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मुझे दुख है मैंने अपनी धरती छोड़ी...कवि विजेंद्र की याद

'ऋतु का पहला फूल' के बाद विजेंद्र के कवित्व की सुगंध राजस्थान तक सीमित न रही बल्कि वे हिंदी जगत की मुख्य धारा के सम्मानित कवि माने जाने लगे.

कवि, आलोचक, संपादक विजेंद्र [फाइल फोटो] कवि, आलोचक, संपादक विजेंद्र [फाइल फोटो]

''दीप शिखा जगती है भावों की,
प्रकाश अविरल होता है
अंदर छिपा कहीं सलोना शिशु होता है.''
- यह अंश कविवर विजेंद्र के सानेट संग्रह 'उदित क्षितिज पर' का है. कितनी सहजता से उन्होंने रचना प्रक्रिया की बात की है कि कैसे भावों की दीपशिखा के जलते ही उसका अविरल प्रकाश चित्त में फैल जाता है जहां कहीं एक सलोना शिशु छिपा होता है. ऐसे सरल सलोने चित्त और निरवधि काल के उदगाता कवि विजेंद्र नहीं रहे. इसके दो दिन पहले उनकी सहधर्मिणी नहीं रहीं. एक-एक कर हिंदी के बड़े लेखक जिस तरह विदा होते जा रहे हैं, सरस्वती का मंदिर जैसे सूना होता जा रहा है.

याद आता है, उनकी पुस्तक 'ऋतु का पहला फूल' के प्रकाशन पर कुछ समीक्षात्‍मक लिख कर उन्हें भेजा तो उन्हें काफी पंसद आया. वह कहीं छपा भी. बाद के दिनों में किसी कार्यवश जयपुर जाना हुआ तो उनके वैशाली नगर स्थित निवास पर जाने का सुयोग मिला. इससे पहले मैं राजस्थान के केवल जयसिंह नीरज, ऋतुराज और हेमंत शेष के कवि व्यक्तित्व से परिचित था. घर में स्थापित साहित्य और साहित्येतर विधाओं के समृद्ध पुस्तकालय में वे मिले तो बहुत प्रसन्न् हुए. 'ओर'  में लिखने का आग्रह किया. इसी सिलसिले में लीलाधर जगूड़ी के लंबी कविताओं के चयन 'महाकाव्य के बिना' पर एक आलेख 'कविता का अनुभव बनते जीवनानुभव' उन्हें भेज चुका था जो उन्हें काफी पसंद आया था, जिसमें जगूड़ी के नैरेटिव के विस्तार पर हल्की सी आलोचना भी थी. इसके बाद मुझे भेजे एक पोस्टकार्ड में उन्होंने एक रूपरेखा प्रस्तावित की कि हिंदी के कुछ कवियों पर मैं धारावाही लिखूं और इस क्रम में उन्होंने कुछ नाम भी सुझाए थे. यद्यपि वह सूची मुझे किन्हीं  कारणों से समुचित न जान पड़ी और मैंने वह क्रम स्थगित कर दिया. किन्तु बहुत सालों तक वे 'ओर' और 'कृति ओर' दोनों भिजवाते रहे और मेरी आलोचना- समीक्षा के प्रति आशावान बने रहे जिस तरह मैं उनके प्रति श्रद्धावान.
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विरल जीवन द्रव्य के कवि
जिन दिनों मैं बनारस में था और ज्ञानेन्द्रपति के साथ आए-दिन बैठकी हुआ करती थी, उनसे हुई मेरी एक लंबी बातचीत 'पहल' के 52वें अंक में प्रकाशित हुई थी जिसकी अनुगूंज काफी दिन रही. खुद ज्ञानरंजन को यह बातचीत काफी पसंद आई थी. इस बातचीत में ज्ञानेन्द्रेपति ने बहुत बेबाकी से अपने समकालीन कवियों व वरिष्ठ कवियों के वैशिष्ट्य और सीमाओं पर बातचीत की थी. उन्होंने विजेंद्र को बहुत महत्त्व से हिंदी कवियों के मध्य रेखांकित किया था तथा कहा था कि विजेंद्र की कविताओं में विरल जीवन द्रव्य है. केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और नागार्जुन की काव्य धारा के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में परिगणित करते हुए उन्होंने विजेंद्र को समकालीन कविता का एक ऐसा कवि माना था जिनके यहां जीवन यथार्थ की बहुवस्तुस्पर्शिता है. यद्यपि इस समय तक उनके कई संग्रह आ चुके थे, त्रास, ये आकृतियां तुम्हारी, चैत की लाल टहनी, उठे गूमड़े नीले तथा धरती कामधेनु सी प्यारी आदि. किन्तु् पंचशील प्रकाशन जयपुर से 'ऋतु का पहला फूल' प्रकाशित होते ही विशेष ध्यानाकर्षण का केंद्र बना. शायद इसके शीर्षक में ही कुछ रमणीयार्थ प्रतिपादक तत्व थे इसलिए और इस वजह से भी कि यह वास्तव में अब के उनके काव्य-संसार का एक विशद प्रक्षेपण और प्रदर्शन था. कुछ छोटी मझोली और कुछ लंबी कविताओं के इस संकलन में वे कविता के उन मुहावरों से अलग सा रचते दिखते हैं जो समकालीन कविता के स्थायी ढर्रे से अलग राह पर चलता दीखता है.

