scorecardresearch
 

रेगिस्तानी राजस्थान में बाढ़, मैदानी इलाकों में कम बारिश, बड़े मौसमी खतरे की आहट! आंकड़ों से समझिए

Changing Course of Indian Floods: जलवायु परिवर्तन के कारण देश में बाढ़ का पैटर्न बदल रहा है. जिन इलाकों में बाढ़ का खतरा कम रहता था, वहां अब बाढ़ से तबाही की तस्वीरें सामने आ रही हैं. वहीं, मैदानी इलाकों में कम बारिश हो रही है. आइए आंकड़ों से समझें कैसे बदल रहा बाढ़ का पैटर्न.

X
Changing Course of Indian Floods (Representational Image)
Changing Course of Indian Floods (Representational Image)

देश के कई राज्यों में मॉनसून की आफत वाली बारिश देखने को मिली है. कर्नाटक के कई इलाकों में भारी बारिश के बीच तबाही देखने को मिली है. पिछले हफ्ते बेंगलुरु से बाढ़ की तस्वीरें सामने आईं. सिलिकॉन सिटी बेंगलुरु में हुई लगातार बारिश से आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त था. लोग अपने घरों को छोड़ने को मजबूर हो गए थे. सुरक्षित स्थानों पर रहने के लिए लोग दूसरी जगहों पर पहुंचे थे. इस मॉनसून के सीजन में बेंगलुरु ने औसत से 150 प्रतिशत ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की. बेंगलुरु को बाढ़ और बारिश के कारण लाखों रुपयों का घाटा उठाना पड़ा है.

मौसम विभाग के मुताबिक, अगस्त के आखिरी सप्ताह और सितंबर के पहले सप्ताह में बेंगलुरु में औसत से पांच से सात गुना अधिक बारिश हुई है. इस बारिश के लिए बेंगलुरु तैयार नहीं था. हालांकि, इसके पीछे कारण है. बेंगलुरु और कर्नाटक के बाकी हिस्सों को पारंपरिक रूप से बाढ़ प्रवण (Flood Prone) नहीं माना जाता है. उसके बावजूद, 11 सितंबर तक, बाढ़ के कारण कम से कम 123 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, ये आंकड़े देश में होने वाली ऐसी सभी मौतों का सात प्रतिशत हैं. 
  
कर्नाटक में बाढ़ की स्थिति चौकाने वाली बात नहीं है. जैसे-जैसे जलवायु संकट बिगड़ता है, और मौसम का मिजाज बदलता है, गैर-पारंपरिक इलाकों में और बाढ़ आ सकती है. देश के कई हिस्सों में ऐसा दिखाई दे चुका है. कर्नाटक के अलावा, 2022 में हिमाचल प्रदेश (17 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (15 प्रतिशत) और असम (11 प्रतिशत) में बाढ़ की घटनाओं से मौत की खबरें सामने आई हैं. कुल मिलाकर, देश में अब तक हुईं 1,804 मौतों में से 70 प्रतिशत से अधिक के लिए राजस्थान (पांच प्रतिशत) समेत सिर्फ सात राज्य जिम्मेदार हैं. 

बाढ़ का बदलता पैटर्न

इंडिया टुडे के डेटा इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) से बात करते हुए, IIT रुड़की के प्रोफेसर दीपक खरे ने कहा, "पिछले कुछ वर्षों में, जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा वितरण बदल गया है. बारिश की तीव्रता में वृद्धि और बारिश के दिनों की घटती संख्या से संकेत मिलता है कि देश को पानी से जुड़े बड़े संकट से निपटने के लिए अभी से तैयारियां तेज़ कर देनी चाहिए. कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य बाढ़ प्रोन राज्यों में से नहीं हैं. हालांकि,आंकड़े बताते हैं कि इन राज्यों में पिछले एक दशक में बाढ़ से होने वाले नुकसान में बढ़ोतरी देखी गई है.

पिछले 70 साल में देश में बाढ़ से संबंधित सभी मौतों के लिए कर्नाटक से 3.4 प्रतिशत मौतें रिकॉर्ड हुई हैं. हालांकि, ये आंकड़ा 2011 से बढ़कर 7.3 फीसदी हो गया और 2016 से 2020 के बीच 8.1 फीसदी रहा है. इसी तरह मध्य प्रदेश में 1953 से 2020 तक बाढ़ संबंधित घटनाओं से लगभग 3 मौतें रिकॉर्ड हुईं. पिछले दस वर्षों में यह संख्या बढ़कर 9.9 प्रतिशत और पिछले पांच वर्षों में 12.3 प्रतिशत हो गई, जिसके लिए डेटा उपलब्ध है. 

Floods

2011 से 2020 के बीच क्षेत्र के मामले बाढ़ प्रभावित राज्यों में मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, बिहार और राजस्थान शामिल हैं. बिहार को छोड़कर, बाकी राज्यों में बाढ़ का खतरा नहीं रहता है. हाल के वर्षों में राजस्थान में बाढ़ ने जिस तरह का नुकसान किया है, वो चिंता की बात है. पिछले पांच सालों में देश में बाढ़ से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में राजस्थान लगभग 11 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है. 1953 में यही आंकड़ा 4.5 प्रतिशत था. डेटा से पता चलता है कि केरल, जहां कई जल निकाय होने के कारण कभी-कभी बाढ़ आती थी, हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2018 में वहां भारी तबाही देखी गई. 

वहीं, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यो में, जहां बाढ़ का खतरा आम है, वहां, मौत के आंकड़ों में मामूली कमी दर्ज की गई है. न केवल बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बदलाव हो रहा है बल्कि बाढ़ और जानलेवा होती जा रही है. बाढ़ के कारण हर साल होने वाली मौतों की औसत संख्या पिछले 70 वर्षों में 1,676 से बढ़कर पिछले दशक में 1,815 हो गई है. पिछले पांच वर्षों में ये आंकड़ा बढ़कर 1,978 हो गया है. 
 
प्रोफेसर खरे के मुताबिक, भूमि उपयोग और शहरीकरण में भारी बदलाव के कारण अभेद्य सतहों में वृद्धि हुई है और नेचुरल रिचार्ज जोन में कमी आई है, जिसके कारण सड़कों पर बार-बार बाढ़ आती है. इसके अलावा, शहरों में अपर्याप्त जल निकासी की व्यवस्था मौजूदा समस्या को और बढ़ा देती है. 

(क्षितिज अरोड़ा के इनपुट सहित)

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें