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46 साल बाद भी पहचान के लिए मोहताज है लद्दाख का ये गांव

जमीन के राजस्व दस्तावेजों के ना होने से गांव के करीब 500 लोग 46 साल बाद भी जम्मू-कश्मीर के निवासी होने का प्रमाण नहीं दे पा रहे हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

जम्मू-कश्मीर के लद्दाख में भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1971 में हुए युद्ध के समय से एक गांव अब तक सरहदों के बीच अटका पड़ा है. 1971 के युद्ध के समय पाकिस्तान के 5 गांव भारत के कब्जे में आए और इन 5 में से 4 गांवों का लैंड रेकॉर्ड भारत में बना लेकिन एक गांव अब भी सरहदों के बीच लटका है. इस गांव का नाम है त्याक्षी.

जमीन के राजस्व दस्तावेजों के ना होने से गांव के करीब 500 लोग 46 साल बाद भी जम्मू-कश्मीर के निवासी होने का प्रमाण नहीं दे पा रहे हैं. साल 1971 के युद्ध के दौरान जब ग्रामीण विस्थापित हुए और कई इलाके भारतीय नियंत्रण में आ गए. उस समय त्याक्षी, तुरतुक, चुलुंका और थांग के राजस्व दस्तावेज स्कर्दू में रह गए जो उस समय जिला मुख्यालय था. स्कर्दू इन दिनों पाक अधिकृत कश्मीर में आता है.

स्कूर्द और गांवों के लोगों को अपनी पहचान के लिए जूझना पड़ रहा है. भारत के बाशिंदे बनने और जम्मू कश्मीर की नागरिकता प्रणाम पत्र पाने के लिए गांवों के लोगों को अदालत से एफिडेविट लेना पड़ता है. गांवों के मुखिया इब्राहिम समी का कहना है कि उन्हें गांवों में इस कारण से विकास कार्यों में भी पीछे छोड़ दिया जाता है. यहां तक कि राशन पाने के लिए भी उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ती है.

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