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‘निरोध’ की विकास यात्रा... कैसे 'कामराज' बनते-बनते रह गया कंडोम?

कंडोम भारत में निरोध के नाम से बिकता है. निरोध यानी कि सुरक्षा. भारत में आबादी की समस्या आज नहीं बल्कि आजादी के समय से ही थी. आजादी मिलते ही तत्कालीन नेहरू सरकार ने परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया. भारत में कंडोम लॉन्च करने पर सहमति बनी थी. समस्या थी कि नाम क्या दिया जाए? एक नाम उभरकर आया कामराज. लेकिन तब कामराज नाम का एक शख्स भारत की राजनीति में शीर्ष पर बैठा हुआ था.

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भारत में कंडोम को कैसे मिला 'निरोध' नाम.
भारत में कंडोम को कैसे मिला 'निरोध' नाम.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सेफ सेक्स इंसान की प्राथमिकता में शामिल रहा है
  • कंडोम की विकास यात्रा कई पायदानों से होकर गुजरी है
  • निरोध का प्रयोग फैमिली प्लानिंग का अहम हिस्सा रहा है

कभी टैबू, कभी झिझक तो कभी जिज्ञासा... कंडोम को लेकर इंसान के मन में उतने ही सवाल रहे हैं जितनी तहों में लिपटकर रबर का ये टुकड़ा हमारे-आपके बीच आता है. सभ्यता के विकास के क्रम में इंसान जब जिंदगी जीने का सलीका सीखने लगा तब मर्दों-औरतों को सुरक्षित यौन संबंध (Safe sex) की जरूरत महसूस हुई. वह यौन संचारित बीमारियों से बचना चाहता था. वह यौन-संगति चाहता था, लेकिन संतति उसे नहीं चाहिए थी.

इस 'काम' के लिए समाज के सयाने लोगों ने आस-पास देखना-सीखना और परखना शुरू किया. इतिहास कहता है कि 1640 ईस्वी में भेड़-बकरी की आंत का इस्तेमाल इंग्लैंड के सैनिक कंडोम के रूप में करते थे. 1645 में अंग्रेज कर्नल (Colonel Quondam) ने इसे आकार दिया और पूर्ण रूप से विकसित किया.

तब इसका कोई नाम नहीं था लिहाजा इसे कर्नल Quondam के नाम पर ही लोग दबे-छुपे पुकारने लगे. अपनी-अपनी बोलियों और भाषाओं में बोलते रहे. यूरोप में सैकड़ों सालों तक घिस-पिटकर, कट-छटकर लज्जा का आवरण ओढ़े ये संबोधन धीरे-धीरे आज का कंडोम (Condom) बन गया. 

बकरी की आंत, सिल्क के धागे, लिनेन के कपड़े, कछुए की खाल के रूप में कंडोम लोगों के निजी पलों तक पहुंच बनाता रहा. वक्त के साथ साथ इसकी उपादेयता बदलती रही. इसके इस्तेमाल में व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार सुरक्षा के साथ-साथ लग्जरी और यौन स्वच्छंदता का भाव भी जुड़ता गया. लेकिन 1860 में जो हुआ उसने बर्थ कंट्रोल की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया.

एक अमेरिकी रसायन विज्ञानी थे चार्ल्स गुडइयर. वे लंबे समय से रबर की प्रकृति पर दिमाग खपा रहे थे. रबर जो कि ठंडा होने पर बहुत सख्त होता है और गरम होने पर बहुत नरम. गुडइयर इस रबर को इलास्टिक बनाने की कोशिश कर रहे थे. 1860 में उन्हें वो फार्मूला मिला गया. इसी के साथ कंडोम के प्रोडक्शन में क्रांतिकारी बदलाव हुआ. 

अब इस चीज में मजबूती थी. यूज करने संबंधी दिक्कतें इससे जाती रहीं. इसमें इलास्टिसिटी थी. लेकिन सिंगल यूज कंडोम का कॉन्सेप्ट अबतक नहीं आया था. यूरोप अमेरिका में कंपनियों ने लोगों से कहा कि रबर से बने कंडोम को धोकर फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है. प्रयोग चलते रहे. इस बीच यौन संचारित रोग की वजह से इसका इस्तेमाल बढ़ता रहा.

वर्ष 1920 आया, इसी साल लेटेक्स की खोज हुई. लेटेक्स से बना कंडोम नये अवतार में सामने आया. जो ज्यादा सॉफ्ट, ज्यादा लचीला (Tensile) था.  इस खोज ने कंडोम को सर्वसुलभ बना दिया. अब इसका प्रोडक्शन बड़े पैमाने पर होने लगा, साथ ही इसकी कीमतें भी पहले के मुकाबले काफी कम हुई और अब ये मध्य वर्ग की पहुंच तक आ चुका था. इस तरह सिंगल यूज कंडोम का चलन शुरू हुआ. इसके साथ ही इसकी सामाजिक और निजी स्वीकार्यता भी बढ़ी. द्वितीय विश्व युद्ध तक इसका मॉस प्रोडक्शन शुरू हुआ और सरकारें दुनिया भर में फैले अपने सैनिकों को कंडोम बांटने लगीं. समय के साथ निजी कंपनियां इस प्रोडक्ट में रोमांच और रोमांस का इनपुट बढ़ाती जा रही थीं. 

कहानी कंडोम के सरकारी संस्करण निरोध की

अब बात भारत की. यानी कहानी इसी कंडोम के सरकारी संस्करण निरोध की. कंडोम भारत में सरकारी हिंदी का लिबास ओढ़कर नहीं आया था. सरकार चाहती थी कि इसका नाम प्रेम और काम के देवता कामदेव के छद्मनाम पर कामराज रखा जाए. लेकिन भले ही शेक्सपीयर ने कहा हो कि नाम में क्या रखा है? भारत में तो नाम पर तो लंबी चौड़ी राजनीति हो जाती है. यहां भी एक राजनीति घुस गई और कंडोम कामराज बनते-बनते रह गया.

ये कहानी हम आपको बताएं इससे पहले ये जानना जरूरी है कि जिस कंडोम को यूरोप-अमेरिका में 1860 में ही स्वीकार्यता मिल गई थी उसे भारत आने में 100 साल की देरी कैसे हो गई? 

जी हां, भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत जनसंख्या नियंत्रण के लिए सरकार ने 1960 के दशक में मुफ्त कंडोम वितरण कार्यक्रम शुरू किया. पूरे 100 साल बाद. खैर भारत की तत्कालीन प्राथमिकताओं पर गौर करें तो इस फासले को कोई बहुत बड़ा गैप नहीं माना जा सकता है. 

आजादी के लिए संघर्ष कर रहे भारत में आबादी की समस्या पर बात होगी ये सोचना बेमानी था. अंग्रेजों का एजेंडा उनके विशुद्ध व्यावसायिक लाभ से संचालित होता था. बंगाल अकाल, प्लेग, हैजा, चेचक जैसी बीमारियों की त्रासदी झेल रहे भारत के लिए ब्रिटिश सरकारें जनसंख्या नियंत्रण पर काम करती, ये उम्मीद करना ही गोरी नस्ल की फितरत के साथ ज्यादती था.

हालांकि भारत तब भी जनसंख्या विस्फोट से पैदा हुई दिक्कतों का सामना कर रहा था. 1950 में भारत की आबादी 37.6 करोड़ थी. नए-नए स्वतंत्र हुए भारत के लिए इतनी बड़ी आबादी का पेट भरना नेहरू की टीम के लिए मुश्किल हो रहा था. इसलिए भारत ने संविधान लागू होने के तुरंत बाद 1952 में ही राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू कर दिया. इस कार्यक्रम के जरिए नेहरू का मकसद न सिर्फ जनसंख्या वृद्धि दर को रोकना था बल्कि प्रजनन स्वास्थ्य को बढ़ावा देना, मातृ, शिशु और बाल मृत्यु दर को रोकना भी था. 

राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत सरकार ने तय किया कि देश में बड़े पैमाने पर कंडोम को मुफ्त बांटा जाए. सरकार ने इसके लिए सोशल मार्केटिंग का सहारा लिया. सरकार की योजना थी कि जनता धीरे-धीरे परिवार नियोजन के इस मुफ्त साधन को अपनाएगी. इससे लोगों को यौन रोगों से राहत मिलेगी. साथ ही जनसंख्या पर नियंत्रण कायम होगा. हालांकि भारत में कंडोम 1940 से ही बिक रहा था. लेकिन पहुंच की बात करें तो यह अंग्रेजों और चन्द अमीरों तक ही सीमित था.

कंडोम का भारत में नाम क्या हो? IIM ने दिया जवाब

1963-64 में योजना शुरू की जानी थी. लेकिन तबतक कंडोम को न तो भारतीय नाम दिया गया था न ही इसकी ब्रांडिंग हुई थी. भारत सरकार इस प्रोडक्ट का नाम भारतीय पौराणिक कहानियों में काम यानी कि सेक्स के देवता के नाम पर चर्चित रहे कामदेव के नाम पर रखना चाहती थी. अंतिम नाम कामराज तय हुआ. लेकिन कंडोम जैसे प्रोडक्ट के लिए इस नाम को रखने और परखने में सरकारी हुक्मरानों ने देश की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति की भयानक अनदेखी की थी. 

के कामराज 1964 से लेकर 1967 तक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे.

ये वो दौर था जब आजादी के बाद कांग्रेस लगातार देश की सत्ता पर काबिज थी. और 1964 में कांग्रेस के इसी अध्यक्ष का नाम था के कामराज. अब आपको समझ में आ गया होगा कि कंडोम का नाम कामराज रखने कि सोचने वाले नेताओं-अफसरों ने क्या गलती की थी? 1964 में के कामराज देश पर शासन करने वाली पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष थे. तब कामराज भारतीय राजनीति में किंगमेकर की भूमिका में थे. 1963 में बेहद चर्चित कामराज प्लान को अमल में लाकर कामराज नेहरू की गुड बुक्स में टॉप पर पहुंच चुके थे. इस प्लान के तहत खुद कामराज समेत देश के 6 राज्यों के मु्ख्यमंत्रियों और उतने ही केंद्रीय मंत्रियों ने इस्तीफा दिया और कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने में जुट गए थे. नेहरू को ऐसे काबिल स्टेट्समैन की जरूरत थी. उन्होंने तमिलनाडु के इस राजनेता को 1964 में कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया. 27 मई 1964 को नेहरू का निधन हो गया. तब कामराज ने किंगमेकर का रोल निभाया और लाल बहादुर शास्त्री को देश का पीएम बनवाया. बता दें कि आज यानी कि 15 जुलाई को के कामराज की 119वीं जयंती है. 

के. कामराजः वो कांग्रेसी जिसके प्लान ने 6 मुख्यमंत्रियों से इस्तीफे दिलवा दिए 

साफ है कि ऐसी विराट शख्सियत वाले व्यक्ति के नाम पर कंडोम का नाम कैसे रखा जा सकता था. कुछ मुखर विरोध हुए, कुछ संकेतों की भाषा में. फिर वैकल्पिक नाम की तलाश शुरू हुई. कई नाम सुझाए गए और काटे गए. ऐसे मौके पर काम आया नेहरू द्वारा ही स्थापित भारत के प्रीमियम माइंड को पोषित करने वाला संस्थान IIM. आईआईएम के एक छात्र ने नाम सुझाया निरोध. जिसका हिन्दी में अर्थ होता है सुरक्षा. इस नाम को आसानी से हरी झंडी मिल गई और देखते ही देखते इस कंडोम ने इतिहास बना दिया. 

