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क्या परमाणु हमला करने के लिए प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति से मंजूरी लेना जरूरी होगा? जानें क्या है प्रक्रिया

Presidential election 2022: अगर भारत के सामने अपने दुश्मन पर परमाणु हमला करने की नौबत आ जाए तो पीएम निवास लोक कल्याण मार्ग से लेकर रायसीना हिल्स पर क्या गतिविधियां होंगी? इस बारे में क्या कहता है भारत का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन? क्या प्रधानमंत्री अपने फैसले की जानकारी राष्ट्रपति को देंगे?

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जैसलमेर में 13 नवंबर 2020 दीपावली के मौके पर जवानों के संग पीएम मोदी (फोटो- पीटीआई)
जैसलमेर में 13 नवंबर 2020 दीपावली के मौके पर जवानों के संग पीएम मोदी (फोटो- पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • युद्ध की स्थिति में परमाणु हमला करने का अधिकार किसके पास?
  • नेशनल कमांड अथॉरिटी में है चेन ऑफ कमांड का जिक्र
  • राष्ट्रपति सेना के सर्वोच्च कमांडर हैं, लेकिन...

क्या होगा अगर भारत को अपने किसी दुश्मन पर परमाणु हमला करने की नौबत आ जाए? सवाल काल्पनिक (Hypothetical) है लेकिन आज के जियोपॉलिटिकल वर्ल्ड पर गौर करें तो अनिष्ट की आशंका से भरे इस काल्पनिक सवाल में सच्चाइयां भी छिपी हैं. भारत के न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन (Nuclear Doctrine of India) के अनुसार हमारा देश नो फर्स्ट यूज की पॉलिसी का पालन करता है. यानी भारत पहले परमाणु हथियारों का प्रयोग नहीं करेगा. हालांकि, हमारी परमाणु नीति यह भी कहती है कि जैविक या रासायनिक हथियारों से भारत या भारतीय सेना के खिलाफ कहीं भी (Anywhere) बड़े हमले की स्थिति में, भारत परमाणु हथियारों से जवाबी कार्रवाई करने का विकल्प खुला रखेगा.

इंडिया की परमाणु नीति का विश्लेषण करने से इतना तो समझ आता है कि भारत अपने जखीरे से परमाणु हथियारों का इस्तेमाल तभी करेगा जब हमारा देश स्वयं 'महाविनाश' का शिकार हो चुका होगा. तो भारत द्वारा इस घातक और विध्वंसक जवाबी एटमी हमला करने की प्रक्रिया क्या होगी? ये एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब प्रधानमंत्री कार्यालय में मौजूद अति गोपनीय फाइलों में सहेज कर रखा गया है. यहां पीएमओ की चर्चा इसलिए की गई है क्योंकि भारत की सरकार ने परमाणु हमला करने के लिए जिस नेशनल कमांड अथॉरिटी (Nuclear Command Authority) को बनाया है उसके अनुसार नेशनल कमांड अथॉरिटी के तहत बनी पॉलिटिकल काउंसिल के चेयरमैन प्रधानमंत्री को ही एटमी अटैक पर निर्णय लेने का एकमात्र अधिकार है. 

रायसीना हिल्स! भारत का VVIP और प्रीमियम एड्रेस

हालांकि प्रधानमंत्री परमाणु युद्ध पर फैसला लेने वाले सुप्रीम शक्ति हैं. लेकिन यहां एक और सुप्रीम कमांडर है और उसका पता बेहद महत्वपूर्ण है. ये एड्रेस है रायसीना हिल्स! हिन्दुस्तान का वो पता जो सुपर प्रीमियम और VVIP है. रायसीना हिल्स पर मौजूद 330 एकड़ में फैले राष्ट्रपति भवन में भारतीय गणराज्य के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भारत के राष्ट्रपति रहते हैं. 340 कमरे वाली इस भव्य इमारत में भारत के प्रथम नागरिक यानी कि राष्ट्रपति और उनके पूरे स्टाफ का निवास है. 

