scorecardresearch
 

हिंदी में नोबेल पुरस्कार विजेता लुईस ग्लिक की 7 उम्दा कविताएं

नोबेल पुरस्कार विजेता लुईस ग्लिक की सात अलग-अलग भावों वाली की बेहतरीन कविताएं- अविश्वसनीय वक्ता, ग्रीष्मकालीन, डूब गए बच्चे, सालगिरह, एक कल्पित कथा, सांध्यचर्या और अक्तूबर-1

नोबेल पुरस्कार विजेता लुईस ग्लिक, IC: AFP नोबेल पुरस्कार विजेता लुईस ग्लिक, IC: AFP

नोबेल पुरस्कार विजेता लुईस ग्लिक की कविताएं सार्वभौम संवेदना और संबंधों के गहन तानेबाने का निर्वचन हैं. उनमें एक गीतात्म‍क आवेग है. उनके अब तक बारह कविता संग्रह छप चुके हैं, जिनमें जीवन, मृत्यु, संबंधहीनता और हताशा के साथ मृत्यु, क्षति, अस्वीकार व विफल संबंध साफ दिखते हैं. प्रकृतिपरक काव्य की रोमानी परंपरा भी उनमें है, तो सच्चाई के प्रति एक विशिष्ट आग्रह और जुनून भी. यहां प्रस्तुत हैं लुईस ग्लिक की कुछ कविताएं, जिनका अनुवाद डॉ ओम निश्चल ने किया है.
***
1.
अविश्वसनीय वक्ता

मेरी बात मत सुनना; क्योंकि मेरा दिल टूट चुका है.
मैं कुछ भी वस्तुनिष्ठ रूप से नहीं देख पाती

मैं खुद को जानती हूं; इसलिए मैंने मनोचिकित्सक की तरह सुनना सीख लिया है.
जब मैं भावुकता में बोलती हूं
तब मैं सबसे कम भरोसेमंद रह जाती हूं.

दरअसल, यह बहुत दुख की बात है, कि जीवन भर, मेरे ज्ञान, भाषाई ताकत और अंतर्दृष्टि के लिए मुझे सराहना मिली है,
पर अंतत: वे सब व्यर्थ गए...

मैं खुद को कभी नहीं देख पाती
अपनी बहन का हाथ पकड़े हुए, सामने की सीढ़ियों पर खड़ी
इसीलिए मैं उसकी बॉंह पर, जहां आस्तीन खत्म होती है, आई खरोंचों का हिसाब नहीं रखती.

खुद की निगाह में, मैं अदृश्य हूं: इसलिए मैं खतरनाक हूं.
निःस्वार्थ लगते हुए लोग मुझे पसंद करते हैं
हम अपंग हैं, झूठे हैं;
हम वही हैं जिन्हें सच्चाई के हक में खड़े होने के लिए बाहर फेंक दिया जाना चाहिए

जब मैं शांत होती हूं, तब सच्चाई उभर कर सामने आती है.
एक निरभ्र आकाश, सफेद रेशे जैसे बादल.
नीचे, एक छोटा सा भूरे रंग का घर, लाल और चटख गुलाबी.

अगर आपको सच्चाई की दरकार है, तो आपको खुद को बंद करना होगा, बड़ी बेटी को
ब्लॉक करें:
क्योंकि जब किसी जीवित इकाई को अपने गहरे क्रियाकलाप में ठेस लगती हो
सारे क्रियाकलाप बदल जाते हैं

इसलिए मुझ पर भरोसा मत करना
क्योंकि चोट खाये दिल का घाव
आखिरकार मन के लिए भी एक घाव है.
***
2.
ग्रीष्मकालीन

हम अपनी पहली खुशी के दिनों को याद करें,
हम कितने मजबूत थे और जुनून से भरे
संकरे बिस्तर पर सारे दिन और सारी रात पड़े हुए
वहीं सोते और खाते हुए. ये गर्मियों के दिन थे. ऐसा लगता था कि सब कुछ तुरंत पक जाएगा
और गर्मी इतनी कि हम पूरी तरह से खुले ही पड़े रहते
कभी-कभी हवा उठती;  खिड़की को छूती हुई दिखती.

लेकिन हम एक तरह से खो गए थे,
क्या आपको ऐसा नहीं लगता था?
बिस्तर एक बेड़े जैसा था; मुझे लगा कि हम एक ऐसी जगह की ओर अपनी कुदरत से दूर जा रहे हैं
जहां हम कुछ नहीं खोजेंगे.
पहले सूरज, फिर चाँद, टुकड़ों में,
विलो से होकर आते पत्थर.
जिन्हें कोई भी देख सकता था.

फिर मंडलियां बंद हो गईं. ठंडी होती गईं धीरे-धीरे रातें;
विलो के लटकते पत्ते
पीले पड़ते गए और गिर गए.
और हम में से प्रत्येक में शुरू हुआ
एक गहरा अलगाव, हालांकि हमने कभी इस बारे में अफसोस के अभाव की बात तक नहीं की,
हम पुन: कलाकार थे,
हम यात्रा पर फिर से रवाना हो सकते थे.
***
3.
डूब गए बच्चे

आप ही देखिए कि वे कोई निर्णय नहीं ले सके
इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि वे डूब जाते
पहले बर्फ उन्हें अंदर ले गई
और फिर, उनके सभी सर्दियों वाले ऊनी स्कार्फ
उनके पीछे तैरते रहे उनके डूबने से लेकर
अंत तक, जब तक कि वे पूरी तरह शांत नहीं हो गए
और तालाब ने उन्हें कई गुना गहरी पकड़ से ऊपर नहीं उठाया
लेकिन मौत उन्हें अलग-अलग तरह से आनी चाहिए,
शुरुआत के इतना करीब.
हालांकि वे हमेशा से थे
दृष्टिहीन और भारहीन.
इसलिये शेष सब स्वप्नमय था, दीपक,
टेबल और उनके शरीरों को ढँकने वाले अच्छे श्वेत वस्त्र भी
फिर भी वे उन नामों को सुनते रहे
जिन नामों से उन्हें पुकारा गया
तालाब पर फिसलते हुए जैसे:
तुम किसके इंतजार में हो
घर आओ, घर आओ, खो जाओ
नीले और स्थायी जल में.
***
4.
सालगिरह

मैंने कहा कि आप झपकी ले सकते हैं
पर इसका अर्थ यह नहीं है
मेरे डिक पर अपने ठंडे पैर रख लें.
कोई आपको सिखाए कि बिस्तर पर कैसा बर्ताव करें
मैं क्या सोचता हूं, यह आपको सोचना चाहिए
फिलहाल आप अपना चरम व्यवहार अपने पास रखें.
देखो आपने क्या किया-
आपने बिल्ली को भगा दिया
लेकिन वहां मुझे तुम्हारे हाथ की जरूरत नहीं थी
मुझे यहां आपका हाथ चाहिए था.
आपको मेरे पैरों पर ध्यान देना चाहिए था.
अगली बार जब आप एक पंद्रह साल के लड़के को देखें,
आपको उसकी तस्वीर उतारनी चाहिए
क्योंकि और भी बहुत कुछ है जहाँ से वे पॉंव आते हैं.
***
5.
एक कल्पित कथा

दो औरतें एक बार एक-से दावे के साथ
बुद्धिमान राजा के चरणों में
आ गिरीं
दो औरतें, लेकिन केवल एक बच्चा.

राजा को पता था
इनमें से कोई एक झूठ बोल रहा है
इसलिए जब उसने कहा कि
इस बच्चे को आधा-आधा काट कर अलग करो
ताकि कोई भी मेरे दरबार से
खाली हाथ नहीं जाए.
और उसने अपनी
तलवार खींच ली

तभी उन दोनों में से एक औरत ने,
अपना हिस्सा त्याग दिया:
यह था
संकेत और सबक.

