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पुण्‍यतिथि विशेषः यदि होता किन्नर नरेश मैं वाले कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्‍वरी की याद

हिंदी प्रदेश का बच्‍चा-बच्‍चा जिस एक कवि को सबसे ज्‍यादा पढ़ता-सुनता और पसंद करता आया है उनमें निश्चय ही द्वारिका प्रसाद माहेश्‍वरी का नाम भी शामिल है. साहित्य आज तक के लिए आज पुण्‍यतिथि पर याद कर रहे हैं उन पर पुस्‍तक लिखने, उनकी रचनावली का संपादन करने वाले डॉ ओम निश्‍चल

बाल कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी बाल कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हिंदी प्रदेश का बच्‍चा-बच्‍चा जिस एक कवि को सबसे ज्‍यादा पढ़ता-सुनता और पसंद करता आया है उनमें निश्चय ही द्वारिका प्रसाद माहेश्‍वरी का नाम भी शामिल है. बच्‍चों के इस लोकप्रिय कवि व साहित्‍य अध्‍येता को साहित्य आज तक के लिए आज पुण्‍यतिथि पर याद कर रहे हैं उन पर पुस्‍तक लिखने, उनकी रचनावली का संपादन करने वाले डॉ ओम निश्‍चल.

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आज भी गांवों में किसी गली कूचे से गुजरिये, तो कोई न कोई बच्चा़ उनकी कविता गाता गुनगुनाता हुआ मिलेगा. किसी अनजान व्यक्ति को उनका बालगीत सुना कर देखिए वह अतीत में लौट जाएगा. 'यदि होता किन्नर नरेश मैं राजमहल में रहता, सोने का सिंहासन होता सिर पर मुकुट चमकता...', 'सूरज निकला चिड़िया बोलीं, कलियों ने भी आंखें खोलीं' या 'वीर तुम बढ़े चलो, धीरे तुम बढ़े चलो, सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो...' जैसे कितने ही गीत हैं जिन्हें कम से कम तीन पीढ़ियों ने बचपन में पढा और गुनगुनाया है. एक वक्त था जब बच्चों के लिए अच्छे  प्रार्थनागीत तक नहीं मिलते थे. आजादी की लड़ाई के लिए प्रयाण गीत नहीं मिलते थे. खादी पर, चरखे पर, झंडे पर, सत्याग्रह पर, राष्ट्रीय भावना पर गीतों की कमी थी. माहेश्वरी जी ने श्या‍मलाल गुप्त पार्षद, सोहनलाल द्विवेदी, निरंकार देव सेवक, हरिकृष्ण देवसरे व डॉ श्रीप्रसाद आदि के साथ मिल कर ऐसे गीतों की कमी पूरी की. बेसिक शिक्षा परिषद व शिक्षा विभाग से जुड़े होने के नाते द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी ने यह बीड़ा उठाया कि 4 से 14 साल के बच्चों के लिए ऐसे गीत लिखे जाएं जो उनमें संस्कार पैदा करें साथ ही वे छंद व कथ्य की दृष्टि से उत्तम हों. उन्होंने अपने समय के श्रेष्ठा कवियों की रचनाएं पाठ्यक्रम में रखवाईं ताकि बच्चों का मानसिक स्तर उन्नत हो. यद्यपि उन्होंने प्रौढ़ों के लिए भी कई काव्य-कृतियां लिखीं किन्तु उनका बाल साहित्यिकार ही प्रमुखता से जाना पहचाना गया.

माहेश्वरी जी की कोई 40 से ज्यादा बाल पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें बालगीत, बाल कथागीत, गीत, कविताओं व संस्मरण आदि की पुस्तकें हैं. साक्षरता से जुड़ी भी उनकी कई पुस्तकें हैं जिन्होंने साक्षरता के प्रसार में अहम भूमिका निभाई है. 'बाल गीतायन' उनके बालगीतों का एक बेहतर चयन कहा जा सकता है, जो 80 के दशक में बेहतरीन आकल्पन के साथ प्रकाशित हुआ था. उन पर इन पंक्‍तियों के लेखक ने 'द्वारिका प्रसाद माहेश्‍वरी: सृजन और मूल्‍यांकन' शीर्षक पुस्‍तक लिखी है तथा उनकी रचनावली भी संपादित की है, जिसके लोकार्पण के अवसर पर राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा व माहेश्‍वरी जी जैसे दो महनीय पुरुषों को देख कर लगता था, दो गांधीवादी मूल्यों के व्यक्ति आमने-सामने हैं. कभी नागरी प्रचारिणी सभा से जुड़े रहे डॉ शंकर दयाल शर्मा ने आगरा में हिंदी की स्थिति पर उनसे बड़ी आत्मीयता से बाते की थीं.

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जब राष्ट्रकवि ने की उनकी कविताओं की सराहना

माहेश्वरी जी की बाल कविताओं के साथ यह सुखद संयोग रहा है कि जितनी अच्छी उनकी कविताएं होती थी, उतना ही सुंदर तथा भव्य उनकी पुस्तकों की सज्जा होती थी, जिन्हें देखकर कोई भी पाठक सहज ही आकॄष्ट हो उठे. सन् 59 की बात है. राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी ने कानपुर में माहेश्वरी जी की पुस्तक 'बढ़े चलो' का नवीन संस्करण खरीदा तथा उसे देख कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का मोह वह संवरण न कर सके. उन्होंने लिखा था, ''प्रिय बंधु, कल कानपुर में नई पुस्तकों को देखते हुए बढ़े चलो पुस्तक ले आया. उसके नवीन प्रकाशन अलंकरण के कारण जब मैंने देखा कि ये कविताएं तो आपकी लिखी हुई हैं, तब मुझे बड़ी ही प्रसन्नता हुई. मैं जिस रूप में आपकी कॄति को देखना चाहता था, उस साकार सपने को देख कर किसे आनन्द न होगा." अपने पत्र में उन्होंने माहेश्वरी जी के किसी काव्‍यपाठ की भी बड़ी आत्मीयता से सराहना की थी. लिखा था, "और आज पत्र लिखते समय मुझे प्रयाग से प्रसारित उस कवि गोष्ठी का स्मरण हो आया, जिसमें आपकी आत्मविभोर करने वाली कविता मुझे ही नहीं, सभी श्रोताओं को सुनने को मिली. आप सुंदर कविता लिखते ही नहीं, पढ़ते भी हैं. सुकंठ हैं, यह तो मुझे उसी दिन जानने को मिला. आज मेरी बड़ी इच्छा हो रही है कि कभी एकांत में बैठ कर आपकी एक नहीं, अनेक प्राणोन्मादिनी रचनाएं सुनूं और आत्मविस्मॄति की समाधि का सुख प्राप्त करूँ.''

उनके सुमधुर काव्यपाठ की प्रशंसा पंडित सोहनलाल द्विवेदी ने अकारण नहीं की थी. उन दिनों समाज में कवि सम्मेलनों की बड़ी प्रतिष्ठा थी. बड़े-बड़े कवि इन सम्मेलनों में काव्‍यपाठ करने जाते थे. जनता बड़े चाव से इनको सुनती थी. शिवमंगल सिंह सुमन, विश्वम्भर मानव, रूप नारायण त्रिपाठी, श्यामनारायण पांडेय, हरिवंश राय बच्चन, रामेश्वर शुक़्ल अंचल, सुमित्रानंदन पंत, मैथिलीशरण गुप्त आदि कवि सम्मेलनों की शोभा होते  थे. माहेश्वरी जी भी मंचों पर बराबर जाते रहे तथा उन्होंने श्रोताओं से भूरि भूरि सराहना पाई. एक बार वे राजापुर के एक कवि सम्मेलन में गए. विश्वम्भर मानव, पं. श्याम नारायण पाण्डेय तथा अन्य कई गणमान्य कवि मंच पर मौजूद थे. माहेश्वरी जी ने कविता सुनाई- मैं लिखूँगा गीत/ तुम गाना अमर हो जाएंगे हम. श्रोताओं ने कविता बड़े ध्यान से सुनी और उसे खूब सराहा. जब वह इलाहाबाद में रहते थे, एक दिन उन्होंने देखा, उनके घर की ओर अज्ञेय जी चले आ रहे हैं. माहेश्वरी जी ने नमस्कार किया तथा कहा, 'अरे आप!' वे बोले, 'आपके पास ही आया था. हम शरद पूर्णमासी को एक गोष्ठी आयोजित कर रहे हैं, जिसमें आपको अपनी कविताएं पढ़नी हैं. बडी सिलेक़्ट गोष्ठी है.' माहेश्वरी जी उस गोष्ठी में शामिल हुए. इसमें इलाहाबाद के चुनिंदा लोग थे. इलाहाबाद में ही माहेश्वरी जी ने 'गुंजन' नामक संस्था भी बनाई, जिसकी गोष्ठियाँ हिंदी साहित्य सम्मेलन के कक्ष में समय-समय पर होती रहती थीं. उन्हें इस बात का संतोष था कि उन्होंने विभिन्न वय क्रम के बालकों की दृष्टि से गीतों की रचना की तथा वे बालकों द्वारा आत्मीयता से ग्रहण किए गए.
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उनके गीत के लिए एक अनूठी वसीयत

