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विभाजन के वो किरदार जिन्हें पाकिस्तान में तिरस्कार और गुमनामी मिली

पाकिस्तान अपनी आजादी का 74वां जश्न मना रहा है. विभाजन के दौरान कई मुस्लिम राजनेताओं ने भारत के बजाय पाकिस्तान में रहना पसंद किया था, लेकिन पाकिस्तान में उन्हें महज तिरस्कार और गुमनामी के सिवा कुछ नहीं मिला है. वहीं, कई नेता मुस्लिम लीग से जीतने के बाद वहां नहीं गए और भारत में रहते हुए सियासत में अपनी बेहतर जगह बनाने में कामयाब रहे थे.

लियाकत अली और मो. अली जिन्ना (Getty Images) लियाकत अली और मो. अली जिन्ना (Getty Images)

  • भारत-पाकिस्तान बंटवारे के आज 74 साल पूरे हो गए हैं
  • 1946 में मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग को मिली थी जीत

पाकिस्तान बने हुए सत्तर साल से अधिक का समय गुजर चुका है. 15 अगस्त 1947 को भारत को ब्रिटिश राज से आजादी मिली थी, लेकिन अंग्रेजों ने जाते-जाते देश को दो टुकड़ों में बांटकर पाकिस्तान के रूप में नए देश का निर्माण कर दिया था. शुक्रवार को पाकिस्तान अपनी आजादी का 74वां जश्न मना रहा है. विभाजन के दौरान कई मुस्लिम राजनेताओं ने भारत के बजाय पाकिस्तान में रहना पसंद किया था, लेकिन पाकिस्तान में उन्हें महज तिरस्कार और गुमनामी के सिवा कुछ नहीं मिला है. वहीं, कई नेता मुस्लिम लीग से जीतने के बाद वहां नहीं गए और भारत में रहते हुए सियासत में अपनी बेहतर जगह बनाने में कामयाब रहे थे.

बता दें कि आजादी से महज एक साल पहले 1946 के सेंट्रल असेम्बली और स्टेट असेम्बली के चुनाव हुए थे. इस चुनाव में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सीधा मुकाबला था. मुस्लिम लीग ने देश की तमाम मुस्लिम रिजर्व सीटों पर 86 फीसदी से ज्यादा मत प्राप्त किए जबकि, अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में कांग्रेस ने जिन मुस्लिम सीटों पर चुनाव लड़ा उनमें से 90 फीसदी सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई थी. देश की कुल 494 स्टेट असेम्बली की मुस्लिम रिजर्व सीटों में से मुस्लिम लीग को 429 सीटें हासिल हुईं थी. ऐसे ही सेंट्रल असेम्बली के भी नतीजे रहे हैं.

उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा पलायन

पाकिस्तान बनने के बाद सबसे ज्यादा मुस्लिम समुदाय ने उत्तर प्रदेश से पलायन किया था. सयुंक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) में 1946 में चुनाव हुए थे. उस समय सूबे में 16 सीटें सेंट्रल असेम्बली की हुआ करती थीं, जिनमें से 6 सीटें मुस्लिम समुदाय के लिए रिजर्व रहती थी, जिनमें से पांच ग्रामीण और एक शहरी सीट थी. इन सभी छह सीटों पर मुस्लिम लीग के मुस्लिम प्रत्याशियों ने जीत दर्ज किया था. वहीं, यूपी के स्टेट असेम्बली में 66 सीटें मुस्लिम को रिजर्व थी, जिनमें से 13 शहरी, 51 ग्रामीण और दो सीटें मुस्लिम महिला के लिए आरक्षित थी. इन 66 मुस्लिम सीटों में से 54 सीटों पर मुस्लिम लीग के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की थी.

सेंट्रल असेम्बली में यूपी अर्दल सीट से नवाब मो. इस्माइल खां ने 89.56 फीसदी वोट पाकर जीत हासिल की थी. ऐसे ही मेरठ रीजन से नवाबजादा लिकायत अली खान 62.47 फीसदी, आगरा क्षेत्र से सर मो. यामीन खां 79.68 फीसदी, रुहेलखंड-कुमाऊ क्षेत्र से खान बहादुर हाफिज मो. जगनफर उल्ला खान 67.14 फीसदी, यूनाइटेड प्रोविन्सेस दक्षिण क्षेत्र से डॉ. सर जियाउद्दीन अहमद 85.28 फीसदी, लखनऊ-फैजाबाद क्षेत्र से राजा महमूदाबाद मो. अमीर अहमद खान ने 87.67 फीसदी वोट पाकर जीत हासिल की थी. भारत के अंतरिम सरकार में लिकायत अली वित्त मंत्री बने तो उन्होंने सेंट्रल असेम्बली सदस्य के तौर पर इस्तीफा दे दिया था और उनकी जगह खान बहादुर शाह नजर हुसैन चुने गए थे.

पाकिस्तान में इन्हें मिली गुमनामी

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के बनने के बाद यूपी सेंट्रल असेम्बली के छह में से पांच सदस्य पाकिस्तान जाकर बस गए और राजा महमूदाबाद मो. अमीर अहमद खान इंग्लैंड चले गए. नवाबजादा लिकायत अली खान पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने थे, लेकिन बाकी सदस्य को कोई खास जगह वहां की राजनीति में नहीं मिल सकी है. ऐसे ही स्टेट विधानसभा में भी मुस्लिम लीग से रायबरेली सीट से मो. शमीम अहमद, फैजाबाद से मुंशी फैयाज अली, फतेहपुर-बांदा से सैय्यद हसन अहमद शाह और सहारपुर नार्थ सीट से मुनफरत अली ऐसे नेता थे, जो पाकिस्तान में 60 दिन से ज्यादा रुके थे और बाद में बस गए थे. मौजूदा पाकिस्तान की सियासत में यूपी से जीतने वाले इन नेताओं को महज गुमनामी ही नसीब में आई है.

क्या कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार फिरोज नकवी?

वरिष्ठ पत्रकार फिरोज नकवी कहते हैं कि 1946 में रायबरेली सीट से कांग्रेस से चुनाव लड़ने वाले रफी अहमद किदवई मुस्लिम लीग के शमीम अहमद से हार गए थे. लेकिन बाद में यूनिवर्सिटी कोटे से रफी अहमद किदवई चुनकर आए थे और बाद में वो राष्ट्रीय स्तर के नेता बने. पाकिस्तान जाने वाले नेताओं को सिर्फ गुमनामी मिली है, आज वहां की राजनीति में उनकी कोई भूमिका नहीं रही. इससे भारत और पाकिस्तान की राजनीतिक अहमियत को समझा जा सकता है.

वहीं, यूपी के स्टेट असेम्बली में मुस्लिम लीग से जीतने वाले चार सदस्य पाकिस्तान नहीं गए थे. नवाब जमशेद अली खान, कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद के ताया सुल्तान आलम खा, संडीला के नवाब एजाज रसूल की पत्नी कुदसिया बेगम और लखनऊ के बेगम हबीबुल्ला ऐसे नेता थे, जो मुस्लिम लीग से जीतने के बाद भी पाकिस्तान नहीं गए और भारत में रहे और बाद में समय से साथ उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया. इसके बाद सियासत में आज भी इन नेताओं के परिवार भी प्रासंगिक बने हुए हैं.

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