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कश्मीर: आतंकियों के लिए पहले भी आ चुकी है सरेंडर पॉलिसी, नई स्कीम में क्या होगा खास

कश्मीर घाटी में एक नई सरेंडर स्कीम की शुरुआत होने वाली है जिसका मसौदा केंद्र की मोदी सरकार को सौंप दिया गया है. यह स्कीम अभी फाइनल नहीं है लेकिन एडवांस स्टेज में जरूर है. स्कीम के मुताबिक ऐसे युवाओं को सुधारने के लिए मुस्लिम बहुल कश्मीर से बाहर भेजा जा सकता है.

सरेंडर पॉलिसी से घाटी में लौटेगी बहार! (PTI) सरेंडर पॉलिसी से घाटी में लौटेगी बहार! (PTI)

  • आतंकियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने की अपील
  • हथियार छोड़ने वालों को मिलती हैं कई सुविधाएं

आतंकी घटनाओं को देखते हुए जम्मू कश्मीर में सरकार और सुरक्षाबल मिलकर नई सरेंडर पॉलिसी लाने की तैयारी में हैं. ये कोशिश इसलिए हो रही है ताकि युवाओं को आतंक का रास्ता छोड़ने के लिए मजबूर किया जा सके और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जा सके. ऐसे युवाओं को हिंसा छोड़ अमन-चैन से रहने के मौके दिए जाएंगे.

कश्मीर घाटी में एक नई सरेंडर स्कीम की शुरुआत होने वाली है जिसका मसौदा केंद्र की मोदी सरकार को सौंप दिया गया है. यह स्कीम अभी फाइनल नहीं है लेकिन एडवांस स्टेज में जरूर है. स्कीम के मुताबिक ऐसे युवाओं को सुधारने के लिए मुस्लिम बहुल कश्मीर से बाहर भेजा जा सकता है. हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब सरकार नई सरेंडर पॉलिसी ला रही है. फिलहाल जो सरेंडर की पॉलिसी चल रही है उसे 2004 में अमल में लाया गया था. इसके तहत हथियार छोड़ने वाले युवाओं को स्टाइपेंड के रूप में नकद रुपये दिए जाते हैं. उन्हें रोजगार के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग भी दी जाती है.

नई पॉलिसी पर इसलिए जोर..

सरेंडर पॉलिसी पर इसलिए ज्यादा जोर दिया जा रहा है क्योंकि इस साल 15 जुलाई तक मारे गए 136 आतंकवादियों में से केवल 15 विदेशी थे और नौ की पहचान की जानी बाकी है. उनमें से बाकी स्थानीय थे. गृह मंत्रालय के सूत्रों ने ऐसी जानकारी दी. पिछले साल इस समय अवधि में 126 आतंकवादी मारे गए थे. सूत्रों ने बताया है कि आर्टिकल 370 हटने के बाद आतंकियों की कमर टूटी है, आतंक का सफाया भी हुआ है. मारे गए आतंकियों में सबसे अधिक 50 से ज्यादा आतंकी हिज्बुल मुजाहिदीन के हैं. लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद से करीब 20-20 आतंकी शामिल हैं और वहीं ISJK और अंसार गजवात-उल-हिंद के 14 आतंकी शामिल हैं.

2004 में लाई गई रिहैबिलिटेशन पॉलिसी में हथियार छोड़ने वाले आतंकवादियों को डेढ़ लाख रुपये के अलावा हर महीने 2000 रुपये दिए जाते हैं. इस पॉलिसी का फायदा 400 से ज्यादा आतंकवादियों ने उठाया है. हालांकि इसे पूरी तरह सफल नहीं कह सकते क्योंकि युवा अब भी आतंक का रास्ता अख्तियार करते हैं. एक आंकड़े के मुताबिक 1995 में पहली बार आतंकियों के लिए सरेंडर और रिहैबिलिटेशन पॉलिसी लाई गई, इसके बाद इसे 2004, 2010 में बदला गया. अब फिर इसमें बड़ा सुधार कर नई सरेंडर पॉलिसी लाने की तैयारी चल रही है.

