणों में समर्पण चाहिए. पर वह सौंदर्य ही क्या जो धैर्य न छीन ले. केदार जी प्रेम में धैर्य खो बैठते हैं तब होश में आते हैं, यह कहते हुए कि तुम मुझे कुछ न दो, न उंगलियों का स्पर्श, न मदांध सुगंधित रातें, न उरोजों के आश्वस्तकारी कूल, न नितंबों का महोल्लास, न फूल की मानिंद झरते बोल, न हिमानी मौन ही, बस मेरा धैर्य जो तुमने छीन लिया है, उसे लौटा दो. कभी ठाकुरप्रसाद सिंह के एक गीत में नायिका प्रेमी से अपने क्वांरेपन को लौटाने को कहती है जो उसने प्रणय ही प्रणय में गँवा दिया है: मुझे लौटा दो मेरा क्‍वारांपन मेरा जीवन धन. यहां उसी लहजे में लगभग कवि कहता है: मुझे मेरा धैर्य लौटा दो. यह प्रेम के चरम वैभव में जीने का ही उन्‍माद है कि कवि अंग प्रत्‍यंग के सौष्‍ठव का बखान करता हुआ प्रेमिका पत्‍नी को सदेह सौंदर्य के समारोह का खिताब देता है. वह उसके न होने की कल्‍पना भी कुछ इस तरह करता है--
तुम न रहोगी तब भी हृदय तुम्‍हारा होगा
मेरे जीवन में बजता संगीत तुम्‍हारा होगा.

केदार जिस गीत से पहचाने गए वह भी उनका एक प्रेमगीत है सांद्र सरल चित्‍त को खींचता हुआ जैसे दूर बजती बांसुरी की धुन पीछा करती हो --
मॉंझी न बजाओ वंशी मेरा मन डोलता.
मेरा मन डोलता कि जैसे जल डोलता
जल का जहाज हैसे पल पल डोलता.
मॉंझी न बजाओ वंशी मेरा प्रन टूटता.
आज भी उनका यह गीत सुन पड़ता है तो लगता है, मॉंझी कहीं दूर वंशी बजा रहा है, उसकी टेर हमारे भीतर सुनाई दे रही है. जीवन में प्रेम हो तो समूची कविता मानवीय प्रेम की व्‍यंजना में बदल जाती है.

कविता में शमशेरियत की चर्चा काफी हुई है. शमशेर के दीवानों को उनकी प्रेम कविताओं के आगे अज्ञेय, केदार, नागार्जुन सबकी कविताएं फीकी लगती हैं. तब भी केदार की सरलता और वक्रता को देखते हुए उनके स्वाभिमानी कवि-मिजाज की बानगी मिल जाती है. उनकी कविता आम आदमी की कविता है, इससे उसकी महत्ता कम नहीं होती. उनसे नारे बनाने का काम लिया जा सकता है, इससे भी उनका महत्त्व कम नहीं होता. उसने अपने होने की चरितार्थता सिद्ध की है. आज प्रकृति का जैसा दोहन चल रहा है, खनिजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा होता जा रहा है, पानी, बिजली और जीवन के बुनियादी संसाधनों के अधिकार निजी कंपनियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौफे जा रहे हैं- जीवन निरन्तर जटिल होता जा रहा है. ऐसे में हमें केदार की पंरपरा को आगे बढ़ाने वाले कवियों की ज्यादा जरूरत है. सारे जनान्दोलन जिस तरह एक पड़ाव पर आकर ठहर-से गए लगते हैं, मनुष्य, पारिस्थितिकी और जीवन के पक्ष में आवाज़ उठाने वाली कविता की मुहिम को अबाध रूप से आगे बढ़ाने की जरूरत है. केदार की कविता की सच्ची प्रासंगिकता यही है कि कविता में उनकी साहसिकता को सलीके से रखने वाली कवि-पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले, मौलिक रूप से आगे बढ़े और शमशेरियत की तरह ही केदारियत को अपना पाथेय बनाए.
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# हिंदी के सुपरिचित कवि-आलोचक और भाषाविद् डॉ ओम निश्चल विभिन्न विधाओं- कविता, आलोचना, संस्मरण, निबंध, कोश व भाषा-चिंतन में तीन दर्जन से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके हैं. वे कई सम्मानों और पुरस्कारों से विभूषित हैं तथा विश्व हिंदी सम्मेलन, मारीशस एवं साहित्य अकादमी की ओर से दक्षिण अफ्रीका के कई शहरों में आयोजित साहित्यि‍क कार्यक्रमों में सहभागिता कर चुके हैं. संपर्क: डॉ ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059. फोनः 9810042770

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