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सुरक्षित बचपन दिवस, जन्मदिन विशेषः मुक्ति के गायक हैं कैलाश सत्‍यार्थी

नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्‍यार्थी एक ओजस्‍वी कवि हैं. वे कविताओं और क्रांति गीतों के माध्यम से बाल मजदूरों में आजादी का ओज भरते हैं. आज उनके जन्मदिन पर विशेष

कैलाश सत्‍यार्थीः कवि और पुस्तकप्रेमी समाजसेवी कैलाश सत्‍यार्थीः कवि और पुस्तकप्रेमी समाजसेवी

यह बात कम लोग ही जानते हैं कि नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्‍यार्थी एक ओजस्‍वी कवि हैं. वे कविताओं और क्रांति गीतों के माध्यम से बाल मजदूरों में आजादी का ओज भरते हैं. सत्‍यार्थी अपनी कविताओं में इन बच्चों से आह्वान करते हैं कि तुम्‍हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है लेकिन पाने के लिए पूरी दुनिया. उनकी कविताओं की हुंकार पर खेतों-खलिहानों, कारखानों-ढाबों में दासता की जंजीरों में जकड़े लाखों बाल मजदूर आजादी की खोज में निकल पड़ते हैं.

मनुष्‍य का पहला और अंतिम स्‍वप्‍न है आजादी. वही मनुष्‍य सपना देख सकता है जो आजाद है और आजादी के लिए गुलामी का अहसास कराना पड़ता है. किन्‍हीं ने कहा है कि गुलाम को गुलामी का एहसास करा दो, वह अपनी जंजीरें तोड़ देगा. कैलाश सत्‍यार्थी गुलामी की बेड़ियों में सिसकते बचपन में हुंकार भरते हुए लिखते हैं-

कल तक अपना बचपन बंधुआ था मालिक का,
हंसने पर, रोने पर पहरा था मालिक का,
गिरवी थे सब सपने, बेगाने थे अपने,
अब अपने बचपन का, सपनों का, अपनों का,
आंसुओं का, खुशियों का, हर दिन का, हर पल का,
चुकता हिसाब करने, हम बच्चे निकल पड़े...
 
सत्‍यार्थी ने बाल अधिकारों के लिए जब भी कोई बड़ा आंदोलन या संघर्ष खड़ा किया है, तो उन्‍होंने अपने साथियों को ऊर्जस्वित और प्रेरित करने के लिए ऐसी ही कविताओं की रचना की. उनकी रचनाओं से आंदोलनकारियों का जोश और जज्‍बा आसमान छूने लगता है. खेतों-खलिहानों, ईंट-भट्ठों, कारखानों, कालीन उद्योगों में कराहते हजारों-लाखों बच्‍चे आजाद बचपन की तलाश में सड़क से संसद तक निकल पड़ते हैं. शोषित-पीड़ित बचपन सपने संजोने लगते हैं. अपनी नष्‍ट इच्‍छाओं और आकांक्षाओं को पुनर्जीवित करने लगते हैं-

फौलाद हो चुके हैं तुम्हारे पांव
और हाथ पहाड़ों की चोटियां
देखो कि तुम्हारा दिल समंदर बन गया है
आंखें, चांद और सूरज
आसमान से ऊंचा हो गया है
तुम्हारा मस्तक… 

इस तरह से हम देखते हैं कि उनकी कविताएं मुक्ति की छटटाहट को स्वाभिमान का अर्थ देती हैं. मुक्ति का अहसास तभी शुरू होता है जब हमें आजाद होने के लिए कोई प्रेरित करता है. विश्‍व इतिहास गवाह है कि कोई भी मुक्ति संग्राम या आंदोलन तब तक अपने लक्ष्‍य की ओर अग्रसर नहीं हुआ, जब तक उसमें ऐसे क्रांतिगीतों की रचना नहीं हुई है.

सत्‍यार्थी बाल अधिकारों के लिए चार दशकों से भी अधिक समय से अनथक संघर्ष कर रहे हैं. अपने संघर्ष के शुरुआती वर्षों से ही वे ऐसी कविताओं की रचना करते आ रहे हैं, जो बाल मजदूरों और उनके साथियों के मनोबल को ऊंचा करती हैं. सत्‍यार्थी की कविताएं उन्‍हें उनकी अतुलित ताकत का आभास कराती हैं. उनकी कविताओं का यही संदेश होता है कि तुमसे बेहतर कोई नहीं. तुम उस क्षमता के मनुष्‍य हो जो पत्‍थर से आसमान में भी सूराख पैदा कर दे-

