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कहानी सेक्स वर्कर की... जिसे दूसरी जिंदगी उसकी बेटी ने दी

By: मानसी मिश्रा

वो जब यहां लाई गई थी तो 13 साल की बच्ची थी, 21 साल बाद वो यहां से भाग निकली तो उसकी वजह उसकी खुद की 9 साल की बच्ची थी. वो भागी क्योंकि वो सम्मान के साथ, सुकून के साथ जीना चाहती है, ये वो दो चीजें हैं जो 21 साल पहले उससे छीन ली गईं और फिर कभी वापस नहीं मिलीं. उसका वजूद मिटा दिया गया. उसकी पहचान के नाम पर उसके नाम एक गाली लिख दी गई. उसे नहीं पता कि अपनी जिस बच्ची के लिए वो जान हथेली पर लेकर भागी है उसका पिता कौन है. लेकिन उसके लिए ये फिलहाल गैरजरूरी सवाल है. उसे चिंता सिर्फ अपनी बेटी के भविष्य की है. ये कहानी दिल्ली की सबसे बदनाम गली जीबी रोड के एक कोठे से भागी मां की है. ये कहानी हम उन्हीं की जुबानी सुनेंगे तो शायद इस पीड़ा को महसूस कर पाएं, और समाज में उनके पुनर्वास के लिए कोई स्पेस बनाने की सोच सकें.

...जैसे कोई मेरा दिल रौंद रहा हो

उस दिन से ज्यादा गर्म दिन दूसरा नहीं था. जैसे किसी ने मेरे गोश्त को भीतर तक झुलसा दिया था. लगा कि जिंदा बच गई हूं तो अब मर जाना चाहिए. धरती से धधकती लपटें तलुओं को जला रही थीं. कुछ पल पहले जो नजारा किसी शादी का लग रहा था, अब शहद पर भिनभिनाती मक्खियों जैसे लोग नजर आ रहे थे. 13 साल की मैं जैसे किसी गर्म तेल की कड़ाही में तड़पने को छोड़ दी गई थी.

कुछ घंटों पहले ब्यूटीपॉर्लर में हुआ मेकअप अब गालों पर आंसुओं की लकीरों से फट गया था. उन लकीरों से मेरा चेहरा कई टुकड़ों में बंटा दिख रहा था. नए कपड़ों से जैसे किसी मुर्दे की सड़ांध आ रही थी. उस कोठे के अंधेरे कमरे में छत पर टंगे पंखे को निहारते मेरी वो रात बीती थी.

मेरी कहानी ऐसे ही मनहूस दिन से शुरू हुई थी. आज कोठे से भागकर आने के बाद भी खत्म होती नहीं दिख रही. अभी भी अक्सर मेरे जेहन में ऐसे ख्याल आते हैं जैसे कोई मेरा दिल रौंद रहा है. दर्द में तड़पती मैं आंखों के सामने पसर गए अंधेरे में खो जाती हूं. जब होश आता है तो बेटी को सीने से चिपका लेती हूं. मैं अपनी नौ साल की बेटी को बचाने की खातिर वहां से भाग निकली हूं.

मैं कर्नाटक के एक शहर में गरीब परिवार में पैदा हुई एक आम लड़की थी. घर में हम सात भाई-बहन थे. पिता मजदूरी करते थे. गुरबत की जिंदगी में 12 साल की उम्र तक सिलाई-कढ़ाई सीख ली थी. 13 साल की उम्र में ख्वाब देखने लगी थी कि मैं सिलाई-कढ़ाई करके कमा सकती हूं. कमाकर अपने घर पैसा लाऊंगी तो खुशियां हमारी चौखट तक भी आ जाएंगी.

