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मोहभंग? कभी था मजबूत वोटबैंक, अब आदिवासी इलाकों में हार रही बीजेपी

आदिवासी समुदाय भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मजबूत वोटबैंक माना जाता रहा है, जिसके सहारे सत्ता के सिंहासन पर विराजमान रही है. झारखंड के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को आदिवासी समुदाय ने सिरे से नकार दिया. इससे पहले बीजेपी को छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में आदिवासियों के चलते सत्ता गंवानी पड़ी है.

रघुवर दास और पीएम नरेंद्र मोदी रघुवर दास और पीएम नरेंद्र मोदी

  • झारखंड में आदिवासी बेल्ट में बीजेपी को करारी हार
  • बीजेपी ने आदिवासियों की नाराजगी के चलते गंवाई सत्ता

आदिवासी समुदाय भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मजबूत वोटबैंक माना जाता रहा है, जिसके सहारे पार्टी सत्ता के सिंहासन पर विराजमान रही है. मौजूदा बदले हुए राजनीतिक समीकरण में आदिवासियों का बीजेपी से लगातार मोहभंग होता जा रहा है. आदिवासियों की नाराजगी का नतीजा यह है कि एक के बाद एक राज्य  बीजेपी के हाथों से खिसकते जा रहे हैं. झारखंड के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी को आदिवासी समुदाय ने सिरे से नकार दिया. इससे पहले बीजेपी को छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में आदिवासियों के चलते सत्ता गंवानी पड़ी है.

झारखंड में आदिवासी सीटों पर सफाया

झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे से साफ है कि पिछले कुछ बरसों से जो आदिवासी बीजेपी को सिर आंखों पर बिठाकर रखते थे, जहां से बीजेपी पर्याप्त सीटें जीतकर सत्ता पर विराजमान होती रही है, वहां हालात बदल गए हैं. बीजेपी का यह दुर्ग इस चुनाव में पूरी तरह से दरक गया है. झारखंड की कुल 81 विधानसभा सीटों में से 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. ये सारी सीटें आदिवासी बहुल इलाकों की हैं, जहां बीजेपी को तगड़ा झटका लगा है.

इन 28 सीटों में से बीजेपी को महज तीन सीटें मिली हैं और बाकी 25 सीटों पर विपक्षी दलों को जीत मिली है. इनमें जेएमएम को 19, कांग्रेस 5 और जेवीएम ने एक आदिवासी सीटों पर जीत दर्ज किया है. बता दें कि 2014 के चुनाव में आदिवासी बहुल सीटों के नतीजों को देखे तो बीजेपी को 11 सीटें मिली थी और 13 सीटें जेएमएम ने जीता था. आजसू को 2 सीटें और दो सीटें अन्य दल को मिली थी. इस तरह से बीजेपी को आरक्षित सीटों पर 8 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है.

दरअसल झारखंड में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन, मूलनिवास की तारीख बढ़ा कर बाहरियों को सुविधा देना और पत्थलगड़ी वाले गांवों के निवासियों पर देशद्रोह के केस  बीजेपी शासन के लिए झारखंड में महंगा पड़ा है. भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का विरोध आदिवासियों ने जोर शोर से किया, जो आदिवासियों के हक को कमजोर कर रहा था.

मूलनिवास का मामला भी काफी दिनों से चला आ रहा था. झारखंड के लोगों की मांग रही थी कि राज्य में साल1932 की जनसंख्या के आधार पर ही मूल निवासी माना जाए, लेकिन बीजेपी ने इसे बढ़ाकर 1985 कर दिया था. इससे बाहर से आने वाले लोगों को काफी लाभ हुआ. इससे आदिवासी समुदाय में काफी गुस्सा रहा, जिसे रघुवर दास सरकार को चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा है.

छत्तीसगढ़ में भी लग चुका है झटका

झारखंड से पहले बीजेपी को आदिवासी समुदाय की नाराजगी का सामना छत्तीसगढ़ में उठाना पड़ा था, जिसके चलते वहां सत्ता से हाथ धोना पड़ा था. छत्तीसगढ़ की 90 में से 29 सीटें आदिवासी बहुल इलाकों से हैं, जो उनके लिए आरक्षित हैं. पिछले 15 साल से बीजेपी इन्हीं आदिवासी सीटों के भरोसे सत्ता में आती रही है, लेकिन पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में आदिवासियों ने बीजेपी को सिरे से नकार दिया. आदिवासी सुरक्षित 29 विधानसभा सीटों में से बीजेपी को महज तीन सीट मिली. जबकि,  कांग्रेस को 25 सीटें मिली थी और एक सीट पर अजीत जोगी जीतने में कामयाब रहे थे.

एमपी में भी आदिवासियों का हुआ था मोहभंग

मध्य प्रदेश में आदिवासी मतदाता किंगमेकर माना जाता है. शिवराज सरकार की सत्ता से विदाई में आदिवासी समुदाय की अहम भूमिका रही है जबकि बीजेपी इन्हीं आदिवासियों के सहारे लगातार 15 साल तक सत्ता में बनी रही. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में आदिवासियों का ऐसा मोहभंग हुआ कि बीजेपी की अपनी सत्ता गंवानी पड़ गई. मध्य प्रदेश में कुल 47 सीटें आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित है, इनमें 31 सीटें कांग्रेस को मिली जबकि16 सीटें बीजेपी को और एक सीट पर निर्दलीय को जीत मिली है.

राजस्थान में कुल 200 सदस्यीय विधानसभा में 25 आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित सीटें हैं. इनमें से कांग्रेस को 12, बीजेपी को 9, बीटीपी को 2 और निर्दलीय की 2 सीटों पर जीत मिली थी. राजस्थान के आदिवासी बेल्ट में बीजेपी की मजबूत पकड़ रही है, लेकिन विधानसभा चुनाव के नतीजों से साफ है कि आदिवासी समुदाय का मोहभंग हुआ है.

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