मोम की गुड़िया बनाके हमसे खेल रहे थे; वो तो कल था
जानवरों से कम कीमत पर बेच रहे थे; वो तो कल था
अब तुम हमको छू न सकोगे, खोटी नजरों वालों सुन लो
आग का दरिया बनकर अब हम निकल पड़े हैं

अंधेरों से जाकर कह दो छुपकर बैठें
दोपहरी का सूरज बनकर निकल पड़े हैं.
सांसों में तूफान लिए हम निकल पड़े हैं
दिल में हिंदुस्तान लिए हम निकल पड़े हैं
निकल पड़े हैं, निकल पड़े हैं, निकल पड़े हैं. 

सत्‍यार्थी आंदोलन का कोई भी अभियान, कार्यक्रम, घटना वगैरह बगैर इन क्रांतिगीतों के आरंभ या अंत नहीं होता. ये क्रांतिगीत आंदोलन के साथियों में उत्‍साह और उमंग भरने का काम करते हैं. कई बार देखा गया है कि अगर ये क्रांतिगीत नहीं बजे, तो उनमें ऊर्जा का संचार नहीं होता.

कैलाश सत्‍यार्थी को शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने के लिए भी नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था. सत्‍यार्थी का मकसद सिर्फ बाल मजदूरों को मुक्‍त कराना नहीं होता. मुक्‍त बाल मजदूरों का पुनर्वास और उनकी गुणवत्‍तापूर्ण शिक्षा को सुनिश्चित करने पर उनका ज्‍यादा जोर होता है. अन्‍य समाज सुधारकों की तरह सत्‍यार्थी का भी मानना है कि शिक्षा हरेक ताले की चाबी है. शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने में उनके विशेष योगदान को कौन भूल सकता है. प्रत्‍येक लड़का और लड़की को बगैर किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा मिले, इसके लिए उन्‍होंने भारत के सुदूर इलाकों में बाल मित्र ग्राम (बीएमजी) जैसे अनूठे कार्यक्रम की शुरुआत की. 

बाल मित्र ग्राम में कोई बाल मजदूर नहीं होता और हरेक बच्‍चा स्‍कूल जाता है. बाल मित्र ग्राम कार्यक्रम की यह सफलता है कि आज वहां से कई लड़कियां सामाजिक बदलाव के क्षेत्र में राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपनी नेतृत्‍व क्षमता का डंका बजा रही हैं. एक कवि, एक समाज सुधारक का यही सपना होता है. वह तमाम रूढ़ियों, बंदिशों, बंधनों और वर्जनाओं की जंजीरों को तोड़ते हुए सारा आकाश का स्‍वप्‍न देखता है-

अभी-अभी किवाड़ खोलकर तोड़ रही है वह,
सदियों पुराने गुलामी के बंधन
देहरी के बाहर पहला कदम रख
जिंदगी की तमाम मुश्किलों को
ठोकर मार रही है वह
उसकी आंखों की चमक के सामने फीके पड़ गए हैं,
ब्रह्मांड के सारे सूरज, चांद और तारे
बेजान-सी लग रही हैं
सारे समंदरों की लहरें-
मेरी बेटी स्कूल जा रही है. 

सत्‍यार्थी की जिन कविताओं के अंशों का आलेख में जिक्र किया गया है, उनका एक संकलन वाणी प्रकाशन से 'चलो हवाओं का रुख मोड़े' के नाम से प्रकाशनाधीन है. सत्‍यार्थी की कविताओं की यह लयात्‍मकता और गीतात्‍मकता ही है कि मशहूर इंडि-फ्यूजन बैंड 'इंडियन ओशन' या अन्‍य कोई समय-समय पर उनको संगीतबद्ध भी करता रहा है. 'निकल पड़े हैं, निकल पड़े हैं, निकल पड़े हैं…'कविता जब संगीतबद्ध होकर लोगों के सामने आई तो इतना सम्‍मोहन पैदा किया कि बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ देशव्यापी 'भारत यात्रा' का थीम सांग बना. इस थीम सांग के कंटेंट, भाव, भाषा और संगीत ने भारत यात्रा का माहौल बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखा. कोई भी बोल संगीत में जब ढलता है, तो वह लोगों को सोते से जगाने का काम करता है. संगीत में वह ताकत है, जो मुर्दों को भी जगा दे. दरअसल यह ताकत सत्‍यार्थी की क्रांतिधर्मी कविताओं की है.

- पंकज चौधरी, युवा कवि और समीक्षक

 

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