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आखिरकार जिंदगी की जंग हार गया पहाड़ का 'स्टीफन हॉकिंग'

त्रेपन सिंह चौहान को केवल 49 साल की कम उम्र नसीब हुई. वह अपने समाज के लिए स्टीफन हॉकिंग थे तो स्पार्टाकस भी थे. इस छोटी सी जिंदगी के विभिन्न आयामों में वह इतने सक्रिय रहे कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल और बड़ी जिम्मेदारी छोड़कर गए हैं.

त्रेपन सिंह चौहान (Photo- Facebook) त्रेपन सिंह चौहान (Photo- Facebook)

अपने जानने वालों के बीच स्पार्टाकस की छवि लेकर जीने वाले उत्तराखंड के प्रखर पत्रकार, साहित्यकार, चिंतक, सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकारी त्रेपन सिंह चौहान का गुरुवार सुबह लंबी बीमारी के बाद देहांत हो गया. लेकिन वह लोगों की यादों में हमेशा जीवन की जटिलता को अपनी जीवटता और जीवंतता से परास्त करने वाले नायक की तरह जिंदा रहेंगे.

स्टीफन हॉकिंग की तरह मोटर न्यूरॉन से लड़े
लंबे समय से कई दुर्लभ बीमारियों से दो-दो हाथ कर रहे त्रेपन अंतिम समय तक सक्रिय रहे. कैंसर को परास्त करने के बाद पता चला कि उन्हें विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग जैसी असाध्य बीमारी मोटर न्यूरॉन है. इसके सामने भी उन्होंने हार नहीं मानी. इस हालत में भी उनके सिर पर अपना नया उपन्यास 'ललावेद' पूरा करने की धुन सवार थी. जब उनके लिए लिखकर टाइप करना मुश्किल हो गया तो वह अपने एक सॉफ्टवेयर की मदद से बोलकर टाइप करने लगे. जब उनकी आवाज भी जाती रही तो उन्होंने एक यंत्र- आईट्रैक की मदद से आंखों की पुतलियों के इशारे से लिखना जारी रखा. इसी बीच उनको सिर पर भी चोट लग गई. इससे उनकी स्थिति और मुश्किल हो गई. अंतिम समय में वह हिल पाने में भी सक्षम नहीं रह गए थे. बावजूद इसके उन्हें राज्य सरकार की ओर से किसी तरह की सहायता नहीं मिली. उनके परिजन, मित्र और परिचित सहयोग राशि से ही उनका इलाज करवा रहे थे.

होश संभालने से होश गंवाने तक जारी रहा संघर्ष
त्रेपन सिंह चौहान छात्र जीवन से ही सामाजिक आंदोलनों का हिस्सा बन गए थे. हिमालयी क्षेत्र में वनों को बचाने के लिए शुरू हुए चिपको आंदोलन से लेकर आजादी बचाओ आंदोलन, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन, शराबबंदी आंदोलन, टिहरी बांध से प्रभावित फलेण्डा गांव आंदोलन, भ्रष्टाचार के खिलाफ सूचना के अधिकार का आंदोलन, नैनीसार आंदोलन जैसे कई संघर्षों को उन्होंने मुकाम पर पहुंचाया और कई के लिए जीवनपर्यन्त संघर्षरत रहे. जैसा कि हर आंदोलनकारी के साथ होता है, पुलिस-जेल-कचहरी से उनका आजीवन संबंध बना रहा.

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया लेखन
इन सबके बीच वह अपनी अद्वितीय लेखनी से भी समाज को उर्वर करते रहे. उनके लेख अंतरराष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में छपे तो उनकी कहानियों का देश की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ. उनके उपन्यासों को पहाड़ का परिवेश समझने के लिए बेहतरीन दस्वातेज माना जाता है. उन्होंने- 'भाग की फांस', 'सृजन नवयुग', 'यमुना' और 'हे ब्वारी' जैसे उपन्यास लिखे. इसके अलावा एक जनगीतों का संग्रह- 'सारी दुनिया मांगेंगे' भी प्रकाशित करवाया.

बदलते पहाड़ को समझने के दरवाजे खोले
वह उत्तराखंड के उन चुनिंदा साहित्यकारों में शुमार हैं जिन्होंने समाज में दर्ज होती आहटों को बारीकी के साथ दर्ज किया. वह नब्बे के उस दौर में जवान हो रहे थे जब देश और दुनिया में ऐसे महत्वपूर्ण बदलाव हो रहे थे जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा के लिए बदल देने वाले थे. ऐसे में वह चुप नहीं रहे. उन्होंने सिर्फ वचनों से ही नहीं बल्कि कामों से भी आने वाले खतरों के प्रति समाज को आगाह किया. साथ ही ऐसी राह दिखाने की भी कोशिश की जो इन खतरों से बचाती थी.

समाज से संवाद करता रहा त्रेपन का लेखन
उनके उपन्यासों 'यमुना' और 'हे ब्वारी' न सिर्फ उत्तराखंड राज्य के संघर्षों, बल्कि नई चुनौतियों और भविष्य में पसर रही हताशा और उनके समाधान की राह भी सुझाते हैं. त्रेपन इतिहास के छात्र रहे थे तो उनके उपन्यासों में पहाड़ों की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक पृष्ठभूमि के नए-पुराने बदलाव दर्ज होते हैं. वह यहां की सामाजिक कुरीतियों के साथ ही बाजारवाद से आए बदलावों, बेरोजगारी, ठेकेदारी प्रथा, पलायन, जल-जंगल और संसाधनों की लूट और उत्तराखंड में माओवाद का हौवा फैलाने की सरकारी साजिश और विकास के नाम पर पहाड़ों के लिए खतरनाक बड़े बांध बनाने जैसी दोषपूर्ण नीतियों को भी जगह मिलती है.