हंसमुख, हुनरमंद, खिलंदड़ी मैं अपने मां-बाप की खूबसूरत बेटी थी. गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आंखें और खुले मन से मिलने के कारण हर कोई मेरी तारीफ करता था. लेकिन बदनसीबी का साया जैसे मेरे इंतजार में था. इसी बदनसीबी ने मेरी मुलाकात एक औरत से कराई. वो मेरे इलाके में ही रहती थी. उसने मुझसे इतनी जल्दी बहनापा जोड़ लिया जैसे मुझे सालों से जानती हो. मीठी मीठी बातें, अपनापन मुझे उसके करीब ले आया. उसे मैंने बता डाला कि सिलाई-कढ़ाई आती है, मैं आगे यही काम करूंगी. एक दिन उसने कहा कि तुम इतनी काबिल हो, तुम्हें तो दिल्ली बंबई(अब मुंबई) में होना चाहिए. वहां तुम्हारे हुनर की लोग कद्र करेंगे और पैसा भी अच्छा कमा लोगी. मेरे जेहन में ये बात बैठ गई.

सिर्फ जिंदा रहने की चाहत थी...!

मुझे घर से ज्यादा बाहर जाने की इजाजत नहीं थी, फिर भी मैं उस औरत के साथ चुपचाप घर में बिना बताए दिल्ली आ गई. सोचा कि कमाकर घर लौटूंगी तो सब बहुत खुश होंगे. दिल्ली में कढ़ाई-सिलाई करूंगी. खैर, वो मुझे ट्रेन से दिल्ली ले आई. यहां स्टेशन पहुंचते ही एक दूसरी औरत मिली, जिसे उसने अपनी बहन बताया. वो थी शमीना (बदला हुआ). शमीना हमें स्टेशन लेने आई थी. मन ही मन मैं बहुत खुश थी कि अब मेरी किस्मत बदल जाएगी. स्टेशन से सीधे हम शमीना के घर गए. वहां रात में ठहरे. उसने मेरी आवभगत काफी अच्छे से की थी. फिर अगले दिन अपने साथ वो एक ब्यूटीपार्लर में ले गई जहां मुझे तैयार कराया. मुझे लगा पार्टी फंक्शन में ले जा रही हैं. मैं अच्छे से तैयार हो गई और नए कपड़े भी पहन लिए. लेकिन वो वहां से तैयार करके मुझे जहां ले गई वो एक कोठा था.

बड़ा हॉलनुमा कमरा, जहां तमाम सजी-संवरी लड़कियां थीं, कई कस्टमर थे. मुझे अब भी लग रहा था कि शायद कोई शादी का घर है. लेकिन वहीं मेरा भी कस्टमर था कोई. वो मुझे घूर रहा था. शमीना ने मुझे उस हट्टे कट्टे आदमी के साथ जाने को कहा. मैंने पूछा, दीदी कहां भेज रही हो, उसने कहा- जाओ, जाकर बात कर लो. मैं अंदर गई. कुछ भी पता नहीं था मुझे कि ये क्या हो रहा है. अंदर आते ही कस्टमर मुझपर टूट पड़ा. मेरे कपड़े उतारने लगा. मैं रो रही थी कि ये क्या हो रहा है. मैं बचने लगी तो कस्टमर ने कहा कि कुछ नहीं, कुछ नहीं होगा और उसने मेरे सारे कपड़े उतार दिए. मैंने बचने की कोशिश की लेकिन कमरा चारों तरफ से बंद था. उसकी पकड़ भी बहुत मजबूत थी. मैं बहुत डर रही थी. मुझे लगा जैसे कोई गोश्त का पहाड़ मेरे ऊपर गिर गया है. बाहर बहुत ज्यादा शोर था और कमरे में इससे भी ज्यादा. मैं समझ गई थी कि अब बचने का कोई रास्ता नहीं है. सिर्फ जिंदा रहने की चाहत थी कि किसी तरह जिंदा बच जाऊं. जैसे ही वो शांत हुआ, मुझे छोड़ा तो वहां से मैं रोते-रोते वापस लौटी.

फ्रॉक पहनने वाली लड़की, सलवार-कुर्ता पहनाकर बैठाई जाने लगी

वहां से निकलकर मैंने रोते हुए उन लोगों से मुझे वापस अपने घर भेजने को कहा. लेकिन सबका रवैया एकदम बदल चुका था क्योंकि मैं अब बिक चुकी थी. शमीना ने पहले प्यार से समझाया कि ये कोई बड़ी बात नहीं है. हमारे साथ भी यही हुआ था. जब जिद की तो बहुत तेज आवाज में डांटकर यही कहा कि हम सबके साथ यही हुआ है, हम तो नहीं रोए, अब यहीं रहो, अब कहीं नहीं जा पाओगी. इस तरह 13 साल की उम्र में मैं जीबी रोड के एक कोठे पर बिक चुकी थी. अब मेरी पहचान बदल चुकी थी.

