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उत्तराखंड: 45 साल बाद घर लौटा शख्स, परिवार वाले खुश नहीं, बोले- नहीं है भावनात्मक लगाव

सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते. ये कहावत अकसर हम सब ने सुनी है. लेकि‍न उत्तरकाशी के एक गांव में यह कहावत सच हो गई है. जहां पर 45 साल बाद एक व्यक्ति अपने घर लौट आया है, लेकिन उसके परिवार वाले उससे खुश नहीं हैं.

सूरत सिंह चौहान (Photo Aajtak) सूरत सिंह चौहान (Photo Aajtak)

  • वर्ष 1975 में छोड़ दिया था घर
  • 45 साल बाद अचानक घर लौटा

बरसों बाद अपने घर लौटना सुखद होता है, लेकिन तभी, जब पर‍िवाार में कोई पहचानने वाला हो. जीवन में रिश्तों को झटककर आगे बढ़ने के फैसले से पहले ये सोचना जरूरी है कि भविष्य में कभी उसी घर में लौटना भी पड़ सकता है. एक ऐसी ही कहानी उत्तरकाशी जिले के चिन्यालीसौड़ के जेष्ठवाड़ी गांव से आई है. जहां पर एक व्यक्ति 45 साल बाद अपने घर लौटा. अब इस व्यक्ति की उम्र लगभग 85 साल है.

उत्तरकाशी जिले के चिन्यालीसौड़ ब्लाक के जेष्ठवाड़ी गांव का एक व्यक्ति 45 साल बाद घर लौटा. अब इस व्यक्ति की उम्र लगभग 85 साल है. परिजनों ने उसे गांव के ही एक कॉलेज में क्वारनटीन कर दिया है. बुजुर्ग के रहने-खाने की व्यवस्था भी परिवार के लोग ही कर रहे हैं. उनका कहना है कि क्वारनटीन अवधि पूरी होने के बाद ही घर लाया जाएगा.

गुरुद्वारे में ब‍िताया लंबा वक्त

बुजुर्ग के पोते ने बताया कि उसके दादा जी सूरत सिंह चौहान ब्यास (जालंधर) के एक गुरुद्वारे में रह रह थे. लॉकडाउन के चलते गुरुद्वारा बंद होने पर वह सोलन (हिमाचल प्रदेश) पहुंच गए. वहां से प्रशासन ने उन्हें उत्तरकाशी भेजने की व्यवस्था की. सूरत सिंह चौहान जब घर छोड़कर गए थे, तब उनकी उम्र महज 40 साल रही होगी. सालों तक काफी खोजने के बाद भी इनके बारे में जानकारी नहीं मिली.

लेकिन, शुक्रवार को बुजुर्ग के पोते के पास तहसीलदार का फोन आया कि उनके दादा जिंदा हैं और सोलन से रविवार को उत्तरकाशी पहुंच रहे हैं. परिजनों को जब इस बात की सूचना मिली, लेक‍िन उन्हें कोई खुशी नहीं हुई. पोते को अपने दादा पर नाराजगी है कि मुश्किल समय में वह दादी को छोड़कर चले गए और इतने सालों तक कोई खैर-खबर तक नहीं ली.

परिवार का नहीं रहा भावनात्मक लगाव

बुजुर्ग सूरत सिंह के पोते अजय सिंह चौहान का कहना है कि दादा से उनका खून का रिश्ता तो है, लेकिन भावनात्मक लगाव कतई नहीं रहा. हां, इतना जरूर है कि परिवार में जब भी दादा का जिक्र होता, उन्हें लगता था कि वे जिंदा जरूर होंगे. परिवार के दस्तावेजों में भी दादा मृत घोषित नहीं है. प्रशासन की टीम ने बुजुर्ग सूरत सिंह चौहान को पंचायत क्वारनटीन के लिए राजकीय इंटर कॉलेज जेष्ठवाड़ी पहुंचाया.

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