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यह समय और नन्दकिशोर आचार्य की कविता 'मरण-वक्तव्य'

कविता हो या सत्य, या कि समाचार, अगर वह चौंकाए तो वह और बेहतर है. नंद किशोर आचार्य की यह कविता समय के ऐतिहासिक चेहरे पर तैरते बोध और इन कालखंड के मनो-चैतन्य में जगते संवेदन तत्त्व का प्रतिफलन है.

वरिष्ठ साहित्यकार नंद किशोर आचार्य वरिष्ठ साहित्यकार नंद किशोर आचार्य

नंदकिशोर आचार्य, एक धीर-गंभीर और नितांत अराजनीतिक कवि. हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ चिन्तक साहित्यकार. मरुधरा की सौम्य लय के साथ कृष्ण की तरह बांसुरी बजाने वाले सात्विक कवि. मेरे इस प्रिय कवि ने सुदर्शन चक्र तो नहीं उठाया; लेकिन इस समय मानो वे सीधे शिव की मुद्रा में आ गए हैं. उन्होंने 'मरण वक्तव्य' शीर्षक से एक नायाब रचना की है, जो समय और शासन की विद्रूपताओं को बहुत ही अलग तरह से आकार देती है! उनका क्रोध इस कविता में सौम्य सात्विकता से निकलकर शासकवर्गीय तंत्र की विद्रूपताओं की गवाही देने उठ खड़ा हुआ है. इस कविता में पीड़ा का सघन आत्मालाप है. यह अनुभव का सत भी है और सत्य भी.

कविता हो या सत्य, या कि समाचार, अगर वह चौंकाए तो वह और बेहतर है. यह कविता समय के ऐतिहासिक चेहरे पर तैरते बोध और इन कालखंड के मनो-चैतन्य में जगते संवेदन तत्त्व का प्रतिफलन है. आचार्य जी ने शासकीय तंत्र की संवेदनहीनता पर गहरा प्रहार किया है और सुंदर अभिव्यक्तियों से अभिभूत करने के बजाय एक निश्छल तरीक़े से यथार्थ को सत्ता के (कृत्रिम रूप से देदीप्यमान) माथे में गुलमेख की तरह जड़ दिया है. अनिवार्य रूप से पठनीय मार्मिक कविता, जो उन्होंने चार जून की रात को ही लिखी है :

मरण-वक्तव्य

     -नन्दकिशोर आचार्य

भाई, नहीं माफ़ करें मी लार्ड
भूल से कह गया भाई
(सुना था भाई भुजा होता है.)
आप तो प्रभु हैं; हाँ, मी लार्ड

हाँ, मी लार्ड,
मैं अपने पूरे होशो-हवास में
दे रहा हूँ - यह मरण-वक्तव्य
हाँ, हाँ, डाइंग डिक्लेरेशन ही -
होश तो तब कुछ गड़बड़ था
जब मैंने भरोसा किया था उन पर
उन्हीं की मेहरबानी ने
अब दुरुस्त कर दिये मेरे होश
                - कृतज्ञ हूँ उनका.

मुझे मालूम है सिरफिरे कुछ
तोहमत लगायेंगे - धन्धा है ये उनका -
कहीं हवा के, कहीं दवा के नहीं होने की
- हत्या कहेंगे वे इसे
कृतज्ञता लेकिन तोहमत नहीं लगाती
जानते हैं आप

हुज़ूर, मेरी मौत तो ख़ुदकुशी है दरअसल
मेरे फेफड़ों का दोष
जब हवा ही हवा है सब ओर
फिर भी साँस नहीं ले सका तो
यह दोष मेरे फेफड़ों का है
अपने धर्म-पालन में
जो ख़ुद ही हो गये नाकाम!

नहीं, दवा को ले कर सब
बेकार है हल्ला
मुझ नाकारा पर अनुत्पादक खर्च!
क्या मतलब?
अच्छा, मिल ही जाती तो
क्या कर पाती दवा -
घिसटना ही जब जीवन है
अर्थ ही नहीं बचा है कुछ जब जीवन में?
आप तो जानते हैं ख़ुद
क्या कर पाती है आपकी फटकार
शर्म ही नहीं बची हो जहाँ!

उनका भी क्या क़ुसूर भला
वे तो लगे ही थे
हवा बाँधने में
अब हवा कोई रोशनी तो नहीं
बँधी पड़ी है जो
नींद अच्छी आती है अन्धेरे में
इसलिए खुली हवा को मेरी साँसों में
घुलना ही था
फेफड़ों ने दिया होता साथ जो मेरा
मेरा भी चौड़ा हो जाता सीना

आप बेवजह परेशान न हों, मी लार्ड
मेरी ख़ुद की गवाही की बिना पर
ख़ुदकुशी ही मान लें इस को
अपने भरोसे का दोषी मैं खुद हूँ

क्या करेंगे जान कर संख्या
मुझ जैसे मृतकों की
और कारणों की तलाश का
अर्थ ही क्या है
जीने के कारणों की जब नहीं
चिन्ता रही कोई

रक्तदाब में गड़बड़ करती है परेशानी
इसलिए भूल जायें मुझे
मेरे जैसे सब को
“आराम बडी चीज़ है
मुँह ढाँप कर सो जायें.”

संपर्कः सुथारों का बड़ी गुवाड, बीकानेर - 334005, मोबाइलः 9413381045

 

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