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समुद्र का बढ़ता जलस्तर खतरनाक, 3.5 करोड़ भारतीयों पर असर

अगर कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं की गई तो समुद्री बाढ़ अगले तीस सालों में नये इलाकों को भी अपने चपेट में ले लेगी. मध्य केरल और गुजरात के कुछ हिस्सों समेत भारत के इन शहरों में 2050 तक साल में कम से कम एक बार बाढ़ जरूर आएगी.

पीटीआई फोटो पीटीआई फोटो

  • 30 करोड़ आबादी में 3.5 करोड़ भारतीयों पर खतरा
  • भारतीय लोगों के सामने खतरा पहले से सात गुना बढ़ा

समुद्र के बढ़ते जलस्तर से दुनिया की 30 करोड़ से अधिक आबादी पर खतरा मंडरा रहा है. एक अध्ययन में कहा गया है कि अगले 30 वर्षों में ऊंची समुद्री लहरें 30 करोड़ से अधिक लोगों के सिर से छत छीन सकती हैं. इस 30 करोड़ आबादी में 3.5 करोड़ भारतीय भी हैं जिन्हें अपने घरों से हाथ धोना पड़ सकता है.

खतरे का अनुमान

इससे पहले एक अध्ययन में समुद्री जलस्तर बढ़ने से जितने लोगों पर खतरे का अनुमान लगाया था, उससे यह तीन गुना अधिक है. भारतीय लोगों के सामने यह खतरा पहले से सात गुना अधिक बढ़ गया है. इस नये 'परिष्कृत' अध्ययन के मुताबिक, समुद्र के बढ़ते जलस्तर से भारत को सात गुना अधिक खतरा है जिससे 3.5 करोड़ जनता प्रभावित होगी.

हालांकि, भारतीय वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन को चुनौती देते हुए कहा है कि इस अध्ययन में खामियां हैं. अर्बन डेवलपमेंट एंड वॉटर रिसोर्सेज पर काम करने वाले जीआईएस और रिमोट सेंसिंग एक्सपर्ट राज भगत पलानीसामी ने इंडिया टुडे से कहा, 'नए जारी हुए अध्ययन के अनुमानों और इसके जोखिम को भारतीय संदर्भ में सावधानी के साथ उपयोग किया जाना है. इस अध्ययन में अमेरिका और आस्ट्रेलिया के डाटाबेस को लिया गया और उन्हीं के आधार पर पूरे विश्व के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया. इसमें भारत के जमीनी आंकड़ों को शामिल नहीं किया गया.'

वैज्ञानिकों के अध्ययन में खुलासा

क्लाइमेट सेंट्रल के वैज्ञानिक Scott A Kulp और Benjamin H Strauss के नेतृत्व में हुए इस नये अध्ययन में कहा गया है कि ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है. भारत में समुद्र के किनारे वाले इलाकों में रह रहे लोगों के घर समुद्र की लहरों में समा सकते हैं. यह अध्ययन नेचर कम्युनिकेशन ने प्रकाशित किया है.

इस अध्ययन में कहा गया है कि भारत में समुद्र के तटवर्ती इलाकों में रह रहे लोगों को पहले के अनुमानों की तुलना में सात गुना अधिक खतरा है. समुद्री जलस्तर पर हुए इस परिष्कृत अध्ययन में कहा गया है कि भारत की 3.5 करोड़ से अधिक जनसंख्या के सामने खतरा मंडरा रहा है. इसमें मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और केरल के अलावा कुछ हिस्सा गुजरात का है जो आने वाले 30 सालों में भयानक खतरे का सामना करेंगे.   

इस अध्ययन के मुताबिक, नये अनुमानों एशिया और खासकर भारत के लिए अहम हैं जहां दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है. 2050 तक सालाना बाढ़ से खतरे की आशंका बांग्लादेश में आठ गुना, भारत में सात गुना, थाईलैंड में बारह गुना और चीन में तीन गुना तक बढ़ गई है.

भारत के बारे में क्या कहता है अध्ययन

मुंबई, कोलकाता, चेन्नई के निचले तटवर्ती इलाके पहले से ही खतरे में हैं. लेकिन नये अध्ययन में कहा गया है कि अगर कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं की गई तो समुद्री बाढ़ अगले तीस सालों में नये इलाकों को भी अपने चपेट में ले लेगी. मध्य केरल और गुजरात के कुछ हिस्सों समेत भारत के इन शहरों में 2050 तक साल में कम से कम एक बार बाढ़ जरूर आएगी. फिलहाल समुद्र के तटवर्ती इलाकों में 3.1 करोड़ भारतीय रहते हैं, 2030 तक यह जनसंख्या 3.5 करोड़ हो जाएगी.

अगर अमेरिका स्थित थिंक टैंक का अध्ययन सच हो जाता है तो 2050 तक मुंबई में दादर से कांदिवली और नवी मुंबई में जवाहर लाल नेहरू पोर्ट से लेकर खारघर तक के इलाके बह सकते हैं. इसी तरह आंकड़े कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से कोलकाता और चेन्नई जैसे भारतीय महानगरों को भी गंभीर खतरा है.

कोलकाता को किसी भी दूसरे भारतीय शहर से ज्यादा खतरा है. सेंट्रल क्लाइमेट डाटा के मुताबिक, निचले इलाकों में बसे घरों में करीब 30 फीसदी घर अगले 30 सालों में नष्ट हो जाएंगे. ग्लोबल वार्मिंग का ऐसा ही दुष्प्रभाव चेन्नई पर पड़ेगा. आंकड़े कहते हैं कि मुख्य चेन्नई समेत कई अहम इलाकों में बाढ़ तबाही मचा सकती है. इसके अलावा मध्य केरल और गुजरात के भी कुछ हिस्से प्रभावित होंगे.

हालांकि, यह अनुमान संदेह के घेरे में है. राज भगत ने इंडिया टुडे से कहा, 'इस अध्ययन में उपयोग किए गए कुछ आंकड़े सही नहीं हैं और भारत की जमीनी वास्तविकता को नहीं दर्शाते. कई जाने माने इलाकों के लिए यह खतरे के अनुमान को बढ़ा चढ़ाकर पेश करता है. इस बारे में अनुमान लगाने से अच्छा है कि हमारी सरकार तटवर्ती इलाकों का नये सिरे अध्ययन कराए, जिसकी मदद से आगे मुस्तैदी बरती जा सके.'

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