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अखिलेश यादव से 'ब्रेकअप' के बाद अब कहां जाएंगे ओमप्रकाश राजभर? सामने हैं ये तीन विकल्प 

सपा प्रमुख अखिलेश यादव से गठबंधन टूटने के बाद ओमप्रकाश राजभर की छह विधायकों वाली पार्टी सुभासपा सूबे में नए दोस्त की तलाश में जुट चुकी है. राजभर की पहली पसंद बसपा मानी जा रही है, लेकिन बीजेपी के साथ भी उनकी नजदीकियां बढ़ रही है. ऐसे में राजभर अब बसपा-बीजेपी में से किसके साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाएंगे या फिर कोई अलग मोर्चा बनाएंगे?

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अखिलेश यादव और ओम प्रकाश राजभर
अखिलेश यादव और ओम प्रकाश राजभर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ओपी राजभर की पहली पसंद बसपा से दोस्ती
  • बीजेपी के साथ क्या फिर मिलाएंगे राजभर हाथ
  • राजभर-शिवपाल क्या मिलकर बनाए थर्ड फ्रंट

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ साथ आए सपा प्रमुख अखिलेश यादव और सुभासपा चीफ ओमप्रकाश राजभर की दोस्ती टूट गई है. सपा से गठबंधन टूटने के बाद ओमप्रकाश राजभर के अगले सियासी कदम को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं. ऐसे में राजभर अब अपनी सियासी पारी को अपने दम पर बढ़ाएंगे या फिर किसी मजबूत राजनीतिक कंधे के सहारे आगे बढ़ेंगे. ऐसे राजभर के सामने फिलहाल तीन ही सियासी विकल्प बचे हैं? 

राजभर की पहली पसंद बसपा

अखिलेश यादव के साथ ब्रेकअप के बाद सुभासपा के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के प्राथमिकता की बात की जाए तो उनकी पहली पसंद बसपा नजर आ रही है. राजभर खुलकर दलितों और पिछड़ों के मुद्दे उठाते हुए सपा को दलित विरोधी बताने में जुट गए हैं. उनको मालूम है कि अखिलेश की सबसे बड़ी राजनीतिक शत्रु बसपा है. ऐसे में वह बसपा को प्राथमिकता दे रहे हैं.

राजभर ने कहा कि हमें सपा से तलाक कुबूल हैं. इसके साथ ही उन्होंने बसपा के साथ गठबंधन करने के संकेत देते हुए कहा कि बहुजन समाज पार्टी जिंदाबाद. अब हम गठबंधन के लिए बसपा अध्यक्ष मायावती का दरवाजा खटखाटएंगे. उन्होंने कहा कि पूर्वांचल में उनकी पार्टी का मजबूत संगठन हैं. ऐसे में अगर बसपा के साथ उनके समाज का वोटर जुड़ जाएगा तो बसपा और मजबूत होकर उभरेगी.  2024 के पहले अभी बहुत गोलबंदी होगी देखते जाइए. इस तरह राजभर साफ तौर पर बसपा के साथ गठबंधन की कवायद में है. 

ओपी राजभर को मालूम है कि बसपा यूपी में अपनी जड़े जमाने में फिर से जुट रही है. मायावती संगठन को बड़ा रूप देने के लिए दलितों के साथ मुस्लिमों को भी ला रहीं हैं. बसपा के पास मायावती को छोड़कर ऐसा कोई कद्दावर नेता नहीं बचा है जो बड़ा चेहरा हो. अगर सुभासपा बसपा से गठबंधन करती है तो इससे उसकी दलित और मुस्लिम समुदाय में पैठ मजबूत होगी. इससे सुभासपा का वोट बैंक भी मजबूत होगा. इसके साथ ही ओपी राजभर का राजनीतिक कद भी बढ़ेगा. 

बीजेपी के साथ फिर मिलाएंगे हाथ
ओम प्रकाश राजभर अपनी तरफ से बसपा के साथ जाने की बात कर रहे है. लेकिन मायावती और उनकी पार्टी की ओर से कोई तवज्जो नहीं दिया गया है. ऐसे में राजभर के सामने दूसरा विकल्प बीजेपी है. 2022 चुनाव के बाद से राजभर के तेवर बीजेपी को लेकर नरम है और राष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोट किया था. इतना ही नहीं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और केन्द्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से राजभर की पिछले दिनों मुलाकात हो चुकी है. इसके साथ ही वह फिर से बीजेपी के केंद्रीय और प्रदेश के नेताओं के संपर्क में बताए जा रहे हैं. ऐसे में योगी सरकार ने हाल ही में उन्हें वाईश्रेणी की सुरक्षा भी मुहैया कराई है, जिसके बाद से बीजेपी के साथ उनके गठबंधन की चर्चा तेज है. 

दरअसल, 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश-राजभर की जोड़ी ने पूर्वांचल में ठीक-ठाक प्रदर्शन किया. राजभर के प्रभाव वाले कई जिलों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा. बीजेपी 2024 के चुनाव में क्लीन स्वीप का टारगेट लेकर चल रही है, जिसके चलते राजभर और बीजेपी एक दूसरी की सियासी मजबूर बन गए हैं. ऐसे में बीजेपी के साथ गठबंधन करने की फिर चर्चाएं हैं. 

यूपी में तीसरा मोर्चा बनाएंगे
ओमप्रकाश राजभर की बसपा और दोस्ती नहीं होती है तो उनके सामने तीसरा विकल्प अपना अलग तीसरा मोर्चा बनाने की होगी. सपा के किनारे किए जा चुके शिवपाल यादव और राजभर के बीच रिश्ते ठीक-ठाक है. ऐसे में सपा को अलग-थलग कर ओपी राजभर तीसरी मोर्चा बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं, जिसमें शिवपाल यादव, कांग्रेस, मौलाना तौकीर रजा और जातीय आधार वाले कुछ छोटे दल शामिल हों. सपा से नाता टूटने के एक बड़े मुस्लिम संगठन ने भी राजभर को खत लिखकर नया मोर्चा बनाने की सलाह दी है. सूबे में ऐसा कोई गठबंधन बनता है तो असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी शामिल हो सकती है, क्योंकि राजभर उनके साथ 2022 के चुनाव में एक मोर्चा बना रहे थे. 

राजभर की कई दल के संबंध
राजभर के इस बयान ने साफ कर दिया है कि छह विधायकों वाली सुभासपा नए दोस्त की तलाश में निकल चुकी है. राजभर का कई छोटे दलों के साथ रिश्ते अच्छे हैं, जिनमें कृष्णा पटेल की अपना दल, संजय चौहान की जनवादी पार्टी और ऐसे ही ओबीसी जातीय आधार वाले छोटे दल हैं. ऐसे में राजभर अति पिछड़ें, दलित और अल्पसंख्यकों को लेकर जिस तरह से सपा को घेर रहे हैं, उससे वो 2024 के लिए सियासी समीकरण बिछा रहें. ऐसे में सुभासपा के लिए मौजूदा राजनीतिक समीकरण में नए दोस्त के रूप में देखना है कि कौन फिट बैठता है? 

 

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