'ऋतु का पहला फूल' भले ही आद्योपांत किसी बसंत की आभा से विरचित न हो किन्तु इस संग्रह को चर्चा मिली और इस पर उन्हें बिड़ला फाउंडेशन का बिहारी पुरस्कार प्रदान किया गया. इसके बाद उनके कवित्व की सुगंध राजस्थान तक सीमित न रही बल्कि हिंदी जगत की मुख्य धारा के वे सम्मानित कवि माने जाने लगे तथा 'मीरा पुरस्कार' व 'पहल सम्मान' से  नवाजे गए. उनके व्यक्तित्व का एक और पहलू था 'ओर' तथा 'कृति ओर' का संपादन प्रकाशन. मूलत: कविता और कविता चर्चा की पत्रिका 'ओर' वे अपने निजी संसाधनों से निकालते रहे तथा पंजीकरण के बाद यह 'कृति ओर' के रूप में छपनी शुरू हुई. अनेक अंकों तक वे ही इसके संपादक रहे फिर उन्होंने इसकी बागडोर अन्य के हाथ में सौंपी. 'ओर' तथा 'कृति ओर' की भूमिका कविता के इतिहास में रेखांकित करने योग्य है क्योंकि इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने देश भर के व विशेषत: राजस्थान के अनेक कवियों को मुख्य धारा में लाने का काम किया. यह और बात है कि 'ओर' तथा 'कृति ओर'  के अनेक अंकों में उन्होंने हिंदी के अनेक बड़े कवियों के कविता संसार पर आक्रामक आलोचनाएं, समीक्षाएं छापीं जिसकी व्यापक प्रतिक्रिया भी हुई. किन्तु इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ कि वे हिंदी लेखकों के एक बड़े समूह से कटते गए व उनकी उपेक्षा का पात्र भी बनते गए. पहल सम्मान या बिहारी सम्मान के बाद लगभग छत्तीस सालों में उनकी किसी पुस्तक पर कोई प्रतिष्ठित पुरस्कार न मिला. हाल के कुछ वर्षों में वे जयपुर छोड़ कर दिल्ली एनसीआर में रहने लगे थे तथा कविता के साथ-साथ पेंटिंग भी करते थे. उनकी अनेक चित्रकृतियां उनके और कुछ अन्य लेखकों की काव्यकृतियों के कवर के रूप में प्रकाशित हुई हैं तथा एकाधिक संग्रह में उनकी कविताएं और चित्रकृतियां दोनों साथ हैं.

उत्तर प्रदेश के बदायूं के धर्मपुर गांव में 1935 में जन्मे विजेन्द्र की प्रारंभिक तालीम उर्दू फारसी के विद्वान मौलवी रफीक अहमद के सान्‍निध्‍य में हुई तथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एमए किया. कुछ दिनों मुकुंदगढ़ के महाविद्यालय में पढ़ाने के बाद भरतपुर के श्री जया महाविद्यालय में पढ़ाया और तदनंतर लोहिया कालेज चूरू में उपाचार्य व एनडीबी राजकीय कालेज नोहर में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति हुए. स्वतंत्र लेखन ताउम्र चलता रहा. वे प्रारंभ से ही वामपंथी विचारधारा के अनुयायी रहे तथा अंत तक वामपंथ में आस्थावान बने रहे. यह और बात है कि वामपंथी आलोचना ने भी उनके अवदान को कभी उत्सुकता से नहीं निहारा. त्रास (1966), ये आकृतियाँ तुम्हारी (1980), चैत की लाल टहनी (1982), उठे गूमड़े नीले (1983), धरती कामधेनु से प्यारी (1990), ऋतु का पहला फूल (1994), उदित क्षितिज पर (1996), घना के पाँखी (2000), पहले तुम्हारा खिलना (2004), वसंत के पार (2006), आधी रात के रंग (2006), कवि ने कहा, आँच में तपा कुंदन, पकना ही अखिल है, दूब के तिनके, भीगे डैनों वाला गरूड़ (2010) कठफूला बास, बनते मिटते पाव रेत में, बेघर का बना देश (2014), मैंने देखा है पृथ्वी को रोते (2014), ढल रहा है दिन (2015), लोहा ही सच है (2015) इत्यादि उनके प्रकाशित संग्रह हैं तथा अंत तक वे रचना-सक्रिय बने हुए थे. कविता के सौंदर्यशास्त्र पर भी उनका काम मानक किस्म का रहा है. 'विश्‍व के लोकधर्मी कवि', 'कविता और मेरा समय', 'सौंदर्यशास्त्र: भारतीय चित्त और कविता', 'सौंदर्यशास्त्र के नए क्षितिज', 'सौन्दर्य-शास्त्र प्रश्न और जिज्ञासाएं' के अलावा उन्होंने डायरी लेखन- कवि की अंतर्यात्रा, धरती के अदृश्य दृश्य, सतह के नीचे, अनजानी पगडंडिया-1 एवं अनजानी पगडंडिया भाग 2 भी किया. इसके अलावा विजेंद्र ने दो काव्‍यनाटक भी लिखे हैं --अग्‍निपुरुष और क्रौंच वध.

