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भारत-पाक के बंटवारे में 75 साल पहले बिछड़े थे चाचा-भतीजा, अब यूट्यूबर्स ने मिलवाया

पंजाब के 92 वर्षीय सरवन सिंह ने अपने परिवार के 22 सदस्यों को खो दिया था. उनका भतीजा मोहन सिंह वर्तमान में पाकिस्तान में एक मुस्लिम परिवार के साथ रहता है, जिसे अब्दुल खालिक के नाम से जाना जाता है. 6 वर्ष की आयु में वह परिवार से बिछड़ गया था.

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ऐतिहासिक करतरपुर गुरुद्वारे में दोनों की मुलाकात हुई ऐतिहासिक करतरपुर गुरुद्वारे में दोनों की मुलाकात हुई

देश के बंटवारे के दौरान सांप्रदायिक दंगों में पंजाब के 92 वर्षीय सरवन सिंह ने अपने परिवार के 22 सदस्यों को खो दिया था. सोमवार को वह 75 साल पहले बिछड़े अपने भतीजे मोहन सिंह से मिले, जो वर्तमान में पाकिस्तान में एक मुस्लिम परिवार के साथ रहता है और उसे अब अब्दुल खालिक के नाम से जाना जाता है. उन्होंने लाहौर से करीब 130 किमी दूर नरोवल स्थित ऐतिहासिक करतारपुर साहिब गुरुद्वारा में मोहन से मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने अपने भतीजे के गले से लगाया. यहां पर दोनों परिवारों के लोग मौजूद रहे.

खालिक के एक रिश्तेदार मुहम्मद नईम ने करतारपुर कॉरिडोर से लौटने पर फोन पर न्यूज एजेंसी को को बताया, 'खालीक साहब ने अपने चाचा के पैर छुए और कई मिनट तक उन्हें गले से लगाया. चाचा और भतीजे दोनों ने एक साथ चार घंटे बिताए. इस दौरान दोनों ने अपनी पुरानी यादें और अपने-अपने देशों में रहने के तरीके के दूसरे से साझा किए.

इस दौरान सरवन सिंह और खालिक, दोनों ने सफेद कुर्ता पजामा पहना हुआ था. साथ में सिंह ने काली और खालिक ने सफेद रंग की पगड़ी पहनी हुई थी. वर्षों बाद दोनों की मुलाकात से पहले उनके रिश्तेदारों ने उन्हें माला पहनाई और उन पर गुलाब के फूल भी बरसाएं.

'भतीजे के साथ रहने आ सकते हैं सरवन सिंह'

खालिक के रिश्तेदार जावेद ने उनका जिक्र करते हुए कहा, "हम अपनी भावनाओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकते लेकिन यह ईश्वर का आशीर्वाद है कि हम 75 साल बाद फिर से मिले. सरवन सिंह अपने भतीजे के साथ लंबी समय तक तक रहने के लिए वीजा प्राप्त करने के बाद पाकिस्तान आ सकते हैं."

Youtubers की मदद से मिले चाचा-भतीजा

बता दें  कि दोनों को 75 साल बाद मिलाने में मदद के लिए भारत और पाकिस्तान के दो YouTubers ने अहम भूमिका निभाई है.

जंडियाला के एक YouTuber ने विभाजन की कई कहानियों का दस्तावेजीकरण किया था और कुछ महीने पहले वह सरवन से मिला और अपने YouTube चैनल पर उनके जीवन की कहानी का एक वीडियो पोस्ट किया. वहीं सीमा पार, एक पाकिस्तानी YouTuber ने खालिक की कहानी सुनाई जो विभाजन के समय अपने परिवार से अलग हो गया था.

संयोग से, ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले पंजाब मूल के एक व्यक्ति ने दो वीडियो देखे और रिश्तेदारों को मिलाने में मदद की. 

6 वर्ष की आयु में बिछड़ गया था मोहन

भारत में जालंधर के रहने वाले परविंदर ने कहा कि बंटवारे के समय मोहन, लगभग छह साल का था. परविंदर ने बताया कि एक वीडियो में, सरवन ने अपने लापता भतीजे के पहचान चिह्नों का उल्लेख करते हुए कहा कि उसके एक हाथ में दो अंगूठे हैं और उसकी एक जांघ पर एक बड़ा तिल है. वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तानी YouTuber द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो में खालिक के बारे में इसी तरह की बातें साझा की गईं.

बाद में, ऑस्ट्रेलिया का रहने वाला व्यक्ति भारत और पाकिस्तान में रह रहे दोनों परिवारों से संपर्क करने में सफल रहा. परविंदर ने कहा कि दादा ने खालिक की पहचान उसके मार्क्स से की. 

बंटवारे से पहले चक 37 गांव में रहते थे सरवन सिंह

बता दें कि सरवन का परिवार चक 37 गांव में रहता था, जो अब पाकिस्तान में है और उनके परिवार के 22 सदस्य विभाजन के समय सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए थे. सरवन और परिवार के अन्य सदस्य भारत आने में सफल रहे थे, लेकिन खालिक वहीं छूट गया, जो हिंसा से बच गया और जिसका बाद में पाकिस्तान में एक मुस्लिम परिवार ने पालन-पोशन किया.

सरवन, जो अपने बेटे के साथ कनाडा में रह रहे थे, COVID-19 महामारी की चपेट में आने के बाद से अपनी बेटी के घर जालंधर के पास संधमान गांव में रह रहे हैं.

2019 में शुरू हुआ करतारपुर कॉरिडोर

नवंबर 2019 में, पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने औपचारिक रूप से एक खास समारोह में गुरु नानक की 550 वीं जयंती के उपलक्ष्य में करतारपुर कॉरिडोर का उद्घाटन किया था, जिससे भारतीय सिख तीर्थयात्रियों को बिना वीजा के पाकिस्तान में अपने धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक की यात्रा करने का मार्ग प्रशस्त हुआ. 

करतारपुर साहिब गुरुद्वारा पाकिस्तान के नरोवाल जिले में रावी नदी के पार स्थित है, जो पंजाब के गुरदासपुर जिले में डेरा बाबा नानक मंदिर से लगभग चार किलोमीटर दूर है. यह सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव का अंतिम विश्राम स्थल है, जिन्होंने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष करतारपुर में बिताए थे. सभी धर्मों के भारतीय तीर्थयात्रियों को ऐतिहासिक गुरुद्वारे बिना वीजा के इसकी यात्रा करने की अनुमति है. 

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