युद्ध की घोषणा करने का एक्सक्लूसिव अधिकार राष्ट्रपति के पास

भारत के संविधान का अनुच्छेद 53 (Article 53) राष्ट्रपति के सैन्य अधिकारों की व्याख्या करते हुए उन्हें भारत के सशस्त्र बलों का सुप्रीम कमांडर बताता है. भारत की रूल बुक के अनुसार राष्ट्रपति सैन्य बलों के सुप्रीम कमांडर हैं. राष्ट्रपति ही सेना के तीनों (जल-थल और नभ) सर्वोच्च कमांडरों की नियुक्ति करते हैं. राष्ट्रपति के पास भारत की ओर से किसी दूसरे देश के साथ युद्ध की घोषणा करने का एक्सक्लूसिव अधिकार होता है. इसके साथ ही वे किसी युद्धरत राष्ट्र के साथ शांति की घोषणा करने का भी विशिष्ट अधिकार रखते हैं. हालांकि राष्ट्रपति ये फैसले मंत्रिपरिषद (जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं) की सलाह मानते हुए करते हैं. इसके अलावा सभी अंतरराष्ट्रीय संधियां और समझौते भी राष्ट्रपति के नाम से की जाती हैं. 

परमाणु हमले पर हरी झंडी देने वाली नेशनल कमांड अथॉरिटी का प्रोटोकॉल

हालांकि भारत के सामने ऐसी नौबत कभी नहीं आई है, हम उम्मीद करते हैं कि ऐसे हालात कभी बनें भी न. लेकिन अगर दुर्योगवश ऐसा करना ही पड़ा तो भारत सरकार की नेशनल कमांड अथॉरिटी एक्टीवेट (NCA) हो जाएगी. 

4 जनवरी 2003 को भारत सरकार ने देश के न्यूक्लियर ड्रॉक्ट्रिन को जनता के सामने रखते हुए कहा कि नेशनल कमांड अथॉरिटी पॉलिटिकल काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल से मिलकर बनेगी. पॉलिटिकल काउंसिल के मुखिया पीएम होते हैं. इस समय बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पॉलिटिकल काउंसिल के चीफ हैं. पीएम इस काउंसिल के एक मात्र आधिकारिक रूप से घोषित सदस्य हैं. इस काउंसिल में और कौन सदस्य हैं ये बेहद गुप्त जानकारी है. लेकिन माना जाता है कि गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री इसके सदस्य होंगे. 

4 जनवरी 2003 को भारत ने अपना न्यूक्लियर डॉक्ट्राइन जारी किया है. (फोटो-PIB)

इसी तरह एग्जीक्यूटिव काउंसिल के बॉस राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होंगे. इस समय अजित डोभाल एग्जीक्यूटिव काउंसिल को लीड कर रहे हैं. एक बार फिर से NSA ही इस काउंसिल के एकमात्र ऐसे सदस्य हैं जिनका नाम सरकार ने सार्वजनिक किया है. न्यूक्लियर हमले की स्थिति बनते ही एग्जीक्यूटिव काउंसिल पॉलिटिकल काउंसिल को सलाह और कई तरह के इनपुट देता है. इस सलाह को देने से पहले एग्जीक्यूटिव काउंसिल कई पहलुओं पर विचार करता है.  निश्चित रूप से ये सूचनाएं अति गोपनीय (Highly classified) होती हैं और इससे जुड़ी बैठकों की टाइम, लोकेशन और प्रोसेस की कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है. 

न्यूक्लियर अटैक के मसले पर PM हैं सुपर बॉस

बता दें कि भारत के पास कभी ऐसी नौबत नहीं आई है जब देश को किसी शत्रु पर परमाणु हमले के लिए विचार करना पड़े. इसलिए इन सारी प्रक्रिया का सैन्य विशेषज्ञ अनुमान ही लगा पाते हैं. 

