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जानिए क्या है विश्वास प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में अंतर?

राजस्थान में विधानसभा सत्र की शुरुआत शुक्रवार से हो रही है और बीजेपी ने गहलोत सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान किया है. वहीं, गहलोत ने भी खुद विश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान किया. अब विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के ऊपर निर्भर करेगा कि वो किसके प्रस्ताव को मंजूर करते हैं. ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव में आखिर क्या अंतर है?

सीएम अशोक गहलोत और बीजेपी नेता एवं पूर्व सीएम वसुंधरा राजे (फाइल फोटो) सीएम अशोक गहलोत और बीजेपी नेता एवं पूर्व सीएम वसुंधरा राजे (फाइल फोटो)

  • विश्वास प्रस्ताव सत्ता पक्ष लाने का काम करता है
  • विपक्ष करता है अविश्वास प्रस्ताव लाने का काम

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट फिर से एक हो गए हैं. विधानसभा सत्र की शुरुआत हो रही है और बीजेपी ने गहलोत सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान किया है. वहीं, गहलोत ने भी खुद विश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान किया है. अब विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के ऊपर निर्भर करेगा कि वो किसके प्रस्ताव को मंजूर करते हैं. ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव में आखिर क्या अंतर है, जिसे लेकर कांग्रेस-बीजेपी आमने सामने हैं.

अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव दोनों निचले सदन में लाए जा सकते हैं. इन्हें केंद्र सरकार के मामले में लोकसभा और राज्य सरकारों के मामले में विधानसभा में लाया जाता है. हालांकि, अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास प्रस्ताव में काफी अंतर होता है. अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा लाया जाता है जबकि विश्वास प्रस्ताव सरकार द्वारा अपने बहुमत को साबित करने के लिए लाया जाता है. स्पीकर विश्वास प्रस्ताव को स्वीकर करता है तो सदन में चर्चा के दौरान सत्तापक्ष को बोलने का मौका मिलता है और अगर अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार करता है तो विपक्ष को बोलने का मौका मिलता है.

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अविश्वास प्रस्ताव

अविश्वास प्रस्ताव को लाने का काम विपक्ष करता है जो मौजूद सरकार के विरोध में होता है. ऐसे में सत्तापक्ष अपनी सरकार बने रहने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का गिरना यानी नामंजूर करने की कोशिश करता है. स्पीकर अगर अविश्वास प्रस्ताव मंजूर कर लेता और सत्तापक्ष सदन में बहुमत साबित करने में सफल नहीं रहता है तो सरकार गिर जाती है. ऐसे ही किसी विधेयक के मामले में भी होता है.

विश्वास प्रस्ताव

विश्वास प्रस्ताव लाने का काम सत्ता पक्ष करता है. केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्य में मुख्यमंत्री विश्वास प्रस्ताव पेश करते हैं. सरकार के बने रहने के लिए विश्वास प्रस्ताव का पारित होना मतलब मंजूर होना जरूरी है. प्रस्ताव पारित नहीं हुआ तो सरकार गिर जाएगी. विश्वास प्रस्ताव दो स्थितियों में सरकार द्वारा लाया जाता है. पहली स्थिति में सरकार के गठन के वक्त सरकार बहुमत परीक्षण करने के लिए करती है और दूसरी स्थिति में केंद्र में राष्ट्रपति या फिर राज्य में राज्यपाल के कहने पर. इसका मतलब सरकार को समर्थन देने वाले घटक समर्थन वापसी का ऐलान कर दें, ऐसे में राष्ट्रपति या राज्यपाल प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को सदन का भरोसा हासिल करने को कह सकते हैं.

विश्वास प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में अंतर

विश्वास प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव संसदीय प्रकिया के अंग हैं, जिसके तहत सदन में सरकार के बहुमत को जांचा जाता है. सदन में अविश्वास प्रस्ताव हमेशा विपक्षी दलों द्वारा लाया जाता है, जबकि विश्वास प्रस्ताव अपना बहुमत दिखाने के लिये हमेशा सत्ताधारी दल लेकर आता है.

किन्हीं विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति या राज्यपाल भी सरकार से सदन में विश्वास मत अर्जित करने के लिए कह सकते हैं. ऐसे में सरकार विश्वास मत जीत जाती है तो 15 दिन बाद विपक्ष दोबारा से सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है.

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संसदीय प्रावधान में कहा गया है कि एक बार अविश्वास प्रस्ताव लाने के छह महीने बाद ही दोबारा अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा लाया जा सकता है. हालांकि, विश्वास मत सरकार की तरफ से लाया जाता है, इसलिये यह कानून इस पर लागू नहीं होता.

सरकार सदन में यादि विश्वास प्रस्ताव के दौरान सामान्य बहुमत साबित नहीं कर पाती तो ऐसे में सरकार को या तो इस्तीफा देना होता है या लोकसभा या फिर विधानसभा भंग करके आम चुनाव की सिफारिश राष्ट्रपति या राज्यपाल से की जा सकती है.

इसके बाद यह राष्ट्रपति और राज्यपाल पर निर्भर करता है कि वह नई सरकार को आमंत्रित करें. ऐसा संभव न होने पर वर्तमान सरकार को ही चुनाव संपन्न होने और नई सरकार के बनने तक कार्यवाहक सरकार के तौर पर काम करने को कहा जाता है.

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