विजेंद्र; निराला, त्रिलोचन, नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा में आने वाले कवि हैं- वस्तुनिष्ठता के साथ अपनी काव्यात्मकता का निर्वहन करते हुए. एक लंबे अरसे तक उन्होंने कविता को लोक से जोड़ने के लिए मुहिम चलाई. त्रिलोचन ने जिस जनपदीयता की बात अपनी कविता में की है उसे काफी हद से तक अपनाने की चेष्टा विजेंद्र में दिखती है तथा शहरातीबोध से उनकी पटरी भी नहीं बैठती. हिंदी कविता बेशक वाम विचारधारा के प्रभाव में रही है पर वाम विचारणा से अलग कवियों का भी एक ऐसा समृद्ध संसार है जिसे हिसाब में लिए बिना समकालीन हिंदी कविता का इतिहास नहीं लिखा जा सकता. विजेंद्र जन्मे तो उत्तर प्रदेश में पर उनकी भाषा में यहां के लोक का असर कम दीखता है. हां, राजस्थान के परिवेश, प्रकृति और जीवन व्यवहार का अंकन उनकी कविताओं में बखूबी मिलता है जो संभवत: राजस्थान में अरसे तक रहने का असर है.
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मध्य वर्गीय जीवन के कवि
विजेन्द्र की कविता में मध्यवर्गीय जीवन शैली की आभा दिखती है. वे अपने काव्य में लोक के शब्दों को बड़े चाव से ले आते हैं, और कुदरत से अपने को बहुत प्रतिकृत महसूस करते हैं. 'घना के पाखी', 'पहले तुम्हारा खिलना' व 'ऋतु का पहला फूल' उनके अच्छे संग्रह हैं, जो अलग मिजाज के हैं. वे कविता कसौटियों पर भी बहुधा बात करते रहे हैं तथा पाश्चात्य कसौटियों का बहुधा ध्यान रखने वाले कवियों में हैं. वे लोक की प्रवृत्तियों के उन्मेष के लिए सदैव सजग दिखते हैं किन्तु उनका वह लोक हिंदी आलोचना में सहज ग्राह्य नहीं हुआ. हालांकि अपने वक्त के यथार्थ को वे बहुविध व्यक्त करने का यत्न करते हैं तथापि कहीं न कहीं वे न केवल हिंदी के समकालीन कवियों से अलग थलग दिखते हैं. उनकी एक कविता का अंश ऐसा ही कुछ बताता है-

जो रास्ते थे ही नहीं / मैं उन ही पर /बराबर चलता रहा
बाद में लगा वे रास्ते ही हैं / जो वनों ने ढँक लिए थे
ओह ! वे रास्ते ही हैं / कहाँ, किधर, कैसे —
वे किस मंज़िल तक पहुँचेंगे / नहीं जानता
उनकी कविताओं में प्रेम की भी जो यत्र-तत्र आभा दिखती रही है, वह भी प्रचलित प्रेम कविताओं के संसार से अलग दिखता है. उसका अंत:संसार भी कितना विवर्ण मालूम पड़ता है-
तुम शायद नहीं जानती / मौसमों ने हमारे प्यार से
जो अपने डैने रंगे थे /वे अब धुल चुके हैं
यह अभी भी नहीं समझ पाया /यह कील सी क्या चुभ रही है
दर्द मुझे ही सहना है .
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सानेट की छंद-सिद्धि
विजेंद्र ने त्रिलोचन की राह पर चलते हुए सानेटों की रचना की तथा उसमें आत्मानुभूतियों के भाव संसार को सींचा और पल्लवित किया है. यह सच है कि जो सिद्धि और प्रसिद्धि त्रिलोचन को उनके सानेटों से मिली- 'शब्द', 'उस जनपद का कवि हूँ' और 'दिगंत' के सानेट चर्चा में आए तथा उसमें त्रिलोचन का परंपरागत काव्यावगाहन दिखता है. यानी कवि परंपरा से चली आती अर्थच्छवियों को सानेट की अंतर्वस्तु में सहेजना, जिसमें त्रिलोचन सफल हुए. उनकी अवध की पृष्ठभूमि भी संभवत: इस बात में सहायक रही है कि वे तुलसी की भाषाई लीक व मुहावरे पर चलते हुए कुछ अद्वितीय सा लिख रच सकें जो उन्होंने किया भी. उस जनपद का कवि हूँ जो रूखा दूखा है, या तुलसी बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी, या मैं उन सबका कवि हूं जिनकी सांसों को आराम नहीं था- सरीखी काव्य पंक्तियां बहुधा उद्धृत की जाती रही हैं. शायद इसी से इस पाश्चात्य काव्य रूप से आकृष्ट होकर विजेंद्र ने भी सानेट लिखे जो उनके संग्रह 'उदित क्षितिज पर' में शामिल हैं. इन सानेटों में वैसा ही संसार दिखाई देता है जैसा स्फुट कविताओं में, बस एक निर्धारित छंद फ्रेम के अलावा. एक फ्रेम में उपनिबद्ध होने के बावजूद विजेंद्र के चौदह पंक्तियों के ये सानेट हमारे जीवन जगत के सुख दुख, प्रेम, विछोह, आशा, निराशा, जिजीविषा, और मानवीय अभिलाषाओं का निदर्शन करते हैं.

