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सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, SC बोली- प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं बन रही

सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने उस याचिका को खारिज किया जिसमें एक प्लॉट के लैंड यूज में बदलाव को चुनौती दी गई थी. कोर्ट ने कहा कि वहां कोई प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं बनाई जा रही है.

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट 2022 तक पूरा होने की संभावना है. (फाइल फोटो) सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट 2022 तक पूरा होने की संभावना है. (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट की फिर हरी झंडी
  • लैंड यूज में बदलाव को चुनौती वाली याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट से एक बार फिर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को हरी झंडी मिल गई है. सुप्रीम कोर्ट ने प्लॉट के लैंड यूज में बदलाव को चुनौती देने वाली उस याचिका को खारिज कर दिया, जहां सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत उपराष्ट्रपति के लिए नया आवास बनाया जाएगा. कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि वहां कोई प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं बनाई जा रही है. उस जमीन का इस्तेमाल हमेशा से सरकारी काम के लिए ही किया जाता रहा है.

याचिका में कहा गया था कि वहां उपराष्ट्रपति का आवास बनाया जाएगा जिससे चिल्ड्रन पार्क और हरियाली खत्म हो जाएगी. इस पर कोर्ट ने कहा कि वहां उपराष्ट्रपति का आवास बनाया जा रहा है, जिससे हरियाली होना तय है. इस प्रोजेक्ट को प्राधिकरण ने पहले ही मंजूरी दे दी है. 

जस्टिस एएम खानविलकर ने कहा कि ये नीतिगत मामला है. हर चीज की आलोचना की जा सकती है लेकिन 'रचनात्मक आलोचना' होनी चाहिए. उपराष्ट्रपति का आवास कहीं और कैसे हो सकता है? उस जमीन का इस्तेमाल हमेशा से सरकारी काम के लिए किया जाता रहा है.

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याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि लैंड यूज में बदलाव करना जनहित में नहीं है. इस दलील पर कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा, 'अब हमें आदमी से पूछना पड़ेगा कि उपराष्ट्रपति का आवास कहां बनाना चाहिए?' जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की बेंच ने कहा, 'उपराष्ट्रपति का आवास किसी और जगह कैसे शिफ्ट किया जा सकता है?'

याचिकाकर्ता ने प्लॉट नंबर 1 के लैंड यूज बदले जाने के नोटिफिकेश को चुनौती दी. याचिकाकर्ता राजीव सूरी ने कहा कि इस नोटिफिकेशन के जरिए रिक्रिएशनल (पार्क जैसी खुली जगह) को रेसिडेंशियल (आवासीय) में बदला जा रहा है. इसके जवाब में केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वो जगह कभी आम जनता के लिए थी ही नहीं. वो जमीन 90 सालों से रक्षा मंत्रालय की है और वहां रक्षा मंत्रालय के दफ्तर ही हैं.

केंद्र सरकार ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठाते हुए जुर्माने के साथ याचिका खारिज करने की मांग की थी. इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को भी खारिज कर दिया और याचिका भी खारिज कर दी.

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को सितंबर 2019 में मंजूरी मिली थी. इस प्रोजेक्ट के तहत नई संसद का निर्माण किया जा रहा है, जिसमें 900 से 1200 सांसदों के बैठने की व्यवस्था रहेगी. ये प्रोजेक्ट अगस्त 2022 तक पूरा होने की उम्मीद है. 

इससे पहले भी इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज कर दिया था. 

 

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