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Maharashtra: उद्धव की मुंबई 'सेना' पर भारी पड़ी शिंदे की 'महा सेना', अब दुर्ग बचाने का संकट

महाराष्ट्र के सियासी महाभारत का पटाक्षेप एकनाथ शिंदे की ताजपोशी के साथ भले ही हो गया हो, लेकिन शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का संकट अभी खत्म नहीं हुआ है. शिंदे की बगावत के चलते शिवसेना के 2 तिहाई विधायक उद्धव का साथ छोड़ चुके हैं, जिसके चलते ठाकरे खेमे में सिर्फ मुंबई के नेता ही बचे हैं. ऐसे में मुंबई से बाहर कैसे उद्धव ठाकरे दोबारा पार्टी को खड़ी करेंगे?

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एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे
स्टोरी हाइलाइट्स
  • महाराष्ट्र में क्या सियासी महाभारत खत्म हो गया है
  • उद्धव ठाकरे के सामने अभी भी सियासी चुनौती है
  • उद्धव के साथ सिर्फ मुंबई के शिवसेना नेता बचे हैं

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की महाराष्ट्र की सत्ता से विदाई के बाद एकनाथ शिंदे सूबे के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं. साथ ही देवेंद्र फडणवीस ने डिप्टी सीएम पद की शपथ ली है. ऐसे में सत्ता कमान हाथों से निकलने के बाद उद्धव ठाकरे की चुनौतियां कम नहीं हुईं, क्योंकि एकनाथ शिंदे शिवसेना के दो तिहाई से ज्यादा विधायकों को अपने पाले में कर रखा है. इस तरह उद्धव ठाकरे के साथ सिर्फ मुंबई के ही शिवसेना नेता बचे रह गए हैं जबकि ठाणे से लेकर कोंकण तक नेता शिंदे के खेमे में हैं. ऐसे में क्या उद्धव की शिवसेना सिर्फ 'मायानगरी' की पार्टी बनकर तो नहीं रह जाएगी? 

शिवसेना के सियासी तूफान की वजह से महा विकास अघाड़ी सरकार को जाना पड़ा तो एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन की सरकार बनी है. गुरुवार शाम एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन अब अगली जंग शिवसेना पर कब्जे को लेकर हो सकती है. एकनाथ शिंदे खेमा इसके संकेत भी दे रहा है तो उद्धव ठाकरे सीएम की कुर्सी और एमएलसी की सीट छोड़कर शिवसेना भवन में बैठने का ऐलान कर दिया है. 

बता दें कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे मुंबई से सटे ठाणे इलाके से आते हैं. शिंदे पुराने शिवसैनिक हैं और वो उन आनंद दिघे के राजनीतिक शिष्य हैं, जिनके होते हुए बालासाहेब ठाकरे भी ठाणे में शिवसेना के काम में दखल नहीं देते थे. आनंद दिघे की उंगली पकड़कर शिंदे सियासत में आगे बढ़े हैं और दिघे के निधन के बाद ठाकरे परिवार के करीबी बने. इस तरह शिंदे ने खुद को महाराष्ट्र के ठाणे से लेकर कल्याण तक मजबूत करने का काम किया.

एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ जब बगावत का झंडा उठाया तो ठाणे से लेकर विदर्भ, उत्तरी महाराष्ट्र और कोंकण तक के शिवसेना विधायक उनके साथ खड़े नजर आए. इस तरह शिंदे ने दिखाया है कि वो कितने ताकतवर हैं. शिवसेना के 53 विधायकों में से 39 विधायक एकनाथ शिंदे के साथ हैं. इस जबरदस्त बगावत के बाद शिवसेना महाराष्ट्र में कैसे खड़ी हो पाएगी और क्या वो मुंबई तक ही सिमट जाएगी, यह एक बड़ा सवाल शिवसेना के सामने खड़ा हो गया है. 

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे, उनके बेटे बाल ठाकरे और पार्टी के तमाम बड़े नेता जैसे अनिल परब से लेकर सुभाष देसाई, संजय राउत, अनिल देसाई, वरुण सरदेसाई ये सभी मुंबई के हैं. इसके अलावा उद्धव के शिवसेना के चीफ व्हिप सुनील प्रभु और विधायक दल के नए नेता बनाए अजय चौधरी भी मुंबई के ही विधायक हैं. शिवसेना के ये तमाम नेता उद्धव ठाकरे के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, लेकिन महाराष्ट्र के बाकी इलाके के शिवसेना के दिग्गज नेता शिंदे के साथ हैं. 

9 मंत्री भी शिंदे के साथ

एकनाथ शिंदे के साथ शिवसेना के विधायक ही नहीं बल्कि ऐसे 9 मंत्री भी खड़े थे, जो उद्धव ठाकरे की सरकार में शामिल थे. शिवसेना कोटे से महा विकास अघाड़ी सरकार में कुल 13 मंत्री बने थे. शिवसेना से विधानसभा चुनाव में जीते 7 मंत्री शिंदे कैंप में शामिल थे. इस फेहरिश्त में एकनाथ शिंदे, गुलाबराव पाटिल, दादा भूसे, संदीपान भुमरे, उदय सामंत, शंभूराजे देसाई और अब्दुल सत्तार थे. 

