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राष्ट्रपति चुनाव: सत्ता हाथ से गई....पार्टी टूटी...क्या फिर भी द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करेंगे उद्धव?

राष्ट्रपति चुनाव में उद्धव ठाकरे किसका समर्थन करेंगे- द्रौपदी मुर्मू या फिर यशवंत सिन्हा? इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिला है. लेकिन शिवसेना सांसदों की हुई बैठक में एक हिंट जरूर मिल गई है.

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पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे (पीटीआई)
पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे (पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • शिवसेना के कई सांसद मुर्मू का समर्थन कर रहे
  • संजय राउत का यशवंत सिन्हा को खुला समर्थन

राष्ट्रपति चुनाव को लेकर एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू और विपक्ष के साझा उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के बीच मुकाबला चल रहा है. कहा जा रहा है कि इस चुनाव में द्रौपदी मुर्मू एक आसान जीत की ओर अग्रसर हैं. कोशिश तो बीजेपी की तरफ से ये की जा रही है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा पार्टियों का समर्थन हासिल हो जाए. इसी कड़ी में महाराष्ट्र के पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे का फैसला भी मायने रखता है.

अभी तक उनकी तरफ से कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा गया है. वे एनडीए उम्मीदवार का समर्थन करने वाले हैं या नहीं, इसे लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन शिवसेना के अंदर जो मूड चल रहा है, उसे लेकर जरूर अटकलों का दौर जारी है. सोमवार को उद्धव ठाकरे ने अपने तमाम सांसदों की एक बैठक बुलाई थी. बैठक में 19 में से कुल 11 सांसद मौजूद रहे थे. उस बैठक के दौरान ज्यादातर सांसदों ने उद्धव से अपील की है कि वे राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करें.

बड़ी बात ये है कि उस मीटिंग में शिवसेना सांसद संजय राउत भी शामिल हुए थे और उन्होंने साफ तौर पर यशवंत सिन्हा को समर्थन देने की बात कही है. वे चाहते हैं कि इस राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना की तरफ से विपक्ष के साझा उम्मीदवार का समर्थन किया जाए. ऐसे में अब फैसला उद्धव ठाकरे के पाले में है, वे मुर्मू के साथ जाने का मन बनाते हैं या विपक्ष का समर्थन कर आगे की राजनीतिक बिसात बिछाते है, इस पर सभी की नजर रहने वाली है.

अब यहां ये जानना जरूरी हो जाता है कि महाराष्ट्र की जैसी सियासत चल रही है, जो घटनाक्रम पिछले दिनों में हो गए हैं, उसे देखते हुए उद्धव ठाकरे का कोई भी फैसला और ज्यादा मायने हो जाता है. कुछ दिन पहले ही उद्धव ने अपनी सत्ता गंवाई है, एकनाथ शिंदे ने उनकी शिवसेना में खुली बगावत कर रखी है, पार्टी इस समय टूटने की कगार पर चल रही है. ऐसी स्थिति में उद्धव अगर फिर भी द्रौपदी मुर्मू के साथ चले जाते हैं तो इसके भी अलग राजनीतिक मायने निकाले जाएंगे. हाल ही में वैसे भी देवेंद्र फडणवीस कह चुके हैं कि सिर्फ कुछ समय के लिए अलग हुए थे. लेकिन अब मुझे लगता है कि हम फिर साथ आ गए हैं. हिंदुत्व के वोट कभी भी बंटने नहीं चाहिए.

उस एक बयान ने इशारा कर दिया है कि भविष्य में एक बार फिर बीजेपी और शिवसेना (उद्धव खेमे के साथ) साथ आ सकती हैं. हिंदुत्व के नाम पर एक बार फिर किसी समझौते पर सहमति बन सकती है. खैर अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है और उद्धव के फैसले का सभी को इंतजार है.

वैसे अगर उद्धव, यशवंत सिन्हा को समर्थन देने की बात करते हैं, इसका कनेक्शन सीधे-सीधे 2024 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जाएगा. लोकसभा के साथ-साथ 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा को लेकर भी स्थिति स्पष्ट हो पाएगी. हाल ही में एनसीपी प्रमुख शरद पवार कह चुके हैं कि वे इस महा विकास अघाडी को आगे भी जारी रखना चाहते हैं. उनकी निजी राय है कि आने वाला विधानसभा चुनाव तीनों पार्टियों को साथ मिलकर लड़ना चाहिए.

अब उद्धव ठाकरे का राष्ट्रपति चुनाव को लेकर जो भी फैसला होगा, वो कई बातों को ध्यान में रखते हुए लिया जाएगा- शिवसेना की वर्तमान स्थिति, महाराष्ट्र की राजनीति और 2024 चुनाव की तैयारी. 

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