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सोशल मीडिया पर शिवसेना का गुस्सा, सामना में लिखा, बेलगाम और निरकुंश हो गई

सामना लिखता है कि पांच-छह वर्षों में ‘सोशल मीडिया’ आया है, इसके बाद गॉसिपिंग के नाम पर निंदा के घोड़े दौड़ने लगे. उस पर किसी भी प्रकार का अंकुश नहीं रहा. कोई भी मामला हो, सोशल साइट्स और सोशल मीडिया क्रिया-प्रतिक्रियाओं से भरा होना चाहिए, मानो ऐसा नियम ही बन चुका है.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (फोटो-पीटीआई) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (फोटो-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 'बेलगाम और निरंकुश हो गया सोशल मीडिया'
  • सामना में सोशल मीडिया यूजर्स पर वार
  • कंगना मामले में शिवसेना की हुई थी आलोचना

शिवसेना के मुख पत्र सामना के आज के संपादकीय में लिखा गया है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर मुंबई की गलत छवि पेश की जा रही है. सामना में कहा गया है कि सोशल मीडिया पर न किसी प्रकार का अंकुश है और न ही मर्यादा. और अगर जब इस पर कार्रवाई की जाती है तो कहा जाता है कि अभिव्यक्ति की आजादी को कुचला गया. 

बता दें कि पिछले कुछ दिनों में सुशांत सिंह राजपूत केस और कंगना रनौत के खिलाफ बीएमसी की कार्रवाई पर महाराष्ट्र सरकार की काफी आलोचना की गई है. 

सामना लिखता है कि पांच-छह वर्षों में  ‘सोशल मीडिया’ आया है, इसके बाद गॉसिपिंग के नाम पर निंदा के घोड़े दौड़ने लगे. उस पर किसी भी प्रकार का अंकुश नहीं रहा. कोई भी मामला हो, सोशल साइट्स और सोशल मीडिया क्रिया-प्रतिक्रियाओं से भरा होना चाहिए, मानो ऐसा नियम ही बन चुका है. इसमें जिम्मेदारी की बजाय अधिकार की बात होने के कारण यहां का हर काम बेकाबू और बेलगाम होता है.

शिवसेना के संपादकीय में लिखा गया है , "पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र और मराठी माणुस इसका अनुभव ले रहा है. मुंबई और महाराष्ट्र को सुनियोजित तरीके से बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया का बाकायदा उपयोग किया जा रहा है. इस गॉसिपिंग का और इस तरीके पर आक्षेप लेने पर अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता की काली बिल्ली आड़े आ जाती है. आवाज दबाने का शोर मचाया जाता है."

अखबार में जस्टिस एन वी रमण का जिक्र करते हुए कहा गया है कि न्यायमूर्ति रमण ने एक कार्यक्रम में कहा था कि देश के न्यायाधीश सोशल साइट्स की जननिंदा और तथ्यहीन गॉसिप के शिकार हो रहे हैं. सामना के मुताबिक कानून ने ही न्यायाधीशों के मुंह को बांध रखा है और ऐसे हालात बने हैं.

 सामना लिखता है कि जस्टिस रमण का इशारा सोशल मीडिया की निरंकुश टीका-टिप्पणी की ओर है. कानूनन हाथ बंधे होने के कारण उसका प्रतिवाद करने में न्याय-व्यवस्था के हाथ भी बंधे हुए हैं. अखबार कहता है कि सवाल यह है कि इन चिंताओं को हुए सोशल मीडिया के बेलगाम लोग कुछ समझदारी दिखाएंगे क्या?

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