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सात महीने और 300 KM का सफर तय कर कर्नाटक पहुंची 420 टन की मूर्ति!

तमिलनाडु के पहाड़ों में एक ऐसी मूर्ति बनाई गई है जिसने हर किसी का ध्यान खींचा है. करीब 420 टन की इस भगवान की मूर्ति को तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिले से 300 किमी. तक का सफर तय करने के बाद कर्नाटक के एक मंदिर में स्थापित किया जाएगा.

फोटो क्रेडिट: Twitter फोटो क्रेडिट: Twitter

तमिलनाडु के पहाड़ों में एक ऐसी मूर्ति बनाई गई है जिसने हर किसी का ध्यान खींचा है. करीब 420 टन की इस भगवान की मूर्ति को तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिले से 300 किमी. तक का सफर तय करने के बाद कर्नाटक के एक मंदिर में स्थापित किया जाएगा.  

इस भारी और विशालकाय मूर्ति को लाने के लिए 240 पहियों का एक वाहन तैयार किया गया. जिस पर मूर्ति को रखा गया और कर्नाटक के एजिपुरा तक लाने में इसको सात महीने का वक्त लगा. जैसा कि आप समझ ही गए होंगे कि ये कोई आम मूर्ति नहीं है. ये 64 फीट ऊंची, 25 फीट चौड़ी अखंड मूर्ति विश्वरूपम की है जिन्हें हिन्दू धर्म के प्रमुख 10 भगवानों का रूप माना गया है.

इस मूर्ति के बारे में डॉ. सदानंद का कहना है कि ये मूर्ति सर्वोच्च भगवान की है जिन्होंने अलग-अलग समय पर हिंदुओं की मदद की है. हिंदुओं में कोई एकता नहीं है क्योंकि हम अलग-अलग देवताओं में विश्वास करते हैं. इसलिए मैंने सभी हिंदू देवताओं की मूर्ति बनाने का फैसला किया. डॉ. सदानंद ने इस मूर्ति को बनाने का संकल्प 7 साल पहले लिया था जिसको पूरा करने में 2.8 करोड़ का खर्च हुआ है.

तिरुवन्नामलाई कलेक्टर के.एस कंदासामी के मुताबिक, मूर्ति को उसकी जगह तक पहुचने में देरी का कारण था सड़कों को चौड़ा करना, रास्ते में आ रहे घर, दुकानों को तोड़कर मूर्ति के लिए रास्ता बनाना.

2 राज्यों और 4 जिलों को पार करने के बाद मूर्ति एजिपुरा तक पहुच पाई है. मूर्ति बनवाने वाले डॉ. सदानंद ने कहा कि बचे हुए 400 मीटर की दूरी को पार करने में अभी 4 दिन और लगेंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि रास्ते में बिजली के खंबे खड़े हैं. जिन्हें निकाला तो आस-पास के ईलाकों में कुछ दिन बिजली नहीं रहेगी.

2012 से चले रहे इस प्रयास में कई मुश्किलें भी आईं. सदानंद ने बताया कि 2012 में तिरुवन्नामलाई में बहुत खोज के बाद उन्हें वो पत्थर मिला जिसकी मूर्ति बनाई जा सकती थी. जिसके बाद सभी तरह की मंजूरी मिलने में पूरे 2 साल लग गए. 2017 में भी मूर्ति के परिवहन के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में पीआईएल दर्ज हुई थी, जिसके बाद नवंबर 2018 में यात्रा शुरू हो पाई.

यात्रा शुरू होने के बाद भी परिवहन में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. इसमें भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के द्वारा छोटे पुलों पर यात्रा पर रोक लगाना भी शामिल है, जिसकी वजह से लगातार रास्तों को बदलना पड़ा.

उनके अनुसार, इस मूर्ति के स्थापित करने को लेकर लोगों में अलग विचार थे. तमिलनाडु के लोगों का कहना था कि हम कर्नाटक को अपना पत्थर नहीं देंगे, क्योंकि उन्होंने हमें कावेरी का पानी नहीं दिया था. जब मूर्ति बॉर्डर क्रॉस कर कर्नाटक में आई तो लोगों ने काफी खुशी व्यक्त की.

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