विजेंद्र का हर सानेट जीवन संसार और जीवनानुभवों की कोई न कोई बड़ी बात कहता है. वह कवि की अंत: अनुभूतियों के गवाक्ष भी खोलता है. उसका कहना है : कवि कर्म निभाना बहुत कठिन होता है; नहीं सीख पाया मैं कहना ठकुर सुहाती;  नहीं कहा जाता वह जिसको मन करता है; जो धरती को चीर फाड़ कर अन्न उगाते / गहरे स्पंदन सुन कर लोहा दहकाते; तुम हो मेरा जीवन- अर्थ भरो गति छंदों में/ कविता का छोर-सागर कहां बंधा फंदों में; कठिन समय है मन उदास है; नेह तुम्हारा पकी फसल सा/ मुझमें दीपित अन्न सकल सा.  वे इस बात पर चिंतित होते हैं कि- नहीं रोक पाया नरमेध हो रहा/ धरती पर हर पल तो कायर हूं / मैं डूब रही मानवता/ शायर हूं. उनके भीतर की आशावादी मनुष्यता इस बात पर अडिग दिखती है कि:
 
घनी उदासी मन में गहरी बैठी- फिर भी
जीने की लहर कौंधती- इच्छा नित बलवती बनी है. (उदित क्षितिज पर, पृष्ठ 49)

उनके कविजन्य सरोकारों के कुछ अन्य उदाहरण-

एकाकीपन शाप नहीं होता है
रचा गया मन सरसिज होता है (वही, पृष्ठ 53)

शीत लहर चलती है पूरे उत्तर भारत में
ठिठुर रहे जन- जिनके बसन नहीं है तन पर (वही, पृष्ठ 66 )

अपने सानेटों में वे निज के संदर्भों का उल्‍लेख भी करते हैं. ये बातें जैसे वे सामान्य संदर्भो और बोलचाल के लहजे में करते हैं पर इन्हें हम वक्तव्य‍ की श्रेणी में नहीं रख सकते. इनके रचाव में सघनता है. यह तुकों का खेल भर नहीं है. अरथ अमित अति आखर थोरे -जैसा तुलसी ने कहा है एक निश्चित छंद-सीमा में कवि को अपरिमित अर्थ भरना होता है और विजेंद्र ने यहां आत्मानुभूति के गवाक्ष भी खोले हैं तथा जीवनानुभवों का संसार भी सामने रखा है. गर्भवती बेटी की सूर्यप्रभा दीप्ति और हेमलता व तन्वंगी कोमल काया का चित्रण उन्होंने किया है. हिंदी जगत में अपनी उपेक्षा का उन्हें भान था इसलिए एक सानेट में ऐसा भी लिखा उन्होंने- ''नहीं घास डालते मुझको जो भद्र बने हैं/ हर पल अपमानित जीता अंतर्विरोध घने हैं.'' अपनी सहधर्मिणी के चिर सान्निध्य के लिए भी उन्होंने एक सानेट में कामना करते हुए लिखा कि-

जब तक जीवित हैं साथ रहें हम दोनों
धाराओं से सतत प्रवाहित पूरक हों
एक दूसरे के, पृथ्वीं दोआब सिंचित हों
उर्वर मिट्टी हों कण से कण जुड़ कर कोनों तक गतिमय हों.

