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SSC Sting Exclusive: बंगाल में 121वें रैंक वाला बन गया टीचर, 95 रैंक वाला बेरोजगार, SSC भर्ती में ऐसे हुई धांधली

पश्चिम बंगाल (West Bengal) में हुए शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़े कुछ नए राज आजतक सामने लाया है. पता चला है कि कुछ ऐसे शिक्षक भी हैं जिनको ठीक रैंक ना होने के बावजूद नौकरी मिली, वहीं कुछ अच्छी रैंक लाने के बावजूद बेरोजगार रह गए.

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सफीकुल हक और इलियास बिस्वास
सफीकुल हक और इलियास बिस्वास

SSC Sting Operation Exclusive: पश्चिम बंगाल का शिक्षक भर्ती घोटाला इन दिनों चर्चा में है. इस मामले में सीएम ममता बनर्जी के खास और मंत्री रहे पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार किया जा चुका है. उनकी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी भी फिलहाल जेल में हैं. अर्पिता के घर से ईडी को करीब 50 करोड़ रुपये कैश मिला था. बताया गया कि यह पैसा वही था जिसको शिक्षक भर्ती के दौरान रिश्वत के तौर पर वसूला गया.

शिक्षक भर्ती घोटाला बंगाल में लंबे वक्त तक चला, जिसकी परतें धीरे-धीरे खुल रही हैं. मामले में कई याचिकाएं दायर हुईं. सीबीआई जांच के 10 बार कोर्ट ने ऑर्डर दिए. फिर पांच FIR हुई और करीब एक हजार लोगों की नौकरी छीनी गई, क्योंकि उसके सिलेक्शन प्रोसेस में गड़बड़ी होने की बातें सामने आईं.

हालांकि, कुछ लोग अभी भी ऐसे हैं जिनको कम रैंक के बावजूद नौकरी मिली और कोर्ट की चाबुक अभी उनतक नहीं पहुंची है और नौकरी जारी है. ऐसे ही एक शख्स हैं सफीकुल हक जो कि नॉर्थ 24 परगना के गोपालपुर में रहते हैं. उनको 2020 में गोपालपुर पॉपुलर अकैडमी स्कूल में हिस्ट्री टीचर के रूप में नौकरी मिली थी.
 
आजतक को RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, सफीकुल हक की 121 रैंक थी और उनका नाम OBC उम्मीदवारों की वेटलिस्ट में था. फिर भी पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग ने उनके नाम की सिफारिश की और एक महीने के अंदर उनको अपाइंटमेंट लेटर मिल गया.

हमने इस बारे में सफीकुल हक से भी बात की. वह बोले कि उनका सिलेक्शन करना नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता  है. 

आजतक रिपोर्टर ने पूछा- आपकी रैंक क्या थी?
सफीकुल का जवाब- 121
सवाल- आपका सिलेक्शन कैसे हुआ?
जवाब- आप इसके बारे में कमीशन से पूछ सकते हैं.

मेरिट को दरकिनार किया गया, अबतक बेरोजगार 95 रैंक वाला

लिस्ट पर सवाल खड़े होने की वजह अब हम आपको बताते हैं. 121 रैंक के बावजूद हक का सिलेक्शन हो गया, लेकिन इलियास बिस्वास जिनकी रैंक उसकी मेरिट लिस्ट में 95 थी, वह अबतक बेरोजगार हैं. इलियास बिस्वास कहते हैं जिनकी रैंक मुझसे कम थी, उनको नौकरी मिल गई. लेकिन मैं अबतक इसके लिए संघर्ष कर रहा हूं. यह अन्यायपूर्ण और अनुचित है.

'मुझे बलि का बकरा बनाया गया'

एक उदाहरण एसके इंसान अली का भी है. उनको 2020 में कम रैंक के बावजूद नौकरी मिली थी. लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट में मामला जाने के बाद एक साल के अंदर वह नौकरी छिन गई. अली उन हजार लोगों में शामिल थे जिनको सिलेक्शन प्रोसेस में हुए संदिग्ध उल्लंघन की वजह से नौकरी से निकाला गया था. 2016 में शुरू हुए इस सिलेक्शन प्रोसेस से बंगाल के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में नॉन टीचिंग कर्मचारियों की भर्तियां हुई थीं.

इंसान अली का मानना है कि उनको इस मामले में बलि का बकरा बनाया गया. वह कहते हैं कि मुझे मूर्ख बनाया गया. उस वक्त नियुक्ति में हो रही देरी की वजह से प्रदर्शन हो रहे थे. उन प्रदर्शनों को खत्म करने के लिए मुझे नौकरी दी गई थी.

जमीन बेचकर रिश्वत दी, फिर नौकरी भी चली गई

शिक्षक भर्ती घोटाले में West Bengal Trinamool Primary Teachers Association की भूमिका सवालों के घेरे में है. हुगली जिले में मौजूद सरकारी मदद से चलने वाले स्कूल के प्राइमरी सेक्शन के हेडमास्टर सुशांत भट्टाचार्य ने बताया कि वह भी उस एसोसिएशन का हिस्सा हैं. सुशांत ने दावा किया कि यह टीचर्स विंग एक सिंडिकेट की तरह काम करती है, जहां अयोग्य उम्मीदवार जुगाड़ करके नौकरी पाते हैं.

सुशांत भट्टाचार्य ने अपने ही स्कूल के दो टीचर्स का किस्सा सुनाया. नाम थे चंद्रिमा देव और सुमना नेयोगी. भट्टाचार्य के मुताबिक, दोनों ने स्कूल में नौकरी पाने के लिए 15-15 लाख रुपये रिश्वत दी थी. हालांकि, बाद में कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उनकी नौकरी चली गई थी.

भट्टाचार्य ने आगे बताया कि चंद्रिमा का बेटा 12 साल का था. उसका पति मुश्किल से 10-12 हजार रुपये कमा पाता था. उन्होंने कुछ जमीन बेचकर किसी तरह नौकरी की रिश्वत के लिए पैसे जुटाए थे. हेडमास्टर ने दावा किया कि रिश्वत सीधे तौर पर टीएमसी टीचर्स एसोसिएशन को दी जाती थी.

 

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