बालगीत के क्षेत्र में उन्होंने प्रभूत कार्य किया है. आजादी के बाद गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन के प्रभाव में उनका पहला बालगीत संग्रह 'कातो और गाओ' 1949 में प्रकाशित हुआ. कातो और गाओ  के बाद प्रकाशित उनके बालगीतों की एक लंबी श्रॄंखला है- लहरें, बढ़े चलो, बुद्धि बड़ी या बल, अपने काम से काम, माखन मिश्री, हाथी घोड़ा पालकी , सोने की कुल्हाड़ी, अंजन खंजन, सोच समझ कर दोस्ती करो, सूरज-सा चमकूँ मैं, हम सब सुमन एक उपवन के, सतरंगा फुल, प्यारे गुब्बारे, हाथी आता झूम के, बाल गीतायन, आई रेल आई रेल, सीढ़ी सीढ़ी चढ़ते हैं, हम हैं सूरज चाँद सितारे, जल्दी सोना जल्दी जगना, मेरा वंदन है, बगुला कुशल मछुआ, नीम और गिलहरी, चाँदी की डोरी, ना-मौसी-ना, चरखे और चूहे, धूप और धनुष. इसके अतिरिक़्त श्रम के सुमन, बाल रामायण तथा शेर भी डर गया कथा-कहानी की पुस्तकें हैं.

माहेश्वरी जी को उनके साहित्यिक अवदान के लिए अनेक पुरस्कार मिले. वर्ष 1977 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा उन्हें बाल साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार प्रदान किया गया. यह पुरस्कार तथा ताम्रपत्र उन्होंने तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई से ग्रहण किया. 1992 में उन्हें पुनः उ.प्र. हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा बाल साहित्य के क्षेत्र में सर्वोच्च पुरस्कार बाल साहित्य भारती से सम्मानित किया गया. इन सम्मानों और पुरस्कारों के बावजूद वे कभी इसके मुखापेक्षी नहीं रहे. उनके अनेक गीतों के मुखड़े जन जागरण और सांप्रदायिक सद्भाव के विज्ञापन के रूप में प्रसारित किए गए और सराहे गए हैं. उनके बालगीत की पहली पंक्ति 'हम सब सुमन एक उपवन के एक समय उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कौमी एकता का बोध जगाने वाली विज्ञापन पंक्ति के रूप में इस्तेमाल किया गया. इस गीत की महत्ता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि कानपुर के एक मराठी विद्वान आचार्य श्रीकृष्ण विनायक फड़के ने अपनी वसीयत में यह इच्छा व्यक्त की थी कि लोग उनकी शवयात्रा में जाएं तो राम नाम सत्य है की बजाय माहेश्वरी जी के गीत 'हम सब सुमन एक उपवन के' का उच्चारण करें.

कहना न होगा कि बाल साहित्य का आयाम आज काफी व्यांपक है. तमाम विधाओं के बाल रचनाएं हो रही हैं तथापि भारत के कोने कोने के बच्चे जिस एक कवि को उसके बालगीतों से जानते हैं वह द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी हैं. वे बच्चों के गांधी थे. आगरा में उनका नाम आज भी लोग आदर से लेते हैं. उनका कमरा, उनकी डायरी, कलम, किताबें, पांडुलिपियां सब एक कमरे में डॉ विनोद माहेश्वरी ने सुरक्षित रखा है जहां बाल साहित्य पर शोध करने वाले आते रहते हैं. कुछ साल पहले राष्ट्रपति भवन के एक कार्यक्रम में गायिका शुभा मुद्गल ने उनका गीत: इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है- गाया था. उनका गीत 'हम सब सुमन एक उपवन के' तो कितने ही राज्यों  में एकता का एक सूत्र बन गया है. लिखने को आज भी हजारो लोग बच्चों के लिए लिख रहे हैं पर माहेश्वरी जी के गीत आज भी चार-चार पीढ़ियों की स्मृति में तरोताजा हैं.

 

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