यानी जीवन की पूरी गतिमयता को विजेंद्र ने अपने सानेटों के स्थापत्य में जगह देने का भरसक यत्न किया. हालांकि वे बाद में सानेट विधा को छोड़ कर मुख्य धारा की कविता में ही रमे जमे रहे किन्तु सानेटों में भी उनकी अभिव्यक्ति ठीकठाक प्रभावी नही है.
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कवि परंपरा में विजेंद्र
विजेंद्र अपनी कवि परंपरा के वाहक कवि हैं. यानी निराला, मुक्ति्बोध, त्रिलोचन, नागार्जुन व केदारनाथ अग्रवाल की काव्य परंपरा के कवि. विजेंद्र यों तो 1966 में 'त्रास' के प्रकाशन के साथ ही कविता की पायदान पर अपने सधे कदम रख चुके थे किन्तु उनके कवि जीवन का पहला बड़ा मोड़ 'ऋतु का पहला फूल' है. यह सच है कि विजेंद्र ने प्रबंध काव्य जैसा फार्मेट नहीं साधा, स्फुट कविताओं में ही रमे जमे रहे किन्तु इस फार्मेट में भी उनका यह संग्रह बहुत ही सारवान है. वे एक उत्तरदायी कवि की तरह अपने सरोकारो व वाम वैचारिकी के साथ सामने आते हैं. कविताओं में वे आम नागरिक के लहजे में ही बोलते बतियाते प्रतीत होते हैं. न तो कविता को शिल्प के चाकचिक्य में उलझाते हैं न उसे कलावादी प्रत्ययों से लुभावना बनाने की कोशिश करते हैं. उनके यहां मिस मालती, बैनी बाबू आदि चरित्र हैं तो खेती किसानी, शीत, घाम, लू-लपट के विपुल चित्रण भी.

'ऋतु का पहला फूल' जो कि उनकी कविता में एक बड़ा मोड़ है, इसकी कविताओं में मिला जुला संसार है. छोटी, कुछ मझोली और कुछ लंबी कविताओं के इस चयन में वे किसी लालित्य के संधान तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि सूख गयी टहनियों की चिंता भी उन्हें सताती है. कवि की दुनिया एक तरफ अपने यथार्थ से टकराती है तो दूसरी तरफ वह स्वप्नदर्शी भी होता है. विजेंद्र ऐसे ही कवि हैं जो इस संकलन की एक कविता में कहते हैं, 'मैं न रहूं -मेरे सपने जीवित हैं/ वे उगेंगे जैसे अंकुरित धान." जैसा कि मैंने कहा, इन कविताओं का अंदाजेबयां आम बोल-चाल वाला है सो कवि सोचता है, कल्पनाएं करता है, वह बदरंग दुनिया देख कर सहमता है, वह जीना चाहता है, वह कुदरत से प्यार करता है, वह चिंतित होता है कि टहनियां उदास क्यों हैं, वह सोचता है किन देवताओं से प्रार्थना करे, वह किसी स्वर्ग की कामना नहीं करता, वह जल के अन्य स्रोतों का संधान करता है, तपते हुए पहाड़ों और दग्ध होती धरती की बात करता है, अकेले पेड़ों और प्यासी धरती के हलक में पानी की अभिलाषा लिए कवि उस करुणाकलित मानवता को बचाने का स्वप्न देखता है जहां एक नया प्रभात खिले, जहां मनुष्य को मरने का भय न हो, जिस मरुभूमि पर उनका लगभग अधिकांश जीवन बीत गया उससे उपजे भूदृश्य, कुदरत और समस्याएं उनकी कविताओं में आते हैं. एक कविता में उनकी चिंता देखिए जहां वे नरमेध को रोकने की बात करते हैं-

मैं किन देवताओं से प्रार्थना करूं
यह नरमेध रुके-
सारी धरती खून से सनी है
सुना है- देवता प्रार्थनाएं सुनते हैं
तो वे सुनें
और दुनिया को सबसे सुंदर कृति को
नष्ट होने से रोकें.

विजेंद्र ने कभी मुहावरेदारी या उद्धरणीयता का रास्ता नहीं अपनाया जैसा धूमिल या जगूड़ी ने. बल्कि उन्होंने सीधा नैरेटिव कविता में साधा है, जो चाकचिक्य में नहीं बल्कि परिस्थितियों के धैर्यपूर्ण विश्लेषण एवं विवेचन में भरोसा करता है. उनका कवि भाषा के स्तर पर भी अलंकरण का अनुगमन नहीं करता बल्कि बहुत साफ लहजे में कहना पसंद करता है, यथा 'जाती हुई सदी' के बारे में कवि कहता है-
धरती असंख्य अंकुरों के गर्भ से
दग्ध है-
मैंने हल चलाते किसान के पास
खड़े होकर सुना
अंधेरे में नन्हें नन्हें हजारों दिल धड़क रहे हैं
...
ओ ढलती सदी---
अब तुम्हारी यात्रा का जोखिम
अपने कंधों पर ले रहा हूं-
अपने पंख समेटो
ये खून से सने वस्त्र  क्षत विक्षत देह
तुम्हें विदा देते मेरे हाथ थरथरा रहे हैं.

कवि का यह कथन गौरतलब है कि ''मैं किसी स्वर्ग की कामना नहीं करता/ मैं इन्हीं खेतों /खलिहानों और नदियों के बीच खड़ा होना चाहता हूं''. ऐसा इसलिए कि मां पहले छोड़ गयीं और पिता बाद में, पर दोनों ने कवि से कहा था कि अपनी धरती को मत भूलना. लेकिन अपनी धरती को कवि छोड़ बैठा जिसका नतीजा हुआ कि वह अब अजनबियों की तरह भटक रहा है. वह अपना दुख व्यक्त करते हुए कहता है कि-
मुझे दुख है
मैंने अपनी धरती छोड़ी
अपनी घास के पोयों को छोड़
यहां आया
हां अब मैं किसी स्वर्ग की कामना नहीं करता.

विजेंद्र की कविता का स्थापत्य विचार और संवेदना से बना है. वह जीवन जगत की चर्या में निमग्न रहते हुए भी अपनी वैचारिकता का दामन नहीं छोड़ती. वे अपने एक वक्तव्य में कहते भी हैं कि केवल विचार से कविता नहीं होती, न निरे भाव से. दोनों का सहज संयोग ही कविता में जीवन सत्य‍ बनता है. (कवि एकादश, पृष्ठ 96 ) वे त्रिलोचन की राह पर चलते हुए कहते हैं कि ''अपने जनपद का होकर ही मैं वैश्विक हो सकता हूं.''  यानी जैसा त्रिलोचन कहते हैं, उस जनपद का कवि हूं जो रूखा दूखा है. वे जिस लोक का स्मरण बार बार करते हैं तथा 'कृति ओर' को भी लोकधर्मी पत्रिका बनाने का यत्न  किया था, उसका अर्थ और आशय भी शायद यही है कि कविता पहले अपने लोक और लोकेल की बात करे जैसे ज्ञानेंद्रपति काशी और गांगेय संस्कृति की धुरी पर रचनारत रहते हुए पूरे वैश्विक यथार्थ और लोक संस्कृति में जन्म लेते बाजारवाद को मूर्त कर देते हैं.

विजेंद्र जिस लोक संस्कृति की बात करते हैं इसका प्रमाण हमें उनकी कविता के सरोकारों में ही खोजना और चिह्नित करना होगा. उनका लोक- करुणाविगलित लोक की तरह कारुण्य का वरण न कर जमीनी सचाइयों का अनावरण है. वह उस भाषा का भी अनुकरण है जो सहज है बोधगम्य है जिसे आम आदमी बोलता है. बस वे यह करते हैं कि इन बातों को एक आख्या न की तरह कविता के गद्य में सहेज लेते हैं. इसमें उद्धरणीयता भले नहीं हो पर उस पूरे जीवन देश और काल का भूगोल और उसकी आत्मा का चित्र हमारे सामने मूर्त हो उठता है, जिसके बिना कविता वायवीय होकर रह जाएगी. वे जानते हैं कि ''वही शब्द होते हैं दीपित जो कवि के मन से फूटे हैं.'' (पहले तुम्हारा खिलना, पृष्ठ 63)
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कला और कविता
विजेंद्र कला प्रेमी कवि हैं. कविता के साथ-साथ उनकी चित्रकारिता भी बोलती है. उनके उत्तर जीवन की उनकी कई काव्यकृतियों में उनके ही चित्र आवरण पर देखे जा सकते हैं. एकाधिक कविता संग्रह तो उनके चित्रों के साथ ही प्रकाशित हुए हैं. उनकी चित्रकृतियां रंगों की एक नई दुनिया निर्मित करती हैं. वे रंगों की भाषा को कविता में भी उतारने की चेष्टा  करते हैं. जैसाकि प्रभाकर श्रोत्रिय कहते हैं, ''विजेंद्र की काव्यभाषा को लेकर हमेशा विवाद रहा है, क्‍योंकि वे काव्य भाषा के सांचे को तोड़ते हैं. उनकी भाषा कथ्य के अनुरूप लोकांचलों की ओर सहज भ्रमण करती है. उसमें नयी लोकोन्मुख संस्कृति की विकसित होती छवियां भी बराबर दिखती हैं. वे कविता के संसार को नया ही नहीं बनातीं. उसमें अपने समय के यथार्थ को भी चित्रित करती हैं. (पहले तुम्हारा खिलना, आवरण से)

वे अपने कवि-पथ पर चलते हुए एक सानेट में सोचते हैं--

सोच रहा हूं: हे कवि, कविता-पथ है बीहड़
अति लंबा, यह पड़ाव है मेरा अधभर-अथक
चलना है पर्वत चट्टानों पर, चाहा भरसक
है, न हो जाऊँ विचलित, बचा रहूँ , हड़बड़.

विजेंद्र की कविता का भूगोल हिंदी जाति की कविता का भूगोल है. वह हमारे सामाजिक यथार्थ, जीवन और वस्तुतनिष्ठ गतिविधियों का भूगोल है जहां, चैत की लाल टहनी है, तो मेवात की धरती का चित्रण भी. उनके जनपद का कृषक है तो कामधेनु से प्यारी धरती भी, अरावली है तो घना के पाखी भी, कच्चे घरों का दैन्य है तो दीपती हुई धरती का आलोक भी. कवि तो वही है जो कविता लिखते समय किसी अनंत में न खोया रहे. वह अपनी कल्पना के पांव जमीन पर भी उतारे. विजेंद्र कल्पना में खेलने वाले कलावादी कवियों में नहीं है. इससे उनकी कविता में कुछ मिसिंग तो अवश्य लगता है पर वह कुछ अलग सा आस्वाद भी देती है. उनकी कविता में श्रमिकों कामगारों किसानों की एक छवि उभरती है. वह शोषण का विरोध करती है और आम आदमी के पक्ष में खड़ी दिखती है. उनकी कविता का व्‍यापक भूगोल यह जताता है कि विजेंद्र को समकालीन कवियों की प्रजाति से अलग कर देखा जाना चाहिए. अफसोस है कि इतने विराट विपुल अर्थसंसार के कवि पर आलोचना ने विशेष ध्यान नहीं दिया. उन पर न ढंग के समीक्षा लेख हैं न सम्यक शोध प्रबंध. स्फुर पुस्तकें भी उनके काव्य संसार पर संभवत: बहुत कम लिखी गयी हैं. 86 वर्ष के उनके कवि जीवन का पटाक्षेप हो चुका है. वे अब इस दुनिया में नहीं रहे किन्तु उनके न रहने पर यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर वे इतना लिख कर भी उपेक्षा का शिकार क्यों रहे और आलोचना में यह समावेशी दृष्टि कब आएगी कि वह जिस 'पोयटिक जस्टिस' की बात कविता में करती है, उसी तुला पर एक कवि के साथ न्याय क्यों नहीं किया. विजेंद्र की स्मृति को आज तक की विनम्र श्रद्धांजलि.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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