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उत्तराखंड: केदारनाथ जैसे एक और प्रलय की आशंका! 600 मीटर लंबी प्राकृतिक झील बन गई, सरकार अलर्ट

केदारनाथ में 2013 में त्रासदी आई थी. इस प्राकृतिक आपदा में हजारों लोगों की जान चली गई थी. उस साल 14 जून को जमकर बारिश हुई थी, जिसके बाद 16 जून की शाम चौराबाड़ी ताल टूट गया था, जिससे मंदाकिनी में बाढ़ आ गई थी. इसके बाद केदारनाथ समेत पूरा इलाका तबाह हो गया था.

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जिला अपादा केंद्र ने पहले ही कर दिया था अलर्ट जिला अपादा केंद्र ने पहले ही कर दिया था अलर्ट
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 2013 से 2019 के बीच भूस्खलन से शंभू नदी में जमा हो गया मलबा
  • रिपोर्ट: अगर झील टूटी तो चमोली जिले में मचेगी सबसे ज्यादा तबाही
  • झील से लगातार निकल रहा पानी, स्थिति खतरनाक नहीं: डीएम

उत्तराखंड में एक बार फिर केदारनाथ जैसे हालात बनते दिखाई दे रहे हैं. यहां बागेश्वर जिले के कुंवारी गांव में 600 मीटर लंबी एक प्राकृतिक झील बन गई है. पुष्कर सिंह धामी सरकार इसको लेकर अलर्ट हो गई है. भूस्खलन की वजह से शंभू नदी के ऊपरी भाग में यह झील बन गई है.जानकारी के मुताबिक अगर यह झील टूटती है तो तेज बहाव के साथ भारी मात्रा में पानी और मलबा फट आएगा, जो पिंडर नदी से मिलने के बाद और भी ज्यादा शक्तिशाली हो जाएगा. पिंडरी नदी नारायणबगड़ से होते हुए कर्णप्रयाग में अलकनंदा से आकर मिलती है.

जानकारी के मुताबिक इस प्राकृतिक झील के निर्माण ने बागेश्वर और चमोली को लोगों की चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्टों के अनुसार, झील अगर टूटती है तो चमोली के देवल, थराली और नारायणबगड़ ब्लॉकों में सबसे ज्यादा तबाही होगी. रिपोर्टों के अनुसार, 2013 से 2019 के बीच भूस्खलन के कारण शंभू नदी पर मलबा जमा हो गया, जिससे झील का निर्माण हो गया. इसको लेकर प्रशासन चिंता में है क्योंकि झील का आकार दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर वक्त रहते प्रशासन ने कदम नहीं उठाया तो बारिश से पहले या बाद में केदारनाथ जलप्रलय जैसा बड़ा हादसा हो सकता है. जिला आपदा केंद्र ने 2012 में भूस्खलन की चेतावनी दी थी. उसी साल जिला टीम ने गांव में प्राकृतिक ढांचे में दरारें देखी थीं. केंद्र ने कुंवारी गांव को लेकर अलर्ट भी जारी किया, क्योंकि इस क्षेत्र में बार-बार भूस्खलन होता है.

2013 से 2019 के बीच भूस्खलन का मलबा जमा होने से बन गई झील

मलबे को हटाने के लिए टीम भेजी: डीएम

खतरे को देखते हुए कपकोट तहसीलदार व उनकी टीम सर्वे के लिए मौके पर भेजी गई है. तहसीलदार ने बताया कि भूस्खलन से शंभू नदी में 60-70 मीटर लंबी 15-20 मीटर चौड़ी झील बन गई है. उन्होंने आगे कहा कि झील 600-700 मीटर लंबी है, जिसमें लगभग 6500 क्यूसेक पानी है.

वहीं एडीएम बागेश्वर चंद्र सिंह इंफाल ने बताया, "भूवैज्ञानिकों, वन अधिकारियों और राजस्व विभाग की एक टीम ने नदी की रुकावट और समय पर की जाने वाली कार्रवाई के लिए झील का मुआयना किया है.

डीएम का दावा- जलप्रलय की आशंका बहुत कम

जिला मजिस्ट्रेट ने इंडिया टुडे को बताया, "हमने क्षेत्र को किसी भी अप्रिय घटना से बचाने और चमोली में अलकनंदा में मिलने वाली शंभू नदी के प्रवाह को बनाए रखने के लिए मलबे को हटाने के लिए एक टीम भेज दी है. यह भूस्खलन संभावित क्षेत्र है, इसलिए इलाके में मलबा इकट्ठा हो गया. हालांकि उन्होंने कहा कि कुंवारी गांव में चल रहे सड़क निर्माण कार्य के कारण नदी के ऊपर बोल्डर और रेत के भी जमा होने की संभावना है. फिलहाल किसी भी तरह के जलप्रलय की आशंका बहुत कम है क्योंकि झील से पानी लगातार निकल रहा है. यह अभी बहुत खतरनाक नहीं है."

शंभू ग्लेशियर से निकलती है यह नदी

शंभू पिंडारी की एक सहायक है. यह बोरबाल्दा गांव के पास शंभू ग्लेशियर से निकलती है. बोरबाल्दा गांव के टोक भराकंडे से लगभग चार किमी और कुंवारी गांव की तलहटी से लगभग दो किमी दूर कालाभ्योद नामक स्थान पर इस झील का निर्माण हुआ है. कुंवारी गांव कपकोट से 65 किलोमीटर दूर पिंडारी नदी की एक सहायक शंभू नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है.

समय पर ध्यान देने से रोका जा सकता है हादसा

उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक डॉ. एमपीएस बिष्ट ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में आमतौर पर दो तरह की लेक बनती हैं. (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फॉर्मेशन और लैंडस्लाइड लेक आउटबर्स्ट फॉर्मेशन). LLOFs (लैंडस्लाइड लेक आउटबर्स्ट फॉर्मेशन) की स्थिति में मलबा लंबे समय तक पानी के दबाव को रोक नहीं पाता है. इसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर प्रलय आती है और बाढ़ के साथ मलबा भी आ जाता है, जो बड़ी तबाही मचाता है. हालंकि अगर इस तरह की घटनाओं पर तुरंत ध्यान दिया जाए तो बड़ा हादसा होने से बचाया जा सकता है.

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