1964 में भारत की आबादी बढ़कर 47 करोड़ हो चुकी थी. भारत ने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, फोर्ड फाउंडेशन और आईआईएम कोलकाता की मदद से निरोध को लेकर व्यापक अभियान शुरू किया. सोशल मार्केटिंग पर ज्यादा जोर दिया गया. लेकिन इसकी कीमतें आड़े आ रही थीं. 1968 में एक कंडोम की कीमत एक चवन्नी यानी कि 25 पैसे थी और ये कीमत अमेरिका के लगभग बराबर थी. 

1964 में भारत में निरोध का मुफ्त वितरण शुरु हुआ.

अमेरिका के एमआईटी के प्रोफेसर पीटर किंग की अगुआई में सरकार ने आईआईएम कोलकाता को निरोध की सफलता के लिए उपाय बताने को कहा. आईआईएम ने कहा कि चूंकि देश में कंडोम का पर्याप्त उत्पादन नहीं हो पा रहा है. इसलिए इसे बड़ी संख्या में विदेशों से आयात किया जाए और कीमत इतनी रखी जाए कि आम भारतीय आसानी से खरीद सके. इसके बाद 1968 में अमेरिका, जापान और कोरिया से 40 करोड़ कंडोम का आयात किया गया. निरोध नाम से इसकी ब्रांडिंग की गई और भारत के बाजार में इसकी कीमत रखी गई 5 पैसे में एक. एक पैकेट में तब 3 कंडोम बिकते थे. 

भारत ने निरोध की सप्लाई बढ़ाने के लिए तीन स्तर की रणनीति अपनाई. देश के स्वास्थ्य केंद्रों में इसकी मुफ्त सप्लाई की गई. जहां इसे बिना पैसे के बांटा जा रहा था. इसकी सोशल मार्केटिंग शुरू गई और आखिरकार कमर्शियल मार्केटिंग पर जोर दिया गया. शुरुआत के कुछ सालों में झिझक, हिचक, सामाजिक मान्यताएं लोगों को निरोध के इस्तेमाल से दूर रखे रहीं. लेकिन सरकारी कार्यक्रमों और विज्ञापनों की वजह से स्थितियां धीरे-धीरे बदलने लगीं. 1966 में भारत सरकार ने केरल के तिरुअनंतपुरम में कंडोम बनाने वाली सरकारी फैक्ट्री हिन्दुस्तान लेटेक्स लिमिटेड की स्थापना की.  

कंडोम का प्रयोग भारत में जनसंख्या के ग्राफ पर व्यापक असर लेकर लाया. हालांकि भारत की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन हमारी जनसंख्या वृद्धि दर में लगातार कमी हो रही है. 1964 में भारत की जनसंख्या बढ़ोतरी दर 2.4 थी जो कि 2005 में  घटकर 1.80 फीसदी हो गई. 10 साल बाद 2015 में इसमें और गिरावट हुई और ग्रोथ रेट 1.26 रह गया. इस गिरावट का काफी श्रेय निरोध के व्यापक इस्तेमाल को जाता है. इसके सामाजिक असर भी हुए. महिला सशक्तिकरण की दिशा में निरोध की अवधारणा को क्रांतिकारी कदम माना जाता है. भारत जैसे देश में जहां मेडिकल सुविधाएं अभी भी दूर की कौड़ी हैं वहां महिलाओं को अनचाहे गर्भ से मुक्ति मिली. अपने शरीर को लेकर महिलाओं में आधिकारिता की भावना आई. वे गैरजरूरी मातृत्व से इतर जीवन के अन्य पहलुओं पर फोकस कर पाने में सक्षम हुईं. दुनिया की फैशन आइकॉन और सिंगर लेडी गागा कहती हैं- You must always remember, the most important fashion accessory is the condom.

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