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अमित कर्माकर: कोलकाता के आखिरी रेडियो मैन, जिनकी दुकान में रखे हैं सैकड़ों पुराने रेडियो सेट

अमित ने कहा कि रेडियो और मोबाइल फोन के बीच कोई तुलना नहीं है. मैं इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता. मेरे पास एक मोबाइल फोन है लेकिन इसे कैसे चलाते हैं यह कम ही जानता हूं.

अमित रंजन कर्माकर अमित रंजन कर्माकर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • रेडियो रिपेयरिंग का काम करते हैं अमित
  • 1976 में रेडियो मैकेनिक के रूप में शुरुआत
  • रेडियो से काफी लगाव रखते हैं अमित

स्मार्टफोन और टीवी के जमाने में रेडियो की अहमियत थोड़ी कम दिखाई देती है. हालांकि देश में ऐसे भी कई लोग हैं, जिनका रेडियो को लेकर काफी लगाव है. इन्हीं में से एक हैं अमित रंजन कर्माकर, जिनकी दुकान में सैकड़ों पुराने रेडियो सेट हैं, लेकिन वे इन्हें बेचते नहीं हैं.

अमित रंजन कर्माकर कहते हैं, 'रेडियो के बारे में कुछ अनोखा है. रवींद्रनाथ टैगोर ने आकाशवाणी नाम गढ़ा और यह हमेशा के लिए अमर हो गया.' 62 साल की उम्र में भी अमित को मुश्किल से ही वक्त मिल पाता है. अब उन्हें गुरुवार को महालय से पहले एक दर्जन रेडियो सेट्स को रिपेयर करना है.

अमित कहते हैं, 'युवा मेरे पास केवल एक अनुरोध के साथ आते हैं. वे कहते हैं, चाचा कृपया इस काम को एक बार फिर से महालय से पहले करें. मेरे दादाजी ने मेरे पिताजी को यह दिया था.' आज की पीढ़ी स्मार्टफोन पर यूट्यूब देखकर बड़ी हो रही है. रेडियो सुनना उनके लिए सबकुछ नहीं है. हालांकि साल में एक दिन ऐसा भी आता है, जब हर बंगाली के लिए रेडियो तरंगें जीवित हो जाती हैं.

कई विकल्प
 
वहीं बंगाल में दुर्गा पूजा की उलटी गिनती बीरेंद्र कृष्ण भद्र की मध्यम आवाज के साथ शुरू होती है, जो अखिल भारतीय रेडियो कार्यक्रम "महिषासुरमर्दिनी" में महालय के दिन सुबह प्रसारित होता है. आज की पीढ़ी के पास यूट्यूब या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कई विकल्प हैं. हालांकि पुराने लोगों में विशेष रूप से बुजुर्ग आकाशवाणी पर रेडियो सेट पर कार्यक्रम सुनना काफी जरूरी मानते हैं.
 
अमित ने कहा, 'रेडियो और मोबाइल फोन के बीच कोई तुलना नहीं है. मैं इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता. मेरे पास एक मोबाइल फोन है लेकिन इसे कैसे चलाते हैं यह कम ही जानता हूं. मैं नंबर बुक में नंबर लिखकर सुरक्षित रखता हूं.' हालांकि अमित की आंखें तब चमक उठती है, जब कोई उसकी दुकान की तरफ सैकड़ों पुराने रेडियो सेट- फिलिप्स, मर्फी, बुश, टेलीफुंकेन की तरफ देखता है.

पहले थी कई दुकानें

कुमरतौली के केंद्र में स्थित, 40 बनमाली सरकार स्ट्रीट में कोलकाता में मूर्ति निर्माताओं के केंद्र में अमित की दुकान है. हालांकि वे अपने रेडियो बेचते नहीं हैं. कुछ समय पहले तक कोलकाता में रेडियो सेट की मरम्मत के लिए कई दुकानें थीं, लेकिन तेजी से बदलती तकनीक के साथ अमित कर्माकर जैसे लोगों को ढूंढना काफी मुश्किल है.

हालांकि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अमित के पास न केवल शहर से बल्कि शहर के बाहर से भी ग्राहक आते हैं. साल 1976 में कर्माकर ने रेडियो मैकेनिक के रूप में काम करना शुरू किया था. अमित का कहना है कि इन दिनों महालय के लिए टीवी पर कई शो हैं लेकिन कोई भी मूल रेडियो कार्यक्रम की लोकप्रियता को कम नहीं कर सकता है.

 

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