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सुसाइड के समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा, ये हैं रोकने के उपाय

सोशल मीडिया पर सुसाइड करने की बढ़ती घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं. रिपोर्टेड केसेज ट्रेंड से पता चलता है कि सुसाइड के दौरान सोशल मीडिया का इस्तेमाल वक्त के साथ बढ़ता जा रहा है. लोग सुसाइड करने से पहले वाट्सएप पर चैट करते हैं, सुसाइड का वीडियो बनाते हैं और मोबाइल से सुसाइड नोट मैसेज भी करते हैं.

सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर

  • गाजियाबाद में खुदकुशी से पहले गुलशन ने किया था वीडियो कॉल
  • विदेशों में ई-साइकी के जरिए सुसाइड रोकने की होती है कोशिश
दिल्ली के बुराड़ी में एक परिवार के 11 सदस्यों के सुसाइड की घटना के बाद अब गाजियाबाद के पॉश इलाके इंदिरापुरम में एक परिवार की खुदकुशी करने का दिलदहला देने वाला मामला सामने आया है. इस खुदकुशी से ठीक पहले कारोबारी गुलशन ने वीडियो कॉल करके लाशों को दिखाया था. यह पहली बार नहीं है, जब सुसाइड करने से पहले किसी ने सोशल मीडिया पर वीडियो कॉल किया हो.

सोशल मीडिया पर सुसाइड करने की बढ़ती घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं. रिपोर्टेड केसेज ट्रेंड से पता चलता है कि सुसाइड के दौरान सोशल मीडिया का इस्तेमाल वक्त के साथ बढ़ता जा रहा है. लोग सुसाइड करने से पहले वाट्सएप पर चैट करते हैं, सुसाइड का वीडियो बनाते हैं और मोबाइल से सुसाइड नोट मैसेज भी करते हैं.

सुसाइड करने से पहले लोग ऑडियो और वीडियो भी बनाते हैं. सुसाइड नोट भेजने के लिए गूगल मैसेंजर का भी इस्तेमाल करते हैं. एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्सीलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ चितरंजन बेहरा का कहना है कि खुदकुशी करने की प्रवृत्ति 20 से 40 साल के लोगों में ज्यादा बढ़ रही है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हो, तो सोशल मीडिया अकाउंट देखकर स्क्रीन किया जा सकता है. डॉ. चितरंजन बेहरा पिछले 18 वर्षों से खुदकुशी पर अध्ययन कर रहे हैं.

कैसे पता चलता है कि कौन करेगा सुसाइड?

डॉ. बेहरा का कहना है कि कुछ शब्द होते हैं, जो सुसाइडल विचार को दर्शाते हैं. सुसाइड करने वाले का पता उसके विचार से लगता है. शब्दों के अलावा इसके कोई लक्षण नहीं होते हैं. एक सवाल के जवाब में डॉ चितरंजन बेहरा का कहना है कि ‘मैं मर जाऊंगा/जाऊंगी’, ‘मेरी लाइफ में कुछ है ही नहीं’ जैसी बातें सुसाइड करने के संकेत देती हैं. हालांकि लोगों के सुसाइड करने के अलग-अलग कारण होते हैं, जैसे इंदिरापुरम में परिवार के सुसाइड के पीछे कर्ज एक बड़ी वजह निकलकर आ रही है.

क्या ई-साइकी से रुकेगी खुदकुशी?

भारत में सोशल मीडिया निगरानी का प्रवधान नहीं है, लेकिन कनाडा में सुसाइड रोकने के लिए ई-साइकी (E-Psychic) का इस्तेमाल किया जाता है. इसके जरिए काउंसलर सोशल मीडिया पर उन पोस्ट का पता लगाते हैं, जिन पोस्ट को पढ़कर ये अंदाजा लगता है कि शख्स परेशान है और जीना नहीं चाहता है. इसके बाद उससे बात की जाती है.

वहीं, बेल्जियम जैसे छोटे देश में ऐसे शब्दों के जरिए पहचान करने का काम किया जाता है, जो सुसाइड से पहले लोग इस्तेमाल करते हैं. स्कैन करके काउंसलर ऐसे लोगों से मिलते हैं और बात करते हैं. अगर सुसाइड करने जा रहे व्यक्ति से कोई बात कर ले, तो उसके सुसाइड करने की आशंका कम हो जाती है. मरने को आतुर शख्स का मन बदल जाता है.

हर केस में तभी सोशल मीडिया का इन्फ्लुएंस पता चलेगा, जब साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी होगी यानी सुसाइड से पहले किसने और कितना सोशल मीडिया इस्तेमाल किया. साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी में रिलेटिव और पुलिस से पूछताछ की जाती है. डॉ बेहरा ने एम्स में पहुंचे एक मामले का जिक्र करते हुए बताया कि साल की शुरुआत में एक पुरुष की खुदकुशी का केस आया था, जिसमें उसने सुसाइड नोट एसएमएस किया था. दोस्तों को सुसाइड नोट ई-मेल के जरिए भी भेजने का मामला सामने आया.

उन्होंने बताया कि इस साल 16 जुलाई को एक जोड़े ने खुदकुशी करने से पहले अपनी मां को वाट्सएप पर वीडियो कॉल किया था. 27 साल की महिला की खुदकुशी का केस जिसने वीडियो रिकॉर्डिंग करके अपने मां-बाप को सूचित किया था. इसी साल के 14 जून को एम्स के फॉरेंसिक डिपार्टमेंट को पुलिस से एक जवान का ई-सुसाइड नोट मिला था, जिसका अध्ययन जारी है.

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