उस पूरी रात नींद मुझसे दूर भागती रही. मेरे चेहरे की दमक कहीं खो गई थी. मैं अपने बचपन के लम्हों को याद कर रही थी. माना कि हम हमेशा से गरीब थे लेकिन हमारे चेहरे पर रौनक रहती थी. मुझे अपने शहर के रंग-बिरंगे फलों और सब्जियों की दुकानें याद आ रही थीं. मेला, सिनेमा, भीड़, भाई-बहनों के चेहरे सबकी याद ने मुझे पूरी रात सोने नहीं दिया. आंसू भी जैसे कम पड़ने लगे थे.

सुबह मेरे लिए नई रौशनी नहीं बल्किं अंधेरा लेकर आई. मेरे लिए अब तो जैसे सुबह होना ही बंद हो गई थी. अब अगली सुबह से मेरे पास कस्टमर भेजे जाने लगे थे. उनकी न उम्र देखी जाती थी, न रंगरूप, न सलीका, सिर्फ पैसे से मेरा शरीर बिकता था. एक दिन में 30-40-50 कई कई कस्टमर आते थे. मुझे बहुत दर्द होता था. ये उम्र खेलने-कूदने की थी और मैं किस दलदल में फंस गई थी. मैं लगातार रोती रहती थी, पर बचकर भागने का रास्ता नहीं था. फ्रॉक पहनने वाली दुबली सी लड़की अब चटकीला सलवार कुर्ता और मेकअप पोतकर बैठाई जाती थी.

इसके बाद ये सिलसिला चल निकला. मैं यहां से कई कोठों पर रही, पहले शमीना मुझे 70 नंबर के कोठे पर ले गई फिर 64 नंबर पर, फिर लाई 56 पर, फिर 56 के नीचे ले आई. कोठे बदलने से भी जिंदगी में कुछ बदलता नहीं था. उल्टा धमकियां, डांट और जुबान खोलने पर थप्पड़ भी लग जाता था. कुछ दिनों बाद वो मुझे पूना भी ले गई. पूना में भी दो-तीन साल कमाया और फिर वापस लौट आई.

तीन अबॉर्शन के बाद मां बनी

मेरा मां बनना, न बनना भी जैसे उसी के हाथ में था. उसने बच्चा कराने से पहले मेरे तीन अबॉर्शन कराए. ऐसा होता था कि कई बार कंडोम के बावजूद गर्भ में बच्चा रुक जाता था. कोई कोई कस्टमर इस कदर बदतमीज होता था कि उसके वहशीपन से कंडोम भी फट जाते थे. इस तरह साल साल में मुझे बच्चा रुक जाता था. एक बार प्रेग्नेंट होने पर मुझे दवा खिलाई. फिर दो बार एबॉर्शन कराया. फिर ऐसा होता था कि जो भी पुलिस वाला रेड के लिए या चेकिंग के लिए आता था, उसकी मेरे पर नजर पड़ती थी. मैं बहुत छोटी लगती थी इसलिए मुझसे जबर्दस्ती बच्चा कराया गया ताकि मैं बड़ी लगूं न कि नाबालिग. शमीना बोली कि बच्चा मैं पाल कर दूंगी, तू बस कर ले. इस तरह मैं मां बन गई.

मुझे पता भी नहीं किसका बच्चा है

मेरे पास पूरे दिन में इतने कस्टमर आते थे और गर्भ निरोधक लेना बंद कर दिया था. बहुत जल्दी ही मैं प्रेग्नेंट हो गई इसलिए मुझे पता तक नहीं, किसका बच्चा है. यहां की जहन्नुम जिंदगी जब मुझे बहुत परेशान करती तो हमेशा सोचती कि आज जाकर शमीना से ये कहूंगी, वो कहूंगी, लेकिन उसके सामने जाती तो एकदम डर के मारे चुप हो जाती. एक-दो बार पिटने के बाद उसके सामने मेरी बोलने की हिम्मत ही नहीं पड़ती थी.

