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पराली की समस्या से निपटने के लिए पंजाब सरकार के दावे और उनकी हकीकत?

राज्य सरकार ने किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए कई उपायों की शुरुआत की है, लेकिन जमीन पर इसका कुछ फायदा सामने नहीं आ रहा है.

पराली जलाने पर सरकार की रोक के दावे और हकीकत (फाइल फोटो) पराली जलाने पर सरकार की रोक के दावे और हकीकत (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पराली जलाने से रोकने के लिए कई उपायों की शुरुआत
  • जमीन पर नहीं दिख रहा इसका कोई फायदा
  • पंजाब में हर साल लगभग 20 मिलियन टन पराली

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) समेत उत्तर भारत में हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के साथ, पंजाब पराली (फसल के अवशेष) जलाए जाने की घटनाओं को लेकर फिर सुर्खियों में हैं. पंजाब में हर साल लगभग 20 मिलियन (2 करोड़) टन धान की पराली पैदा होती है जिसमें से 93 प्रतिशत आम तौर पर आग की लपटों के हवाले कर दी जाती है. 

राज्य सरकार ने किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए कई उपायों की शुरुआत की है, लेकिन जमीन पर इसका कुछ फायदा सामने नहीं आ रहा है. पंजाब सरकार के दावे क्या हैं और असल में उन पर क्या स्थिति है, यह जानने के लिए आजतक/इंडिया टुडे ने रियलिटी चेक किया.

दावा नंबर 1: 

पंजाब सरकार ने गांवों में 8,000 नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करने का ऐलान किया है ताकि पराली जलने की घटनाओं पर नजर रख सकें. वो खेत मालिकों को चेतावनी देंगे कि यदि वो पराली जलाना बंद नहीं करते तो उनकी जमीन को रेड मार्क (लाल निशान) कर दिया जाएगा.

हकीकत: नोडल अधिकारियों की नियुक्ति केवल कागजात पर ही रहती है, वे जमीन पर कहीं नहीं दिखते. जबकि पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों ने पराली जलने के मामले दर्ज करना जारी रखा है, अब तक 1692 मामले दर्ज किए जा चुके हैं. किसानों की ओर से पराली जलाना जारी है. पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में इस साल पराली जलाने की पांच गुना अधिक घटनाएं हुई हैं. 

दावा नंबर 2: 

इस साल किसानों को 23,500 से अधिक पराली प्रबंधन मशीनें दी जा रही हैं जिससे फसल अवशेष का मौके पर ही निस्तारण किया जा सके. कृषि विभाग ने पिछले वर्ष के दौरान ऐसी मशीनें 50 से 80 फीसदी सब्सिडी पर उपलब्ध कराई थीं. 

हकीकत: अधिकतर किसान या तो उन मशीनों को खरीदने की स्थिति में नहीं थे, जिनकी लागत 8 से 10 लाख रुपए थी. या उन्होंने सरकार की ओर से सुझाए उपकरणों को खारिज कर दिया जिनसे प्रति एकड़ खेती की लागत में कम से कम 2,000 रुपये की वृद्धि हुई. केवल कुछ आर्थिक तौर पर संपन्न किसान ही इन मशीनों को खरीद सकते हैं. 

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सरकार ने जिस सब्सिडी का वादा किया था ,उसका भुगतान कुछ किसानों को ही किया गया. बठिंडा सहित कई जिलों के दर्जनों किसानों को अभी तक सब्सिडी की राशि नहीं मिली है. 

दावा नंबर 3:  

सब्सिडी पर पिछले दो वर्षों के दौरान 51,000 पराली प्रबंधन मशीनें पहले ही दी जा चुकी हैं. 

हकीकत: पिछले महीने आजतक/इंडिया टुडे की ओर से किए गए रियलिटी चेक से पता चला है कि अधिकतर  किसानों को यह भी पता नहीं है कि उन्हें सब्सिडी पर मशीनें मिल सकती हैं.

दावा नंबर 4: 

पराली नहीं जलाने वाले किसानों को 2500 रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा दिया जाएगा. 

हकीकत: एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में फसल अवशेष न जलाने के लिए 5000 किसानों को 19 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया. 

राज्य के अधिकारियों की ओर से की गई जांच से पता चला है कि जिन किसानों को मुआवजा दिया गया था, उनमें से खासी संख्या वाले किसान मुआवजा पाने के हकदार हीं नही थे या उन पर धान की पराली जलाने के आरोप थे. 

कई किसानों को मुआवजे का भुगतान भी नहीं किया गया, क्योंकि इसका दावा करने वाला पोर्टल ही सरकार की ओर से बंद कर दिया गया. ऐसा मुआवजा घोटाला सामने आने के बाद किया गया. कथित तौर पर ये घोटाला कुछ भ्रष्ट अधिकारियों  मुआवजे के घोटाले के बाद बंद कर दिया गया था, कथित तौर पर कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और कियोस्क मालिकों ने मिलकर इस घोटाले को अंजाम दिया. आरोप है कि ऐसे व्यक्तियों को मुआवजा दिया गया जो इसके हकदार ही नहीं थे.  

दावा नंबर 5:  

मवेशियों को खिलाने के लिए धान के ठूंठ को चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

हकीकत: मवेशी धान के डंठल का सेवन नहीं करते क्योंकि यह मोटे है कुछ किसान मवेशियों को खिलाने के लिए दूसरे हरे चारे के साथ धान के ठूंठ को मिलाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनका प्रतिशत बहुत कम है. 

दावा नंबर 6:  

राज्य सरकार के अधिकारियों का दावा है कि दोषी किसानों के खिलाफ सैकड़ों केस दर्ज किए गए हैं और उन पर जुर्माना भी किया गया है. 

हकीकत: मामले तो दर्ज होते हैं लेकिन उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई महज आंखों का धोखा है. पंजाब में पिछले साल 11,286 से अधिक पराली जलाने की घटनाएं हुईं, जिनमें से केवल 1585 मामलों में जुर्माना लगाया गया. जुर्माना राशि वसूलना भी टेढ़ी खीर बना हुआ है.

 

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