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शाहीन बाग प्रदर्शन के दौरान बच्चे की मौत का मामला पहुंचा SC

वीरता पुरस्कार विजेता छात्रा जेन गुणरत्न सदावर्ते ने सीजेआई से प्रदर्शन में मासूम बच्चों को लाने को लेकर गाइडलाइन बनाने की गुहार लगाई है.

जस्टिस बोबडे (फाइल फोटो) जस्टिस बोबडे (फाइल फोटो)

  • वीरता पुरस्कार से सम्मानित छात्रा ने CJI से की अपील
  • प्रदर्शन में बच्चों को लाने को लेकर गाइडलाइन बनाने की बात कही

शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के प्रदर्शन के दौरान बच्चे की मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. वीरता पुरस्कार से सम्मानित सातवीं की छात्रा जेन गुणरत्न सदावर्ते ने चीफ जस्टिस एसए बोवडे को चिट्ठी लिखकर प्रदर्शन में मासूम बच्चों को लाने को लेकर गाइडलाइन बनाने की गुहार लगाई.

बता दें कि राष्ट्रीय राजधानी के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर पिछले वर्ष दिसंबर से ही प्रदर्शन लगातार जारी है. यहां प्रदर्शन कर रहे एक गरीब परिवार का आरोप लगाया था कि प्रदर्शन के कारण उनके 4 महीने के बच्चे की मौत हो गई. इसके बाद बच्चे की मौत की वजह लगातार ठंड के संपर्क में रहना बताया गया.

बच्चे के पिता अरशद ने कहा, 'हम लोग 29 तारीख तक विरोध प्रदर्शन में थे. धरना-प्रदर्शन से देर रात हम वापस आए और हमने करीब ढाई बजे बच्चे को दूध पिलाया था. जब सुबह के वक्त हम उठे तो देखा कि बच्चा बिल्कुल खामोश था. उसके बाद हम तुरंत पहले बाटला हाउस क्लीनिक ले गए, लेकिन वहां हमें बोला गया कि इसे होली फैमिली अस्पताल ले जाओ. हमारी उस अस्पताल में जाने की हैसियत नहीं थी, इसलिए हम बच्चे को अल शिफा अस्पताल ले गए. वहां जब डॉक्टर ने देखा तो कहा कि बच्चे की मौत 5 घंटे पहले ही हो चुकी थी.'

बच्चे की मौत के बाद परिवार ने आरोप लगाया था कि अगर सरकार यह कानून नहीं लेकर आती तो उन्हें प्रदर्शन पर नहीं बैठना पड़ता. बच्चे के परिजनों ने कहा कि हम लोग बिहार से हैं और हमारे पास न कागज है और न ही नौकरी. बच्चे के पिता अरशद रिक्शा चलाते हैं.

अरशद ने कहा, 'अगर यह कानून वापस नहीं लेंगे तो हम कहां से कागज दिखाएंगे. हमारे पास खाने को भी पैसे नहीं हैं, फिर भी हम धरना दे रहे हैं, क्योंकि हमें डर है कि हम यहां रहने के लिए कागज कहां से लेकर आएंगे. हम मोदी जी को बताना चाहते हैं कि हम धरने पर बैठे रहेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए. फिर चाहे हमें अपने अन्य दोनों बच्चों को भी शहीद क्यों न करना पड़े.'

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