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क्यों कश्मीर से ज्यादा यूपी की सियासत पर असर डालेगा सिन्हा का LG बनना?

मनोज सिन्हा 2017 में उत्तर प्रदेश के सीएम पद के प्रमुख दावेदार रहे हैं, लेकिन सत्ता का ताज योगी आदित्यनाथ के सिर सजा था. ऐसे में मनोज सिन्हा के उपराज्यपाल बनाए जाने से कश्मीर से ज्यादा उत्तर प्रदेश की सियासत में एक राजनीतिक संदेश देने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है.

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल बनाए गए मनोज सिन्हा जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल बनाए गए मनोज सिन्हा

  • जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल बनाए गए मनोज सिन्हा
  • उत्तर प्रदेश में सीएम पद के दावेदार रहे मनोज सिन्हा

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा को जम्मू-कश्मीर का नया उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है. गिरीश चंद्र मूर्मू के इस्तीफा देने के बाद मनोज सिन्हा को मोदी सरकार ने अहम जिम्मेदारी सौंपी है. वे 2017 में उत्तर प्रदेश के सीएम पद के प्रमुख दावेदार रहे हैं, लेकिन सत्ता का ताज योगी के सिर सजा था. ऐसे में मनोज सिन्हा के उपराज्यपाल बनाए जाने से कश्मीर से ज्यादा उत्तर प्रदेश की सियासत में एक राजनीतिक संदेश देने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है.

बीएचयू छात्रसंघ अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय करने वाले मनोज सिन्हा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते हैं. पीएम मोदी और मनोज सिन्हा के बीच आरएसएस के दिनों से ही अच्छे संबंध हैं. मोदी लहर पर सवार होकर बीजेपी ने साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सियासी जंग फतह किया था, तो मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदारों में मनोज सिन्हा का नाम सबसे आगे थे.

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मनोज सिन्हा की ताजपोशी की तैयारी पूरी तरह हो गई थी. उन्होंने काशी पहुंचकर बाबा विश्वनाथ के दर्शन और पूजा अर्चना करने की कवायद भी शुरू कर दी थी. इसी बीच सूबे में सियासी समीकरण ऐसे बने कि मनोज सिन्हा सीएम बनते-बनते रह गए और सत्ता के सिंहासन पर योगी आदित्यनाथ काबिज हो गए. मनोज सिन्हा केंद्र में मंत्री बने रहे, लेकिन 2019 का लोकसभा चुनाव हार गए. इसके बावजूद मनोज सिन्हा को योगी के विकल्प के रूप में देखा जा रहा था. माना जा रहा था कि सूबे में जब कभी सत्ता में नेतृत्व का परिवर्तन होगा तो सीएम के रूप में मनोज सिन्हा की ही ताजपोशी होगी.

वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु मिश्रा कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण की नाराजगी योगी सरकार के खिलाफ है, लेकिन बीजेपी चुनावी मोड में उतर चुकी है. ऐसे में मनोज सिन्हा को उपराज्यपाल बनाकर यह संकेत साफ दे दिया है कि सूबे में अब किसी तरह का कोई नेतृत्व परिवर्तन नहीं किया जाएगा. हालांकि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनोज सिन्हा 2017 में सीएम की रेस से बाहर होने के बाद भी योगी के विकल्प के तौर पर बीजेपी शीर्ष नेतृत्व की पहली पसंद बने हुए थे.

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वह कहते हैं कि मनोज सिन्हा साफ सुथरी छवि के हैं और भूमिहार समुदाय से आते हैं. ऐसे में उन्हें योगी के विकल्प के तौर पर सीएम बनाया जाता तो यह जरूरी नहीं था कि ब्राह्मण समुदाय इससे खुश होता. मोदी के करीबी होने के नाते उन्हें बहुत दिनों के लिए बैठाकर रखा भी नहीं जा सकता था. ऐसे में उन्हें उपराज्यपाल बनाकर एक अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है. इस तरह बीजेपी ने राजनीतिक तौर पर मनोज सिन्हा को भी सेट कर दिया और सीएम योगी के सियासी राह के कांटे को भी खत्म कर दिया गया.

जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटने के एक साल बाद अब प्रशासनिक कार्य से ज्यादा सियासी गतिविधियों को शुरू करने की सरकार के सामने चुनौती है. नेशनल कॉफ्रेंस के प्रमुख उमर अब्दुला चुनाव लड़ने से इनकार कर चुके हैं और पीडीपी की मुखिया अभी नजरबंद हैं. जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से एक राजनीतिक गैप है, ऐसे में मोदी सरकार के सामने उसे भरने के लिए अहम जरूरत थी. ऐसे में बीजेपी के वफादार और मोदी-शाह के भरोसेमंद माने जाने वाले मनोज सिन्हा जम्मू-कश्मीर उपराज्यपाल के पद के लिए पहली पंसद बने.

हिमांशु मिश्रा कहते हैं कि मनोज सिन्हा को एक अहम जिम्मेदारी मिली है. अब परंपरागत राजनीति खत्म हो गई है कि सियासी तौर पर रिटायर्ड माने जाने वाले नेताओं को ही राज्यपाल या फिर उपराज्यपाल बनाए. अभी कश्मीर में एक ऐसे नेता की जरूरत है जो वहां सियासी माहौल तैयार कर सके, क्योंकि वहां से जो मैसेज जाता है वह देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में जाता है. ऐसे में मोदी सरकार घाटी में बहुत दिनों तक चुनाव नहीं टाल सकती है. इसीलिए मनोज सिन्हा को उपराज्यपाल के तौर पर बहुत बड़ा टास्क सौंपा गया है.

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