वहीं, शिवसेना से विधानसभा से जीते हुए केवल आदित्य ठाकरे ही उद्धव के साथ बचे हुए थे और तीन मंत्री विधान परिषद के सदस्य हैं. ऐसे में साफ जाहिर होता है कि शिवसेना के ज्यादातर जनाधार वाले नेता एकनाथ शिंदे के साथ हैं. इनका असर मुंबई से बाहर महाराष्ट्र के दूसरे इलाकों में है. ऐसे में उद्धव ठाकरे के सामने मुंबई से बाहर निकल कर अन्य इलाकों में पार्टी कैडर को फिर से खड़ा करना. 

महाराष्ट्र में शिवसेना के सियासी असर मुंबई से बाहर ठाणे, कल्याण, विदर्भ, उत्तरी महाराष्ट्र और कोंकण में था. ये शिवसेना के सबसे मजबूत बेल्ट माने जाते हैं, जहां पर दूसरी पार्टियां अपना सियासी आधार खड़ा नहीं कर सकी थी. मुंबई से बाहर के इलाकों के शिवसेना नेताओं के एकनाथ शिंदे के साथ जाने पर उद्धव ठाकरे के लिए इस क्षेत्रों में नए तरीके से अपना आधार खड़ा करना होगा. 

बाला साहेब के विचार के खिलाफ नहीं

दिलचस्प बात यह है कि एकनाथ शिंदे की इस पूरी बगावत में एक खास बात यह रही कि उनकी यह बगावत शिवसेना या बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विचारधारा के खिलाफ नहीं थी. उन्होंने इस बगावती एपिसोड में शुरू से अंत तक अपना यह स्टैंड बरकरार रखा कि खुद उद्धव ठाकरे कथित रूप से बाला साहेब के विचारधारा के विपरीत जा रहे हैं और इसलिए उनकी बगावत सिर्फ उद्धव ठाकरे से है. 

एकनाथ शिंदे बार-बार कहते रहे कि वे सभी लोग बालासाहेब ठाकरे के हिंदुत्व को आगे ले जाने का काम करेंगे और वे शिवसेना में ही रहेंगे, क्योंकि चर्चा थी कि वो किसी दूसरी पार्टी में जाएं. बाला साहेब या उनके नेतृत्व में तैयार शिवसेना का हिंदुत्व ब्रांड के सामने एकनाथ अपना ब्रांड इतनी जल्दी या शायद कभी तैयार नहीं कर सकते थे. ऐसे में उनकी बगावत ठाकरे परिवार से शिवसेना का कंट्रोल अपने हाथ में लेने की रही, नया राजनीतिक मोर्चा खोलने की नहीं.

एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे को किनारे करके मुख्यमंत्री पद तक पहुंच चुके हैं, लेकिन उन्होंने पिछले 11 दिनों में यह कभी नहीं दिखाया कि वो सत्ता के लिए यह सब कर रहे हैं. उन्होंने बार-बार उद्धव पर बाला साहेब के विचारधारा को छोड़ने का आरोप लगाया. एकनाथ को सत्ता का लोभ नहीं दिखाने का एक फायदा यह मिला कि उन्हें इस दौरान उद्धव और शिवसेना के कट्टर कार्यकर्ताओं का भी उतना विरोध नहीं देखना पड़ा, जिसकी उम्मीद शायद खुद उद्धव ठाकरे ने कर रखी थी.

बीजेपी जानती थी ब्रांड नेता की कीमत

एकनाथ शिंदे और बीजेपी को भी शायद शिवसेना ब्रांड की कीमत पता थी. अगर एकनाथ शिंदे जल्दबाजी दिखाकर बीजेपी में शामिल हो जाते तब सत्ता से बेदखल ही सही, उद्धव ठाकरे के हाथ में कमजोर शिवसेना की बागडोर होती. लेकिन आज जब एकनाथ शिंदे बिना बीजेपी में शामिल हुए सरकार बना रहे हैं तब उनका दावा पूरे शिवसेना पर कंट्रोल का है.

बगावत करने वाले विधायकों ने निश्चित रूप से अब एकनाथ शिंदे को अपना नेता स्वीकार कर चुके हैं और ऐसे में शिवसेना का बॉस कौन होगा, यह तय करना आसान नहीं होगा. शिवसेना पर कब्जे को लेकर कानूनी जंग अदालतों तक भी पहुंच सकती है. 

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और उनके सिपहसालारों के लिए ढाई साल तक सत्ता का सुख भोगने के बाद अब वक्त असल इम्तिहान का है. उन्हें चकाचौंध वाली मायानगर मुंबई से बाहर निकलकर महाराष्ट्र की खाक छानने और शिवसेना को फिर से खड़ा करने की है. इसीलिए उद्धव ठाकरे ने सत्ता को अलविदा कहने के साथ-साथ एमएलसी पद भी छोड़ दिया और कहा कि अब से शिवसेना भवन में बैठेंगे और पार्टी को फिर से खड़ा करेंगे. ऐसे में देखना है कि उद्धव कैसे मुंबई के बाहर अपना पैर पसारते हैं? 

 

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