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प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में पॉलिटिकल काउंसिल परमाणु हमले पर अंतिम फैसला लेती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत में न्यूक्लियर अटैक पर आखिरी फैसला प्रधानमंत्री के हाथों में होता है. अगर पॉलिटिकल काउंसिल ने ग्रीन सिग्नल दे दिया तो स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड (Strategic Forces Command) का रोल आता है. SFA ही हमले की लोकेशन, टाइप ऑफ डिलीवरी और टाइम तय करता है और राजनैतिक नेतृत्व को इसकी जानकारी देता है. टाइप ऑफ डिलीवरी की बात करें तो भारत अब दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिसे न्यूक्लियर ट्रायड (Nuclear triad) हासिल है यानी कि भारत जल (परमाणु पनडुब्बी अरिहंत, अरिदमन), थल (पृथ्वी, अग्नि और सूर्या मिसाइलें) और नभ (राफेल, मिराज, जगुआर लड़ाकू विमान) से परमाणु हमला करने की क्षमता रखता है. भारत की ये मिसाइलें अमेरिका-रूस की तरह ही पहाड़ों में दबी हैं, समंदर में छिपी हैं या फिर कंक्रीट के गुप्त बंकरों में बेहद सुरक्षित रखी हुई हैं, इसकी जानकारी सिर्फ प्रधानमंत्री और उनकी टीम के लोगों को होती है.

हालात को देखकर निर्णय लेंगे पीएम-एक्सपर्ट

परमाणु हमला करने से पहले क्या भारत के प्रधानमंत्री राष्ट्रपति तो सूचित करेंगे? ये सवाल जब हमने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स, ऑर्गेनाइजेशन एंड डिसआर्मामेंट (CIPOD) में डिप्लोमेसी एंड डिसआर्मामेंट प्रोफेसर डॉ. स्वरण सिंह से पूछा तो उन्होंने कहा कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ( National security council) का नेतृत्व प्रधान मंत्री करते हैं. व्यवहार में ऐसे अधिकांश निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी कैबिनेट (CCS) द्वारा लिए जाएंगे.  न्यूक्लियर रिस्पॉन्स को एक्टिवेट करने की परिस्थितियों से राष्ट्रपति का कोई लेना-देना नहीं है.  

भारत का राफेल फाइटर प्लेन न्यूक्लियर हमला करने में सक्षम है. (फोटो- India today)

स्वरण सिंह ने कहा कि औपचारिक तौर पर प्रधानमंत्री ऐसा निर्णय राष्ट्रपति से साझा कर भी सकते हैं. पर हालात को देखते हुए यह निर्णय (क्या राष्ट्रपति को इस निर्णय की सूचना देनी चाहिए या नहीं) केवल प्रधान मंत्री का होगा. न्यूक्लियर फोर्स कमांड, सीडीएस के नेतृत्व में केवल प्रधानमंत्री के निर्णय को कार्यान्वित करने की जिम्मेदारी निभाता है. हां प्रधानमंत्री के ऐसे निर्णय लेने की शुरुआत में CDS की तैयारी को आंका और समझा जा सकता हैं और उनकी सलाह भी सुनी जा सकती है. 

इस मुद्दे पर रक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर (रिटा.) वी. महालिंगम ने कहा कि प्रधानमंत्री इस बाबत राष्ट्रपति से नहीं पूछ सकते हैं लेकिन वे उनसे संपर्क कर सकते हैं और संभवत: उनकी सहमति ले सकते हैं. 

राष्ट्रपति के पास जंग की घोषणा का अधिकार, परमाणु हमले का नहीं

यहां कहा जा सकता है कि भारत के राष्ट्रपति भले ही संविधान के अनुच्छेद 53 के प्रावधानों के अनुसार युद्ध की घोषणा कर सकते हैं लेकिन परमाणु हमला करने के लिए ग्रीन सिग्नल देने का अधिकार उनके पास नहीं है. ये सर्वाधिकार प्रधानमंत्री के पास सुरक्षित है. इसके साथ ही युद्ध की घोषणा करते हुए भी उन्हें प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में काम कर रही मंत्रिपरिषद की सलाह को ध्यान में रखना होगा.  

राष्ट्रपति को कैसे जानकारी देंगे पीएम

सामान्य हालात में देश की सेनाओं के सुप्रीम कमांडर होने के नाते राष्ट्रपति समय-समय पर राष्ट्र के सुरक्षा परिदृश्य से अवगत होते रहते हैं. लेकिन जब देश परमाणु हमले के साये में हो तो ये स्थिति अलग होती है. ऐसी स्थिति में सुरक्षा के लिहाज से देश के शीर्ष नेतृत्व की गतिविधियां गुप्त रखी जाती हैं. साथ ही पीएम-राष्ट्रपति की लोकेशन की जानकारी भी सरकार के चुनिंदा लोगों को होती है. लिहाजा कहा जा सकता है कि भारत के सामने परमाणु हमला करने का विकल्प चुनने की नौबत आई तो पीएम इसकी सूचना राष्ट्रपति को कब कैसे और किस देंगे ये उस समय के हालात पर निर्भर करता है. दुनिया भर की सरकारें भी इस मामले में इसी पॉलिसी का पालन करती है. 

बता दें कि मानव इतिहास में परमाणु हमला करने और इसका अभिशाप झेलने का कटु अनुभव विश्व के दो ही देशों अमेरिका और जापान के पास है. इसलिए इन घटनाओं के दौरान किस तरह का चेन ऑफ कमांड फॉलो किया गया इसकी ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाती है. इस वक्त रूस परमाणु हथियारों के मामले में शिखर पर बैठा है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (फाइल फोटो- पीटीआई)

कोल्ड वार के दौर में कट्टर दुश्मनी निभा चुके अमेरिका और रूस ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि ये देश अभी भी 30 मिनट में एटमी हमला कर सकते हैं. बीबीसी की एक रिपोर्ट में इसके बारे में बताया गया है. इस रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रपति की ओर से बस एक इशारा मिलने भर की देर है कि एक मिनट के अंदर इन मिसाइलों को टारगेट की ओर रवाना किया जा सकता है. बीबीसी ने अमेरिका के पूर्व मिसाइल लॉन्च अधिकारी का हवाला दिया है. 

मिनट में मिसाइल लॉन्च कर सकते हैं अमेरिका के मिनटमैन

अमेरिका के पूर्व मिसाइल लॉन्च ऑफिसर ब्रूस ब्ला 70 के दशक में अमेरिका की खुफिया एटमी मिसाइलों पर काम कर चुके हैं. ब्रूस के अनुसार उनकी टीम के लोगों को मिनटमैन कहा जाता था. ऐसा इसलिए क्योंकि राष्ट्रपति का आदेश मिलने पर वे एक मिनट के अंदर न्यूक्लियर मिसाइल लॉन्च कर सकते थे. इससे समझा जा सकता है कि दोनों देशों के बीच तनाव का स्तर क्या रहा होगा. क्योंकि मिसाइल लॉन्चिंग में जरा सी भी देरी स्वीकार्य नहीं होती. ध्वनि की स्पीड से ज्यादा की गति से चलने वाली ये मिसाइलें एक मिनट में सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर फर्स्ट हिट का लाभ उठा सकती हैं और युद्ध की दशा-दिशा ही बदल सकती हैं. भारत के संदर्भ में इन बेहद संवेदनशील और अति महत्वपूर्ण क्षणों में परमाणु हमले की जानकारी कब और किसे देना है ये प्रधानमंत्री ही तय कर सकते हैं. ब्रूस बताते हैं कि शीत युद्ध के दौर में उनकी टीम हर समय कंप्यूटर मॉनिटर की निगरानी करती रहती थी, जिस पर किसी समय भी मिसाइल लॉन्च करने का आदेश आ सकता था. 

मिलिट्री एक्सपर्ट बताते हैं कि अगर रूस मिसाइल से अमेरिका पर हमला करता है, तो वहां से अमेरिका तक मिसाइल पहुंचने में मात्र 30 मिनट लगेंगे. समंदर की पनडुब्बी से छोड़ी गई मिसाइल तो मात्र 15 मिनट में अमेरिका में तबाही मचा देगी. अमेरिका की तकनीक इतनी उन्नत है कि वो मिसाइल की ट्राजेक्टरी देखकर पता लगा लेता है कि उसके आसमान में दुश्मन की मिसाइल आने वाली है. ऐसी स्थिति में अमेरिका के पास इस आक्रमण का उत्तर देने के लिए मिनटों का समय होता है. यही वजह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति जिन्हें परमाणु हमला करने का अधिकार है हमेशा अपने साथ न्यूक्लियर फुटबॉल लेकर चलते हैं. 

इस फुटबॉल में वो संवेदी यंत्र होते हैं जिनकी मदद से अमेरिकी राष्ट्रपति स्ट्रैटेजिक कमांड के चीफ और उप-राष्ट्रपति समेत कुछ वीआईपीज से संवाद स्थापित कर सकते हैं और परमाणु हमले का फैसला ले सकते हैं. 

