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सोना गिरवी-खजाना खाली! 90 की वो बदहाली जब मनमोहन के एक बजट से हमेशा के लिए बदल गया देश

1991 में देश के पास मात्र 20 दिनों का आयात बिल चुकाने भर की विदेशी मुद्रा रह गई थी. संकट की इस घड़ी सोना एक बार फिर सोना साबित हुआ. देश ने मात्र  40 करोड़ डॉलर के एवज में 47000 किलो यानी 47 टन सोना गिरवी रख दिया. इस फैसले की जानकारी तक देश को नहीं दी गई थी. 

डॉ मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों को पेश करते हुए 24 जुलाई 1991 बजट पेश किया था (फोटो-twitter/@IYC) डॉ मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों को पेश करते हुए 24 जुलाई 1991 बजट पेश किया था (फोटो-twitter/@IYC)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • भारत में आर्थिक सुधार के 30 साल पूरे
  • लाइसेंस परमिट राज से बाहर निकला था देश
  • 24 जुलाई 1991 को पेश किया गया उदारीकरण का पहला बजट

उदारीकरण (Liberalisation) की जिस राह पर भारत ने 90 के दशक में कदम बढ़ाए थे, आज 24 जुलाई को उस सफर के 30 साल मुकम्मल हो गए हैं. तीन दशक एक फैसले का असर जानने के लिए बहुत वक्त होता है. क्या बदला है उस भारत में जिसने आजादी के बाद आर्थिक मॉडल के रूप में समाजवाद की विचारधारा के साथ चलना स्वीकार किया. 

इस बजट पेश करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने फ्रांसीसी विचारक विक्टर ह्यूगो की उन पंक्तियों का जिक्र किया, जिसकी चर्चा मैनजमेंट और राजनीति की कक्षाओं में अब भी होती है. उन्होंने लोकसभा में कहा था, "दुनिया की कोई शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसका समय आ पहुंचा है." 

भारत में भी ऐसे ही एक विचार को लागू करने का समय आ गया था, जो इंडिया तकदीर को बदलने जा रहा था.

शाम के पांच बज रहे थे, संसद का बजट सत्र चल रहा था. तारीख थी 24 जुलाई 1991. देश में कांग्रेस की सरकार थी. जो कुछ ही दिन पहले सत्ता संभाली थी और इसने बड़ी मुश्किल से बहुमत साबित किया था. समर्थन के मोर्चे पर डगमगा रही इस सरकार के सामने आर्थिक चुनौतियां खाई की तरह थी. इस सरकार की बागडोर थी कद्दावर कांग्रेसी नेता पीवी नरसिम्हा राव के हाथ में. उन्होंने देश का हिसाब किताब चलाने के लिए वित्त मंत्री के रूप में चुना पूर्व पीएम चंद्रशेखर के आर्थिक सलाहकार रहे डॉ मनमोहन सिंह को. 

डॉ मनमोहन सिंह ने इस सरकार का पहला बजट पेश किया. लगभग 19000 शब्दों वाली बजट स्पीच में मनमोहन सिंह ने साहसिक आर्थिक सुधारों की श्रृंखला पेश कर दी थी. भारत अब समाजवादी मॉडल से इतर खुले बाजार के दौर में प्रवेश कर रहा था. जिसका सिद्धांत था 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट'. और जो पूंजी के प्रवाह पर आधारित था. मनमोहन सिंह के इस पिटारे में और क्या-क्या था ये हम आपको बताएंगे लेकिन पहले इसे बदलाव की पृष्ठभूमि को समझिए.

मनमोहन सिंह के बजट का अंश

क्या स्मार्टफोन वाली पीढ़ी को पता है, कभी लैंडलाइन फोन की थी वेटिंग लिस्ट

क्या 21वीं सदी में पैदा हुई भारत के यंगिस्तान को ये पता भी है कि कभी लैंडलाइन फोन की वेटिंग लिस्ट हुआ करती थी? हफ्ते नहीं महीनों तक? कई बार साल भी. तब फोन स्टेट्स सिंबल था. आपके घर में डिजाइनर डायल फोन का होना आपको इंडियन मिडिल क्लास की सम्मानजनक कैटेगरी में पहुंचा देता था. 

इसे आप ऐसे समझें. आज आप कभी भी (24x7) स्मार्टफोन खरीद सकते हैं. मार्केट में ठेले पर सिम कार्ड बेच रहा लड़का गुहार लगा लगाकर आपसे सिमकार्ड खरीदने की मनुहार करेगा. वह  100 रुपये में आपके सामने देश की दिग्गज कंपनियों का सिम खरीदने का विकल्प दे देगा. कॉलिंग आपको फ्री मिलेगी. बस आपके पास एक आधार कार्ड चाहिए. 

इस 'लग्जरी' को एन्ज्वॉय कर रहे आज के युवा को कभी उनसे मिलना चाहिए जिन्होंने 70, 80 और 90 के दशक में अपनी जवानी गुजारी है. 

कार, स्कूटर, सीमेंट खरीदने के लिए चाहिए थी सरकारी अनुमति

क्या आप ये जानते हैं कि कभी देश में सिर्फ फिएट, एम्बेसडर और स्टैंडर्ड नाम की कंपनी की कारें बनाती थी, मारुति तो संजय गांधी बाद में लेकर आए. तब सरकार तय करती थी कि कितनी कारें बनेंगी और उसकी कीमत कितनी होगी. इन कारों को खरीदने के लिए आपका धनवान होना ही काफी नहीं था. आपको सरकारी दफ्तर के चक्कर काटने पड़ते थे, इसे खरीदने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था, सरकारी बाबू से मान-मनोव्वल करनी पड़ती थी. ये सब तब, जब आप अपनी वैध कमाई पर अपने लिए एक गाड़ी खरीदना चाहते थे. 

आज आप 10 लाख की कार महज एक किश्त देकर खरीद सकते हैं, कार के शोरूम में बैठा एक्जीक्यूटिव आपका लोन दिलवाएगा और एक हफ्ते के अंदर आपको कार की डिलीवरी हो जाएगी. कैश कार तो आप जब चाहें तब खरीद सकते हैं. 

स्कूटर की सवारी भी आसान नहीं थी. लाइसेंस लेकर ही आप इसे खरीद सकते थे. आप यह जानकर हैरान हो सकते हैं कि 80 के दशक में मकान बनाने के लिए लगने वाले सीमेंट को खरीदने के लिए इंस्पेक्टर की अनुमति लेनी पड़ती थी. और तो और शादी ब्याह में अगर आपको एक्स्ट्रा चीनी चाहिए थी तो भी इसके लिए परमिशन जरूरी थी.

समाजवादी जकड़न में बाजार कराह रहा था 

तो ऐसा था 90 के दशक से पहले का जमाना. आपकी हर आर्थिक गतिविधि में सरकारी घुसपैठ थी. हर खरीद में परमिट और परमिशन. स्वतंत्र बाजार का अस्तित्व ही नहीं बन पाया था. बाजार को सरकारें सख्ती से कंट्रोल करती थी. डिमांड और सप्लाई के इकोनॉमिक्स के नियम यहां बेमानी थे. 

पीवी नरसिम्हा राव के साथ डॉ मनमोहन सिंह (फाइल फोटो)

समाजवादी संरक्षण के पक्ष में ये तर्क दिया जाता था कि जिस तरह नए-नए लगाए गए पौधे को बाड़बंदी के जरिए बाहरी तत्वों से सुरक्षित रखने की कोशिश की जाती है उसी तरह आजादी के बाद भारत में नए-नए पनप रहे सरकारी उद्योगों और उपक्रमों को संरक्षण के जरिए इस कदर बनाया जा रहा था कि वो विदेशी और निजी पूंजी का मुकाबला कर सके. भारत के संदर्भ में तब तो ये बात तो कुछ हद तक ठीक थी. लेकिन संरक्षण का ये दौर इतना लंबा चला कि अपने दम पर खड़े होने के बजाए ये कंपनियां पैकेज और बेलआउट जैसे बैसाखी की आदी हो गईं.

फर्ज कीजिए आज सरकार बाइक बनाने कंपनी होंडा या बजाज से कहे कि आप इस महीने इतने बाइक बना सकते हैं, इसके लिए आप इतना स्टील खरीद/आयात कर सकते हैं. इन बाइक्स की कीमत आपको इतनी रखनी होगी. 

ये कल्पना आपको एकदम असंभव सी लगेगी. लेकिन ये सच है. आज से 30 पहले हमारे यहां बिजनेस का कायदा-कानून इसी तरह था. इस व्यवस्था को किताबों में इंस्पेक्टर और परमिट राज कहते हैं. 

क्या है अर्थव्यवस्था का समाजवादी मॉडल

'क्लोज्ड इकोनॉमी' समाजवादी मॉडल या कथित आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की पैरवी करने वाला भारत खुली अर्थव्यवस्था की राह पर चलने को क्यों मजबूर हुआ? इसे बताने से पहले हम आपको बताते हैं कि इकोनॉमी का समाजवादी मॉडल क्या होता है? 

दरअसल समाजवादी अर्थव्यवस्था से अभिप्राय एक ऐसी आर्थिक प्रणाली से है, जिसमें उत्पति के सभी साधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है. इस सिस्टम में आर्थिक गतिविधियों का संचालन  एक केन्द्रीय सता करती है और इसका घोषित उद्देश्य सामूहिक हित और कल्याण होता है. वहीं 'क्लोज्ड इकोनॉमी' वैसी अर्थव्यवस्था है, जो बाहर की अर्थव्यवस्थाओं से किसी तरह की आर्थिक लेन-देन नहीं करती है. भारत की तत्कालीन अर्थव्यवस्था इन दोनों का मिश्रण थी.

1991 में मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री थे (फाइल फोटो)

इसके विपरित खुली अर्थव्यवस्था में सरकार पूंजी के प्रवाह पर अंकुश नहीं लगाती है.  निजी कंपनियों की काम करने की आजादी रहती है. सरकारें प्राइवेट आंत्रप्रन्योरशिप को प्रोत्साहन देती है. स्टार्ट अप, शेयर मार्केट को छूट दी जाती है. सरकार अपने निवेश कम करती है, और खुले मार्केट को बढ़ावा दिया जाता है. यानी कि सब कोई कुछ भी वैध काम करने को स्वतंत्र होता है.

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