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आजादी मिले हो गए 70 साल से ज्यादा, पूर्वोत्तर के ये इलाके विकास से आज भी दूर

तस्वीरें बताती हैं कि भले ही कल राष्ट्र अपना 74वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है, लेकिन उत्तर पूर्वी क्षेत्र के कई गांव अभी भी विकास से कोसों दूर हैं.

नगालैंड में नेटवर्क न होने की वजह से क्लास के लिए जाना पड़ता है जंगल में नगालैंड में नेटवर्क न होने की वजह से क्लास के लिए जाना पड़ता है जंगल में

  • मणिपुर में डोंग गांव से 54 किमी दूर है अस्पताल
  • ऑनलाइल क्लास के लिए जाना पड़ता है जंगल
  • असम के सोनितपुर जिले के गांवों में नहीं सड़क

ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर बांस की स्ट्रेचर पर अस्पताल लाई जा रही गर्भवती महिला के लिए इससे ज्यादा पीड़ादायक और क्या हो सकता है? यह घटना मणिपुर के तमांगलॉन्ग गांव की है, जहां 54 किलोमीटर चलकर कुछ युवा बांस के स्ट्रेचर पर गर्भवती महिला को लेकर अस्पताल पहुंचे.

डोंग गांव की रहने वाली महिला को प्रसव पीड़ा हुई, जिसके बाद इस सुदूर गांव के स्थानीय लोगों ने उसे बांस के स्ट्रेचर पर अस्पताल ले जाने का फैसला किया. दिलचस्प बात यह है कि लगभग 30 घरों वाला डोंग गांव मणिपुर-नागालैंड सीमा पर स्थित है.

तमेई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सुदूर गांव से निकटतम स्वास्थ्य केंद्र है, जो गांव से तकरीबन 54 किमी की दूरी पर स्थित है. सड़क की समुचित कनेक्टिविटी न होने के कारण दूर दराज स्थित इस गांव तक वाहनों का अवागमन मुमकिन नहीं है.

फिलहाल, गर्भवती महिला को तमेई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भर्ती कराया गया जहां, महिला ने बच्चे को जन्म दिया. अभी जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं. लेकिन तथ्य यह है कि आजादी के 70 सालों बाद भी जीवन बचाने के लिए एक गर्भवती महिला को बांस के स्ट्रेचर के सहार अस्पताल लेकर आना पड़ता है.

एक दूसरी तस्वीर नगालैंड की देखिए. 14 वर्षीय लिबो एम झिमो को अपनी ऑनलाइन क्लास के लिए हर रोज लगभग एक घंटे की यात्रा करनी होती है. अगर ऑनलाइन कक्षाओं का मतलब दुनिया के लिए घर में रहना होता है तो देश के इस हिस्से में छात्रों के लिए इसका मतलब है कि ऑनलाइन क्लास के लिए लंबी दूरी तय करना होता है.

लिबो एम झिमो कक्षा 8 में पढ़ते हैं. लेकिन गांव में मोबाइल नेटवर्क नहीं रहता है और ऑनलाइन क्लास के लिए उन्हें 38 अन्य छात्रों के साथ एक ऐसी जगह पर जाना होता है जहां नेटवर्क मिल सके. यह तस्वीर नगालैंड के जिला ज़ुनहेबोतो में त्सुरुहु गांव की है. गांव के बच्चों को ऑनलाइन क्लास और एग्जाम के लिए रोजाना यह सफर तय करना पड़ता है.

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सुदूर गांव के इन छात्रों को उसी रास्ते से प्रतिदिन कैम्प तक पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्तों से होकर लगभग 3-4 किमी की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. त्सुरुहु नगालैंड के ज़ुनहेबोतो जिले का एक सुदूर गांव है, जहां सुमी नगा समुदाय के लोग रहते हैं. गांव जिला मुख्यालय से लगभग 65 किमी दूर स्थित है.

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त्सुरुहु गांव के छात्र संघ ने घने जंगल में बांस, तिरपाल का उपयोग करके एक अस्थायी तम्बू बनाया है, जहां मोबाइल नेटवर्क सिग्नल उपलब्ध है. यहां छात्र किसी तरह ऑनलाइन क्लास लेते पाते हैं. अस्थायी तम्बू में लकड़ी की बेंच पर बैठकर छात्रों ने अपनी कक्षाओं और परीक्षाओं में भाग लिया है. यह पिछले महीने से जारी है.

village_081420032339.jpg त्सुरुहु गांव

सेंट एंथोनी स्कूल के छात्र लिबो एम झिमो ने बताया कि हर सुबह उन्हें कैम्प तक पहुंचने के लिए आधे घंटे खर्च करने पड़ते हैं जो घने जंगल के अंदर स्थित है. झिमो ने बताया, “यह एकमात्र स्थान है जहां मोबाइल नेटवर्क कनेक्टिविटी उपलब्ध है. हमारे पास पर्याप्त स्मार्ट फोन नहीं हैं, लेकिन छात्रों की यूनियन हमारी मदद कर रही है.

असम के दूरदारज के इलाकों में सड़क नहीं

तीसरी तस्वीर असम के सोनितपुर जिले की है. किसी भी इंसान की अंतिम यात्रा उन लोगों के लिए सबसे भावुक क्षण होता है जो परिवार के किसी सदस्य को खो चुके हैं. लेकिन असम के सोनितपुर जिले में एक मृत महिला को ट्रैक्टर और फिर कंधे पर ले जाना पड़ा. क्योंकि खराब सड़क की वजह से एम्बुलेंस वालों ने बार बार आग्रह करने के बावजूद उस इलाके में जाने से मना कर दिया.

यह घटना हाल ही में असम के सोनितपुर जिले के बोरसोला क्षेत्र के झावनी गांव में देखने को मिली थी. उस समय परिजनों को शव को लेकर बारिश के मौसम में खराब सड़क पर 4 किलोमीटर से अधिक दूरी तक पैदल चलना पड़ा था.

assam_081420032643.jpgकंधे पर शव लेकर पहुंचे गांव

असल में, बोरसोला विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत झवानी गांव की एक महिला की तेजपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बीमारी के कारण मौत हो गई थी. परिजनों ने एम्बुलेंस वालों से शव को घर तक पहुंचाने को कहा, लेकिन खराब सड़क की वजह से सबने मना कर दिया. बाद में परिजन कंधों पर ही शव को लेकर गए. परिवार के सदस्यों और ग्रामीणों ने शव को सुदूर गांव तक पहुंचाने के लिए ट्रैक्टर का भी इस्तेमाल किया था.

ये तस्वीरें बताती हैं कि भले ही कल राष्ट्र अपना 74वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है, लेकिन उत्तर पूर्वी क्षेत्र के कई गांव अभी भी विकास से कोसों दूर हैं.

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