जब बज उठा था न्यूक्लियर ब्रीफकेस का अलॉर्म

अमेरिका की तरह रूस के राष्ट्रपति के पास भी परमाणु हमले का अधिकार होता है. अपने प्रतिद्वंद्वी अमेरिका की तरह रूस के राष्ट्रपति भी एटमी कोड वाला ब्रीफकेस साथ लेकर चलते हैं. बीबीसी के अनुसार रूसी गणराज्य पर किसी हमले की दशा में इस ब्रीफ़केस का अलार्म खतरे का सिग्नल देने लगता है. लाइटें जलने लगती हैं. इसके बाद रूसी राष्ट्रपति का एक्शन शुरू होता है. इस कमाल के ब्रीफकेस से ही राष्ट्रपति अपने कमांडरों, डिप्टी चीफ और दूसरे अहम व्यक्ति से बात कर सकते हैं. इसके लिए किसी फोन की जरूरत नहीं होती है और वे स्थिति का आकलन करते हुए कुछ ही मिनटों में अगले एक्शन का आदेश दे सकते हैं.  25 जनवरी 1995 को जब बोरिस येल्तसिन USSR के राष्ट्रपति थे तो उनके न्यूक्लियर ब्रीफकेस का अलॉर्म एक बार बजा था. हालांकि ये अलार्म फेक था और दुनिया परमाणु हमले की तबाही का दंश झेलने से बच गई थी.

परमाणु हमले के बाद बनने वाला Mushroom cloud. (प्रतीकात्मक तस्वीर-Getty)

कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसी किसी भी स्थिति में प्रतिक्रिया देने के लिए समय बेहद कम होता है और इस कम लेकिन नाजुक क्षण में राष्ट्राध्यक्षों को अति सावधानी के साथ फैसला लेना होता है.

सर्जिकल हो या एयर स्ट्राइक, हमले के तुरंत बाद राष्ट्रपति से मिलने गए PM मोदी

न्यूक्लियर हथियारों के प्रयोग को लेकर भारत का अनुभव भले ही व्यापक न रहा हो लेकिन हाल के सालों में जब भी देश की सरकार ने पाकिस्तान को लेकर बड़े सैन्य अभियान किए. संविधान की भावना के अनुरूप सरकार ने तुरंत इसकी सूचना राष्ट्रपति को दी. 

सर्जिकल स्ट्राइक के तुरंत बाद राष्ट्रपति को किया फोन

साल 2016 में 18 सितंबर को उरी में आतंकी हमले के बाद भारत ने सीमा पार बैठे आतंकियों को सबक सिखाने का निर्णय लिया. 28-29 सितंबर की दरम्यानी रात को नियंत्रण रेखा पारकर इंडियन आर्मी के पैरा कमांडों पाक अधिकृत कश्मीर में पहुंचे और वहां मौजूद आतंकियों को मार गिराया. साथ ही उनके लॉन्च पैड को ध्वस्त कर दिया. 29 सितंबर को ही दिन में पीएम मोदी ने फोन के जरिए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को घटना की पूरी जानकारी दी. इसके बाद 1 अक्टूबर 2016 को पीएम मोदी ने प्रणब मुखर्जी से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की थी और इंडियन आर्मी के ऑपरेशन के बारे में उन्हें बताया.  

बालाकोट एयरस्ट्राइक के कुछ ही घंटे बाद राष्ट्रपति से मिले PM मोदी

फरवरी 2019 में ऐसा मौका आया जब एक बार फिर भारत ने पाकिस्तान की हिमाकत को चूर-चूर कर दिया. पुलवामा में पाकिस्तान की कायराना हरकत के बाद भारत  ने 26 फरवरी 2019 की रात को पाकिस्तान को घर में घुसकर मारा. भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट शहर में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों को मिराज लड़ाकू विमानों से टारगेट किया और जैश के ठिकाने को मिट्टी में मिला दिया. इस हमले में जैश के कमांडर समेत बड़ी संख्या में पाकिस्तानी आतंकी मारे गए थे. कुछ ही घंटों बाद 26 फरवरी की सुबह प्रधानमंत्री मोदी ने इस घटना की जानकारी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को दी थी.

 

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