पहले भी आ चुकी है सरेंडर पॉलिसी

आतंकियों को सही रास्ते पर लाने के लिए सबसे पहले सरेंडर पॉलिसी 1995 में लाई गई. इसमें सरेंडर करने वाले आतंकवादी को डेढ़ लाख रुपये की एफडी और वोकेशनल ट्रेनिंग देने का प्रावधान था. इस पॉलिसी ने अच्छा काम किया और 2200 आतंकवादियों ने अपने हथियार त्याग दिए. दूसरी पॉलिसी 2004 में आई जिसमें हिंसा का रास्ता छोड़ने वाले आतंकवादियों को डेढ़ लाख रुपये देने के अलावा हर महीने 2000 रुपये स्टाइपेंड के तौर पर दिए जाने लगे. इस पॉलिसी के अंतर्गत 400 से ज्यादा आतंकियों ने हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा अपनाई.

इसके अलावा सरकार ने 2010 में उन आतंकियों के लिए भी अलग से पॉलिसी बनाई जो सीमा पार जाकर दहशतगर्दी में उतर आए थे. ये उनके लिए था जो सीमा पार से कश्मीर लौट आएं और अमन-चैन से जीवन यापन करें. ऐसे आतंकियों के लिए चार पॉइंट बताए गए जिसके रास्ते वे भारत में लौट सकते थे. ये 4 रास्ते थे- पंजाब का वाघा, कश्मीर का सलामाबाद, पुंछ का चकन दा बाग और नई दिल्ली का इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट. इस पॉलिसी के तहत भी कई आतंकी भारत लौटे और हिंसा को हमेशा के लिए विदा कर दिया.

पहले से घटीं घटनाएं

नई प्रस्तावित पॉलिसी का क्या असर होगा यह देखने वाली बात होगी लेकिन पिछले कुछ महीने के आंकड़े बताते हैं कि घाटी में दहशतगर्दी की घटनाएं पहले से घटी हैं. लगातार चलाए जा रहे आतंकवाद विरोधी अभियान की वजह से हमारे सुरक्षाकर्मी आतंकियों पर लगाम लगाने में कामयाब रहे हैं. कुछ साल पहले तक यहां पर 300-350 आतंकवादी सक्रिय थे लेकिन अब वो 200 से भी कम रह गए हैं.

जम्मू कश्मीर में जिस तरीके से पिछले साल आर्टिकल 370 हटाया गया उसका एक साल पूरा हुआ है. अनुच्छेद 370 हटने के बाद सुरक्षा हालात में काफी सुधार हुआ है. जहां पिछले साल की तुलना में आतंकी घटनाओं में काफी कमी आई है, वहीं आए दिन होने वाली पत्थरबाजी की घटनाओं में काफी कमी देखी गई है. सुरक्षा एजेंसियों की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल की तुलना में इस साल जनवरी से लेकर जून महीने तक सिर्फ 40 पत्थरबाजी की घटनाएं सामने आई हैं. 2019 में सुरक्षा बलों के खिलाफ कुल 666 बार पत्थरबाजी हुई जबकि 2018 में 851 के करीब ऐसे मामले सामने आए थे. 2017 में 623 पत्थरबाजी की घटनाएं हुईं, जिनमें 574 सीआरपीएफ के जवान घायल हो गए थे. 2017 में 199 गाड़ियां भी इन पत्थरबाजी के दौरान तोड़ दी गई थीं. 2016 में सबसे ज्यादा पत्थरबाजी की घटनाएं हुई हैं. 1587 पत्थरबाजी की घटना के साथ 3005 सीआरपीएफ के जवान इन पत्थरबाजी की घटनाओं में घायल हुए थे.

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