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रविंद्रनाथ टैगोर: महाकवि जिनकी रचना एक दो नहीं तीन देशों के राष्ट्रगान के लिए बनी प्रेरणास्रोत

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर दुनिया में ऐसे विरले रचनाकार हैं जिनकी लेखनी 3 देशों के राष्ट्रगान में झलकती है. टैगोर ने बांग्ला भाषा में जन गण मनलिखा था जो बाद में भारत का राष्ट्रगान बना. बांग्लादेश के राष्ट्रगान आमान सोनार बंगला भी उन्हीं की कविता से ली गई. यही नहीं एक और देश है जिसके राष्ट्रगान में टैगोर की झलक दिखती है.

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर

  • आमार सोनार बंगला सन 1905 में लिखी
  • बाद में यह गीत बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना
  • श्रीलंका के राष्ट्रगान में टैगोर की प्रेरणा
एक ऐसा कवि जिसकी लेखनी 3 देशों के राष्ट्रगान का प्रेरणास्रोत बनीं, वह महान कवि जो जन जन का कवि था, बहुमुखी प्रतिभा का धनी था. लेखनी जिसकी सामाजिक कुठाराघात पर चोट करती थी. यहां बात कर रहे हैं ऐसे मूर्धन्य साहित्यकार और देश को पहला नोबेल पुरस्कार दिलाने वाले महान शख्सियत गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की.

7 अगस्त, 1941 को दुनिया को अलविदा कहने वाले गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर दुनिया में ऐसे विरले रचनाकार हैं जिनकी लेखनी 3 देशों के राष्ट्रगान में झलकती है. टैगोर ने बांग्ला भाषा में 'जन गण मन' लिखा था जो बाद में भारत का राष्ट्रगान बना. इसके अलावा बांग्लादेश के राष्ट्रगान 'आमान सोनार बंगला' भी उन्हीं की कविता से ली गई. 'आमान सोनार बंगला' गीत 1905 में लिखा गया था. तीसरा देश श्रीलंका जिसके राष्ट्रगान में भी उनकी अमिट छाप दिखती है.

भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान टैगोर ने लिखा था, यह सभी को मालूम है लेकिन यह ज्यादातर लोगों को मालूम नहीं कि श्रीलंका के राष्ट्रगान का एक हिस्सा भी उनकी कविता से प्रेरित है.

श्रीलंका का राष्ट्रगान

रविंद्रनाथ टैगोर ने पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में विश्व भारती, यूनिवर्सिटी की स्थापना की थी, जिसमें श्रीलंका (तब सीलोन) के आनंद समरकून अध्ययन करने आए. टैगोर से प्रभावित आनंद 6 महीने बाद जब अपने देश वापस लौटे और उन्होंने 'श्रीलंका माथा' की रचना की जो बाद में श्रीलंका का राष्ट्रगान बना.

समरकून को आधुनिक श्रीलंका गीता साहित्य (गीत साहित्य) शैली का संस्थापक माना जाता है जिसने स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय संगीत प्रभावों को शामिल किया और श्रीलंकाई कलात्मक संगीत को एक नई दिशा दी.

आनंद समरकून ने 1940 में 'नमो नमो माता' गीत लिखा और इसका संगीत भी तैयार किया जो काफी हद तक रविंद्रनाथ टैगोर से प्रभावित थी. कुछ इतिहासकारों का कहना है कि टैगोर ने इस गीत का संगीत तैयार किया था, तो कुछ का दावा है कि टैगोर ने इस गीत को लिखा था. हालांकि कुछ इतिहासकार इससे इनकार भी करते हैं.

1951 में इस गीत को आधिकारिक रूप से श्रीलंका के राष्ट्रगान के रूप में अपना लिया गया. हालांकि इस गीत को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किए जाने के बाद विवाद होने पर 1961 में 'नमो नमो माता' की शुरुआती लाइन में बदलाव कर दिया गया और इसे 'श्रीलंका माता' कर दिया गया.

8 साल की उम्र में पहली रचना

टैगोर अपने माता-पिता की 13वीं संतान थे. बचपन में उन्‍हें प्‍यार से 'रबी' बुलाया जाता था. एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मे टैगोर ने महज 8 साल की उम्र में ही कविता लिखना शुरू कर दिया था. उनकी पहली कविता संग्रह 16 साल की उम्र में प्रकाशित हुआ.

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रविंद्रनाथ टैगोर ने कालजयी रचना गीतांजलि लिखी. साल 1913 में वह साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले गैर-यूरोपीय और पहले एशियाई थे.

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साहित्य के अलावा चित्रकला और संगीत के क्षेत्र में भी महारत रखने वाले टैगोर की गीतांजलि, चोखेर बाली, गोरा, घरे बाइरे, काबुलीवाला और चार अध्याय समेत ढेरों बेहद चर्चित रचनाएं हैं. उनकी कई रचनाओं पर फिल्म भी बनी है.

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