सिर्फ आलोचना नहीं समाधान भी सुझाया
त्रेपन के चिंतन में देश के सभी हिमालयी राज्यों में दोषपूर्ण विकास नीति शामिल थी. वह इन इलाकों में बनाए जा रहे बड़े बांधों की बजाए छोटे बांधों के हिमायती थे और इसमें जनभागीदारी के भी. वह केवल सवाल उठाने वालों में नहीं बल्कि समाधान देने वालों में से थे. उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के साथ उनकी दन्या के पास 'सरयू हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट' और भिलंगना घाटी में 'बाल गंगा हाइड्रो प्रोजेक्ट' बनाने की योजना थी. यह 1 मेगावाट के बिजलीघर होने थे जिनमें गांव के 150 लोगों की भागीदारी होनी थी. इसमें हर परिवार को 10 हजार रुपये की मासिक आय भी होनी थी. इसी बीच उनकी तबीयत खराब हो गई थी.

'घसियारी हो या मजदूर, श्रम का सम्मान हो भरपूर'
यह उनका नारा था, जिसे उन्होंने एक सबक की तरह पाला. त्रेपन के उपन्यासों में सशक्त और नेतृत्वकारी महिलाओं की झलक देखने को मिलती है. यही प्रतिभा उन्होंने असल जीवन में भी तराशने का काम किया था. उन्होंने समाज में उपेक्षित माने जाने वाले महिलाओं के श्रम को नए आयाम दिए. घास काटने को सबसे निकृष्ट और बेकार काम मानने वाले जिस तरह के मुहावरे (घास छीलना) प्रचलित हैं वह उनके सख्त खिलाफ थे. उनका कहना था कि पहाड़ की पारिस्थितिकी को इन घसियारियों (घास काटने वाली महिलाओं) ने ही बचाया है. उनके श्रम और उनके योगदान को दर्ज करने के लिए उन्होंने घसियारी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया. इसमें जरूरी पौधों को बचाते हुए दो मिनट के अंदर तेजी से घास काटनी होती थी और जीतने वाली महिलाओं को क्रमश: 1 लाख, 51 हजार और 21 हजार रुपये दिए गए. यह रकम भी लोग चंदा करके देते थे. इस तरह से पहाड़ों पर छोटे बांध बनाने से लेकर महिलाओं को सम्मान दिलाने के ऐसे अनुपम विचारों को सामने रखते थे.

हमेशा अपने दुख से ऊपर रखा समाज का दर्द
त्रेपन अपने समाज के प्रति किस तरह समर्पित थे, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि जिन दिनों में उनकी माता (2016) और पिता (1996) का हुआ, तो भी दोनों मौकों पर वह जनांदोलन, तालाबंदी और रैली जैसे कार्यक्रमों को आयोजित कर रहे थे. इन्हीं व्यस्तताओं के बीच वह घर पहुंचे और उन्हें अंतिम विदाई देकर फिर से अपने काम में जुट गए. काम भी ऐसा नहीं कि किसी की नौकरी करनी हो, बल्कि अपने व्यक्तिगत दुख को समाज के व्यापक हिस्से के दुख के सामने तजकर बेहतर समाज के निर्माण के लिए आगे बढ़ते रहे.

कैसा हो स्कूल हमारा, बना कर दिखाया
उत्तराखंड के ही एक और जनकवि गिरीश तिवाड़ी उर्फ गिर्दा की एक कविता है- कैसा हो स्कूल हमारा. त्रेपन सिंह चौहान ने इसे साकार करके दिखाया. उन्होंने अपनी पत्नी नीमा चौहान के साथ मिलकर गढ़वाल के चमियाला इलाके में दो अद्भुत स्कूल भी खोले थे. ये स्कूल गुणवत्तापूर्ण और रोजगारपरक शिक्षा के अनुपम उदाहरण तो हैं हीं और स्थानीय परिवेश पर आधारित भी हैं. इन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए समय-समय पर स्थानीय किसान, पशुपालक, घसियारिन, शिल्पकार आदि को बुलाया जाता है. समाज के विभिन्न हिस्सों से आने वाले इन लोगों को समाज में आमतौर पर उपेक्षित माना जाता है. लेकिन इनकी जिंदगी के अनुभव भी किसी को शिक्षा दे सकते हैं, यह त्रेपन के कल्पनाशील दिमाग का विचार था. ये लोग इन स्कूलों के टीचर और बच्चों के साथ अपने अनुभवों और ज्ञान को साझा करते हैं. इस कदम से युवा पीढ़ी को अपने समाज और पारिस्थितिकी के बारे में जानने का मौका मिलता है जो आज की अंतरराष्ट्रीय हो गई शिक्षा व्यवस्था में नदारद है.

छोटी सी जिंदगी में किए बड़े काम
त्रेपन सिंह चौहान का जन्म 4 अक्टूबर 1971 को टिहरी गढ़वाल में हुआ था. उन्हें केवल 49 साल की कम उम्र नसीब हुई. उन्होंने अपने समाज को वैज्ञानिकता और आधुनिकता का पाठ सिखाने के साथ ही परंपरागत और मूलभूत तत्वों की अहमियत याद दिलाई. वह अपने समाज के लिए स्टीफन हॉकिंग थे तो स्पार्टाकस भी थे. इस छोटी सी जिंदगी के विभिन्न आयामों में वह इतने सक्रिय रहे कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल और बड़ी जिम्मेदारी छोड़कर गए हैं.

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