सहेली मेरे मुंह में निवाला देती थी

शुरू-शुरू में जब मैं यहां आई तो बहुत लड़कियां थीं. सबके चेहरे पर एक जैसे भाव थे. कोई किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी. यहां एक ही लड़की थी जो मेरा सपोर्ट करती थी. बाद में वो एक कस्टमर के साथ भाग भी गई थी. होता ये था कि उस दौर में मेरे हालात बहुत बुरे थे. कभी एक ग्राहक निकला तो दूसरा घुसा. दूसरा निकला तो तीसरा घुसा. मैं खाना भी नहीं खा पाती थी. वो ये सब देखती तो मेरी फिक्र करती थी. कैसे बीच-बीच में वो एक-एक निवाला मेरे मुंह में देती थी.

कस्टमर के बीच में मैं अपने पेट तक जैसे-तैसे खाना पहुंचा पाती थी. वैसे तो कोठों में खाने-पीने के लिए एक किचन होता है, जिसमें भैया लोग होते हैं. उस समय तो बहुत सारे भैया लोग थे, लेकिन खाने का वक्त ही नहीं रहता था. इसी कारण शायद आज मेरी नजर भी कमजोर हो गई है. मुझे दूर का साफ दिखाई नहीं पड़ता. जब बच्चा हुआ, उस दौरान भी मुझे राहत नहीं मिली. बच्चे को दूध पिला रही होती तो शमीना आकर कहती कि जाओ ग्राहक आ गया. मैं अपनी कहानी हूबहू तो बता भी नहीं सकती. कई किरदार तो ऐसे हैं जिनके बारे में जिक्र करने पर मेरी जान पर आफत ही बन आएगी.

वो घुटन के पल कभी नहीं भूलेंगे

उस घुटन के बारे में क्या बताऊं, जब कभी कोठे में छापा पड़ता था. यूं तो अक्सर पहले ही छापे का पता चल जाता था. कोई न कोई खबरी बता देता कि 'कोई छोटा सामान है तो हटा दो' कई बार शमीना छोटी लड़कियों को बाहर भेजती थी. लेकिन उनके साथ कोई न कोई होता जो साथ जाता था. जो भी साथ जाती वो हमेशा हाथ पकड़कर रखती थी. टॉयलेट भी जाओ तो हाथ पकड़कर रखती. कहीं भाग नहीं सकते थे. इसके अलावा अचानक छापा पड़ने पर जमीन के नीचे जगह बनी थी जहां लड़कियों को वो लोग छुपा देते थे.

हम कितनी ही देर तक घुटनों के बल झुके बैठे रहते थे. यहां सांस तक लेते नहीं बनती थी, प्यास लगती थी, जमीन के अंदर उस सुरंग में सांस लेने में घुटन होती थी. बेहोश भी हो जाती थी. घुटने मोड़कर कई-कई घंटे बैठना सहनशक्ति से बाहर की बात लगती थी. वहां कभी महिला आयोग के सदस्यों के आने से पहले कह दिया जाता था कि अच्छा-अच्छा ही बोलना, कोई खराब नहीं बोलेगा.

कैसे निकली बाहर

मैंने वहां से भागने का मन बना लिया था. वजह थी मेरी नौ साल की बेटी जो उसकी बहन के यहां पल रही थी. वो अक्सर अब मेरी बेटी के लिए कहने लगी थी कि तू जितना करती है न, अब तेरी बेटी को भी इसी धंधे में डालूंगी. इसमें बुरा क्या हो गया. ये तो होता ही है. अब मेरे भीतर की मां एकदम छटपटा गई थी. मैं दिन-रात रोती थी. अपने साथ जो हुआ उसकी कल्पना बेटी के लिए करके ही कांपने लगती थी. अब मुझे इस बात का डर सताने लगा कि मेरी बच्ची कैसे सेफ रहेगी. तभी मुझे एक रास्ता मिला.

मेरा एक कस्टमर आता था जो बहुत अच्छे से बात करता था. मैंने उसे सब बताया. पूरी स्टोरी सुनाई तो उसने कहा कि इन लोगों से बोलो कि तुम्हें घर भेजे. मेरा बच्चा इसकी बहन के पास था. तो मैंने जाकर कहा कि बच्चे को देखे दो साल हो गए हैं, एक बार मुझे जाने दो. कुछ दिनों बाद लौट आऊंगी. इस पर वो पिघल गई और कहा कि ठीक है 15 दिन में आ जाना. मैं वहां से निकलकर पहले बेटी को लेने पहुंच गई. वहां से बेटी को लेकर घर जाने का कहा और सीधे दिल्ली महिला आयोग आ गई. यहां खुद और बेटी को बचाने की गुहार लगाई.

तुम हमारे लिए मर गई हो

मेरे घरवाले ये सब कुछ नहीं जानते थे. एक बार घर गई तो बोले कि हमें लगा कि तू मर चुकी है. काफी साल बाद गई थी. एक बार तो मुझे पुलिस वाले घर छोड़कर आए थे. घरवालों ने कहा कि हमें लगा कि तुम मर चुकी हो, हमारे घर के राशन कार्ड में भी तुम्हारा नाम नहीं है. शायद वो मन ही मन बहुत कुछ समझ रहे थे. उधर, वो औरत लालच देकर तो कभी धमकाकर बुलाने में लगी थी. उसने कहा कि वापस लौट आओ. मैं तेरी अपने पति से ही शादी करा दूंगी. तू घर में रहना. मेरे बच्चे नहीं होते तो तू कर देना. मैं मजबूरी और लालच में आ गई लेकिन फिर मुझे वापस कोठे पर भेज दिया गया.

इससे पहले भी वहां से एक दो बार भागने का ट्राई किया था. कोई कस्टमर अच्छा मिलता था तो कहता था कि अपनी लाइफ खराब कर रही हो, चलो हमारे साथ. इस पर शमीना हम सबको समझाती कि अगर कस्टमर के बहकावे में आ जाओगी, उसके हिसाब से चलोगी तो बाहर ले जाकर बेच देगा. वो हमें वीडियो दिखाती थी कि देखो कैसे ले गया और बाहर मारकर फेंक दिया. हम डरते थे क्योंकि हम इतना पढ़े-लिखे तो थे नहीं.

कोठे पर मैंने एक गुलाम की तरह जिंदगी जी है. अगर कोई लड़की आती तो हम उसे सपोर्ट नहीं कर सकते. कोई लड़की आती तो हमें डांटा जाता कि तुम्हें क्या मतलब. अपने काम से काम रखो. हमें कपड़े और दवाएं समय पर मिल जाते. कपड़े जो वहां पर बेचने वाले आते हैं, उन्हीं से लेते. फिर जैसे बीमार हो गए तो दवा मंगा के दे दी जाती या अस्पताल ले जाया जाता. कभी बच्चा रुका, अगर एक महीने का है तो दवा देंगे, पांच छह-महीने का हो गया तो अबार्शन करा देंगे. सोचिए, पांच छह महीने में तो बच्चे में जान आ जाती है.

बेटी के साथ खुश हूं, झाड़ू-पोंछा करके गुजार कर लूंगी

आज मुझे इस बात की खुशी है कि मेरी बेटी मुझे पहचानती है. वहां से भागकर अभी तो अपनी पहचान छुपा कर रह रही हूं. जिस कस्टमर के साथ आई थी, वो अभी तो साथ दे रहा है. वो कहता है कि जब से तुम्हारी हेल्प कर रहा हूं, जीबी रोड नहीं जाता. मैं बस इतना चाहती हूं कि जैसे मेरी लाइफ खराब हुई है, किसी और लड़की की न हो बल्किर कोठा चलाने वाली की लाइफ खराब हो. वो मेरे बच्चे से धंधे कराने की बात बोली, एबॉर्शन कराए. ऐसे लोगों को सजा मिलनी चाहिए. अब ये सब बंद होना चाहिए. मैं झाडू पोंछा करके अपने बच्चे को पाल लूंगी. अपनी जिंदगी के 21 साल किसी सजा की तरह काटे हैं. अब बची हुई जिंदगी सम्मान-सुकून से जीने की कोशिश है.