मान लीजिए
आप अपनी माँ को देखें
दो बेटियों के बीच दो हिस्सों में विभाजित:
तो आप क्या करेंगे
उसे बचाने के लिए
लेकिन अपने को
नष्ट करने को भी तैयार रहते हुए
हालांकि वह खुद जानती होगी
सही बच्चा कौन है,
वही जो सहन नहीं कर सकता
माँ का दो हिस्सों में विभाजित कर दिया जाना.
***
6.
सांध्यचर्या

अपनी सुदीर्घ अनुपस्थिति में, मुझे अनुमति दें
इस पृथ्वी का उपयोग करूँ इस प्रत्याशा के साथ
कि इस निवेश पर कुछ प्रतिफल मिलेगा. मुझे बताना होगा
यदि मेरे काम में विफलता मिले, सिद्धांतत:
टमाटर के पौधे की खेती में.
मुझे लगता है कि मुझे टमाटर उगाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए
या, अगर मैं उत्साहित होता हूं, तो आप
भारी बारिश रोक लें, वे ठंडी रातें भी जो आती हैं
यहां अक्सर, जबकि अन्य इलाकों में
बारहों हफ्ते गर्मियां होती हैं. यह सब
आप पर है: दूसरी ओर,
मैंने कुछ बीज बोए, मैंने पहली शूटिंग देखी
जैसे पंख मिट्टी को चीरता है, और यह मेरा ही दिल था
कि इतनी जल्दी काला धब्बा, टूट गया
जिनके कई गुना वलय बन रहे थे
मुझे शक है कि
हमें समझने के लिए आप के पास दिल है
आप जो मृत और जीवित लोगों के बीच, कोई भेदभाव नहीं करते हैं
वे परिणामत:
पूर्वाभास के लिए प्रतिरक्षात्मक होते हैं,
आप यह भी नहीं जानते होंगे
हम कितना आतंक सहते हैं, चित्तीदार पत्ती,
यहां तक कि अगस्त में, शुरुआती अंधेरे में गिरते हुए मेपल के लाल पत्तों के लिए ;
मैं जिम्मेदार हूं
***
7.
अक्तूबर-1

क्या फिर से सर्दी आ गई, क्या यह फिर ठंड के दिन हैं
फ्रैंक अभी बर्फ पर नहीं फिसल रहा
क्या वह अभी ठीक नहीं हुआ, क्या वसंत के बीज बोए नहीं गए
रात का अंत नहीं हुआ
क्या पिघलती हुई बर्फ से
संकरे नाले में बाढ़ नहीं आई
मेरे शरीर को क्या बचाया नहीं गया
क्या यह सुरक्षित नहीं था
अदृश्य खरोंचें नहीं थीं उस पर
चोट के ऊपर
आतंक और ठंड,
क्या उनका अंत नहीं हुआ, वापस बगीचे नहीं लगाए गए-
मुझे याद है कि पृथ्वी कैसी लगी, लाल और घनी,
कड़ी पंक्तियों में, बीज नहीं बोए गए थे
लताएं दक्षिणी दीवार पर चढ़ी नहीं
मैं आपकी आवाज नहीं सुन सका
क्योंकि हवा रो रही थी, खाली मैदान में सीटी बजाती हुई
मुझे अब कोई परवाह नहीं है
कि यह कैसी ध्वनि आ रही है
उस निरर्थक ध्वनि का वर्णन करने के लिए
मैं कब का चुप हो गया, ऐसा पहली बार कब लगा
ऐसा लगता है कि यह जो भी है उसे नहीं बदल सकता है-
रात का अंत नहीं हुआ, पृथ्वी क्या सुरक्षित नहीं थी
जब यह लगाया गया था,
क्या हमने बीज नहीं बोए
क्या हम पृथ्वी के लिए आवश्यक नहीं थे,
लताओं के लिए आवश्यक न थे,
क्या वे सब काट डाली गईं ?
इन लताओं के लिए.
***
अंग्रेजी से भावांतरण: डॉ ओम निश्चल

# निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि-आलोचक व भाषाविद हैं. तीस से अधिक पुस्तकों के लेखक व हिंदी अकादमी दिल्ली, उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्का‍र, विचारमंच कोलकाता के प्रो कल्याणमल लोढ़ा साहित्य सम्मान एवं जश्ने अदब के शाने हिंदी खिताब से समादृत हैं. संपर्क: जी-/506 ए, दाल मिल रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059. मेल: dromnishchal@gmail.com

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें